बिहार
का लोकनाट्य ‘नटुआ नाच’- ओम प्रकाश भारती
नटुवा नाच बिहार और
नेपाल के मैथिली भाषी अंचल का जनप्रिय लोकनाट्य रूप है। दशहरा, दीवाली तथा छठ जैसे त्यौहारों पर लगने वाले मेले का मुख्य आर्कषण नटुवा
नाच ही होता है। नटुवा नाच का मंचन प्राय रात्रि में फसलोत्सव, विवाह या अन्य सामाजिकोत्सवों पर होता है। फिल्म, टेलीविज़न
तथा मनोरंजन के अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आए बदलाव के बावजूद नटुवा नाच की
लोकप्रियता तनिक भी कम नहीं हुई है, बल्कि नाट्य दलों की
संख्या और मिलने वाले मानदेय की राशि में दिनोंदिन बढ़ोतरी हुई है। मैथिली भाषी
अंचल में लगने वाले मेले में फिल्म, आरकेस्ट्रा, बाईजी का नाच, कव्वाली तथा नटुवा नाच का प्रदर्शन
यदि एक साथ हो रहा हो तो सबसे अद्दिक दर्शक नटुवा नाच के समक्ष देखे जा सकते हैं।
आज लगभग पाँच-छह सौ नाट्य दल उत्तरी बिहार और नेपाल के दक्षिण पूर्वी अंचलों में
सक्रिय हैं।
नटुवा /लौंडा /अभिनेता - पद्मश्री रामचंद्र मांझी
नटुवा नाच दो शब्द
मिलकर बना है, जहाँ नटुवा का अर्थ नर्तक और नाच का
नृत्य। नाट्य सम्बन्द्दी ग्रंथों के अंतःसाक्ष्यों के अनुसार 12वीं शताब्दी से 15वीं शताब्दी के बीच नाट्य के लिए
कोई अलग शब्द प्रचलित नहीं था, बल्कि नृत्य और नाट्य के लिए
नाच शब्द ही रूढ़ था।
नटुवा नाच का कोई
लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है। सिर्फ वर्णरत्नाकर में ‘लोरिक नाच’ का उल्लेख हुआ है। वर्णरत्नाकर में नटुवा
नाच से सम्बन्धित दो शब्दों का उल्लेख हुआ है- लोरिक नाच और लेवारी। लोरिक,
नटुवा नाच मंच का आज भी लोकप्रिय कथानक है। नटुवा नाच में विदूषक को
लेबरा कहा जाता है तथा उसके द्वारा अभिनीत हास्यप्रसंग को लेबारी कहा जाता है।
भोजपुरी में यही ‘लेबार’ लबार बन जाता
है और ‘लेबारी’ लबारी। वर्णरत्नाकर 13वीं शताब्दी में ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा लिखित विश्वकोशीय ग्रंथ है,
जिसमें तत्कालीन समाज में प्रचलित कलारूपों का उल्लेख हुआ है। लेकिन
लोरिक नाच का प्रदर्शन स्वरूप क्या था इसका पता वर्णरत्नाकर से नहीं चलता है। बहुत
सारे विद्वानों ने नटुवा नाच को कीर्तनियाँ, अंकिया तथा
पारसी थियटर से प्रभावित और इसका काल इन नाट्यरूपों के बाद का माना है। इस विषय पर
पुनर्विचार करना होगा। वर्णरत्नाकर में वर्णित ‘लोरिक नाच’
और लेबारी, जिसका संबंध आज भी नटुवा नाच से है,
किसी न किसी प्रकार सम्पुष्ट करता है कि नटुवा नाच की परम्परा 13वीं शताब्दी से ही है, भले ही आज यह उस रूप में नहीं
है, जिस रूप में 13वीं शताब्दी में रहा
होगा। लोरिक के अलावा बिहुला-बिषहरी, सत्य हरिश्चन्द्र तथा
गोपीचन्द, भरथरी, सोरठी बृजभार आदि
कथानकों का मंचन 13वीं से 15वीं
शताब्दी के बीच आरंभ हुआ होगा। सलहेस, रेशमा-चूहरमल, नैका-बनिजरा जैसे कथानकों का मंचन बाद के दिनों में आरंभ हुआ, क्योंकि इन कथानकों की घटना सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच का लगता है।
किसी भी स्तर में नटुवा नाच की समानता कीर्तनियाँ, बिदापत और
अंकिया नाट से नहीं है। अभिनय पद्धति, गीत-संगीत, मंचशिल्प आदि रूपों में यह बिलकुल भिन्न है।
कीर्तनियाँ और अंकिया
नाट्य का संगीत कहीं-न-कहीं मार्गी संगीत से प्रभावित है, जबकि नटुवा नाच में ठेठ लोक संगीत अपने मूल रूप में उपस्थित है। कीर्तनियाँ
और अंकिया नाट की मंच व्यवस्था सुनियोजित है जबकि नाच में मंच व्यवस्था बहुत ही
अनौपचारिक है। नटुवा नाच की वेषभूषा रामलीला और पारसी रंगमंच तथा अन्य पारम्परिक
नाट्य रूपों जैसी है। अनुमानतः यह बदलाव भी उन्नीसवीं सदी के बाद आरंभ हुआ होगा।
कुछ बुजुर्ग कलाकारों से सम्पर्क करने पर पता चला कि राजा, देवता
या अन्य विशिष्ट पात्रों के लिए जरीदार कोट, पायज़ामा का
उपयोग पहले नहीं होता था। तेरहवीं से सत्रहवीं सदी के बीच द्दोती या अंगवस्त्र पहन
कर ही कलाकार, राजा या देवता की भूमिका में आते थे।
नटुवा नाच के उद्भव
की परिस्थितियाँ स्थानीय रहीं। जिस अंचल में नटुवा नाच का उद्भव और विकास हुआ है, वहाँ की संस्कृति नदी मातृक है। छह महीने आवागमन लगभग बंदप्राय रहता है।
अंचल के लोगों का बाहर आना-जाना कम रहा। 19वीं सदी के
उत्तरार्द्ध में रोजगार की खोज में इस अंचल के लोगों का मोरंग (पूर्वी नेपाल) और
कामरूप (असम) आना-जाना शुरू हुआ। बहुत बाद में बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में
कुछ लोगों का कोलकाता आना जाना शुरू हुआ, वह भी बहुतायात में
नहीं। कुछ विद्वानों की राय है कि नटुवा नाच में चित्रकारी किए पर्दे का प्रयोग
पारसी रंगमंच से प्रेरित है। इस संबंध में पुनर्विचार करना आवश्यक है। नटुवा नाच
के रंगमंच पर चित्रकारी किये हुए पर्दों का प्रयोग पारसी रंगमंच से नहीं, बल्कि पुरानी नाट्य परम्पराओं से ग्रहण की गई है। इस इलाके में पारसी
कम्पनियाँ नाटक करने गईं ही नहीं। हो सकता है एक-आद्द मेले में कोई छोटी-मोटी
कम्पनियाँ कभी कभार पहुँच गई हो। कहा जाता है कि दरभंगा महाराज द्वारा किसी पारसी
कम्पनी को नाट्य प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया गया था। लेकिन इन नाटकों को देखने
का अवसर शायद ही नटुवा नाच के प्रयोक्ताओं और कलाकारों को मिलें हों। मगद्द अंचल
में तीसरी शताब्दी में यमपटक (चित्रकारी किए हुए पर्दे) का उल्लेख मिलता है।
पूर्वांचल भारत में ही विकसित पारम्परिक नाट्य अंकिया नाट में चित्रकारी किए हुए
पर्दे का प्रयोग करने का उल्लेख मिलता है। वर्णरत्नाकर (13
वीं सदी) में ‘यमनिका’ (यमनिका काँ
अभ्यन्तर रंगभूमिक अथ नृत्यवर्णना-59क) का उल्लेख मंच पर
पर्दे के रूप में हुआ है।
नाच कलाकार समूह को
मंडली तथा अभिनेता को नटुवा और अभिनय को पाट कहा जाता है। एक मंडली में लगभग
पन्द्रह-बीस नटुवा होते हैं। मंडली प्रद्दान को गुरु या मास्टर कहा जाता है, जो नटुवा नाच का प्रोड्यूसर ही नहीं, प्रशिक्षक भी
होता है। स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुषों द्वारा की जाती हैं।
नटुवा नाच का
पूर्वरंग गायन और नृत्य से आरंभ होता है, जो चार
चरणों में पूरा होता है। प्रथम चरण में समाजी मंच पर आते हैं, जिसमें साज बजाने वालों को बजनियाँ तथा गाने वालों को गबैया कहा जाता हैं।
गाने-बजाने वालों को कभी-कभी गायन-बायन भी कहा जाता है। अंकिया नाट में भी
गायन-वाद्य मंडली को गायन-वायन कहा जाता है। नटुवा नाच में प्रद्दान गायक मूलगैन
कहलाता है। टीम के संचालक होने की वजह से मूलगैन को गुरु, मास्टर
या कम्पनी आदि नामों से पुकारा जाता
गायनवादन मंडली मंच पर पूरब या दक्षिण दिशा की ओर बैठते हैं। उसके बाद झाल,
करताल, ढोलक, नगड़ा,
झाझ, बाँसुरी, क्लॉरनेट
आदि को एक साथ बजाकर, विशेष प्रकार की द्दुनें निकालते हैं,
जिसे ‘संगत’ कहा जाता
है। संगत आरम्भ होते ही, दर्शक प्रदर्शन स्थल की ओर कूच करते
हैं। पूर्वरंग के दूसरे चरण में मंच पूजा की जाती है। कहीं-कहीं भगत पूजा की भी
परम्परा मिलती है। भगत पूजा में नटुवा अपने शरीर में देवता आने का स्वांग करता है
और मंडली के अन्य सभी नटुवा को ‘पान’ (दुष्टात्माओं
से रक्षा हेतु वरदान) देता है। पूर्वरंग के तीसरे चरण में मंडली के सभी नटुवा मंच
पर आते हैं और बंद्दनिया गाते हैं। बंद्दनिया में नटुवा स्थान विशेष के अनुसार
चारों दिशाओं में स्थित प्रमुख देवी-देवताओं का स्मरण करते हुए नाच सफल होने में
सहायता के लिए प्रार्थना करते हैं। पूर्वरंग के चतुर्थ और अंतिम चरण में होता है
हँसने-हँसाने का प्रसंग। बंघनियां के बाद मंच पर नट और नटी का प्रवेश होता है। नटी
स्त्री वेश में पुरुष ही होता है, वह नाच में विभिन्न
पात्रों की भूमिका भी करता है। नटी का कोई अलग नाम नहीं मिलता लेकिन लेबरा उसे
बार-बार-‘‘हे गे छौड़ी’’ (ऐ लड़की) कहकर
पुकारता है। नट को लेबरा, जोकर, बिकटा
आदि कई नामों से पुकारा जाता है, पर सबसे अद्दिक लोक प्रचलित
नाम लेबरा ही है। ‘लेबरा’ ही नाच का सूत्रद्दार
और विदूषक होता है। कई पात्रों की भूमिका ‘लेबरा’ अकेले करता है। अद्दिकतर कथानकों में वह नायक का दोस्त और सलाहकार होता है,
वह मंच का संचालन और उद्घोषणा भी करता है। सही अर्थों में लेबरा नाच
को सामाजिक बनाता है।
नाच का मंच जिसे नटुवा रंगभूमि कहते
हैं,
आठ-नौ चौकियों को जोड़कर बनाया जाता है। जिसकी लम्बाई-चौड़ाई क्रमशः
तेरह-चौदह फुट के करीब होती है। मंच के ऊपर बाँस के सहारे तिरपाल या फूस की छत
बनाई जाती है। ध्वनि व्यवस्था के लिए माइक को मंच पर खम्भे के सहारे टांग दिया
जाता है। नाच के मंच को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। नेपथ्य, मंच (अभिनय
क्षेत्र) और मंच के आगे का भाग। नेपथ्य का प्रयोग साजघर (ग्रीनरूम) के रूप में
किया जाता है, साथ ही यह स्थल अभिनेताओं के द्वारा नेपथ्य से
बोले जाने वाले संवाद गीत एवं आकाशभाषित आदि प्रसंगों के लिए उपयोग में लाया जाता
है। मंच पर समाजी बैठते हैं तथा मुख्य अभिनय क्रिया यहीं सम्पन्न होती है। मंच के
आगे या नीचे का भाग का उपयोग भी नटुवा अभिनय के लिए करता है। कई दृश्यों को एक साथ
दिखाने तथा स्थान परिवर्तन बोद्द के लिए भी मंच के आगे का भाग उपयोग में लायी जाती
है, जैसे एक ही समय राजा का महल और युद्ध का मैदान दिखाना
होता है तो राजा के महल का दृश्य का मंच पर दिखाया जाता है और युद्ध क्षेत्र मंच
के आगे।
मंच प्रकाश के लिए पहले मशाल या
गैसबत्ती का प्रयोग होता था, अब बिजली की सुविद्दा
होने से साद्दारण बल्ब जलाकर काम चलया जाता है। रूपसज्जा के बारे में नटुवा अद्दिक
सजग है। नटुवा अपना-अपना मेकअप स्वयं करते हैं। रूपसज्जा में सिन्दूर, कुमकुम, खड़िया, गेरू, काजल, मुर्दाशंख आदि पारम्परिक सामग्री का उपयोग
किया जाता है। स्त्री पात्र के लिए ‘विग’ का प्रयोग तथा बूढ़े पात्र के पके मूंछ -दाढ़ी के लिए सन (पटसन) प्रयुक्त
होता है। मोटा-मोटी नाच का कथानक पौराणिक होता है, इसलिए
रूपसज्जा अद्दिक चमकीली और भड़कीली होती है, जो मद्धिम प्रकाश
में भी अभिनेता के चेहरे के भावों को स्पष्ट कर देता है। वेशभूषा सम्पन्न नाच
मंडली उम्दा समझी जाती है। मानवेत्तर प्राणी के अभिनय के लिए मुखौटे का भी प्रयोग
किया जाता है। युद्ध सामग्री बाँस या लकड़ी की बनी होती है।
नाच की दृश्य-रचना अन्य लोकनाट्यों की
तरह सांकेतिक और काल्पनिक होती है। हाव-भाव तथा कथोपकथन द्वारा स्थान परिवर्तन का
सहज बोद्द कराया जाता है। यथा ‘राजा सलहेस’ के नाच में लेबरा नटी से मंच को निमित कर कहता है- ‘ई
भेलो लोलन बाग फुलवारी’ (यह है लोलन बाग फुलवाड़ी)। यहाँ
दर्शक समझ जाता है कि अब लोलन बाग फुलवारी वाला दृश्य यहीं होगा। कहीं-कहीं
चित्रकारी किए पर्दे का प्रयोग भी दृश्य विशेष के लिए किया जाता है।
नटुवा नाच की सबसे
बड़ी विशेषता है उनका अभिनय शिल्प विद्दान। अधिकांश संवाद गेय होते हैं। बीच-बीच
में वार्तालाप गद्य में होता है। अच्छे अभिनेता के लिए अच्छा गायक होना जरूरी होता
है। नृत्य के साथ गायिकी कठिन साधना है और
उसे नटुवा नाच के अभिनेताओं में देखा जा सकता है। गायकी भी उच्च लय में और भी कठिन
है। लेबरा के हास्य प्रसंग के बाद जब पात्र मंच पर आता है, सबसे पहले सुमिरन (देखें पृष्ठ 149) और उसके बाद अपना परिचय देता है।
अइ हमरो के नाम हो लागे सिरी ते सलहेस नै यौऽऽऽ
अइ चौदह कोस राज हमरा भगवान नै देलके नै यौऽऽऽ
अइ छोट भाय के नाम लागे मोती राम दुलरूवा नै यौऽऽऽ
अइ भागिना के नाम लागे कारिकंथ दुलरूवा नै योऽऽऽ
अइ कहाँ गेले किए भेलौ मोतीराम दुलरूवा नै रेऽऽऽ
अइ जलदी से आबिहें रे बबुआ राज तँ दरबार मे नै रेऽऽऽ
अर्थात्, मेरा नाम राजा सलहेस है,
राज महिसोथा मेरा घर है। छोटे भाई का नाम मोती राम है तथा भागिन का
नाम कारिकंथ है। भाई मोती राम कहाँ हो, जल्दी से राज दरबार
में आओ ?
पार्श्व मंच में खड़े
अभिनेता को जो मोतीराम की भूमिका कर रहा है, सलहेस की
पुकार सुनाई देती है। वह वहीं से गाते हुए मंच पर प्रवेश करता है -
अइ सुनिये अवाज हो भैया सब, राजा सलहेस के नै
योऽऽऽ
अइ कोन तऽ बिपतिया भैया पड़लौ हो आयऽऽऽ
अइ कौन तऽ बिपतिया राज महिसोथा मेऽऽऽ
अइ एक कोस चलले मोती राम कोस तऽ दोसर वे होऽऽऽ
अइ तेसर कोस जुमलै दुलरूवा राज तऽ महल मेऽऽऽ
संवाद गीतों को गाकर, मंच पर चार
तीन चक्कर लगाकर मोती राम राजा सलहेस के समक्ष जाता है, जो
मंच पर ही उपस्थित है तथा राजदरबार में चहलकदमी कर रहा है। एक दूसरे की नज़रें
मिलती हैं। मोतीराम झुककर प्रणाम करता है, सलहेस गले लगाते
हैं। मोतीराम, (सलहेस) से ‘‘हे भाई
आपको क्या बिपति आ पड़ी है, राज महिसौथा में? सो आज आपने दुलरुवा मोतीराम को याद किया।’’ राजा
सलहेस कहते हैं, ‘‘देवी दुर्गा स्वप्न में प्रकट हुई थीं।
उनका कहना है कि राजपोखरिया गढ़ कंचन में राजा कुलेश्वर की फुलवाड़ी में नाना प्रकार के फूल खिले हैं, सो वहाँ से मुझे फूल लाकर देवी दुर्गा को चढ़ाने हैं, मेरे पीछे तुम राजपाट का खयाल रखना।’’ इतना कहकर
राजा सलहेस कंचनगढ़ के लिए प्रस्थान करते हैं। नाटक आगे बढ़ता है। नटुआ नाच में
अभिनेता संवाद या गीतों को रटते या याद नहीं करते हैं, बल्कि
घटनाओं पर गीत या संवादों का तत्काल आशु रचना करते हैं। पात्रों के बीच ‘बतकही’ और बात से बात निकालना, उसकी व्याख्या करना, उससे भी ज़्यादा दृश्यों में
संजोकर जीवन्त बनाना नटुवा नाच के अभिनय पद्धति की विशेषता है। अभिनेता को सिर्फ
घटनाक्रम का पता होता है। गीत और संवादों की आशु रचना वे स्वयं करते हैं। अतः
नटुवा नाच के अभिनेता, अच्छे गायक के साथ ही बेहतर आशु कवि
भी होते हैं। अभिनेता मंच पर घूम-घूमकर ऊँची आवाज में लयात्मक ढंग से संवाद बोलते
हैं ताकि सभी दिशाओं में बैठे दर्शक देख-सुन सकें। नटुवा नाच अभिनय की सबसे बड़ी
विशेषता है - भावनिरपेक्षता। ब्रेख्त के जिस नाट्य प्रयोग ने
(महाकाव्य रंगमंच) बींसवी शताब्दी में थियेटर की दुनिया में द्दूम मचा दी थी,
वह तत्व नाच के अभिनय में विद्यमान है। नाच में जब कोई ऐसा दृश्य
आता है कि दर्शक कैथारसिस (भावप्रमणता) का शिकार हो, भावविभोर
हो जाता है तो यकायक ‘लेबरा’ मंच पर
आता है और दर्शकों से कुछ गुदगुदाने वाली बात कह हँसा देता है। इस प्रकार नाटकीय
स्थिति में रुकावट तो आती है पर दर्शकों को कैथारसिस से मुक्ति मिलती है। वाचिक
अभिनय के अलावे नटुवा आंगिक, अहार्य और चित्राभिनय में भी
प्रवीण होते हैं। आंगिक अभिनय पर लोक जीवन की छाप होती है। नटुवा नाच के कलाकार
मजदूर वर्ग से आते हैं। एक दिन मजदूरी नहीं करने की विवशता उनके परिवार को भूखा रख
सकती है। श्रम से गठित शरीर मंचाभिनय में बड़ा काम आता है। नटुवा नाच के अद्दिकांश
कथानक वीर और करुण रस के हैं। वीरता श्रमिक वर्ग की दमित भावना है और करुणा में तो
उनका जीवन ही सराबोर है। इन दोनों भावनाओं की स्वच्छन्द अभिव्यक्ति के लिए इन
अभिनेताओं को कहीं से कुछ सीखना नहीं होता है, बल्कि कुछ पल
के लिए मंच पर वह अपने ही जीवन को जीता है। वीर रस के अभिनय में विशेष प्रकार के
युद्ध ताल या अभियान ताल बजाए जाते हैं। नटुवा, मंच पर युद्ध
के दृश्य के लिए तलवारबाजी का बेहरतर प्रदर्शन करते हैं। सैनिकों के बीच की लड़ाई
का दृश्य लड़बाजी (लाठी भाँजने की कला) के द्वारा प्रदर्शित की जाती है। कभी कभार
दो योद्धाओं के बीच की लड़ाई का दृश्य मल्लयुद्ध के द्वारा दिखाया जाता हैं।
मल्लयुद्ध में धोबी पाट और मुसकी बांध का दृश्य बड़ा ही रोमांचक होता है। सामान्य
रूप से कपड़ों को मेढ़कर बनाया गया कोड़ा भी मारपीट के दृश्य में प्रभावोत्पादक होता
है। कपड़े से बने कोड़ों को इस तरह झटका जाता है कि उससे फटफट की आवाज़ें निकलती हैं
तथा पीटने का भ्रम उत्पन्न होता है। मानवेत्तर प्राणियों तथा नदी, नाव, घुड़सवारी आदि दृश्य या घटनाओं को दर्शाने के
लिए सांकेतिक और चित्राभिनय का सहारा लिया जाता है। अहार्य अभिनय में नटुवा माहिर
होते हैं। सामान्य या पात्रोचित वेशभूषा के अलावे नटुआ नाच के कलाकार वेशभूषा के
द्वारा ही विभिन्न मानवेत्तर प्राणियों की अनुकृति मंच पर प्रस्तुत करते हैं।
नटुवा नाच के अधिकांश
कथानक लोकगाथाओं से लिए गए हैं। इन गाथाओं की पहचान कथानक से पहले गायकी की धुनों
से कर ली जाती है। नटुवा नाच के कलाकारों ने इन सभी का प्रयोग गायकी में किया है।
मसलन सलहेस और लोरिक नाच में गायकी की मुख्य धुनें सलहेस और लोरिक की गाथाओं जैसी
हैं। जहाँ बीच-बीच में यथावसर पूर्वी, कजरी,
बारहमासा, जँतसार, चैतार,
लगनी, पराती, निर्गुण,
गोदना, पमरिया, सोहर,
समदौन आदि लोकद्दुनों का प्रयोग भी नटुवा नाच में होता है। सुमिरन
या बंधनियाँ गाते समय प्रायः कोसिका (कोसी नदी के गीत) या देवी-देवताओं के गीत की
द्दुनें प्रयुक्त होती हैं। संवाद गीतों को अभिनेताओं द्वारा गाया जाता है।
अभिनेताओं द्वारा गाए गए संवाद को पुनः समाजी द्वारा गाया जाता है, जिसका नेतृत्व ‘मूलगैन’ करता
है। बड़ा ही रोमांचक होती है यह पद्धति, अभिनेता संवाद गीतों
को जिस लय और ताल के साथ गाते हैं, समाजी उसी संवाद गीतों को
इससे अलग लय और ताल में गाते हैं। जब तक समाजी संवाद गीतों को गाते हैं तब तक
अभिनेता उन गीतों के भावों को आंगिक भंगिमाओं के द्वारा अभिव्यक्त करते हैं। गीत
स्वर प्रदान नहीं, बल्कि बोल प्रधान होते हैं। वाद्यों मे
ढोल, नगाड़ा, हारमोनियम, पिपही (सुषिर वाद्य) झांझ, करताल आदि बजाए जाते हैं।
नृत्य का कोई संयोजित या संगठित रूप नटुवा नाच में देखने को नहीं मिलता है। लेकिन
संवाद गीतों के साथ अंग संचालन और विशेष भावाभिव्यक्ति के समय आंगिक विक्षेप किसी-न-किसी
नृत्य परम्परा का बोध कराता है। पूर्वरंग में गायन के साथ किया जानेवाला नृत्य भोजपुर अंचल के लौंडा नाच से साम्य रखता
है। दरअसल नटुवा नाच के नृत्य में वक्ष, हाथ और पाँव के साथ
कमर का संचालन बड़ा ही लुभावन होता है। ठीक इसी तरह का कमर संचालन त्रिपुरा की
रियांग जनजाति के होजागिरी नृत्य में देखा जा सकता है। नर्तन की चाली, कमर और हाथ का संचालन, वक्ष और गर्दन की गतियाँ
कश्मीर के पारम्परिक नाट्य भांड पाथेर के अभिनय के बीच होने वाले नृत्य ‘बचनगमा’ से साम्य रखता है। नटुवा का मंडलाकार या आवर्त
में भाँवरी भरते हुए नाचना रास से प्रेरित लगता है, जो
वैष्णव भक्ति आन्दोलन के समय पूर्वांचल भारत में आया। लेकिन नर्त्तन की चाली और
अभिनेताओं का आंगिक विक्षेप नदियों की लहर, पक्षियों का उड़ना,
तथा साँप के रेगने आदि से प्रभावित लगता है। नटुवा नाच के नर्तक झुंड
में पक्षियों की तरह मंच पर आते हैं और झटके से बिखरकर उन्मुक्त भाव से मंच पर
तैरने लगते हैं। सलहेस नाच का चाँचर नृत्य और गीत बड़ा ही लुभावना होता है।
शास्त्रीय रूप से चाँचर, चर्चरी से विकसित लगता है।
नटुवा नाच के अधिकांश
कथानक लोकगाथाओं से लिए गए हैं। पौराणिक, प्रेमाख्यानक
तथा वीरकथात्मक लोकगाथाओं के अलावे कुछ सामाजिक घटनाओं का मंचन भी नटुवा नाच के
मंच पर होता है। मंचित होने वाली अधिकांश लोकगाथाएँ मध्यकालीन या पूर्व मध्यकाल की
सामाजिक घटनाओं पर आद्दारित हैं। मध्यकालीन समाज राजनीतिक रूप से खंडित था। कुछ
काल विशेष को छोड़कर बाँकी समय में समाज केन्द्रीय सत्ता से अलग-थलग था। राजा या
सुल्तान सूबे को छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित कर जागीरदार और सामंतों के अधीन कर दिया था। इन सामन्त और जागीरदारों का सामाजिक
सरोकार सिर्फ कर उगाही तक सीमित था। इस व्यवस्था के प्रति कई संगठित और असंगठित
विद्रोह भी हुए। इस तरह के विद्रोह निर्ममता से कुचल भी दिए गए। लेकिन लोक मानस पर
इन घटनाओं का गहरा और व्यापक प्रभाव पड़ा। जागीरदारों और सामन्तों के खिलाफ
लड़नेवाले, समाज के असली लोकनायक हुए। लोक कवियों ने इन
नायकों के जीवन चरित्र को लेकर कई संघर्ष गाथाओं की रचना की, जो लोकगाथा के रूप में लोककंठ में प्रवाहमान है। नटुवा नाच के प्रयोक्ता
भी उसी वर्ग से हुए, जिस वर्ग के ये लोकनायक और लोककवि थे।
नटुवा नाच के कलाकारों ने बड़ी सहजता से इन वीरगाथाओं का नाट्य रूपान्तरण किया।
वीरकथात्मक कथानकों में लोरिक मनियार, दीना-भदरी, हंसराज- बंसराज, कुँवर विजयमल्ल, गुगली घटमा, आल्हा ऊदल, नटुवा
दयाल सिंह, सौंसिया महाराज, शीत-बसंत
आदि प्रमुख हैं। इन वीरगाथाओं में संघर्ष का कैनवास स्थानीय रहते हुए भी विद्रोह
का स्वरूप व्यापक और धारदार था।
मिथिलांचल (उत्तरी बिहार)
प्राचीन काल में वैदिक शिक्षा, न्याय, दर्शन आदि प्रमुख विद्याओं का
अध्ययन केन्द्र था। लोग वैदिक द्दर्म को मानते थे। कालान्तर में कभी बौद्ध,
कभी शैव, कभी शाक्त तो कभी नाथपंथ और वैष्णव
आदि मार्गों को समाज ने अपनाया। इन मार्गों की स्वीकृति और अस्वीकृति में समाज ने
गहरा चिंतन किया। ये चिंतन विभिन्न विद्दाओं में प्रतीकात्मक रूप में स्थान पा
लिया। इनमें से एक विद्दा थी, लोकगाथा। गोपीचन्द, भरथरी, सोरठी-बृजभार (सभी नाथपंथ), बिहुला-विषहरी (शाक्त और शैव का संघर्ष) इसी श्रेणी की लोकगाथाएँ हैं,
जिनका प्रदर्शन नटुवा नाच के मंच पर होता है। नटुवा नाच के कथानक
में सत्य हरिश्चन्द्र और राजा नल जैसे आदर्श चरित्रों की जीवन-गाथा भी शामिल है।
राजा हरिश्चन्द्र और नल दो ऐसे पौराणिक चरित्र हैं, जो
प्रतिकूल परिस्थितों में भी सत्य और जीवन के आदर्श से नहीं डीगे।
लोकजीवन खास कर निम्न
आर्थिक वर्ग में प्रेम की स्वीकृति और उसकी स्वच्छंद अभिव्यक्ति के प्रति संकोचभाव
रहा है। वहाँ उन्होंने मर्यादित प्रेम को समर्थन दिया। ऐसी ही प्रेमकथाएँ हैं - सलहेस-कुसमा, रेशमा-चुहड़मल, नैका-बनिजरा,
महुवा-घटवारिन, जालिम सिंह, हिरणी-बिरनी, ढोला कुँवर तथा सारंगा-सदावृक्ष आदि।
इन प्रेमकथाओं में एक बात सामान दिखती है, वह है नायक का वीर
होना। नायिका इन वीर नायकों के रूप पर मोहित नहीं होती, बल्कि
उनकी वीरता पर सबकुछ न्यौछावर करती है। नायक भी नायिका के रूप शृंगार पर आसक्त
नहीं होता, बल्कि यह कहते हुए उन्हें अपने से दूर रहने को
कहता है कि उनका जन्म तो लोक कल्याण के लिए हुआ है। इसके अलावा कुछ ऐसे कथानकों को
भी नटुवा नाच मंच पर दिखाया जाता है, जिसके केन्द्र में
परिवार है। जहाँ सौतेली माँ के कारण बच्चे कष्ट पाते हैं। ऐसे नाच हैं - सुन्दर वन, रूना-झूना, शीतबसंत
तथा हंसराज बँसराज आदि। इन कथानकों में बालचरित्र अवश्य हैं। ये सभी वीर बालक हैं
और समय से पहले प्रौढ़ भी। एक नाच है मोतिया किसान, जिसमें
जमींदार अपने रैयत की पत्नी पर मोहित होता और उस पर कर्ज नहीं अदा करने का मुकदमा
चलाकर करागार में डाल उसकी पत्नी को हड़प लेता है। इस प्रकार नटुवा नाच के कथानकों
में अंचल विशेष के सामाजिक जीवन के यथार्थ का चित्रण हुआ है। इन कथानकों का विकास 12वीं शताब्दी से
लेकर आज तक के विभिन्न कालखंडों में हुआ है। भारी संख्या में दर्शकों की सहभागिता
का कारण इनका कथानक और प्रदर्शन शिल्प है।
नटुवा नाच के दर्शकों में निम्न
आर्थिक वर्ग और मध्य वर्ग के लोग शामिल होते हैं। नटुवा नाच को दरबार या सामन्तों
का संरक्षण नहीं मिला। लगता है इसलिए इस नाट्यरूप ने किसी वर्ग विशेष की अभिरुचि
का सम्पोषण नहीं किया, बल्कि यह दर्शकों की अभिरुचि
और भावनाओं के अनुकूल विकसित हुआ है। दर्शकों में सबसे अद्दिक थके हारे श्रमिक
होते हैं, जो दिनभर खेतों में कठिन श्रम करते हैं। इन श्रमिक
वर्गों की अपनी आकांक्षाएँ एवं अभिरुचियाँ है। नटुवा नाच के अद्दिकांश कथानक वीर
और करुण रस के हैं। कुछ कथानक प्रेमाख्यानों से भी लिए गए हैं, लेकिन ऐसे कथानक बहुत लोकप्रिय नहीं हैं। स्वच्छंद प्रेम का खुलेआम
समर्थन/स्वीकृति इन दर्शकों के पहुँच से बाहर है। इसका कारण शायद सामंती सामाजिक
ढाँचे में उनका सबसे नीचे होना है, जहाँ उन्हें सबकुछ चुपचाप
सहन करना पड़ता है। वीरता इन श्रमिक वर्गों की दमित भावना है, जिन्हें अभिव्यक्त या प्रदर्शित करने का अवसर इन्हें सामाजिक ढाँचा ने
नहीं दिया, इसलिए जब मंच पर अपने लोकनायकों को वीरता का
प्रदर्शन करते देखते हैं तो उनका मन हर्षित होता है। जीवन की दबी हुई भावनाएँ फलित
होती नज़र आती हैं। वे आँखों में रात काट लेते हैं। करुणा में तो उनका जीवन सराबोर
होता है। जब कोई पात्र मंच तिरस्कृत होता है या विवशता में तड़पता है, तो उन्हें समानुभूति होती है।
अधिकांश भारतीय
कलारूप अपने संरक्षक या मालिक की भावनाओं और आकांक्षाओं का सम्पोषण करती है या
उसके दवाब को झेलती या महसूस करती रही है। लेकिन नटुवा नाच के विश्लेषण से स्पष्ट
है कि यहाँ सर्वहारा दर्शकों की अभिरुचि और आकांक्षाओं के अनुरूप ही इस नाट्य रूप
का ढाँचा विकसित हुआ है। इसलिए यह परम्परा जीवन्त है ।
(साभार : बिहार के पारंपरिक नाट्य – ओम प्रकाश भारती। प्रस्तुत पुस्तक को मौलिक शोध
लेखन के 2008 का इंदिरा गांधी राजभाषा राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ)

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