आदिकालीन नाट्य रूपों के संदर्भ में ‘हरिवंश पुराण’ का विष्णुपर्व उल्लेखनीय है । हरिवंश पुराण का रचना काल 3री
सदी माना जाता है । कुछ विद्वान इसे अश्वघोष(2री सदी) से पहले का मानते हैं।
प्रदर्शनकारी कलाओं के दृष्टिकोण से यह महत्वपूर्ण ग्रंथ है । हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व में नृत्य और अभिनय संबंधी
सामग्री अपने मौलिक रूप में मिलती है। इस पर्व के अंतर्गत दो प्रसंगों में ‘छालिक्य’ का उल्लेख हुआ है। छालिक्य, वाद्य – संगीत- नृत्यमय अभिनयपरक कला ज्ञात होता है। मुद्रा तथा हाव- भावों का प्रदर्शन इस नृत्य
में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हरिवंश पुराण में विष्णु के दस अवतारों का दृश्यपरक वर्णन हुआ है । कालांतर में कई
लोकनाट्यों में दशावतार प्रसंग और हरिवंश पुराण के अन्य विविध प्रसंगों की मंचन
परंपरा आरंभ हुई । हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व (91-93 अध्याय) में भद्र नामक नट तथा यादव कुमारों यथा प्रद्युम्न, साम्ब आदि द्वारा वज्रनाभपुर में ‘रामायण’ और ‘रंभाभिसार’ नाटक
के प्रदर्शन का उल्लेख हुआ है-
...तदनन्तर वर प्राप्त किये हुए उस नटने वहाँ सुपुर में नृत्य किया
और पुरवासियों के मन में महान् हर्ष भर दिया। उसने रामायण नामक महाकाव्य की कथावस्तु को
लेकर वहाँ एक नाटक किया। उसमें यह दिखाया गया कि राक्षस राज रावण के वध की इच्छा
से अप्रमेय स्वरूप भगवान् विष्णु का भूतल पर अवतार हुआ ।[1] भरतनन्दन! राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न , भरत, ऋषि शृंग तथा शान्ता का वेश उन्हीं के जैसे रूपवाले नटों ने धारण किया था।।8 राजन्! जो राम के समय में जीवित थे, वे बूढ़े
दानव भी उन्हें देखकर आश्चर्य चकित हो गये और कहने लगे, इनका रूप तो ठीक उन्हीं व्यक्तियों के तुल्य है।।9 उनके संस्कार (वेश-धारण), अभिनय, प्रस्तावों (क्रिया-प्रसंगों
) का धारण तथा प्रवेश (पात्रों का प्रथम दर्शन) देखकर सभी दानव बड़े विस्मय में पड़
गये थे।।10 उस नाटक में अनुरक्त हुए वे असुरगण नाट्य विषयों में बारम्बार उठ-उठकर बड़ी प्रसन्नता के साथ आश्चर्ययुक्त कोलाहल
करते और संतुष्ट हो नटों को वस्त्र, गले का भूषण, कंकण, मनोहर
हेमवैदूर्यभूषित हार देते थे।।11-12 दानवराज का वह आदेश
सुनकर शाखा नगर निवासी असुर नटवेशधारी यादवों को रमणीय वज्रपुर में ले गये।
तत्पश्चात् जब वे नट पूर्ण विश्राम कर चुके, तब महाबली
वज्रनाभ ने उन्हें बहुत-से रत्न देकर नाट्यकला का प्रदर्शन करने के लिए आज्ञा दी।।19 नरेश्वर! अन्तःपुर की स्त्रियों को पर्दे की ओट में जहाँ से वे अपने
नेत्रों द्वारा सब कुछ देख सकती थीं, बिठाकर मनस्वी
वज्रनाभ स्वयं भी जाति-भाइयों के साथ उन नटों का अभिनय देखने के लिये बैठा।।20 भयंकर कर्म करने वाले वे यादव कुमार भी उपयुक्त शृंगार करके नटवेश धारण किये और नृत्य का उपक्रम करने लगे।।21 फिर तो घन (झाँझ और करताल आदि), सुषिर (मुरली), मुरज (मृदंग), आनक (ढोल या
नगाड़ा) तथा वीणा के स्वरों से मिश्रित दूसरे-दूसरे बाजे उन नटों द्वारा बजाये जाने
लगे।।22।। तम्पश्चात् यादव कुमारों के साथ आयी हुई
वारांगनाएँ देव गांधार नामक छालिक्य का गान करने लगीं, जो
कानों को अमृत के समान मधुर प्रतीत होता था। वह श्रोता के मन और कान दोनों को सुख
देने वाला था।।23।। गांधार आदि
सातों को व्याप्त करके स्थित होने वाले जो त्रिविध ग्राम (स्वरों के समूह), वसन्त आदि राग तथा गंगावतरण
नामक गीत विशेष हैं, उन्हें रागान्तर से मिश्रित, व्याप्त तथा रमणीय बनाकर वे अपनी मधुर स्वर सम्पत्ति के द्वारा गाने
लगीं।।24।। कार्यवश नटभाव को प्राप्त हुए पराक्रम सम्पन्न
प्रद्युम्न, गद और साम्ब नान्दी[2] बजाने
लगे।।26।। उस समय नान्दी (मांगलिक
पद्य पाठ)- के अंत में रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न ने गंगावतरण से सम्बन्ध रखने वाले श्लोक का उत्तम अभिनय के साथ पाठ किया।।27।।
तत्पश्चात् कुबेर लोक संबंधी ‘रम्भाभिसार’ नामक
नाटक का वे सब लोग अभिनय करने लगे। शूर नामक यादव रावण रूप से उपस्थित हुए। मनोवती नामक वारंगना ने रम्भा का वेष धरण
किया।।28।। प्रद्युम्न ही नलकूबर
बने। साम्ब उनके विदूषक बनकर तदनुरूप कार्य करने लगे। यादव कुमारों ने माया से वहाँ कैलास को ही
मूर्तिमान कर दिया।।29।। क्रोध में भरे हुए नलकूबर ने जिस
प्रकार दुरात्मा रावण को शाप दिया और जिस तरह रम्भा को सान्तवना प्रदान की, इस प्रकरण का, जिसके द्वारा सर्वज्ञ महात्मा
नारद मुनि की कीर्तिपर प्रकाश पड़ता है, उन वीर यादव
कुमारों ने नाटक द्वारा प्रदर्शन किया।।30-31।। अत्यन्त तेजस्वी भीमवंशियों के पाद-विक्षेपपूर्वक किये गये नृत्य और
अभिनय से संतुष्ट हुए ।
भरतनन्दन
! उन दानवों ने यादव कुमारों को दिव्य शीतल एवं सरस चन्दन, अगुरु आदि श्रेष्ठ सुगन्धित पदार्थ तथा चिन्तन करने मात्र से सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवाले उदार
चिन्तामणि नामक रत्न भी दिये। पुरुषप्रवर! नरेश्वर! वहाँ बहुत बार नाटक देखने को
अवसर मिले 35-37।।
उपरोक्त
उल्लेखों में नाट्य प्रदर्शन संबंधी निम्नलिखित तथ्य अवलोकनीय है-
- नाट्य प्रदर्शन में गीत, वाद्य एवं नृत्यों सा समुचित प्रयोग हुआ है।(श्लोक संख्या- 22)
- नट /अभिनेता गायन ,वाद्य तथा नृत्य में निपुण
हैं ।(श्लोक संख्या- 26-27)
- प्रदर्शन में विदूषक की उपस्थिति है । (श्लोक संख्या- 29)
- प्रस्तावना और नांदी पाठ का प्रचलन था । (श्लोक संख्या- 10, 27 )
- नाट्य प्रस्तुति में स्त्रियों की सहभागिता थी तथा स्त्री पात्रों की
भूमिका स्त्रियों द्वारा की जाती थी ।
(श्लोक
संख्या- 23,28 )
- रूपसज्जा, वस्त्र तथा अलंकरण पर विशेष रूप से ध्यान
दिया जाता था ।(श्लोक संख्या- 10)
- पात्रों की भूमिका (रोल) का निर्धारण कलाकारों के शारीरिक एवं चारित्रिक
विशेषताओं के आधार पर निर्धारित होता थी। (श्लोक संख्या- 9)
- नाट्य प्रदर्शन के लिए प्रेक्षकों द्वारा
उपहार या मानदेय देने का प्रचलन था। (श्लोक संख्या- 11, 35)
उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि हरिवंश पुराण में
वर्णित नाट्य प्रस्तुति का शिल्प लोकनाट्यों के समीप है । “तत्पश्चात् कुबेर लोक
संबंधी ‘रम्भाभिसार’ नामक
नाटक का वे सब लोग अभिनय करने लगे” (हरिवंश पुराण के श्लोक
28)- यहाँ लोक संबंधी नाटक से तात्पर्य , लोक
नाट्य परंपरा से हो सकता है। हरिवंश पुराण का यह
विवरण एक ओर नाट्यशास्त्र आधारित प्रदर्शन पद्धति को संपुष्ट करता है, वहीं तत्कालीन समाज में लोकनाट्यों के प्रदर्शन की उपस्थिति को दर्शाता
है।
शोध
प्रश्न : 1. भारतीय परंपरा में किसी भी प्रकार की नाट्य प्रस्तुति का क्या ये पहला
विवरण है? तर्क , विवरण के साथ अभिमत दें।
2.
अश्व घोष और भास के नाटक क्या इस समय तक लिखे जा चुके थे ? अश्वघोष और भास के
नाटकों में
उल्लखित रंग निर्देशों से तुलनात्मक अध्ययन करें।
3. संस्कृत नाटक की प्रस्तुति शिल्प और हरिवंश पुराण में वर्णित नाट्य
प्रस्तुति के शिल्प में क्या
समानताएँ और विभिन्नताएँ हैं , टिप्पणी करें।
आपके विचार और टिप्पणी इस शोध को अग्रगामी बनाएगा ।
[1] रामायणं
महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम्।
जन्म
विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ।।6
[2] एक प्रकार
का विशिष्ट वाद्य
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