भारतीय
परंपरा में ‘भरतमुनि’ –
ओम प्रकाश भारती
भारतीय
परंपरा के अनुसार ईस्वी पूर्व चौथी सदी से दूसरी सदी के बीच भरत नामक व्यक्ति ने
नाट्यशास्त्र की रचना की। नाट्यशास्त्र नाट्य, नृत्य, संगीत, अलंकार तथा छंदशास्त्र का बीज ग्रंथ है।
भरत शब्द ‘भृ’ ( भरण या पोषण करना ) धातु से ‘अतच’ प्रत्यय लगा कर बना है। भरत का सामान्य अर्थ है– शबर, जुलाहा, खेत, अग्नि, आयुधजीविसंघ, ऋत्विक तथा भरत का शिष्य।
भरत शब्द में अण प्रत्यय लगा कर इस प्रत्यय का लोप हो जाने पर जो भरत
शब्द बनेगा, उसका
अर्थ भरत का शिष्य होगा। क्षीरस्वामी ने भरत शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुये कहा
है-‘भरतस्थापत्य विद्याधि... बहुत्वे लुक’ अर्थात ‘भरतस्यापत्यम’।
इस विग्रह में भरत शब्द से ‘अन ...होकर ‘भरता: बनता है,जो ‘नट’ का वाचक है। अभिनवगुप्त ने ‘भरत’ शब्द को नटमात्र का वाचक माना है। ‘याज्ञवल्य्क
स्मृति’ में भरत शब्द का प्रयोग अभिनेता तथा नाट्य
प्रयोक्ता के अर्थ में हुआ है। नन्दिकेश्वर के ‘अभिनयदर्पण’ एवं ‘भारताणर्व’ से
ज्ञात होता है कि वहाँ भरत शब्द नाट्य एवं नट के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
नाट्यशास्त्र में स्वयं भरत ने नाना प्रकार की भूमिकाओं को भरण(धारण) करने वाले, नटन करने वाले नटों(अभिनेताओं) तथा उसके सहायकों को ‘भरत’ कहा है। इन तथ्यों से प्रतीत होता है कि
प्राचीन काल में ‘नट’, सूत्रधार
तथा अभिनेता को भरत कहा जाता था।
संस्कृत में लिखे गये ‘नाट्यशास्त्र’ में सैंतीस अध्याय तथा लगभग छ: हज़ार श्लोक हैं। नाट्यशास्त्र के अनुसार मुनि
भरत ने ब्रह्मा से नाट्य वेद ग्रहण कर अपने एक सौ पुत्रों को नाट्य वेद की शिक्षा
दी तथा नाट्य मंडप का निर्माण किया। कालांतर में इनमें से कई पुत्रों ने नाट्य
विषयक ग्रन्थों की रचना की। भरत ने स्वयं ‘महेन्द्र
विजय’ (नाटक), ‘त्रिपुरदाह’(डिम) तथा ‘अमृतमंथन’(समवकार)
नामक रूपकों को विभिन्न अवसरों पर प्रस्तुत किया। धनंजय के दसरूपक, नंदिकेश्वर के अभिनय दर्पण, शारदातनय के भाव
प्रकाशन, अभिनव गुप्त के अभिनव भारती, सिंहभूपाल के रसार्णवसुधाकर, सागरनन्दी के
नाटक- लक्षण- रत्नकोश तथा रामचंद्र-गुणचन्द्र के नाट्यदर्पण
आदि ग्रन्थों में भरत का उल्लेख नाट्यशास्त्रकार/ नाट्यशास्त्राचार्य के रूप में
किया गया है। संस्कृत के नाटककारों ने भरत का उल्लेख नाट्यप्रयोक्ता के रूप में
किया है। कालिदास के विक्रमोंर्वशीयम में भरत द्वारा स्वर्ग में इन्द्र आदि देवों
के समक्ष ‘लक्ष्मी स्वयंवर’ नाटक
कराने का उल्लेख किया है। भवभूति के उत्तररामचरित के अंतिम अंक में रामायण की नाट्य
प्रस्तुति भरत द्वारा की जाती है। राजशेखर के बाल रामायण में सीता स्वयंवर नाटक
रावण की राज सभा में खेला जाता है, जिसके प्रयोक्ता भरत
और स्थापक कोहल हैं।
रामभद्र के प्रबुद्धरौहिणेय में नाट्याचार्य भरत गन्धर्वों तथा
अप्सराओं की भूमिका में अपने नट - नटियों को उतारकर स्वर्ग के दृश्य का भ्रमजाल
रचते हैं। नाट्यशास्त्र के ही पहले चौथे तथा अंतिम अध्यायों (36-37) में भरतमुनि
ने स्वयं को नाट्यशास्त्र का प्रवक्ता बताते हुए भूलोक में नाट्य के अवतरण में
अपनी भूमिका की चर्चा की है।
प्राचीन
भारतीय ग्रन्थों में भरत नाम के कई व्यक्तियों का उल्लेख मिलने के कारण
नाट्यशास्त्र के रचयिता भरतमुनि को लेकर अभी तक भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
मान्यता है कि नाट्यशास्त्र की रचना कई भारतों ने मिलकर कई युगों में की।
पौराणिक ग्रन्थों में अनेक भरतों का उल्लेख मिलता है; यथा, दुष्यन्त पुत्र भरत , दशरथपुत्र भरत, मंधाता के प्रपौत्र भरत तथा जड़ भरत। लेकिन इन भरतों का नाट्यशास्त्र का
प्रणेता नहीं होना प्रमाणित है। भागवत पुराण(5/7/8) के अनुसार ब्रह्मावर्त में
प्रियव्रत के वंश में राजा ॠषभदेव के पुत्र भरत हुये। वे ब्रह्मावर्त से वैशाली
जनपद के पुलहाश्रम चले गये। भरत के पाँच पुत्र थे। उनमें सुमति नाट्यशास्त्र का
विद्वान था। सुमति ने नन्दिकेशवर से नाट्यकला की शिक्षा ग्रहण की।
पद्मपुराण
में भरत के द्वारा लक्ष्मीस्वयंवर नाटक कराये जाने का वर्णन है।
नाट्यशास्त्र
में भरत शब्द का प्रयोग अभिनेता, सूत्रधार आदि के रूप में मिलने के कारण परवर्ती आचार्यों में अनेक भरतों
की आशंका व्याप्त हो गई। कुछ आचार्यों ने वृद्ध तथा आदि भरत की परिकल्पना की।
आचार्य अभिनव गुप्त ने अभिनव भारती में नाट्यशास्त्र का उन्नायक आचार्य सदाशिव, ब्रह्मा तथा भरत को माना है। भावप्रकाशन के अनुसार नाट्यशास्त्र की
द्वादशसाहस्त्री- संहिता की रचना आदि या वृद्ध भरत ने की। कालांतर में
नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के साथ भरत शब्द का प्रचलन रूढ़ हो गया।
नाट्यशास्त्र
के अन्तःसाक्ष के अनुसार भरत काश्मीर के निवासी थे। नाट्यशास्त्र के अनुसार
भरतमुनि ने हिमालय पर्वत में भगवान शिव के आदेश
पर तंडु से तांडव का ज्ञान प्राप्त किया था तथा शिव के समक्ष त्रिपुर दाह नामक डिम
(रूपक) को प्रस्तुत किया था। नाट्यशास्त्र में अन्यत्र भी हिमालय पर्वत की
वनस्पतियों एवं मनोरम प्रकृतिक दृश्यों का चित्रण हुआ है। नाट्यशास्त्र के अधिकांश
भाष्यकार जैसे भट्ट लोल्लट, श्री शंकुक, भट्टनायक तथा अभिनवगुप्तपाद आदि का मूल निवास हिमालय का काश्मीर अंचल है।
अतः अनुमान है कि भरतमुनि हिमालय के काश्मीर अंचल
में ही हुए होंगे।
निष्कर्ष
– प्राचीन
भारत में भरत नाम के कई व्यक्ति हुये । भरत शब्द नट,अभिनेता
तथा नाट्य प्रयोक्ताओं के लिये रूढ़ रहा। नाट्यशास्त्र में भरत को नाट्यवेद का
प्रवर्तक तथा प्रयोक्ता कहा गया है। नाट्यशास्त्र के कई स्थलों पर नट और अभिनेताओं
को भरत कहकर संज्ञापित किया गया है। पुराणों में ‘हे
भारतनंदन!’ का संबोधन नाट्य रसिकों के लिए हुआ है। प्राचीन नाट्य लक्षण ग्रंथों में नाट्यवेद का आदि प्रणेता भरत मुनि को कहा
गया है। निश्चित रूप से नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरतमुनि एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे ।
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