असम पारम्परिक नाट्य: अंकिया नाट- ओम प्रकाश भारती
अंकिया नाट असम पारम्परिक नाट्य रूप है। इसे वैष्णव नाटक भी कहा जाता है।
वैष्णव नाटक का आर्विभाव सोलहवीं शताब्दी में मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन की स्निग्ध
छाया में हुआ। इसके आदि प्रणेता प्रसिद्ध वैष्णव संत श्री शंकर देव (1449-1557 ई.) को माना जाता है। उन्होंने समाज में उच्च नैतिक आदर्शों को लोकमंच के
द्वारा प्रस्तुत किया। आज भी असम के ग्राम्य अंचलों में ‘अंकिया नाट’ श्रद्धा और भक्ति-भाव के साथ खेले जाते हैं।
मध्ययुगीन भक्ति संतों का मुख्य उद्देश्य उच्च मानवीय
मूल्यों और सामाजिक आदर्शों की स्थापना करना था। उन्होंने एक मत से तत्कालीन
सामाजिक विसंगतियों का विरोध किया। इसके लिए उस माध्यम का अन्वेषण आरम्भ हुआ,
जिसके द्वारा संत अपनी वाणी और विचारों को जन-जन तक पहुँचा
सकें तथा वह माध्यम आम लोगों के बीच प्रिय भी हो। गहरे आत्म अन्वेषण के बाद भक्ति
संतों ने लोकरंजन के लिए प्रचलित गीतों एवं नृत्यों को ही अपना माध्यम बनाया।
कालान्तर में इस नृत्यगान शैली में लोक आदर्श के कथा तत्त्व जुड़ जाने से पारम्परिक
नाट्य रूपों का उद्भव हुआ। असम का अंकिया नाट भी इन्हीं परम्परा की एक महत्त्वपूर्ण
कड़ी है।
अंकिया नाट दो शब्दों के मेल से बना है। अंकिया शब्द विशेषण
है और नाट शब्द विशेष्य। अंकिया शब्द का
प्रयोग शंकरदेव ने नहीं किया है। शंकरदेव ने अपने नाटकों को नाटिका,
नाट, यात्रा और नृत्य से अभिहित किया है। अनुमानतः यह शब्द उनके
पश्चात् प्रचलित हुआ होगा। शंकरदेव से पहले ‘अंक’ शब्द का प्रयोग असमिया एकांकी नाटकों के लिए किया जाता था।
इसका प्रमाण रामशरण ठाकुर की एकांकी चरितपुथी है। विद्वानों का तर्क है कि-‘अंकिया नाट’ एक ही अंक का होता है इसलिए इसे-‘अंकिया’ कहा जाए और ‘नाट’ शब्द संस्कृत रंगमंच से लेकर ‘अंकिया नाट’ शब्द रूढ़ हुआ होगा।
अंकिया नाट प्रदर्शन को भाओना कहा जाता हैं। भाओना असमी भाषा का शब्द है
जिसका अर्थ होता है- नाट्य प्रस्तुत करना। भाओना का सम्बन्ध संस्कृत शब्द भावना
(भावायति) से जोड़ा जाता है। संस्कृत में भावना से तात्पर्य होता था- प्रदर्शन करना,
प्रसारित करना तथा परिकल्पना करना। भओना शब्द आचार्य
शंकरदेव के समय में ही ‘अंकिया नाट’ प्रदर्शन के लिए रूढ़ हो चुका था। अंकिया नाट को ‘भाओ’ कहा जाता है। अंकिया नाटक में सिद्धहस्त मुख्य अभिनेता को
भवरिया तथा अन्य सभी अभिनेता को नटुवा या नर्त्तक कहा जाता है। भवरिया किसी भी
भूमिका को जीने में माहिर होता है।
वैष्णव संत शंकरदेव ने अपने शिष्यों सहित ब्रजमंडल की
यात्रा की। वहाँ उन्होंने कृष्ण के जीवन पर आधरित नाट्य लीलाओं को देखा। ब्रजभूमि
से लौटने के बाद श्री शंकरदेव ने सम्पूर्ण पूर्वांचल भारत की यात्रा की। वहां
उन्होंने बंगाल में जात्रा तथा बिहार में किरतनियां (उमापति रचित ‘पारिजातहरण’) नाटक आदि का प्रर्दशन देखा। असम लौटने के बाद श्री शंकरदेव
ने अपनी सघन यात्रा के गहन अनुभवों को सहेजकर ब्रजबुलि में पद्यबद्ध नाटक की रचना
की। इन नाटकों का उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार करना
भी था। नाट्य प्रस्तुति में उन्होंने असम के लोकजीवन में पूर्व से प्रचलित
संगीत-नृत्यों को शामिल किया। इनमें से सबसे अधिक प्रभावी ओजापालि जैसे प्राचीन
नृत्य था। असम की प्राचीन नाट्याभिव्यक्ति ओजापालि में काव्य कथन कहने वाले को ओजा
(नेता) और नृत्य-गान करनेवाले को ‘पालि’ कहा जाता था। इन नृत्यों की शिल्प-विधि में चरित्रांकन और
घटना चक्र को छोड़ रंगमंच के प्रारम्भिक सभी गुण मौजूद थे। अंकिया नाट का नृत्य-गान
पद्धति ‘ओजापालि’
पर आधारित है।
शंकरदेव के सामने
केवल कुछ व्यक्ति, जाति, वर्ण अथवा स्थान विशेष के लोग नहीं थे। उनका लक्ष्य
सम्पूर्ण भारतवर्ष था। रंगशाला और अभिनय की जिस शैली का प्रवर्तन शंकरदेव ने किया
वह न्यूनाधिक रूप में असम की लोकरंजन विधओं, मिथिला, बंगाल, ब्रज, उड़ीसा और केरल की विभिन्न रंगशैलियों के आधार पर विकसित हुआ
था।
शंकरदेवकालीन समाज मध्ययुगीन समाज था,
जिसका मूलाधार तत्कालीन भूमि-व्यवस्था थी। राजनीति,
कानून, धर्म, साहित्य, संस्कृति तथा कला आदि सभी उसी से संचालित होते थे। कला, साहित्य और कानून पर उच्च आर्थिक वर्ग का एकाधिकार था। समाज
के गरीब लोग स्वतः आर्थिक कारणों से सामाजिक अधिकारों से वंचित हो गए। दूसरी तरपफ
समाज में जातिवाद, प्रजातिवाद तथा वंश या गोत्रवाद जैसी दुर्भावनाएँ फैली थीं।
शंकरदेवकालीन असम जैसे राजनैतिक दृष्टि से छोटी बड़ी अनेक
इकाईयों में खंडित, अस्थिर तथा सामाजिक दृष्टि से विशृंखल और रूढ़ियों से
अभिशप्त था, वैसे ही अनेक प्रकारों की पूजा-उपासना पद्धतियों का भी अडाó
बना हुआ था। अंिधकांश निवासी आर्येतर मूल के थे,
जिनके धर्म, पूजाचार अलग-अलग थे। आर्य अथवा हिन्दू भी शैव,
शाक्त, वैष्णव इत्यादि विभिन्न सम्प्रदायों में विभक्त थे। विभिन्न
धर्म और विचारधाराओं के सम्पर्क एवं संघर्ष ने तत्कालीन समाज को आत्मनिरीक्षण के
लिए विवश किया जिसे कार्यान्वित करने वाले थे आचार्य शंकरदेव। शंकरदेव से पहले भी
असम में वैष्णवमत का प्रचलन था। लेकिन जिस नव्य वैष्णव मत का प्रचलन शंकरदेव ने
किया, वह परम्परायुक्त ‘पंचरात्र’ आधारित वैष्णवमत से सर्वथा भिन्न था। शंकरी भक्ति प्रतिक्रियावादी नहीं थी।
शंकरदेव ने जितनी कठोरता, अपराजिता और निर्ममता से शैवों, शाक्तों, तान्त्रिकों और पथभ्रष्ट उपासकों पर प्रहार किया,
उतनी ही कठोरता से तान्त्रिक वैष्णववाद और ब्राह्मण दर्शन
के शुष्क बुद्धिवाद के विरुद्ध खुला विद्रोह भी किया। शंकरदेव के कृष्ण सामाजिक
क्रान्ति के द्रष्टा, असुर संहारक, दुष्ट-दमनकर्ता, पुरुषोत्तम, अनाथों के नाथ और शरणागत-वत्सल हैं। वे गोकुल और मथुरा के
हरकारे मात्रा नहीं, द्वारका से प्रागज्योतिषपुर के विजेता भी हैं।
अंकियानाट की भाषा ब्रजबुलि है। लेकिन इसके साथ-साथ संस्कृत
और मैथिली मिश्रित असमिया बोली का प्रयोग भी ‘अंकिया नाट’ में हुआ है। नाटक में निर्देशक वाक्य और सम्भ्रान्त वर्ग की
भाषा संस्कृत थी। जबकि संस्कृत में बोले गए श्लोक को पुनः असमिया बोली में दुहराए
जाते थे। गीतों की रचना एवं अन्य पात्रों के सवांद मैथिली प्रभावित ब्रजबोली में
होते थे।
अंकिया नाटकों के लिए कोई स्थायी रंगमंच नहीं होता है।
प्रार्थनाओं के लिए बने सामाजिक स्थान नामघर के प्रांगण में खेले जाते हैं तब वहाँ
पंडाल खड़ा कर दिया जाता है, जिसे रंभाघर कहा जाता है। नामघर को बाद में थान,
कीर्त्तनघर, आदि कहा गया। यह नामघर जहाँ स्थित होता है उसे ‘सत्र’ कहा जाता है। सत्र एक सामाजिक एवं धार्मिक संस्था है,
जहाँ भागवत धर्म के लोग नाट्य प्रदर्शन करते हैं। सत्र में
कई नाट्य मण्डप (नामघर) बने होते हैं। यह नामघर सामान्यतया पूर्व और पश्चिम दिशा
में बने होते हैं। नामघर के आस-पास भक्तों के रहने के लिए कुछ और घर बने होते हैं
जिन्हें हाति कहा जाता है। नामघर सामान्यतया 100 गज लम्बा और 20 गज चौड़ा होता हैं। इसके चारों ओर किसी तरह की दीवार अथवा
पर्दा नहीं होता है। इस आयताकार मण्डप की चौड़ाई वाले बीच की रंगस्थली पर कोई मंच
नहीं होता है। नाटकों का प्रदर्शन समतल भूमि पर ही होता है लेकिन इस हॉल के एक छोर
पर थापना रखी जाती है। थापना को मणिकूट भी कहा जाता है और वह सत्र का सिंहासन होता
है सिंहासन रंग-बिरंगे वस्त्रों से ढंका रहता है तथा इसके ऊपर तक बर्त्तन में कपड़े
लपेटकर श्रीमद्भागवत रखा रहता है।
नामघर के स्तम्भ
काफी भारी और भव्य होते हैं। जब कभी ‘भाओना’ खेली जाती है तब इन स्तम्भों को रंग-बिरंगे सुन्दर कढे़ हुए
वस्त्रों से ढक दिया जाता है। स्तम्भों के शीर्ष स्थान पर तरह-तरह के मुखौटे टंगे
रहते हैं।
नामघर में दर्शक दो तरफ यानी आमने-सामने बैठते हैं। नामघर के तीसरी ओर मणिकूट स्थित होता है, और चौथी ओर से पात्रों के आने-जाने का मार्ग बना होता है। पात्रों के प्रवेश के लिये यहां दीपक से सुसज्जित तोरण द्वार बनाया जाता है। इस तोरण द्वार को अग्निगर कहा जाता है। मण्डप के ठीक दूसरे छोर पर संगीत मण्डली के लिए बैठने का स्थान होता है। इस स्थान को जहाँ संगीत मण्डली बैठती है, दोहर कहा जाता है। इस प्रकार थापना और संगीत मंण्डली के बीच का भाग अभिनय स्थल होता है। जिस स्थान पर संगीत-मण्डली बैठती है, उनकी बाईं ओर से पात्रों के आने-जाने के लिए रास्ता होता है, यह रास्ता मण्डप से कुछ दूरी पर बने शंऊ-घर (छद्म ग्रह) को जाता है। यही ‘शंऊ-घर’ सज्जागृह (ग्रीनरूम) और नेपथ्यगृह होता है। यहाँ कलाकार अपना मेकअप करते हैं तथा साज-सज्जा के सभी समान रखते हैं। कभी-कभी रंग-मण्डप में प्रवेश करने से पूर्व पात्रों को ‘दोहार’ पर प्रतीक्षा करनी पड़ती है। दोहार पर ही विशेष पात्र-पत्रियों के प्रवेश पर पर्दा फैलाने की व्यवस्था होती है। इसे पर्दे को आड़-कापड़ कहते हैं। यह ‘आड़कापड़ नाट्यशास्त्रा (भरतमुनि) की पेटी अथवा आपटी तथा यवनिका के समान होता है। आड़कापड़ प्रायः श्वेत रंग का होता है। इसके दोनों छोड़ों को कुछ व्यक्ति हाथ से पकड़े रहते हैं। प्रथम प्रवेश के समय पात्रा ‘आड़कापड़’ के पीछे नृत्य करते हैं। नृत्य की थोड़ी बहुत झांकी ‘पटी’ के ऊपर के हिस्से से दिख पड़ती है। नृत्य के उपरान्त ‘आड़कापड़’ हटा दिया जाता है तथा पात्र अभिनय के लिए सामने मंच पर प्रस्तुत होते हैं। पात्र प्रायः ‘गायन-वायन’ की बाई ओर से आते-जाते हैं। किन्तु कुछ विशेष प्रवेशों के लिए जिसमें रथ इत्यादि को दर्शक के सामने लाया जाता है, रंगशाला की दूसरी ओर से भी आने का स्थान होता है।
मण्डप के दोनों ओर अर्थात् रंगस्थली के दाहिने ओर बाएं
दर्शकगण बैठते हैं। दर्शक के बैठने की जगह प्रायः घोडे़ की नाल के आकार की होती
है। दर्शक चटाई बिछाकर जमीन पर बैठते हैं। इस चटाई को कठ कहा जाता है,
जो ‘सत्र’ के भक्तों के द्वारा ही बुना जाता है। रंगमण्डप में अभिनय
स्थल के ऊपर, ठीक मध्य से एक वितान (चंदोवा) टांग दिया जाता है। इस वितान के नीचे ही मुख्य
अभिनय स्थल होते हैं। इसी के नीचे एक छोटी-सी चौकी के ऊपर सुसज्जित ‘पटवितान’ खड़ा कर दिया जाता है। यही चौकी कभी राजा का सिंहासन होती है
कभी कृष्ण के बांसुरी बजाने का स्थल। मंच-सज्जा के नाम पर मात्र यही चौकी मंच पर
रखी रहती है। दृश्य परिवर्तन का बोध कभी-कभी ‘सूत्रधार’ ही संवादों में व्यक्त करता है। रंगशाला में
प्रकाश-व्यवस्था के लिए प्रकाश-स्तम्भ बनाए जाते हैं जिन्हें गाछ कहा जाता है। इन
गाछों का आकार वृक्ष जैसा होता है जिनकी शाखाओं पर सैकड़ों मिट्टी के दीपक तथा
मशालें जलाई जाती हैं। सूत्रधार तथा अन्य मुख्य पात्रों के प्रवेश पर अलग से एक
प्रदीप्त प्रकाश स्तम्भ दिखाया जाता है, जिसे अग्निघर कहा जाता है।
अंगभूषण और रूपसज्जा- अंकिया नाट के कलाकार स्वयं अपना रूप-सज्जा करने में
सिद्धहस्त होते हैं। रूप-सज्जा में सिन्दूर, काजल, खड़िया, गेरू आदि प्रयुक्त होते हैं। अंकिया नाट में रूप सज्जा
यथार्थपरक चरित्रगत विशेषताओं को स्पष्ट करने वाली तथा भड़कीली होती है।
कलाकार मुखौटे भी धारण करते हैं। लेकिन ये मुखौटे सिर्फ राक्षस,
गरुड़, हनुमान, ब्रह्मा जैसे पात्रों के लिए प्रयुक्त होते है। मसखरा
(जोकर) का मुखौटा हास्यात्पादक होता है। अन्य सभी पात्र बिना मुखौटे के ही
स्वतन्त्र अभिनय करते हैं। ये मुखौटे स्वयं कलाकारों द्वारा तैयार किये जाते हैं।
मुखौटे बनाने वाले कलाकार को खनिकर कहा जाता है। खनिकर कहे जाने वाले कलाकार की कई
पीढ़ियां मुखौटे बनाती आ रही हैं। मुखौटे मुख्यतः मिट्टी, लकड़ी, बांस और कपड़े के बनाए जाते हैं। इनके ऊपर सिन्दूरी लाल रंग,
पीला, नीला और काले स्याही से रेखाएँ खींची होती हैं।
अंकिया नाट के कलाकार पात्रोचित वेशभूषा धारण करते हैं। सूत्रधार
की वेशभूषा कुछ विशेष होती है। उनके वस्त्र सफेद होते हैं। सिर पर पगड़ी (पाग) या ‘मुगलई टोपी’ धारण करता है। शरीर पर घुटने तक लटकते हुए घाघरा पहनता है।
हाथों में चांदी की चूड़ियाँ तथा कानों में सोने की बाली और पैरों में नुपूर पहनते
हैं। अन्य पात्रों में जैसे ‘नटुवा’ की वेशभूषा सूत्रधार की ही तरह होता है। लेकिन दक्षिणापथ
सत्रों में नटुवा पारदर्शी घूंघट से अपना चेहरा ढके रहते हैं। बलराम नीले रंग की
धोती तो कृष्ण पीले रंग की धोती पहनते हैं। कृष्ण मयूर पंख से सजा हुआ मुकुट और
तंगाली (वक्षसज्जा) वस्त्र धारण कर हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर मंच पर प्रवेश करते
हैं। गले में फूलों का अंगमाला और पैरों में कांसे का पायल,
कृष्ण और बलराम के भव्य व्यक्तित्व को उजागर करते हैं।
संगीत और नृत्य-अभिनय और प्रस्तुतीकरण की विधियाँ संगीत और नृत्य का मिला-जुला
प्रयोग अंकिया नाट का प्राणतत्व है जो मध्ययुग के ‘संगीतक’ के रंगमंच का सच्चा आभास कराती है। संगीत अंकिया रंगशाला का
प्रधान तत्त्व होता है। वैष्णव नाटक अपनी गीतिमयता के लिए प्रसिद्ध है। इसमें गाए
जाने वाले नाट्यसंगीत तीन प्रकार के होत हैं-
1. भाटिमा - इन गीतों का उद्देश्य और इनकी प्रेरणा मुख्यतः
आध्यात्मिक हैं
2. भावात्मक गीत - इन गीतों का उद्देश्य नाटकीय वातावरण को
तीव्र और गहन बनाना है।
3. पयार अथवा अख्यानक गीत, जिसमें किसी घटना का वर्णन रहता है और जो कथानक की प्रगति
में सहायक होते हैं। ये गीत संगीतमय व भक्तिमय होते हैं और कला एवं सौन्दर्य की
दृष्टि से उच्च भावनाओं और प्रेरणाओं को प्रोत्साहित करनेवाले भी।
अंकिया नाट में गीतों का प्रयोग चरित्रों को स्थापित करने
तथा नाटकीय घटनाक्रम को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है। कथोपकथन अथवा अभिनय में जब
उन विचारों अथवा भाव की पुनरावृत्ति होने लगती है, जो गीतों द्वारा व्यक्त हो चुके हैं,
तब वे बदरंग और बेस्वाद हो उठते हैं। इसके कुछ उदाहरण दिए
जा सकते हैं। रामविजय में रावण की पराजय का चित्रण मुद्राओं द्वारा नहीं गान
द्वारा किया जाता है। कृष्ण द्वारा ताड़का और बकासुर राक्षसों के वध का वर्णन गान
के माध्यम से किया जाता है न कि अभिनय से। इसी प्रकार ‘रुक्मिणी हरण’ की कुछ घटनाएँ यथा रुक्मिणी द्वारा अपने अपराधी भाई की
प्राण-रक्षा के लिए कृष्ण का अनुनय-विनय, कृष्ण और रुक्मिणी के परिणय-दृश्य आदि गीतों के ही माध्यम
से सामने लाए जाते हैं। सम्भवतः इन दृश्यों के लिए गीतों का प्रयोग इसीलिए किया
गया हो कि नाट्यकला की दृष्टि से इन दृश्यों का मंच पर संयोजन अनावश्यक था। या हो
सकता है कि रंगमंच पर स्थान का अभाव रहा हो। वैष्णव रंगमंच पर गीत की तरह नृत्य भी
समान रूप से लोकप्रिय रहा।
पूर्वरंग- अंकिया नाट प्रदर्शन का आनन्द दर्शकगण शाम से लेकर सुबह तक उठाते
हैं। मुख्य नाटक आरम्भ होने से पहले संस्कृत नाटक के पूर्वरंग जैसी ही क्रिया ‘अंकिया नाट’ के मंच पर होती है। अंकिया नाट में मुख्य नाटक आरम्भ होने
से पहले होने वाली इस क्रिया को धेमाली
कहा जाता है। इसमें नाटककार अपने-अपने इष्ट देवताओं के गुण-गान करते हैं। जैसे
आमतौर से असमिया नाटक में विष्णु और उसके अवतार को ही सम्बोधित किए जाने की
प्रथाएँ रहीं हैं। नाटककार ‘धेमाली’ क्रिया का उल्लेख नाट्यालेख में ही कर देते हैं। अंकिया नाट
में बारह प्रकार के ‘धेमाली’ के प्रचलन का उल्लेख मिलता है। इनमें प्रमुख हैं - ना-धेमाली,
बोर धेमाली, नाट धेमाली, देव-धेमाली, राम-धेमाली, घोषा-धेमाली, गरूदा-मर्दना धेमाली तथा बरपेटा धेमाली आदि। इनमें से ‘ना-धेमाली’ माधवदेव ने आरम्भ किया जबकि शंकरदेव के समय में ‘देव-धेमाली’ का प्रचलन था। अन्य सभी ‘धेमाली’ इन दोनों के बाद आरम्भ हुए।
सूत्राधर- पूर्वरंग के बाद ‘सूत्राधर’ का प्रवेश मंच पर होता है। संस्कृत नाटक के सूत्राधर के
विपरीत अंकिया नाट का सूत्रधार सम्पूर्ण नाटक के बराबर ही रंगमंच पर बना रहता है।
पर वस्तुतः वह नाटक के चरित्रों और श्रोताओं के बीच की एक कड़ी के रूप में रहता है।
वह रंगमंच का ही एक आवश्यक हिस्सा है और स्वंय अभिनेता भी है और रंगमंच का संचालक
भी। उसे श्लोकों को पढ़ना होता है। नाटक का परिचालन करना पड़ता है। और कथानक की
कमियों को अपने अनुक्षेपों से पूरा करना पड़ता है।सूत्रधार साधारणतः समवेत गान में अन्य
गायकों का सहभागी हो जाता है। प्रायः नृत्य, संगीत और अभिनय कलाओं में ‘सूत्रधार’ निपुण होता है।
सूत्रधार नांदी गीत की धुन के साथ नृत्य करना है और पात्र
प्रवेश तथा नाटक की घोषणा करता है। नांदी गीत के रूप में सूत्रधार के द्वारा गाया
गया गीत भाटिमा गान कहलाता है। सूत्रधार ही प्रस्तावना (प्रवेश) गीत और प्रचोरना
(प्रशंसा) गीत प्रस्तुत करता है। मंच पर पहले प्रचोरना (प्रशंसा) गीत प्रस्तुत
किया जाता है और इसके बाद भाटिमा गान। प्रचोरना का आरम्भ संस्कृत श्लोक में इस
प्रकार होता है। -‘‘भो-भो सभासदाः, स्वयं शृणुत सांवधानतः’’। इसके पश्चात् ‘नाट’ शुरू होने की घोषणा निर्देशक (गुरु) द्वारा की जाती है।
सूत्रधार नाटक के विषय से दर्शक को अवगत कराता है और फिर प्रमुख पात्रों का प्रवेश
आरम्भ होता है। दैवी चरित्रों के प्रवेश से पहले सूत्रधार प्रस्तावना में कहता है-
‘‘आकाशे
कि वाद्य बाजत’’ (आकाश में कौन-सा बाजा बज रहा है?) इसके बाद किसी दैवी ध्वनि की बजने की आवाज होती है और फिर
कहा जाता है कि ‘देव दुन्दुभि बाजत’ (देवताओं की दुन्दुभि बज रही है)। इस पर फिर कहा जाता है- ‘‘आह परम ईश्वर कृष्ण मिलल’’ और इस भांति राम या कृष्ण जैसे प्रधान चरित्र को श्रोताओं
के सामने लाया जाता है। नाटक के पात्र मंच पर नृत्य करते हुए प्रवेश करते हैं या
थिरकते हुए नेपथ्य संगीत खोलों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।
अभिनय-स्त्री-पात्रों की भूमिका पुरुष पात्रों के द्वारा ही अभिनीत होता है।
अभिनय में मुद्राओं और अंग विक्षेपों के द्वारा भाव प्रदर्शन किया जाता है। यदि
घटनाक्रम को गीतों में गायकों द्वारा गाया जाता है तो पात्र उसी के भावानुरूप उस पर अंगविक्षेप या
नृत्य करते हैं। नाटक का समापन सुबह में सूत्रधार द्वारा मुक्ति मंगल गान से किया
जाता है। इस गान के द्वारा सभी के लिए शान्ति और सुख की कामना की जाती है।
पूर्वांचल के लोकटनाट्यों में अंकिया नाट मध्यकालीन पहचान
को कायम रखे हुआ है। इसके कई कारण परिलक्षित होते हैं। पहला यह है कि शंकरदेव ने
वहां के ‘सत्रों
में ऐसी व्यवस्था कर दी थी कि नए सत्राधिकारी को उसी शैली और भाषा में कम-से-कम एक
नाटक की रचना करना भी अनिवार्य हो गया था। इस प्रकार नए-नए नाटक लिखे जाते रहे। एक
अन्य कारण यह भी हो सकता है कि चूंकि यह धार्मिक मंच था, इसलिए लोगों की आस्था इसके प्रति चिरंजीवी रही।
वैष्णव नाट्य परम्परा में दो प्रकार के अंकिया नाटक उपलब्ध
होते हैं। पहला अंकिया भओना जो शंकरदेव और उनके शिष्य माधवदेव द्वारा रचे गए तथा
इसमें संगीत की प्रधानता होती थी। दूसरा मातृभाषा नाटक जो माधवदेव के बाद के महन्तो
ने लिखा तथा जिसमें ब्रजबुलि के स्थान पर असमिया भाषा आ गया और संगीत तत्त्व भी
गौण होने लगे।
शंकरदेव का नाट्य सृजन- शंकरदेव की नाट्य प्रतिभा के सम्बन्ध में रामचरण ठाकुर
विरचित् शंकरदेव चरित में अच्छा प्रकाश डाला गया है। प्रस्तुत पुस्तक
में लिखा गया है कि बहुमुखी कलाओं के मर्मज्ञ शंकरदेव ने एक संन्यासी से चित्रकला
सीखी। उन्होंने नाटकों के अभिनय के लिए स्वयं चित्रपटों का निर्माण किया।
तदुपरान्त संगीतज्ञ, अभिनेता और मंच सहायकों का चयन किया। चेहरे (मुखौटे) और
अन्य अभिनयोपयोगी वस्तुओं का संकलन किया। फिर रंगमंच (रंभा) निर्मित हुआ और वहाँ
प्रकाश की व्यवस्था की गई। इसके बाद चिन्ह यात्रा नामक नाटक अभिनीत हुआ,
जिसमें शंकरदेव स्वयं अभिनय किए।
कहा जाता है कि उन्होंने 19 वर्ष की अल्पायु में ही पहला अंकिया नाटक लिखा था। चिन्ह
यात्रा नाटक आज उपलब्ध नहीं है। चिन्ह यात्रा नाटक का कोई लिखित रूप प्राप्त नहीं
है। कहा जाता है कि यह नाटक लिखा नहीं गया, बल्कि चित्रों का संयोजन अथवा चित्रपट ही था। कहा जाता है
शंकरदेव ने ‘कंसवध’
नाम से भी एक नाटक लिखा था, जो अनुपलब्ध है। अगर इसे छोड़ भी दिया जाए तो शंकरदेव ने छः
नाटक रचे, वे हैं- रुक्मिणीहरण, कालियदमन, केलिगोपाल, पारिजातहरण, राम-विजय और पत्नी प्रसाद।
इनमें से प्रथम चार कृष्ण-कथाश्रित हैं। ‘रामविजय’ वाल्मीकि रामायाण के बालकाण्ड और अग्निपुरान के पाँचवें
अध्याय पर आधारित हैं राम-विजय शंकरदेव की अन्तिम रचना मानी जाती है। ‘पत्नी-प्रसाद’ की कथा विवाहित ब्राह्मणी स्त्रियों के अतिशय कृष्ण प्रेम
पर आधारित है।
शंकरदेव के परवर्ती नाट्य प्रयोक्ता-शंकरदेव के बाद उनके शिष्य माधवदेव ने न
केवल अपने गुरुदेव की नाट्य परम्परा को कायम रखा, बल्कि, उसे विकसित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने
असम प्रदेश के लोकप्रिय नृत्य शैली झूमरा पर आधारित नाटक लिखा। इनके नाटकों को
झूमरा भी कहा जाता है।
माधवदेव ने पाँच नाटकों की रचना की, वे हैं- अर्जुन भंजन, चोरधरा, पिम्पारा गुचुवा और भोजन विहार। इन नाटकों में से प्रथम और
अन्तिम में माधवदेव की कलात्मक तीक्ष्णता,
प्रवेक्षण शक्ति और संयम के विशेष रूप परिलक्षित हुए हैं,
इन नाटकों ने माधवदेव को कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित
किया। चोरधरा और पिम्परा गुचुवा शिल्प-विधि की दृष्टि से तो नहीं किन्तु
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उनके सर्वाधिक सपफल और लोकप्रिय नाटक हैं। श्रीमाधवदेव
आजीवन ब्रह्मचारी रहे। शायद इसीलिए भी इनके नाटकों का विषय सिर्फ कृष्ण बाललीला से
सम्बन्धित रहा।
माधवदेव के बाद ‘गोपालदेव’ ने आचार्यत्त्व ग्रहण किया। उन्होंने कृष्ण जन्म तथा नन्द
के यहां उनके पहुँचाए जाने की कथा को लेकर जन्मयात्रा नामक नाटक लिखा। इसके अलावा
इनके दो नाटक और हैं -नन्दुतात्सव और
गोपी-उद्धव संवाद। बाद के दिनों में रामचरण ठाकुर, द्विजभूषण और दैत्यारी ठाकुर प्रभृति नाटककारों ने इस
परम्परा को आगे बढ़ाया। इन लोगों ने भी अंकिया शैली में नाटक लिखे। इनमें
कृष्ण-जीवन के विविध प्रसंग प्रस्तुत किए गए हैं। ऐसा नहीं है कि ‘अंकिया नाट’ मंच पर कृष्णेत्तर विषय के नाटक नहीं रचे गए। कई नाटककारों
ने राम और शिव लीला पर आधारित नाटक भी रचे, लेकिन अंकिया नाटकों में कृष्ण की लीला से सम्बन्धित नाटकों
की प्रधानता सदा ही बनी रही।
पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर सोलहवीं शताब्दी
के अन्त तक (लगभग एक-सौ वर्षों का यह काल)
वैष्णव पुनर्जागृति के तत्त्वाधान में वैष्णव नाट्य साहित्य की उन्नति का काल था।
गोपालअता को छोड़कर बाद की पीढ़ियों के बाकी किसी भी नाटककार ने कला की उत्कृष्टता
का कोई परिचय नहीं दिया। अपने पूर्ववर्ती नाटककारों की ही परम्परा में इन्होंने भी
अपनी रचना के लिए पौराणिक आख्यानों को ही चुना किन्तु इनकी सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियां
भी पुनरावृत्तिपूर्ण और अनुकरणात्मक ही है। इन नाटकों में ब्रजबुलि की प्रधानता का
स्थान बोलचाल की असमिया भाषा को मिल गया। लेकिन परम्परा की जीवन्तता और
परिवर्तनशीलता के निर्वाह में इन नाटककारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
इस काल के अन्य
नाटककारों में रामचरण ठाकुर को समीचीन सपफलता मिली। उनका एक ही नाटक उपलब्ध है-कंस
वध, नान्दी
श्लोक, भाटिमा और पयार जैसी तत्कालीन अन्य नाटकीय विशेषताओं को यदि छोड़ भी दे,(जिनका प्रयोग उन्होंने किया, वो भी केवल शिल्पविधि की दृष्टि से) तो यह नाटक शंकरदेव के
सर्वोत्कृष्ट नाटकों के समकक्ष हैं।
दैत्यारि ठाकुर के दो नाटक माने जाते हैं- नृसिंह यात्रा और
स्यामन्त हरण। उनके समकालीन भूषणद्विज ने अजामलि-उपाख्यान नाटक लिखा।
दैत्यारि-काव्यों प्रह्लाद चरित और स्यामन्तहरण का स्पष्ट प्रभाव है। फिर भी वे
उनकी भद्दी नकल नहीं है। इन दो नाटकों में शकंरदेव के समय के अन्य वैष्णव नाटकों
के विपरीत संवादों का स्थान गुण और परिणाम दोनों ही दृष्टि से प्रमुख और
महत्वपूर्ण हैं।
भूषणद्वितज के अजामिल उपाख्यान में इस परम्परा और प्रतृप्ति
का आरै भी विकास हुआ है तथा इसे पर्याप्त सफलता भी मिली है। नाटकीय अभिव्यक्ति के
लिए जब संवादों का प्रयोग अधिक होने लगा, तब से एक प्रधान चरित्र के रूप में सूत्रधार का महत्त्व घट
गया। यह भी इस काल की एक नवीनता ही थी।
इस काल के अन्य नाटकों में यदुमणि देव के फल्गूयात्रा,
रामदेव के सुभद्राहरण, रुचिदेव के कुमारहरण, गोपाल के सीताहरण, दुर्वासाभेजन, तथा बलिचलन और पूर्णकान्त के सिन्धुयात्रा का नाम लिया जा सकता है। फल्गू यात्रा नाटक एक
चित्रावली के समान हैं, जिसमें फल्गू उत्सव के अवसर पर ब्रजधाम की नारियों के साथ
कृष्ण के भावावेश का चित्रण है। चूँकि शंकरदेव के केलिगोपाल में जो गोपबाला कृष्ण
के विरह में तड़पती हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि फल्गूयात्रा के द्वारा पहली बार
राधा का असमिया वैष्णव साहित्य में प्रवेश हुआ। कथा प्रकरण सम्बन्धी इन नवीनता की
दृष्टि से यह नाटक महत्त्वपूर्ण है। सुभद्राहरण अर्जुन के द्वारा बलराम की बहन
सुभद्रा का हरण जैसे पौराणिक आख्यान पर आधारित है। सम्पूर्ण नाटक,
उसके संवाद और गीत ब्रजबुलि में है। गोपाल जैसे नाटककारों
ने अपने सीताहरण, दुर्वासा भोजन आदि नाटकों में मुक्तावली छन्द का पहले पहल
प्रयोग किया।
निष्कर्षतः इस काल के नाटकों में शंकरदेव और माधवदेव ने
नाटक की रचना में पद्य की जो प्रधानता दे रखी थी, उसके कारण नाटकीय क्रम में बहुत अधिक निर्जीवता आ गई थी।
शृंगारिक प्रवृत्ति ने नाटकों में फूहड़ता का समावेश किया। उसने लोकरंजन में तो योग
दिया पर नाटक को कठोर धार्मिक साधना और उसकी गम्भीरता से वंचित कर दिया। जिस
वैष्णव नाटक ने शंकरदेव और माधवदेव तथा उनके समकालीन अन्य नाटककारों के कारण
उत्कृष्टतता की ऊँची-से-ऊँची सीढ़ी पार की थी, परवर्ती काल में रीतिवाद की प्रवृति ने उस पर अधिकार जमाना
शुरू कर दिया, फलस्वरूप ये नाटक ह्रासोन्मुखी हो गए। बाद के नाटक केवल मनबहलाव का एक साधन रह
गया।
( विशेष अध्ययन : लोकायन – ओम प्रकाश भारती, भारतीय
लोकनाट्य: परम्परा और सौन्दर्य)
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