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Tuesday, February 1, 2022

कश्मीर का लोकनाट्य - भांड पाथर, ओम प्रकाश भारती

 

                         कश्मीर का लोकनाट्य - भांड पाथर


भांडज़श्न या भांडपाथर  काश्मीरियों का लोकनाट्य है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है भांडऔर जश्न। भांड कश्मीर के वाथोरा, बडगाम, कुपवाड़ा,  कुलग्राम, वायोर, एकीग्राम, बुमूज तथा  एटामुकाम आदि  क्षेत्र में बसने वाली कालजीवी समुदाय  है। ज़श्न फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है, सामुहिक रूप से मनाया जाने वाला उत्सव। इस प्रकार भांड द्वारा मनाया जाने वाले नाट्योत्सव को भांड जश्न कहा जाता है। दूसरी व्याख्या है कि  भांड शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के भण्डधातु से हुई है, जिसका अर्थ होता है मसख़रा और पाथर शब्द संस्कृत शब्द पात्र का कश्मीरी रूप है। अतः भांड पाथर का अर्थ हुआ भांडो द्वारा पात्रों का अभिनय या नकल। उत्तर भारत के कई राज्यों में भांड कलाकार आज भी मसखरी का कार्य करते हैं।  लगता है नाट्यशास्त्र के रचियेता भरत मुनि भांडों से परिचित थे। पुष्कर आदि घन वाद्यों का वर्णन करते समय उन्होंने माना है कि इस वाद्य-विशेष की रचना भांड-वाद्य के आधार पर हुयी है ।


            15वीं शताब्दी के आस-पास कश्मीर के ग्राम्यांचल में भांडजश्नउद्भव और विकास हुआ। कश्मीर सहित सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र पर शैव मत का व्यापक प्रभाव रहा है। कश्मीर के अनेक हिन्दू राजा शैव मतालम्बी थे। नटराज शैव नृत्य और संगीत के आदि देव हैं। शिव की अराधना के लिए मंदिरों में नृत्य तथा गीतों का प्रचलन बढ़ा।  कश्मीर के अकबर के नाम से प्रसिद्ध जैनुल अबेदिन के दरबार में हाफिज़ाओंद्वारा प्रस्तुत हाफिज़नामेंके आयोजनों से गज़ब का समां बंध जाता था। कालांतर में (15वीं शताब्दी के आस-पास) राजनैतिक परिवर्तनों के कारण कलाओं को राजाश्रय मिलना बंद हो गया। परिणमस्वरूप शास्त्रीय नृत्य, संगीतों की परम्परा अवरूद्ध  हो गयी। इनके सभी कलाकार गाँव चले गए। और पूर्व प्रचलित नृत्य, गीत और संगीत की परम्परा में नाटकीय और लोकतत्वों  का समावेश कर जश्नका आरंभ किया।

            भांड जश्न में पांरपरिक कश्मीरी संगीत सूफ़ियाना कलाम का प्रयोग किया जाता है।  यह भारतीय, ईरानी और कश्मीरी संगीत सूफ़ियाना कलाम का प्रयोग किया जाता है। यह भारतीय, ईरानी और कश्मीरी संगीत प(तियों के समिश्रण से बना है इसके कुछ रागों के नाम इस प्रकार हैं जंजोटी, दुगाह, रास्त, तबरोज़, सुबह कल्याण, तोड़ी बहार, बड़ रंग, स्वारी, गतका तथा हदिंपोश इत्यादि।

            भांड पाथेर के वाद्ययंत्रों में स्वरनय, साज –ए- कश्मीर, रबाब, ढोल, मंजीरा, नगारा और दहर आदि प्रमुख होते हैं। प्रत्येक नाटकों में पात्रों के प्रवेश, नृत्य तथा अन्य नाटकीय कार्यकलापों के लिये भिन्न-भिन्न मुकाम (रागनियां) और धुने बजाई जाती हैं 


            वैसे भांड पाथर का आयोजन वर्षभर किया जाता है। लेकिन कश्मीर घाटी में वसंत और ग्रीष्म ऋतु में लगने वाले मेले तथा उर्स आदि के अवसर पर इसका प्रर्दशन अनिवार्य रूप में होता है। शाम ढलते ही रबाब और दहर की खनक और थाप को सुनकर दर्शक जुट जाते हैं। प्रर्दशन सुबह तक चलता रहता है। कभी-कभी दिन में भी इसका प्रर्दशन किया जाता है।

            भांड कलाकार सिर्फ मुसलमान होते हैं। कहा जाता है की स्वतंत्रता से पूर्व कुछ हिन्दू भी भण्डाई करते थे। लेकिन अब वे इसे पूर्णतया छोड़ चुके हैं। भांड पाथर पूर्णत: सामाजिक नाट्य है। किसी प्रकार की धार्मिक भावना की अभिव्यक्ति भांड पाथेर के मंच से नहीं होता।  भांडपाथर के दल नायक  को मागुन कहते हैं। मागुनसंस्कृत भाषा के मार्गनः या महागुणी शब्द का कश्मीरी रूप लगता है। आमतौर पर मागुन ही राजा का अभिनय करता है। राजा सिर पर पगड़ी तथा लम्बा चोगा पहनता है। स्त्री पात्रों की भूमिका युवकों द्वारा अभिनीत की जाती है। वे पेशवाज पहनते हैं और सिर पर दुपट्टे रखते है। अन्य पात्रों की वेशभूषा रोज़मर्रा का पहनावा रहता है। मसख़रा हस्यापद टोपियाँ तथा चादर पहनता है। वह चुटीले संवादों के साथ मंच पर आता हैं और आद्यान्त हास्य-व्यंग की बौछारों से दर्शकों का दिल जीत लेता है। एक नाट्य दल में 12-15 लोग होते हैं।

            भांड जश्नके मंचन का विषय समसामयिक तथा सामाजिक होता हैं। इनमें उन राजाओं का उपहास किया जाता है, जिन्होंने जनसामान्य का शोषण किया है। भांड अपनी मजबूरियों, कमजोरियों और पूरी न होनेवाली आकांक्षाओं पर व्यंग ही नहीं करते बल्कि उपहास की भरपूर सामग्री भी प्रदान करते हैं। भांडपाथर में खेले जानेवाले नाटकों के नाम हैं- दर्ज़ पाथर, आरमान्य पाथर, वातल पाथर, बटअ पाथर, राजा पाथर, अंग्रेज पाथर और बकरवाल पाथर आदि। ये सभी मौखिक होते हैं । घटना और स्थिति के अनुसार कलाकार संवादों कि आशुरचना करते हैं। भांड पाथेर के अभिनय पर कश्मीरी लोक जीवन की अमिट  छाप है।  

 

 

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