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Saturday, November 14, 2020

बांग्लादेश का पारंपरिक नाट्य ‘कुसान गान’ - डा. ओम प्रकाश भारती

बांग्लादेश का पारंपरिक नाट्य कुसान गान’ - डा. ओम प्रकाश भारती

कुसान गान बांग्लादेश (रंगपुर, मेमनसिंह तथा सिलेट जिले) नेपाल (झापा) तथा भारत के बिहार (किशनगंज) उत्तर बंगाल (कूच बिहार तथा जलपाईगुड़ी जिले) तथा असम (धुबरी तथा ग्वालपारा जिले) के राजवंशी समुदाय के बीच प्रचलित लोकनाट्य रूप है ।

कुसान गान का प्रचलन कब हुआ इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलता।  लोकस्मृति के अनुसार इसका प्रचलन रामायण काल से ही है। कहा जाता है कि लव ने ताल, कुश ने बेना तथा अयोध्यावासी ने सुमधुर स्वरों में पहली बार पिता-पुत्र का परिचय गान के माध्यम से प्रस्तुत कर राम को मुग्ध कर दिया, इसके बाद से ही कुसान गान की  परंपरा चल पड़ी। एक अन्य लोकश्रुति के अनुसार बाल्मीकी आश्रम प्रवास के दौरान लव के खो जाने से सीता बेचैन हो उठी कि भगवान राम को वह क्या जवाब देगी। बाल्मीकी ऋषि ने उसे सांत्वना देते हुए कहा- कुश आन” अर्थात कुश ले आओ और फिर बाल्मीकी  ने कुश और जल से एक बालक का सृजन किया, जो राम के दूसरे पुत्र कुश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। शाब्दिक रूप से कुश+आन, कुसान का अर्थ बोधक है,  लेकिन कुसान के प्रदर्शन में ना  तो इस प्रसंग को अभिनीत किया जाता है और ना ही यह शब्द प्रदर्शन की परंपरा को अभिव्यक्त करता है। यह मात्र भाषायी अर्थ हो सकता है। एक अन्य विश्लेषण यह है कि कु=दुरात्मा तथा शान=भगाना, सफाई करना अर्थात बुराई को दूर करना। यह व्याख्या भी अर्थक्षेपक है। कुसान प्रदर्शन के दौरान किसी दुरात्मा को दूर भगाने का अनुष्ठान नहीं किया जाता। केवल दिकबंदना (दिशा वंदना) के समय दुरात्मा से रक्षा की गुहार की जाती है। कुसान गान के प्रदर्शन स्वरूप को देखने से प्रतीत होता है कि यह पूर्णतः एक सामाजिक लोकनाट्य है, जिसमें राजवंशी समुदाय के सामाजी तथा संस्कृतिकरण के कई स्तर परिलक्षित होते हैं। यह परंपरा राम कथा के विस्तार की वह कड़ी है, जिसमें अलौकिक चरित्रों का लौकिककरण अथवा सामाजीकरण हुआ है। रामायण के पात्रों ने लौकिक चरित्रों के रूप में सामाजिक भूमिका निभाते हुए लोक मूल्य एवं आदर्शों का निर्माण किया।


कुसान का प्रदर्शन - बीच मसखरा -दोहारी 

बाल्मीकी रामायण में लव कुश द्वारा बेना के साथ राम कथा का गायन प्राचीन साक्ष्य है। संभव है कि इस गायन परंपरा में कथातत्व तथा अभिनय के समावेश से कुसान गान जैसी नाट्य परंपरा का विकास हुआ हो।  राजवंशियों के बीच एक अन्य प्राचीन नाट्य-नृत्य रूप मदनकाम उत्सव का प्रचलन है। मदनकाम उत्सव का उल्लेख प्राचीन काल के कई साहित्यिक एवं नाट्यलक्षण ग्रन्थों में हुआ है। इस तरह राजवंशी समुदाय कई प्राचीन कलारूपों के संवाहक हैं। 1515 ई में विश्वसिंह ने वर्तमान उत्तर बंगाल, असम के धुबरी तथा ग्वालपारा जिले और बांग्लादेश के रंगपुर जिले को मिलाकर कोच राज्य की स्थापना की। विश्व सिंह ने वर्तमान कूच बिहार को राजधानी बनाया। विश्व सिंह तथा उनके भाई चिलाराय कला संरक्षक थे।  दर्ङ्ग वंशावली के अनुसार कोच राजा विश्वसिंह(1515-1540) के राज्याभिषेक के समय राम बेना बजाया गया था। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कुसान गान का प्रचलन कोच राजवंश के समय से अवश्य था।

राजबाड़ी , कूचबिहार 

कुसान गान की कथावस्तु मुख्य रूप से राम कथा पर आधारित है। युद्ध कांड, सीता हरण तथा लव कुश प्रकरण विशेष रूप से अभिनीत होता है। कथाश्रोत मुख्य रूप से बाल्मीकी रामायण तथा बांग्ला कृत्तिवास रामायण(श्रीराम पांचाली) है।(आगे लिंक से पढ़ें)