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Saturday, September 26, 2020

प्रेम, प्रकृति और सौंदर्य का उत्सव - असमिया बिहु

 


लुइतर पारे पारे नासि थका नासोनी
कार जीर्यार तई
लुइत के पारे पारे नाचने वाली लड़की किसकी जियरी’ हैजिसके नाचने से धूल उड़ रही है...!

बोकाखात गाँव में सोमनाथ बोरा ने ढ़ोल की थाप और पैंपा की गगनभेदी आवाज़ के संग बीहु  का स्वर अलापा तो हजारों युवक-युवतियाँ किलकारियों के साथ थिरकने लगे। गूंजने लगे प्रेम और सौंदर्य के राग लुइत के पारे पारे’ (लुइत> ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे किनारे)। लुइत (लोहित) भी इतराने लगाउसके पारे- पारे कहूँआ’ (एक प्रकार का सफेद फूल) खिले हैंगाँव के डेका’(युवक) अपनी प्रेमिकाओं के लिए कपोफूल और नाहर फूल पाने के लिए लुइत के पारे - पारे खाक छान रहे हैं। काल को ईर्ष्या हो रही है वह लुइत से मौन प्रश्न कर रहा है- लुइत यह कैसा उत्सव है क्या तुम भूल गए निरीह लोगों की चीखअभी-अभी तो घाटी में दहशतगर्दों ने हजारों गीतों को हृदय में दफन कर दिया। लुइतक्या तुम गा सकते हो उसके लिए कोई गीतजिसकी प्रेमिका बिहुबान से अब आँखें पोंछ रही है। लुइततुम नाच सकते हो उसके बेकसूर- युवक का नाचजो अपनी प्रेमिका को कपोफूल भेंट करने की लालसा लिए असमय मृत्यु के आगोश में समा गया। लुइत क्या तुम गा सकते हो कोई हुसोरी’ जिससे इन दहशतगर्दों का पाषाण हृदय पिघले। लुइत क्या तुम बुला सकते हो शंकरदेव जैसे महापुरुषों कोजो इन्हे समझा सके। लुइत कल गरू’ बिहु  थाआज मानहू’ बिहु  है। मानूह बिहु  यानि मानव बिहु  । लुइत आज कुछ करोहम ऐसे नहीं थे देखो ना- गरूमानवप्रकृति हमारे पुरुखों ने सबके राग गाये हैंलुइत चलो इन्हें समझाएँ-  मानहुहे मानूहोर बाबे जोदिहे अकनो नाभाबे अकनो सहानुभूतिरे भिबिबो कोने नो कोआसमोनिया ....! (मानव यदि मानव के लिए नहीं सोचेंगेथोड़ी सी भी सहानुभूति से भी नहीं सोचेंगेतो कहो कोन सोचेगा ?) *


बिहु नृत्य 

* आलेख का प्रस्तुत अंश पूर्वोत्तर प्रवास के दौरान लिखा था, संदर्भ था-  बिहु  के समय 2007 में बराक घाटी में आतंकियों द्वारा बड़ी संख्या में  बिहार और उत्तर प्रदेश के निरीह प्रवासी मजदूरों की हत्या कर दी गयी थी।- प्रेम, प्रकृति और मानव को पूजने वाला समाज हिंसक कैसे हो सकता है ! आलेख का कुछ अंश रंग –प्रसंग(2007) के अंक में प्रकाशित है। ( पूरा आलेख पी डी एफ लिंक से पढ़ें)https://drive.google.com/file/d/1jQobHbIYsbnQyYyrCC-l2AVVNz4b0VyC/view?usp=sharing

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