जनजातीय एवं लोक कलाएँ : अर्थ, परिभाषा , विशेषताएँ एवं वर्गीकरण- ओम प्रकाश भारती
मानव अपनी सहज अनुभूतियों से लेकर जटिलतम स्थितियों को, आवेग एवं संवेगों की अनुभूतियों को कलात्मक सौंदर्य के साथ, अत्यन्त सहज प्रतीकों एवं बिम्बों के माध्यम से परंपरागत लोक कलाओं में अभिव्यक्त करते आए हैं। हजारों वर्षो में समाज विकास की धारा के साथ ये लोक कलाएं विकसित हुई हैं। इसमें संपूर्ण समाज का अनुभूत सौंदर्य बोध एवं सामाजिक यथार्थ की कलात्मक अभिव्यक्ति हुई है। लोक कलाओं में अभिव्यक्ति के लिए उपयेाग में लाए जाने वाले उपकरण प्रकृति और जीवन से जुटाए गए हैं ।
जनजातीय और लोक कलाओं पर अलग से विमर्श 18 वीं के आरंभ
में हुआ। इससे पूर्व भारतीय तथा परंपरा में वैदिक ग्रंथों में लोक शब्द की
व्याख्या की गयी गयी है । लेकिन लोक
परंपरा तथा कला की अवधारणा हमें नाट्यशास्त्र के समय से ही प्राप्त होता है। यूरोपीय विचारकों ने आदिवासी या लोक कलाओं के
आरंभिक रूपों को आदिम कला (प्रिमिटिव आर्ट्स) कहा है। कालांतर में folk (लोक) शब्द का प्रचालन हुआ। और फिर लोक, आदिम तथा जनजातीय कलाओं की भिन्न
व्याख्याएँ की गयी। यहाँ क्रमिक रूप से हम
आदिम, जनजातीय तथा लोक कलाओं के अर्थ , परिभाषा तथा विशेषताओं आदि की चर्चा
करेंगे।
भारतीय संदर्भ में आदिवासी, वनवासी
या जनजाति एक विशेष सांस्कृतिक परिवेश और पहचान के साथ रह रहे मानव समूह से है। जनजाति
शब्द की परिभाषा को लेकर मानवशास्त्रियों में मतभेद रहा है। प्रायः
‘जनजाति’ शब्द की उत्पत्ति तथा अर्थ के सम्बन्ध में
भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण देखने को मिलते है। चूंकि जनजातियों प्रायः शहरी सभ्यता से
बहुत दूर घने जंगलों, पर्वतों, घाटियों
एवं पहाड़ी क्षेत्र में निवास करती आयी है। इन लोगों का जीवन प्रकृति के संघर्षमय
था।
अतः
सामान्यतः लोग उन्हें आदिवासी समझते है जो ‘पिछड़े वर्ग’ और ‘असभ्य मानव समूह’ के रूप
में एक सामान्य क्षेत्र में निवास करते हुए समान्य संस्कृति का अनुसरण करते है।
मुख्यतः भारतीय जनजातियों के संबंध में मानवशास्त्रियों एवं समाजशास्त्रियों का मत
है कि ये नीग्रीटो, प्रोटोआस्ट्रेलियड़ (आस्ट्रिक या
प्री-द्रविडियन) तथा मंगोलियन प्रजाति के लोग है जो भारतीय परिवेश के आदि निवासी
हैं।
भारतीय
संविधान (1950) के अनुच्छेद उपखण्ड- 1 में जनजाति की परिभाषा को इस प्रकार स्वीकार
किया गया है। ‘राष्ट्रपति सार्वजनिक सूचना व्दारा जनजातियों,
जनजाति या जनजातियों के भीतरी समूह मे परिभाषित किये जाएंगे,
वे अब अनुसूचित जनजाति कहलायेंगे।[1]
जनजाति शब्द के सन्दर्भ में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति आयुक्त ने 1952 ई. में
प्रस्तुत रिपोर्ट में जनजाति समूह की निम्न विशेषताओं का वर्णन किया है[2] –
1.
जनजाति समूह सभ्य समाज से दूर वनों
एवं पहाड़ियों में दुरस्थ स्थानों में निवास करते है।
2.
जनजाति समूह नैग्रिटों, आस्ट्रेलियाई एवं मंगोलाइड प्रजाति वर्गो के अन्तर्गत माने जाते हैं।
3.
जनजाति समूह एक ही प्रकार की बोली
बोलते हैं।
4.
जनजातियों का धर्म जीववाद कहा जा
सकता है, जिसके अन्तर्गत वे प्रेत आत्माओं की पूजा करते हैं।
5.
जनजाति समूह का व्यवसाय शिकार और
भोजन एकत्र करना होता है।
6.
जनजाति समूह समान्यतः मांस आदि का
सेवन करते हैं।
7.
जनजाति समूह पर्वतों की घाटियों के
किनारे निवास करते हैं।
8.
इनका जीवन घुमंतु प्रवृत्ति का होता
है और ये नृत्य एवं मदिरापान के प्रेमी होते है।
समाजशास्त्री
घूरये ने इन्हें तथाकथित आदिवासी अथवा पिछड़े हिन्दू कहा है।
धीरेन्द्र
नाथ मजुमदार ने जनजाति की व्याख्या करते हुए कहा है कि जनजाति परिवारों या परिवार
समूहों के समुदाय का नाम है। इन परिवारों या परिवार –
समूह का एक सामान्य नाम होता है ये एक ही भू – भाग में निवास करते हैं, एक ही भाषा बोलते हैं विवाह,
उद्योग – धंधों में के ही प्रकार की बातों को
निबिद्ध मानते हैं। एक- दूसरे के साथ व्यवहार के संबंध में भी उन्होंने अपने
पुराने अनुभव के आधार पर कुछ निश्चित नियम बना लिए होते हैं। ‘जनजाति’ शब्द की उत्पत्ति तथा अर्थ के विषय में
भिन्न-भिन्न विचारधाराएँ है। सन 1981 ई. की जनसंख्या आयुक्त श्री डॉ. एन. बेन्स ने
जातियों को उनके परम्परागत व्यवसाय के आधार पर वर्गीकृत किया। कृषक एवं चरवाहा
जातियों की श्रेणी के अंन्तर्गत उन्होंने ‘वन्यजातियों’ के नाम से एक पृथक उप शीर्षक बनाया। सन 1911 ई. में उन्हें जनजाति
प्रकृतिवादी अथवा जनजातीय धर्म को मानने वाले लोग कहा गया। सन 1921 ई. की जनसंख्या
रिपोर्ट में उन्हें पहाड़ी एवं वन्य जनजातियों का नाम दिया गया। सन 1931 ई. की
जनसंख्या रिपोर्ट में उन्हें ‘आदिम जनजाति’ कहा गया। भारत सरकार अधिनियम सन 1935 ई. में जनजातीय जनसंख्या को ‘पिछड़ी जनजातियाँ’ नाम दिया गया। सन 1941 ई. की
जनसंख्या रिपोर्ट में केवल ‘जनजातियाँ’
कहा गया।
मानवशास्त्रियों ने जनजातियों को
परिभाषित करने में मुख्य आधार या तत्व संस्कृति को माना है। परंतु कभी – कभी
ऐसा देखने में मिलता है कि किसी एक ही क्षेत्र में यद्यपि विविध जनजातियाँ
रहती हैं, फिर भी उनकी संस्कृति में एकरूपता दृष्टिगत होती
है। अत: जनजातियों को परिभाषित करने में केवल संस्कृति को ही आधार – तत्व मानना एकांगीपन कहा जायेगा। इसके लिए हमें संस्कृति के अतिरिक्त
भौगोलिक, भाषिक तथा राजनितिक अवस्थाओं को भी ध्यान में रखना
आवश्यक होगा।
जन जातीय कलाओं को अंग्रेजी के ‘ट्रायबल आर्ट्स’ के समकक्ष समझना चाहिए। डेनिस डटन के अनुसार जनजातीय कला जिसे ‘इथ्नोग्राफिक आर्ट’ भी कहा जाता है,मूल रूप से "आदिम" लोगों की सांस्कृतिक कलाकृतियों को संदर्भित करता है - अर्थात, उन जातीय समूहों को पश्चिमी मानकों पर सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत पिछड़ा माना जाता है।
जन जातीय कलाओं के अंतर्गत अमेरिका (जैसे कि इनुइट, दक्षिण-पश्चिम और मैदानी भारतीय और मध्य और दक्षिण अमेरिका के अलग-थलग इलाके), ओशिनिया (मेलनेशिया और ऑस्ट्रेलिया, पोलिनेशिया और न्यूजीलैंड सहित), और सबहारन अफ्रीका। और वह समाज जो (1) यूरोप, उत्तरी अफ्रीका या एशिया की सभ्यताओं से राजनीतिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग है (2) साक्षरता के अभाव में मौखिक परंपराओं का अनुपालन करता है (3) छोटी, स्वतंत्र जनसंख्या
समूहन, आम तौर पर कुछ सौ से अधिक लोगों के गांवों, में जो सामाजिक संपर्क और अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण का जीवन जीते हैं, (4) निम्न स्तर का श्रम / शिल्प विशेषज्ञता प्राप्त समाज, (5) शिकार, मछली पकड़ने के द्वारा और भोजन संग्रह या छोटे पैमाने पर कृषि करने वाला समाज (6) छोटी तकनीक, और धातु के बजाय अक्सर पत्थर का उपयोग करने वाला समुदाय (7) यूरोपीय संपर्क में आने से पहले सांस्कृतिक परिवर्तन की धीमी दर। लिखित भाषा की कमी, और बड़ी सभ्यताओं से अलगाव उन समाजों की आवश्यक विशेषताएं हैं।[3] - जो इस प्रकार का जीवन यापन कर रहे हैं , इनके कलाओं को ट्रायबल आर्ट कहा जाएगा।
डेनिस ‘ट्रायबल आर्ट’ को आदिम कला का
पर्याय मानते हैं। आदिम कला शब्द का उपयोग
आमतौर पर चीनी, भारतीय या इस्लामी कलाकृतियों का वर्णन करने
के लिए नहीं किया जाता है, या मिस्र, ग्रीक
या रोमन सभ्यताओं सहित किसी भी प्रमुख संस्कृतियों के लिए नहीं किया जाता है।
सांस्कृतिक
सृजन खासकर कला के प्रचारात्मक मूल्य की खोज मानव इतिहास के आदिकाल में ही कर ली
गई और उसका भरपूर उपयोग भी किया गया।[4]
भारतीय जनजातियों के कलात्मक प्रयासों व कलाओं के वैज्ञानिक तथा व्यवस्थित अध्ययन
पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है । फिर भी जनजातियों की कलाओं से संबंधित जो भी
आंकड़े उपलब्ध है, उनसे यह पता चलता है कि जनजातियों में विभिन्न
प्रकार की कलाएं विद्यमान है। अधिकतर आदिम लोगों की कलाएं,
तकनीकी अज्ञानता,
फूहड़पन से उच्च तकनीक, सरलता से विषमताओं,
तथा प्रकृतिवाद व यथार्थ से लेकर परंपरागत कल्पनाओं के विस्तार की
ओर विचरण करती हैं।[5]
आदिवासी प्रकृति के बीच रहने वाला
ऐसा व्यक्ति है जिसने अपने रहन-सहन के तौर तरीके तथा कार्यकलाप प्रकृति से सीखें
हैं। एक बाहरी या अजनजातीय सामान्य व्यक्ति के लिए अधिकतर जनजातीय कलाएं और इनके
प्रदर्शन के माध्यम सुंदर या कलात्मक नहीं होंगे। परंतु इन कलाओं को पूर्णतया
समझने के लिए उन तथ्यों तथा वातावरण को भी भली-भांति जानना और समझना चाहिए जिनमें
इसकी रचना हुई है।[6]
आदिम कलाओं के
संबंध में यह बात सत्य है क्योंकि इन कलाओं की पृष्ठभूमि ही अलग है। वेरियर एल्विन
ने इस विषय पर और विस्तृत रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी मंदिर या तीर्थ
में रखने के उद्देश्य से अफ्रीका के जंगलों में उपलब्ध किसी देवता या पूर्वज की
मूर्ति जब अपने मौलिक वातावरण से हटाकर शीशे में बंद कर यूरोपिया हिंदुस्तान मैं
किसी कमरेनुमा स्थान पर रख दी जाए तो उसका प्रभाव सामान कैसे रह सकता है। भारतीय
जनजाति कलाओं का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है ,इन
कलाओं का धर्म के साथ तालमेल। सभ्य समाज द्वारा धर्मनिरपेक्षता व पवित्रता के बीच
का विभाजन इन लोगों में मान्य नहीं है। इस प्रकार कला तथा धर्म "एक दूसरे के
एक रूप व एक रस होकर एकीकृत हो जाते हैं"। [7]
संस्कृति के संदर्भ में आदिम कला के महत्त्व का
पता टेलर की ‘प्रिमिटिव
कल्चर’ और फ्रेजर की ‘गोल्डन बाउ’ जैसी पुस्तकों से चलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक मनुष्य और उसकी
कला प्रवृत्तियों को समझने के लिए आदिम मनुष्य और आदिम कला को समझना आवश्यक है। तभी हम उन परिवेश दत्त प्राकृतिक शारीरिक
मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रगति का जायजा ले सकेंगे।
कलाकार इस बात पर बिल्कुल परेशान नहीं है कि
उनकी कलाओं को अपरिष्कृत कहा जा सकता है। किसी भी वस्तु की जैसी छवि उसके मस्तिष्क
में है वे उसे वैसा ही बनाकर प्रस्तुत करते हैं। जनजाति कलाकार
"अप्रशिक्षित" हो सकता है परंतु भली प्रकार से "दीक्षित" है।[8]
पिकासो ने एक बार कहा था कि उसकी ‘एव्सट्रेक्ट’(अमूर्त) कला का प्रेरणा स्रोत अफ्रीका
कि आदिम कला है ,जिसमें मुखौटे ,
नृत्य-मुद्राएँ ,रेखाओं का उलझाव और संगीत कि अजीब धुनें
मिलती है। [9]
संस्कृति का
कार्य समाज की रक्षा करना है। आध्यात्मिक सृजन ,परंपराएं, रूढ़ियां और संस्थाएं सामाजिक संगठन के ही
तरीके और साधन है। समाज के संरक्षा के संघर्ष में धर्म, दर्शन,
विज्ञान और कला सब अपनी जगह है। अगर केवल कला के ही बारे में विचार
करें तो सबसे पहले यह जादू टोना का औजार थी ,आदिम शिकारी
समुदाय की आजीविका की रक्षा का साधन थी । फिर यह सामुदायिक हितों की रक्षा के लिए
भली और बुरी आत्माओं को प्रभावित करने वाले
हथियार की तरह पशु पूजक धर्म में
बदल गई । क्रमशः, यह सर्वशक्तिमान ईश्वर और उसके सांसारिक
प्रतिनिधियों के गुण कीर्तन और भजन, ईश्वर और राजा की मूर्ति
निर्माण के जरिए उनके अति रंजन में बदल गई। अंततः, कमोबेश
खुले प्रचार के रूप का इसका इस्तेमाल किसी अल्पसंख्यक समूह, किसी
गुट, किसी राजनीतिक पार्टी या किसी सामाजिक वर्ग के हितों के
लिए होने लगा।[10]
निष्कर्षत:
जनजातीय कलाओं में प्रेम और प्रकृति सहज कि सहज अभिव्यक्ति हुई है। इस प्रकार जनजाति और जन जातीय कलाओं को लेकर
दुनियाँ भर के विद्वानों ने भिन्न –भिन्न विचार प्रस्तुत किए हैं। दरअसल, एकांगी विचार देना संभव नहीं लगता, कारण यह है कि
दुनियाँ के अधिकांश आदिवासी समाज ना तो आदिम अवस्था में है और ना ही
अशिक्षित या अर्द्ध विकसित । भारतीय संदर्भ में देखें तो वे मूल धर्म से कट चुके हैं। इसका असर उनके कला
रूपों पर भी दिखाई देता है। जो कुछ भी हो प्रस्तुत शोध प्रबंध में पूर्वोत्तर भारत
के जन जातियों के बीच प्रचलित कला रूपों की परंपरा और वर्तमान स्थिति को ध्यान में
रखकर शोध अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कला आलोचना
में जन जातीय और लोक कलाओं के शिल्प और
सौंदर्य को अलग नहीं समझा जा सकता है। वस्तु के स्तर पर भिन्नता अवश्य है। क्योंकि
दोनों का समाज, धर्म
और चिंतन प्रक्रिया भिन्न है।
जनजातीय कलाओं समाजशास्त्रीय और ऐतिहासिक महत्व इसलिए
भी है कि यह भाषा और मिथक की मध्यवर्ती रही है। सौंदर्य चेतना और मानवता के विकास
के अध्ययन की दृष्टि से
जनजातीयकला की सभी कृतियां सामाजिक इतिहासकार के लिए ‘मोमेंट्स हिस्टॉरिक्स’ हैं। इतना ही नहीं इन कलाकृतियों में व्यस्त सौंदर्य समिक संदर्भों की
सीमा से ऊपर उठा हुआ कालातीत सौंदर्य है। इसी तरह समाजशास्त्रीय दृष्टि से आदिम
कला का महत्व इसलिए भी सुरक्षित है कि उसकी रचना जनसाधारण के बीच पली हुई भावुक
मनीषा ने की है, किसी अवकाश होगी कुलीन वर्ग की सुविधा
प्राप्त प्रतिभा ने नहीं।
जनजातीय कलाकार सामाजिक दायित्व निर्वाह के प्रति
आधुनिक कलाकारों की अपेक्षा अधिक सजग रहें। सचमुच आदिम कला नितांत व्यक्तिगत कला
नहीं थी, उसमें समाविष्ट
सामाजिकता की प्रचुरता, नैतिकता के अभिज्ञान को कठिन बना
दिया। यह निर्विवाद है कि जनजातीय कला में हमें सौंदर्य चेतना के विकास का पहला
चरण मिलता है। साथ ही उसमें हमें धर्म भावना के प्रति आधुनिक कला के पुरुषों की
प्रतिक्रियाएं मिलती है। धर्म भावना से युक्त आदिम कला का यह रूप यातुक औपचारिक
अनुष्ठानों से संबंध रहा है।
लोक कला – अर्थ ,परिभाषा तथा विशेषताएँ
लोक विधाओं के नामकरण में सबसे भ्रामक ‘लोक’ शब्द की व्याख्या है, जो
समय-समय पर परिवर्तित होता रहा है। साथ ही अंग्रेजी के ‘फोक’
(जो लोक का पर्याय माना जाता रहा है) का दबाव
भी लोक के अर्थमान को अस्थिर होने में भरपूर सहयोग दिया। दोष सिर्फ़ अंग्रेज़ी का
नहीं,
भारतीय भाषाओं में भी ‘लोक’ को लेकर अभी तक आम सहमति नहीं बन पाई है,
जबकि ‘लोक’ की व्याप्ति
और अवधारणा उस समय से भारतीय समाज और परम्परा में है, जब इन
क्षेत्रीय भाषाओं का उद्भव नहीं हुआ था। इधर
साहित्य आलोचना में लोक, आदिम और जनजातीय के बदले ‘मौखिक’ शब्द का प्रचलन बढ़ा है, वह भी अंग्रेज़ी ‘फोक’ के दबाव
में। प्राचीन भारतीय वाङ्मय श्रुति परम्परा में था तो क्या उसे आज के लोक या मौखिक
साहित्य के दायरे में शामिल किया जाना समीचीन होगा ? कई ऐसे
सवाल हैं जिन पर विमर्श होना चाहिए।
लोक को लेकर भ्रांति कुछ हद
तक अंग्रेज़ी के शब्द ‘फोक’ के कारण हुई। ‘फोक’ (folk)
की व्युत्पति जर्मन शब्द ‘वोल्क’ से(volk) मानी जाती है।
ये शब्द लोक- वोल्क- फोक समानार्थी हैं। फोक या फोकलोर शब्द के प्रचलन का श्रेय
विलियम जॉन थॉमस को जाता है। ब्रिटिश संग्रहालय लंदन के संग्रहालय संरक्षक सर
हेनरी एलिफ़िन्स्टन ने 1813 में ‘पॉपुलर
एन्टिक्वेटिज’ के
नाम से कुछ सामग्रियों का संकलन किया था। 1846 में विलियम
जॉन थॉमस ने एक आलेख में ‘पॉपुलर एन्टिक्वेटिज’ के बदले ‘फोकलोर’(folklore)
शब्द के प्रयोग का सुझाव दिया था।[11] कहा
जाता है कि थॉमस ने जर्मन भाषा के शब्द ‘वोकसुन्डे’ (folklore) से प्रेरित होकर अंग्रेजी अनुवाद ‘फोकलोर’(folklore) प्रस्तुत किया था। सन् 1878 में नृविज्ञानी ई.बी. टेलर ने ‘फोकलोर सोसाइटी’ की स्थापना की। इसके बाद पूरे
यूरोप में ‘फोकलोर’ शब्द का प्रचलन
बढ़ा। जर्मन भाषा
में ‘वोकसुन्डे’ शब्द कब और कैसे आया यह अभी तक
ज्ञात नहीं हो पाया है। लेकिन जिस दबाव में आया था, उसका पता
तो इसके अर्थ से ही चल जाता है। जर्मन शब्द ‘वोक’ का अर्थ ‘गँवारू लोग’ और ‘सुन्डे’ का अर्थ
ज्ञान या समाचार होता है। अब सवाल उठता है कि कौन थे ये ‘गँवारू लोग’। पुनर्जागरण, यूरोपीय
इतिहास में लगभग तीन सौ वर्षों तक चलने वाला एक महान आन्दोलन था, जिसका आरम्भ चौदहवीं सदी में इटली में हुआ था और सोलहवीं सदी तक समस्त
उत्तरी यूरोप में पुनर्जागरण की हवा चल पड़ी थी। इस नये आन्दोलन में जहाँ मध्ययुगीन
सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का अंत मान लिया गया था, वहीं नई
शुरुआत में जो नया वर्ग आया उनमें श्रेण्यवाद(classism) की
भावनाओं का जन्म हुआ। श्रेण्यवाद की यह भावना ज्ञान, विज्ञान,
कला और साहित्य के क्षेत्रा में प्रबलत्तर होती गई। और इसी
श्रेण्यवाद के जो सम्पोषक वर्ग थे उन्होंने ही कल्पना की थी ‘गँवारू लोगों’ की। आरम्भ में यूरोप में भी ‘फोक’ का अर्थ गँवारू तथा असभ्य समझा जाता था। लेकिन
यह विचारधारा यूरोप में दीर्घायु न हो सकी। मानवतावादी सिद्धांतों ने वैज्ञानिक
युग की घोषणा के लिए दबाव बनाया। जर्मनी में कान्ट से लेकर फिक्टे, शिलर, फ्रांस में देकार्त से लेकर मोन्ताएँ, वोल्तेयर और बाद में रूसो, मार्क्स, एन्जेल्स आदि अनेक लोगों के चिन्तन में ‘मामूली आदमी’
ने जन्म लिया। कवियों ने मानवता के स्वर दिए । जन समुदाय की
मातृभाषाओं में रचनाएँ आरम्भ हुईं। मानवशास्त्रियों ने जनजातियों में ज्ञान और
बौद्धिकता के विकास के दावे प्रस्तुत किये। सवाल उठा ‘असभ्यों
को पालने वाला समाज’ सभ्य कैसे कहा जाएगा ? ‘फोक’ को पुनः परिभाषित किया गया। यूरोप का ‘फोक’ सभ्य और ज्ञानी हो गया। सिर्फ़
अनुभवजनित मौखिक ज्ञान जैसे विशेषण उनके साथ
जुड़ा रहा। आज पश्चिम का सामाजिक परिवर्तन ‘फोक’ को पुनःपरिभाषित करने के लिए उकसा रहा है। और हम वहीं खड़े हैं। असभ्य,
निरक्षर और अशिष्ट लोगों के बीच !
ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में
लोक शब्द का व्यवहार जीव तथा स्थान दोनों अर्थों में हुआ है।[12]
पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में लोक तथा ‘सर्वलोक’ शब्दों का उल्लेख
किया है तथा इनसे ठज्ञ प्रत्यय करने पर ‘लौकिक:’ तथा सार्वलौकिक:’ शब्दों की निष्पत्ति की है।[13]
पाणिनि ने वेद से पृथक लोग शब्द की सत्ता को स्वीकार किया है । उन्होंने अनेक
शब्दों की व्युत्पत्ति को बतलाते हुए लिखा है कि वेद में आमुख शब्द अमुक प्रकार है, परंतु लोक में इसका स्वरूप भिन्न है।[14] महाभाष्यकार पतंजलि ने भी जनसाधारण के अर्थ में
‘लोक’ शब्द का व्यवहार किया है।[15]
डॉ. कृष्ण देव
उपाध्याय के अनुसार -लोक कला किसी परिभाषा के बंधन में नहीं बंधी है यह तो
उन्मुक्त व स्वच्छंद है। लोक कलाकार बिना किसी स्वार्थ के "स्वांत
सुखाय" के लिए साधना करता है । ये लोक कलाकार किसी दुरु सिद्धांत व शैली की
जटिलता में नहीं पड़ता अपितु सरलता व हृदय की सुबोधता से चित्रण करता है। अतः लोक
कला जन के द्वारा आत्मानुभूति के लिए चित्रण करता है। इसे इस प्रकार परिभाषित कर
सकते हैं "जन जन को जन-जन द्वारा जन जन हेतु निश्चित कला लोक कला है।
डॉ श्याम
परमार के अनुसार- लोक का अर्थ लोक मन अथवा जनजीवन की सहज अभिव्यक्ति
से है। लोक कलाओं से मेरा मतलब उन प्रदर्शनकारी कलाओं से है जो देहातों कस्बों और
आदिवासी रीति रिवाजों और जनपदीय सौंदर्य बोध से सीधी जुड़ी हुई हैं।
ए के हल्दार
ने लिखा है कि लोग कला परंपरागत कला का वह आवश्यक स्वरुप है जिसकी अपेक्षा गवारू
और उबड़ खाबड़ कला कहकर नहीं की जा सकती क्योंकि इसका संबंध आनंद की भावनाओं से
सीधा जुड़ा है।
शैलेंद्र
नाथ डे के अनुसार लोककला जन सामान्य विशेषतः ग्रामीण जनों को सामूहिक अनुभूति की अभिव्यक्ति है । डॉक्टर पूरनहगल के
विचार में लोक कला की मूल प्रवृत्ति स्वच्छंद स्वाभाविक
एवं जीवन मूल्यों का सहज चित्रण है ।मानवीय अनुभूतियों की भाव अभिव्यक्ति लोक कला
और लोक कलाकारों का मूल धर्म व लक्ष्य रहा है। इसके गंगा जमुना रंगों की सातवीं
छवि में हमें सर्वत्र दिखाई देती हैं। संस्कारों और सुविचारों की श्रृंखला में
आबद्घ है। इसका वह स्वरूप स्वाभाविक रूप से ही सर्वत्र विकसित हुआ है।
प्रोफेसर
ए. स्टीवेंसोन के अनुसार लोक कला धार्मिक प्रतीकों की नंदतिक अभिव्यक्ति है। प्रोफेसर
एम. सी. वरकेट के अनुसार लोककला पौराणिक आनुष्ठानिक एवं धार्मिक आदर्शों का
प्रतिबिम्ब है।
प्रो
सी एल झा के अनुसार लोक कला हमारी धार्मिक एवं आध्यात्मिक की प्रतीक है । मानव
हृदय की उपज है और जिसमें कृत्रिमता एवं प्राविधिक प्रयोगों का कोई भी स्थान नहीं है। श्री शैलेंद्र नाथ सामंत
के अनुसार जन कला सामान्य जन समुदाय को सामूहिक अनुभूति की अभिव्यक्ति है।
भारत में ‘फोलकोर’ के क्षेत्र में शोधकार्य उन्नीसवीं सदी के
उत्तराद्ध में यूरोपीय विद्वानों ने आरंभ किया। इनमें से अधिकांश विद्वान यूरोपीय
श्रेण्यवाद के सम्पोषक साम्राज्यवादी राज्य और शासक थे, जिनके
अन्तःमन में अभी भी असभ्य आदमी पल रहे थे। भारत में पुनर्जागरण की घोषणा की जा
चुकी थी। समाज और धर्मिक सुधर की कई संस्थाएँ नगरों में खड़ी हो चुकी थीं। भारत में
बौद्धिक चेतना का आन्दोलन तो चौदहवीं शताब्दी में ही आरंभ हो चुका था, जिसे भक्ति आन्दोलन कहा गया है। भक्ति आन्दोलन में जिन सामाजिक, अमानवीय व्यवस्थाओं के खिलाफ संतों ने आवाज़ें उठाई, पाँच
सौ वर्ष बाद पुनर्जागरण काल के शिक्षित वर्गों ने भी उसे दुहराया और आज भी हम जाति,
धर्म को संघर्ष लेकर संघर्षरत हैं। इसी ऊहापोह में लोक साहित्य/लोक
कलाओं पर अध्ययन आरंभ हुआ और लोक को परिभाषित किया गया-
इस परिभाषा में लोक का अर्थ :
- निरक्षर और
अशिष्ट जन समूह।
- रहता कहाँ है? तो आधुनिक सभ्यता से दूर गाँव में।
- समाज या
संस्कृति का सबसे पिछड़ा वर्ग।
- जिसकी
वृत्तियाँ मौलिक रूप से आदिम और अपरिष्कृत है, आदि समझा गया।
ऐसा करने में एक तो यूरोपीय साम्राज्यवादियों का
दबाव था तो दूसरा स्वयं भारतीय सामाजिक ढांचा; जबकि भारतीय
परम्परा लोक के इन अर्थों का समर्थन नहीं करती हैद्ध। संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘लोक’ शब्द की उत्पति संस्कृत की ‘लोक दर्शने’ धातु में ‘घअ’ प्रत्यय जुड़ने से हुई है, जिसका अर्थ है देखना। इस
तरह लोक शब्द का मूल अर्थ देखने वाला है। ऋग्वेद
के पुरुषसुक्त में
लोक शब्द जीव और स्थान दोनों के लिए प्रयुक्त
हुआ है। पाणिनी कृत अष्टाध्यायी, पतंजलि कृत महाभाष्य तथा
भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र में ‘लोक’ शब्द
का प्रयोग शास्त्रोतर, वेदोत्तर तथा समान्यजन के संदर्भ में
किया गया है। पाणिनी काल में वेद परिपाटी एवं लोक परम्परा का पृथक रूप मुखरित हो
चुका था। श्रीमद्भागवत गीता में प्रयुक्त लोक समूह शब्द का अर्थ भी साधारणजन के
आचरण तथा आदर्श से है। प्राकृत, अपभ्रंश और भक्ति साहित्य
काल में भी लोक शब्द वेद के प्रतिकूल जनसाधारण की परम्परा की ओर संकेत करता है। इस
प्रकार भारतीय परम्परा में ‘लोकज्ञान’ या
अनुभव उस परिपाटी को कहा गया है, जो वेद या शास्त्र से उलट
या भिन्न हो तथा जिसका आधार जनसाधारण हो। वेद या शास्त्र वर्ग विशेष का ज्ञान था,
जिसका आधार मानव समुदाय का विशेष हिस्सा या वर्ग था। ये दोनों रहते
भी अलग-अलग थे। एक गाँव में दूसरे नगर में। गाँव ‘लोक’
का था और नगर के निवासी वेद या शास्त्र सम्मत ज्ञान के अधिकारी थे।
भ्रांति तब हुई जब शास्त्र सम्मत ज्ञान का क्षेत्र नगर की सीमा के बाहर गाँव तक आ
पहुँचा। और गंवई लोक, नगर आकर बस गए और अपने लोक को बृहत
आयाम के साथ प्रस्तुत किया। यहाँ गाँव और नगर से तात्पर्य दो विशाल जनसमूह है,
जो एक ही भौगोलिक क्षेत्र में अलग-अलग आर्थिक वर्ग से है। इस
भ्रांति का दुष्प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि लोक के प्रति दृष्टिकोण ही बदल गया।
गाँव के लोगों को लोक कहकर संज्ञापित किया
गया तथा शहरी जनसंख्या को लोक के दायरे से बाहर रखा गया और फिर लोक साहित्य और शिष्ट
साहित्य, लोककला और शिष्टकला आदि। भारतीय चिंतन परिपाटी में
लोक और शास्त्र या वेद के बीच का अंतर तो यह कतई नहीं समझाता है कि लोक से
अभिप्रेत अशिष्ट, निरक्षर या
आदिम और अपरिष्कृत जन समूह है। भारतीय चिंतन परिपाटी में शास्त्रा वह है जिसका
व्याकरण तय हो तथा जिसमें लिखित और सुनियोजित ज्ञान हो। लोक, अनुभवजनित मौखिकज्ञान है जो वर्षों से परम्पराशील और परिवर्तनशील है। हम
सभी जानते हैं कि शास्त्र को लोक के दबाब में कई बार बदलने पड़े हैं। शास्त्र भी तो
लोकजनित और लोक अनुभवों से प्रेरित है।
गाँव का कलाकार शहर आकर कॉलेज
या विश्वविद्यालय में उच्चशिक्षा ग्रहण करता है और उसके बाद नौटंकी में अभिनय करता
है तो क्या वह लोककलाकर नहीं कहलायेगा? बिलकुल कहलायेगा।
हमें यह नहीं देखना है, कलाकार गाँव में रहता है या शहर में,
पढ़ा है या मूर्ख। हमें यह देखना चाहिए कि उसके द्वारा प्रस्तुत कला
की शिल्प-प्रविधि लोक जैसी है कि नहीं। पारम्परिकता का निर्वहन या सूत्र उसमें है
कि नहीं।
निष्कर्ष यह है कि लोक किसी
भी राष्ट्र का जन समुदाय है, वह नगर, गाँव
कहीं भी रह सकता है यदि उनका ज्ञान या कला-वर्षों से परम्परित और अनुभवजन्य है तथा
मौखिक परम्परा में है तो वह लोकज्ञान (folklore)या लोककला कहें जाएँगे । धार्मिकता, आनुष्ठानिक, तथा प्रकृति मूलक लोक तथा जन
जातीय कलाओं की विशेषताएँ हैं।
उद्देश्य के आधार पर लोक एवं
जन जातीय कलाओं का विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है-
1.
आनुष्ठानिक – ऐसे कला रूप जिसका प्रदर्शन/सृजन किसी धार्मिक अथवा
सामाजिक अनुष्ठानों के निमित्त किया
जाता है।
2.
प्रदर्शनमूलक – ऐसे कला रूप जिसका प्रदर्शन या सृजन पूर्णत: कलात्मक
अभिव्यक्ति के निमित्त किया जाता है।
कला
रूपों के स्वरूप और शैली के आधार पर जनजातीय तथा लोक कलाओं के निम्नलिखित विभाजन
हो सकते हैं-
1.
ललित कला-
संगीत, नृत्य , नाट्य , चित्र
2.
शिल्प कला – हस्त शिल्प , मुखौटा शिल्प
प्रचलित
विधाओं के आधार पर लोक एवं जनजातीय कलाओं के निम्नलिखित प्रकार हैं-
1.
लोकगीत
2.
लोकनृत्य
3.
लोक कथाएँ
4.
लोकगाथाएँ
5.
लोकनाट्य
6.
लोक कहावतें
(कलाशास्त्र की रूपरेखा,
शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक का अंश )
[1]
Elvin, V. (1963), New Deal For Tribal India Home Ministry, Govt. of India, New
Delhi, P. 1
[2]
Dube, S.C. (Editor),"Tribal Heritage All India, p 2-4 Vikas Publishing
House, New Delhi, pp. 5-6
[3] Denis Dutton,The Encyclopedia of Aesthetics,
edited by Michael Kelly( NY, Oxford University Press,1998), 16
[4]
Ibid, 15
[5] होबेल,1954
[6]
(लीनार्ड एडम,
1949)
[7]
एन के बोस 1971
[8]
नदीम
हसनैन , भारतीय जनजाति पृ. 299
[9]
शर्मा,
हरद्वारी लाल ,कला
दर्शन ,पृ.
91
[10]
हाउजर
आर्नल्ड , कला का इतिहास दर्शन ( अनुवाद- गोपाल
प्रधान ) पृ. -15
[12]
ऋग्वेद
, पुरुष सूक्त 10। 90। 24
[13]
अष्टाध्यायी, 5। 1। 44।
[14]
अष्टाध्यायी,2। 4। 39।
[15]
महाभाष्य
, 1। 84।

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