लुइतर पारे पारे नासि थका नासोनी
कार जीर्यार तई
लुइत के पारे पारे नाचने वाली लड़की किसकी ‘जियरी’ है, जिसके नाचने से धूल उड़ रही है...!
बोकाखात गाँव में सोमनाथ बोरा ने ढ़ोल की थाप और पैंपा की गगनभेदी आवाज़ के संग बीहु का स्वर अलापा तो हजारों युवक-युवतियाँ किलकारियों के साथ थिरकने लगे। गूंजने लगे प्रेम और सौंदर्य के राग ‘लुइत के पारे पारे’ (लुइत> ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे किनारे)। लुइत (लोहित) भी इतराने लगा, उसके पारे- पारे ‘कहूँआ’ (एक प्रकार का सफेद फूल) खिले हैं, गाँव के ‘डेका’(युवक) अपनी प्रेमिकाओं के लिए कपोफूल और नाहर फूल पाने के लिए लुइत के पारे - पारे खाक छान रहे हैं। काल को ईर्ष्या हो रही है ! वह लुइत से मौन प्रश्न कर रहा है- लुइत यह कैसा उत्सव है ? क्या तुम भूल गए निरीह लोगों की चीख, अभी-अभी तो घाटी में दहशतगर्दों ने हजारों गीतों को हृदय में दफन कर दिया। लुइत, क्या तुम गा सकते हो उसके लिए कोई गीत, जिसकी प्रेमिका बिहुबान से अब आँखें पोंछ रही है। लुइत, तुम नाच सकते हो उसके बेकसूर- युवक का नाच, जो अपनी प्रेमिका को कपोफूल भेंट करने की लालसा लिए असमय मृत्यु के आगोश में समा गया। लुइत क्या तुम गा सकते हो कोई ‘हुसोरी’ जिससे इन दहशतगर्दों का पाषाण हृदय पिघले। लुइत क्या तुम बुला सकते हो शंकरदेव जैसे महापुरुषों को, जो इन्हे समझा सके। लुइत कल ‘गरू’ बिहु था, आज ‘मानहू’ बिहु है। मानूह बिहु यानि मानव बिहु । लुइत आज कुछ करो, हम ऐसे नहीं थे देखो ना- गरू, मानव, प्रकृति हमारे पुरुखों ने सबके राग गाये हैं, लुइत चलो इन्हें समझाएँ- “मानहुहे मानूहोर बाबे जोदिहे अकनो नाभाबे अकनो सहानुभूतिरे भिबिबो कोने नो कोआ, समोनिया ....! (मानव यदि मानव के लिए नहीं सोचेंगे, थोड़ी सी भी सहानुभूति से भी नहीं सोचेंगे, तो कहो कोन सोचेगा ?) *
बिहु नृत्य
* आलेख का प्रस्तुत अंश पूर्वोत्तर प्रवास के दौरान लिखा था, संदर्भ था- बिहु के समय 2007 में बराक घाटी में आतंकियों द्वारा बड़ी संख्या में बिहार और उत्तर प्रदेश के निरीह प्रवासी मजदूरों की हत्या कर दी गयी थी।- प्रेम, प्रकृति और मानव को पूजने वाला समाज हिंसक कैसे हो सकता है ! आलेख का कुछ अंश रंग –प्रसंग(2007) के अंक में प्रकाशित है। ( पूरा आलेख पी डी एफ लिंक से पढ़ें)https://drive.google.com/file/d/1jQobHbIYsbnQyYyrCC-l2AVVNz4b0VyC/view?usp=sharing

No comments:
Post a Comment