देवदासी
देवदासी का अर्थ है, देवी –देवताओं की दासी
अर्थात सेविका । उड़ीसा ,महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के
मंदिरों में देवी-देवताओं को समर्पित युवती/स्त्री को देवदासी कहा गया । भारत में
देवदासी प्रथा का प्रचलन प्राचीन काल से है । माता –पिता स्वेच्छा ,भक्तिभाव या पालन –पोषण के अर्थाभाव में अपनी पुत्री को
मंदिरों में अर्पित कर देते थे । मंदिर के
पुरोहित अर्पित कन्या का प्रतिकात्मक विवाह एक विशेष
आनुष्ठानिक विधि से मंदिर के देवी-देवताओं से करवा देते थे। यही व्याहता स्त्री
देवदासी कहलायी । मृत्युपर्यन्त ये देवदासियाँ
देवी-देवताओं की पूजा -अर्चना करतीं थीं । विशेष अवसरों पर मंदिरों मे नृत्य- गान
प्रस्तुत कर देवी- देवताओं को प्रसन्न करती थी। इनकेलिए
कठोर धार्मिक और सामाजिक नियम थे । देवदासियों को कई सामाजिक एवं मानवीय अधिकारों
से वंचित रखा गया । आरंभ में देवदासियाँ केवल मंदिरों के प्रांगण मे देवी देवताओं
के विग्रह के सामने नृत्य-गान करती थीं । सामंतीकाल में देवदासियाँ मंदिरों के
संरक्षक तथा पुरोहितों के आश्रयदाता शासक /सामंतों के यौनिक अभिरुचियों को तृप्त करने के लिए नृत्य-गान प्रस्तुत करने लगीं । धार्मिक अनुष्ठान और
नृत्य-गीत की आड़ मे यौनिक तृप्तिकरण की प्रवृत्ति इस कदर बढ़ी कि औपनिवेशिक काल में
देवदासियों पर यौनाचार मे लिप्त होने तथा वेश्यावृत्ति के आरोप/लांछन लगे।
भारत के विभिन्न अंचलों में देवदासी प्रथा भिन्न- भिन्न रूपों में प्रचलित
रही हैं । भारत के अन्य भागों के विपरित उड़ीसा के महारी देवदासियों को
वेश्यावृत्ति में लिप्त होने का कोई साक्ष्य नहीं
मिलता है। महारी, उडि़या भाषा में जिसका शाब्दिक अर्थ
है मोहन नारी, अर्थात् भगवान श्रीकृष्णा मुरारी मोहन
के लिए समर्पित नारी। यहां ,यह प्रचलित दर्शन रहा कि मन
के आवेगों तथा पांच इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर कोई भी ब्रह्मचारिणी महारी बन सकती है। ...देवदासियों के लिए भारत के विभिन्न अंचलों में अलग –अलग नाम प्रचलित हैं। उड़ीसा में माहारी ,कर्नाटक में वासवी तथा महाराष्ट्र में इसे मतंगी कहा जाता है । ऐतिहासिक अन्तःसाक्ष्यों के
अनुसार देवदासी प्रथा का प्रचलन ई. पू. तीसरी शताब्दी से है। कालिदास
के मेघदूत में उल्लेखित है कि उज्जेन के महाकाल
मंदिर में पूजा के समय नर्तकियाँ नृत्य करती थीं
। पुराणों में मंदिरों के लिए गायिकाओं की व्यवस्था करने का उल्लेख मिलता है।
दक्षिण भारत के चोल शासकों ने देवदासी प्रथा को विशेष प्रोत्साहन दिया। चोल काल
में मंदिर धार्मिक और आर्थिक रूप से शक्तिशाली हो गए। स्थापत्य कला की दृष्टि से
चोल शासकों ने मंदिरों के निर्माण में गहरी रुचि दिखाई। मंदिर के प्रांगण में पुरोहित और भक्तों के आवास के अलावे नर्तक और नर्तकियों के लिए आवास
गृह बने। मंदिर के परिसर में प्रदर्शन स्थल बनाए गए। चोलकलीन शिलालेखों से पता
चलता है कि तंजौर के बृहदेश्वहर मंदिर में 400 नट्टूवनार (नर्तक) नियुक्त किए गए थे। ये पुरुष नर्तक देवदासियों के साथ सह प्रदर्शक
के रूप में कार्य करते थे। शिलालेख से यह भी पता चलता है कि चोल राजकुमारी कुंतवी
ने नट्टूवनार से
नृत्य और संगीत की शिक्षा प्राप्त की थी। 10वीं
सदी के अंत तक देवदासियां मंदिर व्यवस्था का आवश्यक अंग बन चुकी थी। अब यह प्रथा
केवल धार्मिक आस्था या विश्वास का अंग नहीं होकर, रोजगारपरक तथा अर्थोपार्जन के महत्व पूर्ण साधन के रूप में प्रकट हुई।
सामंती काल में शासकों ने देवदासियों को मंदिर के बाहर राजकीय आयोजनों में नर्तन
के लिए आमंत्रित करने लगे। इन आयोजनों का उद्देश्य
केवल मनोरंजन था। इस श्रेणी के नर्तकियों को राजदासी कहा गया। 11वीं सदी के बाद हिंदू राज्यों
के पतन के साथ मंदिरों को मिलने वाले राजाश्रय और आर्थिक अनुदानों में कमी आई।
कालांतर में ये सहायता बंदप्राय हो गई। देवदासियों की स्थिति दयनीय हो गई। सामाजिक
व्यवस्था के अनुसार उसके लिए पारिवारिक जीवन में
लौटना दुष्कर था। देवदासियों के द्वारा प्रस्तुत कलारूपों की सामाजिक मांग और कद्र
भी नहीं रहा। तिरस्कार और गरीबी ने उन्हें
वेश्यावृति अपनाने के लिए विवश किया।
उत्तर औपनिवेशिक काल में देवदासियों के उद्धार के लिए कई महत्वापूर्ण
प्रयास किए गए। उद्धारक दो खेमों में बंट गए। एक सुधारवादी और दूसरा पुनरूत्थान
वादी थे। सुधारवादियों की राय थी कि देवदासी
द्वारा प्रदर्शित कला रूपों को प्रतिष्ठा दिलायी जाये तथा इन्हें अन्य सामाजिक अधिकार दिये जाएं। पुनरूत्थांनवादी इस कदम को धार्मिक हस्तहक्षेप
मान रहे थें। वह थोड़े बहुत संशोधनों के साथ जिसमें देवदासियों को मिलने वाले कुछ
सामाजिक अधिकारों थे , इस प्रथा को बनाये
रखने के पक्षधर थे। एक और खेमा था, जो इस प्रथा की
सामाप्ति चाहते थे और देवदासियों को समाज की मुख्य
धारा से जोड़ने की पहल कर रहे थे। औपनिवेशिक सरकार की सख्ती को कभी-कभी ईसाइर्यत
से जोड़कर देखा जाने लगा। देवदसियों की हितों की सुरक्षा के लिए 1934 का ‘देवदासी प्रोटेक्शेन एक्ट’ पहला वैधानिक प्रयास है। यह अधिनियम ब्रिटिश सरकार द्वारा केवल मुंबई प्रांत के लिए लाया गया था। इस अधिनियम के तहत देवदासियों को
कुछ सामाजिक अधिकार दिए गए। देवदासियों के विवाह को वैधानिक ठहराया गया। सामाजिक सुरक्षा प्रदान की गई। देवदासियों को
प्रताडि़त को करने वाले दोषियों को एक वर्ष की कैद तथा अर्थदंड का प्रावधान किया गया। देवदासियों से जुडे़
भूमि विवाद को सुलझाने का अधिकार स्थानीय जिला कलेक्टर
को दिया गया । 1947 का ‘‘मद्रास देवदासी प्रीवेंसन एक्ट’’ इस दिशा में अगला महत्वापूर्ण कदम था। इस अधिनियम के तहत देवदासियों को समाजिक अधिकार देने के कई प्रस्ताएव पारित हुए।
1988 में पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर देवदासी प्रथा समाप्त करने की पहल की गई। भारत सरकार के राष्ट्रीय महिला आयोग ने विभिन्न राज्यों में देवदासियों की स्थितियों का सर्वेक्षण करवाया । उड़ीसा की सरकार ने कहा है कि देवदासी प्रथा राज्य में प्रचलित नहीं है, केवल पुरी के मंदिर में एक देवदासी है। इसी तरह तमिलनाडु सरकार ने लिखा कि इस प्रथा की समाप्ती हो चुकी है और अब राज्य में कोई देवदासी नहीं है । आंध्र प्रदेश ने अपने राज्य के भीतर 16,624 और कर्नाटक ने 22,941 देवदासियों की पहचान की । महाराष्ट्र सरकार, आयोग द्वारा मांगी गयी जानकारी उपलब्ध नहीं करा सकी । हालांकि, उस समय 1,432 देवदासियाँ राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली “देवदासी रखरखाव भत्ता” प्राप्त कर रहीं थीं। वर्तमान में आंध्र प्रदेश के करीमनगर, वारंगल, निजामाबाद, महबूबनगर, कुरनूल, हैदराबाद, अनन्तपुर, मेडक, आदिलाबाद, चित्तूर, रंगारेड्ड,नेल्लोर, नलगोंडा और श्रीकाकुलम आदि जिलों देवदासी प्रथा प्रचलित है ।
कर्नाटक के रायचूर, बीजापुर, बेलगाम, धारवाड़, बेल्लारी तथा गुलबर्गा आदि जिलों में देवदासियाँ पायी
गई हैं । महाराष्ट्र के पुणे, शोलापुर, कोल्हापुर, सांगली, मुंबई, लातूर, उस्मानाबाद, सतारा, सिंधुदुर्ग
और नांदेड़ आदि जिलों में देवदासियाँ मौजूद हैं। सदी की महान गायिका भारत रत्न लता मंगेशकर तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत
की प्रख्यात गायिका
केसरबाई केरकर, किशोरी
आमोणकर तथा मोगूबाई कुर्दिकर देवदासी समुदाय के हैं ।

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