भारतीय
लोकनाट्यों की रूपरेखा
ओम प्रकाश भारती
लोकनाट्य को
पारम्परिक, परम्पराशील, लोकधार्मी
नाट्य, जननाट्य, क्षेत्रीय या
प्रादेशिक, ग्रामीण नाट्य अथवा आंचलिक नाट्य आदि कई नामों से
अभिहित किया जाता रहा है। कभी-कभी तो लोकगाथा और लोकनृत्य को भी लोकनाट्य से
संज्ञापित कर भ्रम पैदा की जाती है। हमें यह ज्ञात है कि लोक में या लिखित साहित्य
की परम्परा में किसी भी विधा की उपस्थिति की आवश्यकता और अर्थ है। लोकगाथा,
लोकनृत्य और लोकनाट्य इसीलिए है कि समाज को इन तीनों की अलग-अलग
आवश्यकता है। भिन्न-भिन्न कारणों से समाज में इनकी उपस्थिति अनिवार्य है। इन
अनिवार्यताओं को समझते हुए, इनकी स्वतंत्र पहचान और नामकरण
भी अति आवश्यक है। यहाँ हम केवल लोकनाट्य
पर विमर्श करेंगे। लोकनाट्य सामाजिक पद है, जिसके सामान्यतः
दो अर्थ निकाले जा सकते हैं- लोक का नाट्य और लोक के लिए नाट्य। इस संदर्भ में दो
शब्द विवेच्य हैं- लोक और नाट्य।
1. लोक – अर्थ , परिभाषा , स्वरूप
2. लोकनाट्य- अर्थ,
परिभाषा , विशेषताएँ , वर्गीकरण
3. लोकनाट्यों का उद्भव और विकास
4. भारत के पारंपरिक तथा लोकनाट्य
| Bhavai of Gujarat |
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