गोंधळ
महाराष्ट्र का आनुष्ठानिक लोकनाट्य है। इसका विकास धार्मिक आनुष्ठानिक परंपराओं से
हुआ है। गोंधळ का उल्लेख 12वीं-13वीं शताब्दी के मराठी संत साहित्य में मिलता है। आरंभ में यह एक गायन शैली
था, जिसका आयोजन देवी पूजा के अवसर पर होता था। कालांतर
में इसमें नाटकीय तत्त्वों का समावेश होता गया और यह लोकनाट्य के रूप में प्रचलित
हुआ।

मराठी में गोंधळ शब्द का अर्थ है- गड़बड़।
इसकी व्युत्पति गणदल-शंदाल-गोंदल-गोंधळ आदि क्रम में हुई है। एक मत यह है कि गण का
स्वामी गणेश है, गण का साधारण अर्थ होता है भक्त।
भक्तों का दल गणदल कहलाया होगा और गणदल से ही गोंधळ रूढ़ हुआ। कुछ अन्य मराठी
विद्वानों ने गोंधळ का विकास महाराष्ट्र में प्राचीनकाल में प्रचलित गौडली नृत्य
से (गौंडली-गुंजली-गोंडली-गोंधळ) माना है।
मराठी संतों के साहित्य में विशेषतया ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ के साहित्य में गोंधळ के भक्तिपरक गीत मिलते हैं। संत कवियों के
अधिकांश गीत शक्ति उपासना से जुड़े हैं। शिवाजी महाराज के काल में भवानी की उपासना
और स्तुति में गोंधळ का भव्य आयोजन किया जाता था।
गोंधळ के दो प्रकार प्रचलित हैं- पहला आनुष्ठानिक एवं गायन-नृत्य प्रधान
तथा दूसरा मंचीय अनुष्ठानों से संपृक्त अभिनय प्रधान। दोनों ही प्रदर्शन में भक्ति
रस मुख्य होता है। पहले प्रकार के गोंधळ की प्रस्तुति भोंपे, अराधी या पोतराज द्वारा विभिन्न तरह के नृत्य-गायन के साथ सम्पन्न होता है। डफ, तुनतुनियां और डमरू इस प्रदर्शन
का मुख्य वाद्य होता है। दूसरे प्रकार के गोंधळ का प्रदर्शन प्रायः मराठे दरबारों
में होता था। इस प्रदर्शन में पूर्वरंग, रंगयुक्तियां तथा कथोपकथन की बहुलता होती थी। डफ, तुनतुनियां, संबल के अलावे झांझ इसका मुख्य
वाद्य होता था। कालान्तर में गोंधळ ने दोनों ही पूर्ववर्ती परम्परा से स्वरूप
ग्रहण किया।
गोंधळ प्रदर्शन का स्वरूप अभी तक आनुष्ठानिक ही कही जायेगी। कुछ कलाकारों
की यह पुश्तैनी परम्परा है जो प्रायः गांवों में घूम-घूमकर गोंधळ करते हैं।
गृहस्थी में रहने वाले गोंधळी डबरी कहलाता है। मंदिरों और अन्य सार्वजनिक स्थानों
पर गोंधळ का मंचन रात्रि के लिए दिवटी (मशाल) जलाने की
प्रथा है। नाट्य मंचन से पहले आम्रपल्लव से सजा मिट्टी का घड़ा मंच मर रखा जाता है। फिर दिवटी जलाकर कार्यक्रम शुरू होता है।
गोंधळ में मुख्यतः चार कलाकार होते हैं। एक संबल और एक तुनतुनियां
वादक। एक मुख्य गायक जिसे ‘नाईक’ कहा जाता है। और चौथा पात्र विदूषक जो अक्सर प्रदर्शन के दौरान उटपटांग
प्रश्नों की बौछार कर दर्शकों को हंसाता है। संवाद गीत ऊँचे स्वर में गाये जाते
हैं और बीच-बीच में छोटे-छोटे भक्तिपरक और प्रहसनात्मक प्रसंगों का अभिनय प्रस्तुत
होता है। कालान्तर में वीरोचित प्रसंगों का समावेश भी गोधळ के मंचन में हुआ। मुख्य
गायक, पहले गणपति और फिर देवी वंदना गाता है और अन्य
सहायक गायक उन बोलों को दोहराते हैं।
पात्रों की वेशभूषा समान्य होती है। वे पेशवाकालीन चोबदार व भालदार
लाल पगड़ी तथा बारहबंद वाला श्वेत अंगरखा और सफेद धेती पहनते हैं।
छत्रापति शिवाजी के जीवन-प्रसंगों पर आधारित कई गोंधल रचे गये। संत नामदेव
और ज्ञानदेव रचित गोंधळ विषयक गीति-रचनाएँ आज भी लोकप्रिय हैं। कोल्हापुर, पूना, तुलजापुर, नागपुर और अमरावती आदि स्थानों पर गोंधळ के आयोजनों की आज भी धूम मची रहती
है। तुळजापुर में तुकाई के मंदिर में गोंधळ का भव्य आयोजन होता है, यहां के गोंधळियों को पोतराज कहा जाता है। और पोतराज द्वारा प्रस्तुत
नाट्यप्रसंग को ‘पोतराज का खेल’ कहा जाता है। मराठी में पोत का अर्थ होता है मशाल। पोतराज हाथ में पोत तथा
आराधी पाँव में घुंघरू बांधकर संबल के ताल पर नाचता है। आराधी को देवी का भाव आता
है और भक्तों को कष्ट निवारण का वरदान देते हैं। गोंधळ का एक और लोकप्रिय खेल है-
खंडोबा का गोंधळ। महाराष्ट्र में परम्परा रही है कि जिन दम्पतियों को संतान नहीं
होती थी वे खंडोबा की पूजा कर संतान की मन्नते मांगते थे। यदि उन्हें पुत्र होता
था उसे ‘वाघ्या’ और पुत्री को ‘मुरली’ कहा जाता
था। पुत्र हो या पुत्री जन्म के बाद उन्हें
खंडोबा देवता को समर्पित कर दिया जाता था। ये मंदिरों में ही रहते थे तथा आपस में
इनके संबंध भाई-बहन के होते थे। खंडोबा के गोंधळ में वाघ्या-मुरली और रामोसी
समुदाय के लोग भाग लेते हैं। खंडोबा के पाली और जेजुरी के मंदिरों में आज भी गोंधळ
का प्रदर्शन होता है। इसके अलावे भैरवनाथ और ज्योतिबा का गोंधळ भी प्रस्तुत होता
है। पुणे के ‘पांचगे मंडली’ का
गोंधळ महाराष्ट्र में काफी लोकप्रिय रहा है।
वस्तुतः गीत, नृत्य और अभिनय से युक्त गोंध्ळ
के सार्वजनिक आयोजनों में जनता की सामाजिक और सांस्कृतिक अभिरूचियाँ प्रतिबिंबित
होती है-
लख्ख पडला प्रकाश
दिवट्या मशालीचा
गोंधळाला उभा गोंधळी भवानीचा
लख्ख पडला प्रकाश दिवट्या मशालीचा
गोंधळाला उभा गोंधळी भवानीचा
मी पणाचा दिमाख तुटला
अंतरंगी आवाज उठला
ऐरणीचा सवाल सुटला
या कहाणीचा
लख्ख पडला प्रकाश
दिवट्या मशालीचा
गोंधळाला उभा गोंधळी भवानीचा
हे, लख्ख पडला प्रकाश दिवट्या मशालीचा
गोंधळाला उभा गोंधळी भवानीचा
वीज तळपली, आग उसळली
ज्योत झळकली, आई गं
बंध विणला, भेद शिनला
भाव भिनला आई गं
माळ कवड्यांची घातली गं
आग डोळ्यात दाटली गं
कुंकवाचा भरून मळवट
या कपाळीला
लख्ख पडला प्रकाश
दिवट्या मशालीचा
गोंधळाला उभा गोंधळी भवानीचा
लख्ख पडला प्रकाश दिवट्या मशालीचा
गोंधळाला उभा गोंधळी भवानीचा
आई
राजा उदो, उदो, उदो
तुळजापूर तुळजाभवानी आईचा
माहूर गाडी रेणुका देवीचा
आई अंबाबाईचा
देवी सप्तशृंगीचा
बा सकलकला अधिपती गणपती धाव
पंढरपूर वासिनी विठाई धाव गं
गाज भजनाची येऊ दे गं
झांज स्वीजमाची वाजु दे
पत्थरातून फुटलं टाहो
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