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Saturday, April 10, 2021

भारतीय पारंपरिक पुतुल नाट्य- डॉ. ओम प्रकाश भारती


 

भारतीय पारंपरिक पुतुल नाट्यडॉ. ओम प्रकाश भारती

पुतुल नाट्य जन सम्प्रेषण का प्राचीनतम सशक्त कलात्मक माध्यम है। भारते के अलावे चीन इन्डोनेशिया इंगलेंडइटलीजर्मनीफ्रांसरोमानियाहौलेण्डचेकोस्लोवाकियाबलगारिया आदि देशों में पुतल नाट्य की आधुनिक परंपरायेँ है जिनका विकास 500 से 600 वर्षों में हुआ है। मिस्रतुर्कीअरब तथा ईरान आदि देशों में पारंपरिक पुतलियों का चलन है। तुर्की में करखेजजापान में डकुबोइन्डोनेशिया में यांग बोलोक पुतलियाँ आकर्षक एवं तकनीकी में समृद्ध तथा सम्प्रेषण में उद्दात्त है। अधिकांश पाश्चात्य तथा भारतीय विद्वान पुतलियों का उद्भव भारत में मानते हैं। महाभारतरामायणपंचतंत्र तथा कथासरित्ससागर आदि प्राचीन ग्रन्थों में किसी न किसी रूप में पुतलियों का उल्लेख हुआ है।

            पुतुल शब्द संस्कृत के पुत्तलिका का परावर्तित रूप है। संस्कृत में पुतलिका के समानार्थी पुत्रिका तथा दुहित्रिका शब्दों का प्रयोग हुआ हैजिनका शाब्दिक अर्थ है छोटी या नन्ही बेटी।  प्राचीन ग्रन्थों में पुतली के लिए पंचालिका शब्द भी प्रयुक्त हुआ है।

            यूनानी भाषा में पुतली के लिए लातिन ‘प्युपा’ और ‘प्युप्ला’ शब्दों का प्रचलन हैजिसका अर्थ  होता है छोटी कन्या। जर्मन विद्वान डॉ पिशेल ने भारतीय नाट्य उत्पत्ति की व्याख्या करते हुए इसे पुत्तलिका नृत्य से उद्भित माना है। पिशेल के विचार में संस्कृत नाटकों का सूत्रधार मूलतः पुतली नाट्यों से ही सम्बद्ध है। उनका कहना है कि पुतलियों को नचाते समय नचाने वाला उनके साथ सम्बद्ध सूत्रों को पीछे से पकड़े रहता हैइसलिए वह सूत्रधार कहलाने लगा और यही नाम नाटक के प्रयोक्ता को भी दे दिया गया। बाद में कीथ ने पिशेल के इस मत का खंडन करते हुए कहा कि नाट्यकला का विकास पुतली नृत्य के साथ ही हुआअतः पुतुल कला नाट्य कला जितना ही प्राचीन है। भारतीय विद्वानों में सीताराम चतुर्वेदी ने पिशेल के मत का समर्थन करते हुए कहा है- पुतलिकानृत्यमेव नाट्योत्पत्ति कारिण  मिति केचित। डॉ सुनीति कुमार चटुर्जाया की  स्थापना है कि पुतुल नाट्य  भारत में ईसा के कम से कम दो सौ वर्ष पहले या उससे पहले विकसित हुई होगी। लेकिन ईस्वी पूर्व नवीं शताब्दी में महाभारत महाकाव्य में पुतुल परंपरा का स्पष्ट उल्लेख हुआ है-

यथादारूमयी योषां नरस्थिर समाहिता।

ईरयत्यंगमंगानि तथा राजन्निमा: प्रजा:॥ वनपर्व,31।22

 

अर्थात हे राजन जैसे कोई व्यक्ति स्थिर रहकर कठपुतलियों का संचालन करता है वैसे ही परमात्मा भी प्रत्येक प्राणी को बचाता है। वात्स्यायन ने 64 कलाओं की श्रेणी में ‘काष्ठ पुतलिका’ को भी शामिल किया है। पाणिनी (ईस्वी पूर्व चौथी शताब्दी) और पतंजलि ने अपनी रचनाओं में पुतुलियों का उल्लेख किया है। दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के तमिल कवि तिरुवल्लूवर ने लिखा है कि ‘एक संवेदनहीन व्यक्ति की गतिविधि डोर से चलने वाली कठपुतली के जीवन के समान है। ‘विक्रमोचरितम’ में राजा भोज से बत्तीस पुतलिकाओं की वार्तालाप की कथा प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि विक्रमादित्य का सिंघासन कठपुतलियों द्वारा निर्मित था। उसके सिंघासन में कठपुतली नाटिका की बत्तीस पुतलियाँ निवास करती थी। राजा इसी सिंघासन पर बैठ कर निर्णय सुनाया करते थे। यही सिंघासन ‘सिंघासन  बत्तीसी’ के नाम से लोक में प्रसिद्ध हुआ। यह पुतलियाँ रात्रि में निकालकर राजा का मनोरंजन करती थी। यह भी कहा जाता है कि राजा के कहने पर यह पुतलियाँ विभिन्न दिशाओं में घूम फिर कर सच्ची घटना की सही खबर लाती थी। बत्तीस पुतलियों ने राजा भोज को एक एक कर न्यायिक कहानियाँ सुनाई और अंत में सिंहासन को स्वर्ग की तरफ ले गई।  और राजा इसी आधार पर न्याय करते थे। इस तरह राजा की लोकप्रियता तथा न्यायप्रियता दोनों ही बढ़ी।

सोमदेव के कथासरितसागर में यंत्रचालित पुतलियों का उल्लेख मिलता है। प्रख्यात शिल्पी मेदानव की पुत्री सोमप्रभा ने अपनी सहेली राजकुमारी कलिंग सेना के लिए अपने पिता के हाथ से बनी हुई यंत्रचालित पुतलियों की टोकरी भेंट की थी। इन सब पुतलियों में एक एक लकड़ी की खूंटी लगी हुई थी। उनमे से एक खूंटी छूने से पुतली माला लेकर लौट आती थी। दूसरा पानी ला कर देती थी। तीसरी नाचने और चौथी बाते करने लगती थी। राजशेखर की बाल रामायण के पांचवें अंक में सीता की प्रतिमूर्ति एक ऐसी पुतली का उल्लेख हुआ हैजिसके मुंह में तोता रखा हुआ था। इसके मुंह से अपने अनुरोधों के संगत उत्तर पाकर रावण भ्रम में पड़ गया। मालावर अंचल में कम्बन  रचित तमिल  रामायण की कथा पुतल कलाकारों द्वारा प्रदर्शित की जाती है।  मध्यकालीन भक्ति साहित्य की कुछ रचनाओं में वाद्य के साथ कुछ पुतलियों का उल्लेख मिलता है। रहिमन ने कठपुतली की उपमा कर्मसूत्रों से जकड़े मनुष्यों देते हुए कहा है

ज्यों नाचत कठपुतरी करम नचावत गात।

अपने हाथ रहीम ज्यों नहीं अपने हाथ ॥

  संचालन प्रविधि के अनुसार भारतीय पुतुल रंगमंच को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

1.      दस्ताना पुतुल

2.      छड़ पुतुल

3.      सूत्र ( धागा ) पुतुल

4.      छाया पुतुल

5.      छड़ और धागा पुतुल

6.      मोजे पुतुल

दस्ताना पुतुल:

इसे हथ पुतुल भी कहा जाता है। इस परंपरा की पुतली के सिर और दोनों हाथ प्रायः लकड़ी के बने होते तथा खोखले होते हैं। यह पुतली हाथ में दस्ताने के रूप में धारण की जाती है। पुतली का संचालन तीन उँगलियों ( अंगूठाअनामिका और मध्यमा) से किया जाता है। पुतली का सिर पहली उंगली तथा हाथ अंगूठे और मध्यमा से संचालित होते हैं। इन पुतलियों की टाँगे नहीं होती। प्रायः एक व्यक्ति ही एक साथ दो पुतलियों का संचालन दोनों हाथों से करता है। पुतलियों का संवाद संचालक बोलते हैं। संचालक जब एक पुतली का संचालन कर रहा होता है उस दौरान वह उसी पुतली का संवाद बोलता है। ऐसी स्थिति में दूसरी पुतली स्थिर रहती है या दूसरे पुतली के संवाद को सुनने का स्वांग करती है। संचालक जब दूसरे पुतली का संचालन करता है तो उनका स्वर बदल जाता है। इस प्रकार दर्शकों को दो भिन्न पात्रों के बीच का संवाद अलग अलग सुनाई देता है। कभी कभी पुतली संचालक एक हाथ से कमर में बंधे ढ़ोल बजते हैं और दूसरे हाथ से पुतली का संचालन करते हैं। दस्ताना पुतुल की परंपरा केरलउड़ीसाउत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में है।

छड़ पुतुल

छड़रौड़ तथा पतले डंडे से संचालित पुतलियों को छड़ पुतुल कहा जाता है। इस परंपरा की पुतलियाँ कई हिस्सों में कटी तथा जुड़ी होती है। पुतलियों के संचालित किए जाने वाले विभिन्न अंगों को बांस से बने बत्तियों या डंडे के नोक से जोड़ दिया जाता है। संचालक पर्दे के पीछे छुपकर पुतलियों का संचालन करता है। छड़ पुतली का प्रदर्शन प्रभावोत्पादक होता है। तमिलनाडुझारखंडउड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल में छड़ पुतुल की परंपरा है।

सूत्र (धागापुतुल

धागे या डोर से संचालित पुतलियों को धागा पुतुल कहा जाता है। पुतलियों के विभिन्न अंग धागे या सूत्र से बंधे होते हैं संचालक इन धागों को दोनों हाथ की उँगलियों में बांधकर पुतलियों का संचालन करते हैं। संचालक प्रायः पर्दे के पीछे छुपा होता है। कभी-कभी संचालन खुले मैदान में बिना पर्दे के सहायता से भी किया जाता है। इस परंपरा की पुतलियों का आंगिक संचालन एवं नृत्य बड़ा ही लुभावना होता है। पुतलियों के संवाद संचालक बोलते हैं। नृत्य के समय वाद्य मंडली द्वारा संगीत की धुने बजाई जाती है साथ ही गीत भी गए जाते हैं। इस परंपरा की पुतलियों में राजस्थान की कठपुतलियों ने पूरे विश्व में अपनी पहचान बनाई है।भारत के अधिकांश भागों में धागा पुतुल की परंपरा है। धागा पुतुल आंध्र प्रदेशतमिलनाडुकर्नाटक असममहाराष्ट्रमणिपुरउड़ीसा और पश्चिम बंगाल में प्रचलित है।

छड़- धागा पुतुल

सयुंक्त रूप से छड़ और डोरियों से संचालित पुतलियों को छड़- धागा पुतुल कहा जाता है। इस पुतली का मुख्य सिरा छड़ की नोक से जुड़ा होता है और हाथ और पाँव धागे से बंधे होते हैं। पुतलियों का संचालन संचालक अपने दोनों हाथों से करता है। एक हाथ से छड़ थामे रहता है तथा दूसरे हाथ से धागाओं का संचालन करता है। पश्चिम बंगाल तथा बिहार में किसी समय यह पुतली चदर- बदर ( चादर दरबार ) के नाम से बड़ी लोकप्रिय रही। अब यह लुप्तप्राय है।

छाया पुतुल

प्रकाश की सहायता से किसी पर्दे या दीवार पर आकृतियों की छाया को प्रस्तुत करना छाया पुतुल कहलाता है। यह पुतलियाँ प्रायः हिरणबकरा तथा भेंड के चमड़े से बनाई जाती हैं। पात्र या चरित्र की आकृति के अनुसार चमड़े को काट लिया जाता है। इनके विभिन्न अंग छड़ियों से जुड़े होते हैं। संचालक पर्दे के पीछे से आने वाली प्रकाश के सामने पुतलियों का संचालन करते हैं। पुतलियाँ रंग-बिरंगी तथा पारदर्शी होती है। पीछे से आ रहे प्रकाश से आकृतियों की छाया पर्दे पर प्रस्तुत होती हैं। पहले जमाने में सूर्य की रोशनी अथवा मशाले जलाकर नाट्य प्रस्तुतियाँ होती थी । इन दिनों आधुनिक बिजली उपकरणों का प्रयोग होने लगा है। छाया पुतुल आंध्र प्रदेशकर्नाटकमहाराष्ट्र , उड़ीसा और तमिलनाडु में प्रचलित है।

मोजे पुतुल

मौजे में रुई या कपड़े भरकर बनाई गई खिलौने के आकार की पुतलियाँ मौजे पुतुल कहलाती है। इनके अंग छड़ से संचालित होते हैं। इनके अधिकांश पात्र पशु- पक्षी तथा अन्य मानवेतर चरित्र होते हैं। इन पुतलियों का निचला भाग प्रायः पर्दों में छुपा होता है।इन पुतलियों का संचालन छड़ से किया जाता है। यह पुतलियाँ बनाने में आसान तथा संचालन प्रविधि सरल है।मोजे पुतलियाँ प्रायः शहरी क्षेत्रों में लोकप्रिय हैं।                 

भारतीय पुतलियों की परंपरा विश्व में सबसे प्राचीन मानी जाती है। भारतीय लोकजीवन में पुतुल नाट्य की लगभग 22- 23 रूप आज भी प्रचलित है। पारंपरिक पुतलियों के अलावे भारत में पुतलियों के कई आधुनिक रूप हैंजिनका संचालन तकनीक तथा प्रविधि पारंपरिक पुतलियों से प्रभावित है। भारत के विभिन्न अंचलों में पारंपरिक पुतुल नाट्य इस प्रकार हैं -

1.      उत्तर प्रदेश  – गुलाबो- सिताबो (Uttar Pradesh – Gulabo- Sitabo)

2.      राजस्थान कठपुतली (Rajasthan – Kathputli)

3.      असम पुतुलानाच (Assam – Putala Nach )

4.      मणिपुर लाईथीबी जगोई (Manipur – Laithibi Jagoi)

5.      त्रिपुरा पुतुलनाच (Tripura – Putul Nach)

6.      झारखंड चदर बदर (Jharkhand – Chadar Badar)

7.      पश्चिमी बंगाल बेनिर पुतुलतारेर पुतुलडांगेर पुतुल (West Bengal – Benir Putul, Tarer Putul, Daanger Putul)

8.      उड़ीसा गोपालीलासखी कुन्दईकाठी कुन्दईरावण छाया (Orissa – Gopalila, Sakhi Kundhei, Kathi Kundhei Nach, Ravanachhaya)

9.      महाराष्ट्र कलसूत्री बाहुल्यचमरच्या  बाहुल्य (Maharashatra – Kalasutri Bahulya, Chamadyacha Bahulya)

10.  आन्ध्रप्रदेश कोयया बोम्मालट्टातोलु बोम्मालट्टा (Andhra Pradesh – Koyya Bommalatta, Tolu Bommalatta)

11.  कर्नाटक सूत्रदा गोम्बेयाट्टातोगालु गोम्बेयाट्टा (Karnataka – Sutrada Gombeyatta, Togalu Gombeyatta)

12.  केरल पावकथकलितोलपावकूथु (Kerala – Pavakathakali, Tolpava Kuthu)

13.  तमिलनाडु बोम्मालाट्टमतोलु बोम्मालाट्टम (Tamil Nadu – Bommalattam, Tolu Bommalattam)

14.  बिहार जमपुरी का खेल

उत्तर प्रदेश गुलाबो- सिताबों (Uttar Pradesh – Gulabo- Sitabo)

उत्तर प्रदेश के अवध अंचल में दस्ताना पुतुल की पारंपरिक शैली गुलाबो- सिताबो के नाम से जाना जाता है। सत्रहवी शताब्दी के आस पास इस परंपरा की शुरुआत हुई अब यह लुप्तप्राय है। लखनऊ के आस-पास के गाँव के मेले में कभी कभार गुलाबो- सिताबों का प्रदर्शन करते हुए पुतली वाले दिख जाते है।

            इस परंपरा का नामकरण दो महिला चरित्र गुलाबो- सिताबों के नाम पर हुआ। गुलाबो- सिताबों दोनों बहनें है दोनों की शादी एक ही व्यक्ति से होती है। गुलाबो पति के करीब रहती है और घर में प्रभुत्व रखती है। सिताबों उपेक्षिता है और भाग्य को कोसती रहती है। आए दिन दोनों बहनों के बीच झगड़ा होते रहता है। संवाद मूलतः खड़ी बोली और गीत अवधि में गाया जाता है। गीतों की एक कड़ी दृष्टव्य है-

गुलाबो खूब झगरिहें मलीदा घोरि पीहें

गुलाबो रिन्ही बरीसिताबो रिन्ही दाल

गुलाबो कै जरि गै बारी सिताबों भई बेहाल

गुलाबो खूब झगरिहें सिताबों खूब झगरिहें॥ मलीदा घोरि पीहें।

इस परंपरा में दो ही पुतुल होते हैं। पुतुल की बनावट तथा साज-सज्जा आकर्षक होती है।  

पहले जमाने में यह पुतलियाँ लकड़ी की बनाई जाती थीपिछले सौ वर्षों में लकड़ी के स्थान पर लुगदी का प्रयोग किया जा रहा है। लकड़ी या लुगदी दोनों ही स्थिति में पुतलियों का सिर और हाथ खोखला होता हैजिसमें उँगलियाँ डालकर संचालन किया जाता है। पुतलियों की आँखें निखरी हुई होती है। चेहरों की सजावट रंगों द्वारा कर पुतली को आकर्षक बनाया जाता है। पोशाको में लालरंग का लहंगाब्लाउज और गहनें पहनाएं जाती है। पुतलियों की कलाई में घुँघरू बंधे होते हैं। गाना और नृत्य के समय इन घुंघरूओं का प्रयोग साज वाद्य के रूप में किया जाता है। इन पुतलियों की ऊँचाई प्रायः 60-65 सेंटीमीटर होती है।

गुलाबो- सिताबो पुतुल नाट मंडली में तीन व्यक्ति होते हैं। एक पुतुल संचालक जो दोनों हाथों से दोनों पुतलियों का संचालन करते हुए संवाद बोलते हैं। दूसरा ढोलकिया और तीसरा मंजीरा वादक । दोनों वाद्यकार गीतों का टेक भी गाते हैं।

राजस्थान कठपुतली (Rajasthan – Kathputli)

उत्तर भारत विशेषकर राजस्थान के ग्राम्यञ्चल में प्रचलित धागा पुतुल की विशिष्ट परंपरा को कठपुतली कहा जाता है। राजस्थान के नट और भाट समुदाय के लोग जो प्रायः घुमंतू होते थे। वर्षों से एक विशेष आस्था के रूप में कठपुतलियों का प्रदर्शन करते आ रहे हैं। जो अब उनकी जीविका का अंग बन चुका है। नट और भाटों का विश्वास है कि उनके पुरखे राजा विक्रमादित्य के समय से ही कठपुतलियों का प्रदर्शन करते आ रहे हैं।

            कठपुतली कला के आरंभ के बारे में लोकजीवन में कई कथाएँ प्रचलित है। इनमें से दो कथाएँ अधिक लोकप्रिय है। पहली कथा है कि सेवक राम नामक एक बढ़ई इतने सुंदर और जीवंत खिलौने बनाते थे कि लोग उन खिलोनों को देखकर भ्रम में पद जाते थे कि यह असली है या नकली। स्वयम सेवक राम उन खिलौनों को घंटों निहारता और उनमें जीवन की कल्पना करते रहता। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव और पार्वती वहाँ से गुजर रहे थे कि पार्वती की दृष्टि खिलौनों पर पड़ी। मन मोहक खिलौनों को देख पार्वती सोचने लगी यदि इनमें जीवन आ जाए और यह नाचने उछलने लग जाये तो क्या बात है। उन्होने शिवजी से विनय किया पर उन्होने कोई ध्यान नहीं दिया। पार्वती हठ  कर बैठी। पार्वती की हठ के सामने शिवजी परास्त हुए और उन्होने खिलौनों में प्राण प्रतिष्ठा की। देखते ही देखते सारे खिलौने फुदकने और चहचहाने लगे। सेवक राम खिलौनों को पकड़ने चला किन्तु उसके स्पर्श मात्र से सारे खिलौने निर्जीव हो गए। वह बहुत निराश और दुखी हुआ। उसी  समय आकाशवाणी हुई कि सेवकराम यह खिलौने अब सजीव नहीं हो सके यदि तुम चाहो तो तुम धागे के सहारे इसका संचालन कर सकते हो। सेवकराम ने बड़ी लगन से एक एक खिलौनों को धागे के सहारे खड़ा कर उसे नचाया। दूसरी कथा है कि शिवजी ने पार्वती का मन बहलाने के लिए भाट की  सृष्टि की और उसे एक पुतली देते हुए आदेश दिया कि पुतलियों को नचाकर पार्वती का मनोरंजन करे। लेकिन भाट शिवजी की प्रशंसा में लगा रहा और पार्वती  का मनोरंजन करना भूल गया। कहा जाता है कि शिवजी ने क्रोधित होकर भाट को पुतली साहित धरती पर फेक दिया। धरती पर इस भाट ने भरण पोषण के लिए लोगों के बीच कठपुतली नाच का प्रदर्शन करने लगा। उसकी देखा देखि में अन्य लोगों ने भी कठपुतली बनाया और कठपुतली नाच दिखाना आरंभ किया। इस प्रकार आगे चलकर कठपुतली नचाने वालों का एक समुदाय ही हो गयाजो भाट कहलाए। राजस्थानी भाट राजा विक्रमादित्य के सिंघासन बत्तीसी और उससे जुड़ी कठपुतलियों की कहानीयों से अपने को जोड़ते हैं। इन प्राचीन कथाओं के कारण ही भारतीय विद्वान कठपुतली कला की जन्म स्थली राजस्थान और आरंभिक उन्नायक भाटों को मानते हैं। आज राजस्थानी कठपुतली कलाकारों ने देश ही नहीं बल्कि विदेशों के कई मंचों पर राजस्थानी कठपुतली का श्रेष्ठ प्रदर्शन किया। इस समृद्ध परंपरा के पीछे सेकड़ों पुतुल कलाकारों की प्रतिभाएं हजारों पुतलियों के प्रयोग लाखों उँगलियों का श्रम- कौशल और समाज का असीम मनोबल रहा है। पुतली कलाकार जब मंच पर प्रदर्शन के लिए प्रस्तुत होता है तो अपने व्यक्तित्व को पुतलियों में लीन कर स्वयम पुतली बन जाता है। पुतलियाँ स्वयम पात्र नहीं होती वह असल भी नहीं होती। नकल बनकर मंच पर आती है और असल का प्रभाव छोड़ कर चली जाती है। इन सबके पीछे उन पुतली कलाकारों की प्रतिभा होती हैजो प्रदर्शन के दौरान नेपथ्य में पर्दे के पीछे पुतलियों में प्राण फूँक रहा होता है।

राजस्थानी कठपुतलीयों के सिर प्रायः आम की लकड़ियों से बनाए जाते हैं। सिर की बनावट में नुकीली नाकबड़ी बड़ी आँखें तथा कान विशेष रूप से उकेरी जाती है। आँखों के निखार के लिए सफ़ेद या पीले रंग की पुताई कि जाती है। काले रंग की भौं और रोबदार मुंछे राजस्थानी कठपुतली की विशेषता होती है। कठपुतलियाँ प्रायः 60 सेंटीमीटर ऊंची होती है। पौशाकें ठेठ राजस्थानी। कठपुतलियों की वेशभूषा कुछ हद तक राजस्थानी फड चित्रों से प्रेरित लगता है। पुतलियों के हाथ और धर फटे कपड़े और चिथड़ों से मेढ कर बनाया जाता है। कुछ अपवादों को छोड़कर इन पुतलियों के पाँव नहीं होते। ऐसी स्थिति में पुतलियों को कमर से नीचे चुन्नटदार राजस्थानी घाघरे पहनाए जाते है।

राजस्थानी कठपुतली का मंच आकर्षक होता है समान्यतः 8 से 10 फीट की दूरी पर दो चारपाई खड़ी कर दी जाती है। दोनों चारपाई को बांस के सहारे शंखदार तौरणों से सुसज्जित कपड़े का पर्दा लटका दिया जाता है। इस पर्दे को तिवारा या ताजमहल कहा जाता है। बांस के ऊपर लगभग 5 से 8 फीट की उचाई तक एक लंबे कपड़े से घेर दिया जाता है। जिसके पीछे पुतली कलाकार छिपकर पुतली का संचालन करते हैं।

राजस्थानी कठपुतलियाँ प्रायः एक ही धागे से चलाई जाती हैजिसका एक छोर कठपुतली के सिर तथा दूसरा इसकी पीठ से बंधा होता है। पुतली संचालक सुविधानुसार उँगलियों में इन धागों को लपेट कर पुतलियाँ का संचालन करते हैं। केवल नर्तकी पुतलियों का संचालन चार धागों के सहारे किया जाता है। नर्तकी पुतली की गर्दन चारो दिशाओं में किसी भी समय में घुमाई जा सकती है। नर्तकी पुतली का नृत्य बड़ा लुभावना होता है।

राजस्थानी कठपुतलियों के कलाकार छोटे- छोटे हास्य प्रसंगों के अलावे वीर गाथाओं की प्रस्तुति करते हैं। अमर सिंह राठौर लोकप्रिय कठपुतली नाटक हैजिसका प्रदर्शन प्रायः सभी दलों द्वारा की जाती है। सत्रहवीं शताब्दी में अमर सिंह राठौर पुतली कला के अन्यन संरक्षक हुए। अमर सिंह नागौर के शासक थे। कठपुतली कलाकार नागौर को अपना मूल निवास मानते हैं। अमर सिंह राठौर के जीवन के वीरोचित एवं शौर्य परक घटनाओं को गीत और नृत्यों के माधम से कठपुतली वाले मंच पर प्रस्तुत करते हैं।

असम पुतुलानाच (Assam – Putala Nach )

असम में धागा पुतुल की परंपरा को पुतुलानाच के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि प्रसिद्ध वैष्णव संत शंकरदेव ने भाओना नाट्य की स्थापना में पुतला नाच के कई तत्वों का समावेश किया । असमिया भगवत पुराण में कष्टमाया या दारू पुतला  लकड़ी के पुतले तथा छाया पुतलों की परम्पराओं का उल्लेख हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में यह परंपरा समाप्त हो गई। वर्तमान समय में असम के निचले भाग विशेषकर नालवाड़ी जिले में पुतला नाच के कई नाट्यदल है। आज से लगभग 75 वर्ष पूर्व पुतली कलाकारों के एक घुमंतू दल ने माजुली द्वीप स्थित नूतन कमलावाडी सत्र के कुछ भक्त एवं कलाकारों को पुतली कला सिखाई थी। पुतला नाच की यह परंपरा पुतला भाओना के नाम से आज भी प्रदर्शित होती है। पुतला भाओना के प्रदर्शन की पुतलियाँ अंकिया भाओना के गायन वायन और सूत्रधार आदि का वेश धारण करते हैं। इनके कथानक भी वैष्णव भक्ति से जुड़े होते हैं।

दक्षिण असम में पुतला नाच की परंपरा आस्थानीय लोकनाट्य शैली खुलिया भावरीया से प्रेरित है।

असम के पुतला नाच में रामायणमहाभारत तथा अन्य पौराणिक गाथाओं के साथ समासमायिक विषयों को भी प्रस्तुत किया जाता है। पुतला नाच के कलाकारों ने कई लोककथाओं तथा गाथाओं को भी मंच के नाम से प्रस्तुत किया। आजीमोलालोककथाओं पर आधारित प्रसिद्ध पुतला नाट्य है।

पुतला नाच के पुतुल प्रायः 40 से 90 सेंटीमीटर ऊंचे होते हैं। पुतला का मूल ढांचा बांस की कमाची पर कपड़े और मिट्टी चढ़ाकर तैयार किए जाते हैं। कंधेगर्दन तथा कोहनी पर जोड़ होता है। अधिकांश पुतलों के पाँव नहीं होते । नीचे का भाग घेरदार कपड़े से ढका रहता है। प्रायः एक पुतुल तीन या चार धागों से संचालित होता है। संचालन के लिए धागा का एक छोर पुतलियों की जोड़ों से तथा दूसरी छोर संचालक के उँगलियों पर लपेटा रहता है। असम के पुतला नाच के कलाकारों ने पारंपरिक सिंघासन रथ सारथी आदि के साथ आधुनिक मोटरसाइकिल और हेलिकॉप्टर जैसे यंत्रों का पुतला तैयार किया है।

एक पारंपरिक दल में 5 से सात कलाकार होते हैं। दल का नेतृत्व ओझा करता है। 5 पुतली संचालक के अलावे गायन वाद्य मंडली में चार या पाँच व्यक्ति होते हैं। वाद्य यंत्रों में खोल और ताल अनिवार्य वाद्य है। पुतला नाट का मंच बांस के फ्रेम से बना होता है। जो तीन तरफ से कपड़े से ढका होता है। फ्रेम के बीचों बीच एक छोटा सा मंच बनाया जाता है जिसके निचले और ऊपरी भाग को कपड़े से धक दिया जाता है। पुतली संचालक पर्दे के पीछे बेंच पर खड़े होकर पुतलियों का संचालन करते हैं।पुतलियों का संवाद संचालक स्वयं बोलता है। ओझा मुख्य नरेटर की भूमिका निभाता है जो प्रायः वाद्य और गायन मंडली के साथ पर्दे के आगे खड़ा रहता है।असम के पुतला रंगमंच का हास्य चरित्र करुआ भेरुआ और चेंगला केवल दर्शकों पर टिप्पणी नहीं करते अपितु विषय को संसमायिक बनाते हुए धारदार टिप्पणी भी करते हैं।

त्रिपुरा पुतुलनाच (Tripura – Putul Nach)

16 वीं शताब्दी के पश्चात वैष्णव भक्ति आंदोलन ने बंगाल के कलारूपों को विशेष रूप से प्रभावित किया। कालांतर में बंगाली जात्रा ने प्रदर्शनकारी कलाओं में गीत एवं संगीतात्मकता के भरपूर तत्वों का समावेश किया। दूसरी और बाउल फकीर और दरवेश की गायन परंपरा बांगला लोकजीवन में पहले से मौजूद था। बंगाल में पुतुल नाट्य पुतुल नाच के नाम से जाना जाता है। यहाँ दस्तानाधागा तथा छड पुतुल की परंपरा है। दस्ताना पुतुल में बेनीर यानि वेणी आकार की  पुतुलियां अथवा जिस पुतली को जुड़े की तरह समेटा या मोड़ा जा सके । यह पुतलियाँ प्रायः कपड़ों से तैयार की जाती है। पुतलियों के सिर और दोनों हाथ लकड़ियों के बने होते हैं । एक दल में 2 से 3 कलाकार होते हैं। एक पुतली संचालक जो एक साथ दो पूयलियों का संचालन करते हैं और दोनों ही पुतलियों का संवाद स्वयम बोलते हैं। दूसरा ढोलकिया तथा तीसरा मजीरा वादक कथा मूलतः गीतों के  माध्यम से प्रस्तुत होती है। दोनों वादक साज बजाने के अलावा गीत भी गाते हैं जबकि मुख्य संचालक पुतलियों के संचालन पर ध्यान केन्द्रित करता है। पुतलियों के कलाई पर छोटे घुंघरू बंधे होते हैं मुख्य संचालक बार- बार दोनों हाथों की थपकियों से निकले घुँघरुओं की आवाज से प्रदर्शन में विशेष प्रभाव डालता है। बेनीर पुतुल के प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं होती बल्कि यह कलाकार घुमंतू होते हैं। गाँवमैलेहाटबाजारबस और ट्रेन आदि कहीं भी अपना प्रदर्शन कर सकते हैं। बेनीर पुतुल  के अधिकांश कलाकार पश्चिम बंगाल के मेदनापुर जिले में बसे हुए हैं।

तारेर पुतुल

पश्चिमबंगाल में धागा से संचालित पुतुल को तारेर अथवा सुतुर पुतुल के नाम से जाना जाता है। इस परंपरा ने बंगाल के शहरी क्षेत्रों में विशिष्ट पहचान बनाया। रामायणमहाभारतपुरानों तथा लोककथाओं के अलावा समासमायिक विषयों पर आधारित कथानकों का मंचन तारेर पुतुल के मंच पर किया जाता है। पुतुल के गीत संवाद और वेषभूषा आदि पर जात्रा नाटकों तथा बंगाली और हिन्दी फिल्मों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।

तारेर पुतुल की पुतलियाँ 60 से 80 सेंटीमीटर ऊंचे होते हैं। पुतुल शोला ( कोइला अथवा कोरीला ) के बने होते हैं। पुतलों के हाथ सिर और पीठ धागे से बंधा होता है। जिसके दूसरे छोर पर बांस की फट्टी लगी होती है। इन्हीं बांस की फट्टियों को पकड़कर कलाकार खड़े होकर पुतलों का संचालन करते हैं। एक संचालक कभी कभी 2 पुतले भी चलाते हैं। प्रदर्शन प्रायः नृत्य से आरंभ होता है इसके पश्चात एक चरित्र गीत गाकर प्रदर्शन का परिचय देता है। तबला हारमोनियम शहनाईवाइलीन और मजीरा आदि वाद्यों का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है। घुमंतू पुतुल दल अपना तम्बू चित्रित पर्दे तथा अन्य मंच सामाग्री आदि साथ ले कर चलते हैं।

डांगेर पुतुल

बंगाल में डंडे या बांस के छड़ से संचालित पुतुल को डांगेर पुतुल के नाम से जाना जाता है। डांगेर पुतुल का मंचीय पक्ष उम्दा और संतुलित होता है। रामायणमहाभारतबंगाली लोककथा तथा गाथाओं के अलावे फिल्म और बांग्ला रंगमंच के लोकप्रिय सामाजिक एवं एटिहासिक नाटकों को डांगेर पुतुल रंगममंच पर प्रस्तुत किया जाता है। पुतुल की वेषभूषा पर जात्रा का प्रभाव परिलक्षित होता है। पुतले जरीदार मखमली जेकेट तथा राजसी मुकुट धारण करता है। प्रस्तुति का स्वरूप गीतिनाट्य होता है।

डांगेर पुतुल की उचाई प्रायः 48 इंच से 55 इंच के बीच होता है। तथा वजन 5 से 10 किलोग्राम होता है। पुतली का मूल ढांचा लकड़ी का बना होता है। चेहरे पर मिट्टी और कपड़े की तह जमा दी जाती है। जिसके ऊपर पट चित्र शैली में विशेष अलंकरण किया जाता है। पहले जमाने में पुतुल का धड़ बांस का बना होता थाजिसके ऊपर चावल की भूसी और मिट्टी के लेप से आकृतियाँ गढ़ी जाती थी। पुतुल की गर्दनें लंबीआंखे निखरी हुई तथा नाक नुकीली होती है। पुतली की बनावट केवल धड़ तक होता है। कमर के नीचले हिस्से में बांस का लंबा डांडा बंधा होता है। यह डंडा पुतुल द्वारा पहने गए लहंगे में छिपा होता है। पुतुल संचालन के समय कलाकार मुख्य डंडे को कपड़े के सहारे कमर से लगाकर मजबूती से बांध लेता है। सिर के संचालन के लिए एक छड़ लगी होती है। कंधे के जोड़ धड़ के भीतर से धागों के साथ जुड़े होते हैं। हाथों की गतिविधियों के लिए पुतुल कलाकार इस धागे को खिचता है।

डांगेर पुतुल का मंच बांस के खंबों को चारों और से घेर कर बनाया जाता है। जिसकी उचाई प्रायः इतनी होती है कि पुतुल कलाकार और डंडा ठीक ठीक चुप जाये और दर्शकों को दिखाई न दे। मंच तीन और से खुला होता है चौथी और चित्रकारी किए हुए पर्दे टंगे होते हैं। कलाकर पुतलियों का संचालन इनहि घेरों से करते हैं। एक दल में 18 से 25 सदस्य होते हैंजिसमें एक मुख्य गायक होता है। खोल नगाड़ा हारमोनियम और मंजीरा डांगेर पुतुल नाट्य का प्रमुख वाद्य है।

 

पावा कथकली  

केरल में दस्ताना पुतुल की एक परंपरा पावा कथकली के नाम से जाना जाता है। पुतुल रंगमंच की यह परंपरा मूलतः केरल के लोकप्रिय नृत्य नाटक कथकली से प्रेरित और विकसित माना जाता है। पुतुल कलाकार अंडी पंडाराम समुदाय के हैं। इनकी भाषा मिश्रित तेलगु और मलयालम है। कहा जाता है कि यह लोग कभी आंध्र प्रदेश से आए थे। पंडाराम समुदाय के लोग सुब्रमण्यम मंदिर के लिए तीर्थ यात्राएं आयोजित कर जीवकोपार्जन करते रहे हैं।

कालांतर में इन्होने पुतुल प्रदर्शन को अपनी जीविका बना लिया। पावा कथकली के पुतुल 30 से 60 सेंटीमीटर के बीच ऊंचे अलग अलग आकार के बने होते हैं। पुतुल का सिर और हाथ लकड़ी के बने होते हैं। पुतुल की साज सज्जाआभूषणवस्त्र विन्यास हुबहूँ कथकली के पात्रों का प्रतिरूप होता है। कथकली जैसे विशिष्ट मेकअप के प्रभाव के लिए चेहरे को विविध रंगों से रंगा जाता है। पुतुल संचालन में तीन उँगलियाँ प्रयुक्त होती है। सिर को तर्जनी से और भुजाओं को अंगूठे तथा मध्यमा से संचालित किया जाता है। पुतुल का संचालन कलाकार सीधे दर्शकों के सामने करते हैं। संचालक कभी भी किसी पर्दे या कपड़े की आउट में नहीं छिपते। पुतलों का संवाद संचालक कलाकार बोलता है। राग-रागिनीगीत एवं कथा सभी कुछ कथकली परंपरा से प्रभावित है। प्रदर्शन के सभी प्रसंग कथकली की अट्टकथाओं का रूपान्तरण है। महाभारत के कल्याण सौगंधिकम उत्तरस्वयंवरम तथा दुर्योधन वधम आदि लोकप्रिय प्रसंग है।

तोलपावा कुथू

केरल में पारंपरिक छाया पुतुल नाट की परंपरा तोलपावा कुथू के नाम से जाना जाता है। तोलपावा कुथू का प्रदर्शन चेट्टीनायर और गणक समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है। कलाकारों को पुलवर कहा जाता हैजिसका शाब्दिक अर्थ होता है विद्वान। कलाकारों को पुतुल निर्माण और संचालन के प्रशिक्षण के अलावे वेद-पुराण तथा उपनिषदों की  शिक्षा भी दी जाती है। तोलपावा कुथू के आरंभ को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुथू के अधिकतर नाट्य प्रसंग तमिल कवि कम्बन( 9वीं शताब्दी) द्वारा लिखित कंब रामायण से ली गई हैजिसमें राम जन्म से राज्याभिषेक तक के प्रसंगों को प्रस्तुत किया जाता है। कुछ कलाकारों ने कंब रामायण के तार पत्र पर लिखे हस्त लिपि को घर में सुरक्षित रख रखा है। कुछ विद्वानों की राय है कि तोलपावा कुथू की परंपरा कंब रामायण से पहले ही केरल के मंदिरों में विद्यमान थी। सत्रहवीं शताब्दी के आस- पास कम्बन की कविताओं का समावेश नाट्य प्रसंगों में किया गया। केरल में मान्यता है कि यह नाट्य रूप भद्र काली के मंदिर में उनको ही समर्पित प्रस्तुत होता था। आज भी भद्र काली की छाया पुतुल इस नाट्य रूप में दिखाई जाती है। इस प्रकार इसकी परंपरा प्राचीनकाल से ही है। पुतलों का निर्माण हिरणों के खाल से किया जाता है। चमड़े अपारदर्शी होते हैं। चमड़े की रंगाई की जाती है। आभूषण- वेषभूषा आदि के प्रभाव के लिए चमड़े पर पारदर्शी चित्रकारी की जाती है। पुतलों की उचाई 48 से 80 सेंटीमीटर के बीच होती है। पूरी कथा के वर्णन के लिए लगभग 130 पुतलों की आवश्यकता होती है। पुतलों के संचालन के लिए विभिन्न जोड़ों पर छड़ लगे होते हैं। चूंकि पर्दा 12 मीटर लंबा होता है अतः पर्दे को कवर करने के लिए कम से कम 5 कलाकार 1 साथ पुतलियों का संचालन करते हैं। पुतलों के संवाद संचालक कलाकार द्वारा बोला जाता है। कलाकार गद्य और पद्य संवादों का लयबद्ध पाठ एक विशेष शैली करते हैं। प्रदर्शन के दौरान ईज़ूपाराचेंड़ामद्दलम (ड्रम)इलतालम (मंजीरा) तथा पुरूम कुझल( फूँक वाद्य) आदि वाद्य बजाए जाते हैं। तोलपावा कुथू का प्रदर्शन अनुष्ठाणिक विधि से आरंभ होता है। प्रदर्शन की अवधि 7 से 21 रात्रि की होती है। सबसे पहले विशेष चढ़ावे के साथ मंच पर पर्दा टांगा  जाता है फिर देवी के दिव्य पुरुष बेली चपडु की मूर्ति के समक्ष रखे दीप के लौ से मंच के 21 दीपों को प्रज्वलित किया जाता है और कलाकारों को  नाट्यप्रस्तुति के लिए आशीर्वाद दिया जाता है। इसके बाद कलाकारों द्वारा मंचपूजन और फिर गणेश वंदना करते हुए तार की सुइयों से अपने पुतलियों को पर्दे से जोड़ देते हैं। और गुरु वंदना के साथ प्रदर्शन आरंभ होता है। प्रदर्शन के बीसवें दिन रावण की मृत्यु के पश्चात पर्दा हटा लिया जाता है। मंच की धुलाई की जाती है ऐसा समझा जाता है कि रक्तपात से मंच दूषित हो गया। प्रदर्शन के अंतिम दिन राम के राज्याभिषेक के साथ समारोह समाप्त होता है।   

तोलपावा कुथू का प्रदर्शन कुथुमदम नामक रंगशाला में किया जाता है। कुथुमदम केरल के पालघाट क्षेत्र के मंदिर परिसर में बने हैं। पुथुमदम का स्थापत्य अद्भुत है। छत ढालू हैजिस पर टाइलें लगी होती है और ऊपर से टीन से ढकी होती हैं। सामने वाले हिस्से में करीब 12 मीटर लंबा सफ़ेद पर्दा लगा होता है। सफ़ेद पर्दे के नीचे काला कपड़ा लगा होता है। कहा जाता है कि सफेद पृथ्वी और आकष का और काला कपड़ा पाताल का प्रतीक है। पर्दे के पीछे नारियल के खप्पे से बने 21 दीपों को बांस या लकड़ी के खंभों पर रख प्रज्वलित किया जाता है। कुथुमदम देश का एकमात्र स्थायी पुतुल रंगशाला है।पलाघाट क्षेत्र के मंदिरों में कुल 63 कुथुमदम हैं।                        

कलसूत्री बाहुल्य

महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले के गाँव में प्रचलित धागा पुतुल की परंपरा को कालसुतरी बाहुल्य के नाम से जाना जाता है। कालसूत्री बाहुल्य अर्थात धागा से चलने वाला पुतुल। कलसुत्री बाहुल्य के कलाकार थाकर समुदाय के होते हैंजो मूलतः सामाजिक व्यवस्था में जनजाति के अंतर्गत आते हैं। इस कला का विकास चित्रकथि( चित्रों के साथ कथा गायन) परंपरा से माना जाता है।

कलसुत्री बाहुल्य के पुतले अपेक्षाकृत्य छोटे होते हैं। इनका सिर और हाथ लकड़ी के बने होते हैं। इनके पाँव नहीं होते। कंधों पे जोड़ होता है। पुतलों का संचालन आयताकार डब्बेनुमा मंच से किया जाता है। पुतलों का नियंत्रण तीन धागों से होता है यह धागे बांस के फट्टी के बीने त्रिकोणिए फ्रेम से जुड़ा होता हैजिसे पकड़ संचालक पुतलियों को चलाते हैं। इस परंपरा के पुतुल के जबड़ों में भी गति होती है तथा उसका संचालन किया जाता है। पुतलियाँ अलंकृत और सुसज्जित होती है।  कमर से नीचे गोटेदारघाघरी पहनाई जाती है। बालआँखेंभौंहमुछे तथा होठों को वांछिक रंगों से रंगा जाता है।

कलसुत्री बाहुल्य के कलाकार रामायण और महाभारत के कथा के अलावे मराठी पवाड़े के विभिन्न प्रसंगों को पुतलियों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।

गोपा लीला

उड़ीसा में धागा पुतुल की परंपरा गोपा लीला के नाम से प्रचलित है। गोपा लीला के पुतलों के सिर और धड़ कहीं 50 सेंटीमीटर ऊंचे लकड़ी के बने होते हैं। बालआभूषण तथा शरीर के ऊपरी अंगों के वस्त्र रंगों से बनाए जाते हैं। दक्षिण उड़ीसा के कुच्छ भागों को छोड़कर पुतलों के पाँव नहीं होते। कुछ पुतलियों के आभूषण और वेषभूषा जात्रा रंगमंच  से प्रेरित है। कमर से नीचे चटकदार रंग की घाघरी पहनाई जाती है साथ ही पीठ पर कंधे से लटकते हुए अंडाकार लवादा पहनाया जाता है। सिर और कलाइया धागे से जुड़े होते हैं। दूसरी छोर एकत्रिकोणी लकड़ी के फ्रेम से बांध दिया जाता है। संचालक इन्हीं त्रिकोणी फ्रेम के सहारे पुतलों को चलाते हैं। पुतुल दल घुमंतू होते हैंजो मेले हाट बाजार तथा गाँव में घूम घूम कर पुतला नाच का प्रदर्शन करते हैं। मंच बिलकुल अनौपचारीक केवल पीछे मोर के पंखों की चित्रकारी वाला पर्दा टांग दिया जाता है। इसी पर्दे के समक्ष प्रदर्शन होते हैं। प्रदर्शन के विषय मुख्यतः कृष्ण की बाल और युवा अवस्थाओं की लीलाओं पर आधारित होते हैं। आधार ग्रंथ श्रीमद  भागवत को माना जा सकता है। गोप और गोपियों के साथ विनोदपूर्ण लीलाएँगोबरधनपर्वत को उठानापूतना और कंस के पराजय की कथा विशेष रूप से दिखाई जाती है। छोटे छोटे संवादों के बीच पद्य गायन की परंपरा प्रदर्शन को गति प्रदान करते हैं। कलाकारों में पुतली संचालक कथावाचक गायक के अलावे ढोलक तथा मजीरे बजाने वाले होते हैं।

अब यह परंपरा तेजी से लुप्त हो रही है     

सखी कुंढेई                                                                                      

सखी कुंढेई उड़ीसा के कटकढेकनाल तथा केंद्रपारा जिले में प्रचलित दस्ताना पुतुल नाट्य की परंपरा है। सखी कुंढेई के कलाकार अहीर हैं। जो कभी उत्तर भारत से बंगाल और फिर उड़ीसा में आकार बस गए। यह लोग बंगला मिश्रित उड़िया बोलते हैं। पुतलियों के सिर और धड़ लकड़ी के बने होते हैंजिनका भीतरी भाग खोखला होता है। पुतुल के पाँव नहीं होते। कमर से नीचे उन्हे लंबे सज्जित घाघरा पहनाया जाता है। नर्तकी पुतुल के पौशाक के नीचे घुंघरू बंधे होते हैंजो नाच के समय छनकते हैं। पुतुल कलाकार गाँव-गाँव घूमकर प्रदर्शन करते हैं। पुतलियों का संचालन तीन उँगलियों से किया जाता है। मंच के नाम पर एक चटाई बिछाकर प्रदर्शन आरंभ करते हैं। दर्शक चारों और से घेरकर खड़े या बैठ जाते हैं। प्रदर्शन गंगा वंदना से आरंभ होता है। वाद्यों में ढोलक की प्रधानता है। नाट्य प्रस्तुति में संवाद से अधिक गीत होते हैं।

सखी कुंढेई के कलाकार मुख्य रूप से राधा और कृष्ण की कथाओं से जुड़े प्रसंगों पर आधारित प्रस्तुतियाँ करते हैं। वस्त्र हरणराधा मिलनकेलिलीला लोकप्रिय प्रसंग है। यह सारे प्रसंग और गीत सत्रहवीं शताब्दी के वैष्णव कवी वनमाली दास द्वारा लिखित पदों पर आधारित है।

 

 

काठी कुंढेई 

उड़ीसा के ग्राम्य अंचलों में छड़ से संचालित पुतुल नाट्य की एक परंपरा को काठी कुंढेई कहा जाता है। प्रदर्शन के विषय रामायणमहाभारत तथा पौराणिक आख्यानों पर आधारित होते हैं। पुतलों के हाथ और सिर लकड़ी के बने होते हैं। पुतुल प्रायः 55 से 60 सेंटीमीटर ऊंचा होता है। संचालन के लिए मुख्य छड़ सिर से जुड़ी होती है। कंधों के जोड़ों को पुतुल के घर के अंदर से दो मुद्रिकाओं के साथ धागों से जोड़ दिया जाता है। जिन्हे खिचने पर हाथ में गति आ जाती है। पुतलों के संवाद संचालक बोलते हैं।

रावण छाया

उड़ीसा के अंगुल जिले के ओडस क्षेत्र में प्रचलित छाया पुतुल नाट्य की परंपरा रावण छाया के नाम से जानी जाती है। रावण छाया रामलीला या रामनाटक के नाम से भी प्रसिद्ध हैजिसमें राम-रावण की कथा पर आधारित प्रसंगों को प्रस्तुत किया जाता है।

रामकथा पर आधारित इस पुतुल नाट्य परंपरा का नाम रावण छाया है। इस कला रूप से जुड़े भाट समुदाय के लोगों के बीच मान्यता है कि राम दिव्य और अलौकिक पुरूष हैं। अतः उनकी छाया नहीं हो सकती। इसलिए इस पुतुल नाट्य परंपरा का नाम रावण छाया रखा गया। कथा का मूल आधार विचित्र रामायण का उड़िया संस्कारण हैजो सत्रहवीं शताब्दी के एक कवि विश्वनाथ खुटिया द्वारा विरचित है।

रावण छाया की पुतलियाँ चमड़े की बनी होती हैं। अलौकिक तथा दिव्य चरित्र के लिए हिरण की खाल जबकि अन्य पात्रों के लिए भेड़ और बकरियों की खाल प्रयुक्त होती है।

पुतलियों का आकार 20 से 60 सेंटीमीटर होता है। खाल अपने मूल रूप में ही पात्र की आकृति अनुसार काट ली जाती है। खालों ण तो रंगे जाते हैं ण ही उसका सतह चिकना होता है। वेषभूषा तथा आभूषण के आभास के लिए खाल की बहुत ही सूक्ष्म कटाई की जाती है। पुतुल संचालन के लिए पुतलियाँ छड़ से जुड़ी होती हैं। हनुमान का उड़ना समुद्र की लहरें पहाड़पशुयेँवृक्षों की कतारनागपाश आदि दृश्य पर्दे पर बहुत ही रोमांचक तरीके से प्रस्तुत होता है। पुतलियों में राम और रावण की पुतलियाँ अपेक्षकृत बड़ी और अलंकृत होती है।

रावण छाया का मंच बांस के खंभों को गाड़कर वर्गाकार घेरा बना लिया जाता हैजिसे सफ़ेद धोती से पर्दे की तरह घेर दिया जाता है। निचले भाग को घास-फूस या चटाई से ढक लिया जाता है। पर्दे के पीछे बांस के डंडों पर मिट्टी के दो दीपों में तेल भरकर दीप प्रज्वलित कि जाती है इस तरह पर्दे के पीछे उजाला हो जाता है। पुतलियाँ इन्ही दीपों के सामने पर्दे के पीछे संचालित की जाती है। प्रदर्शन से पूर्व नेपथ्य में पुतलियाँ क्रमिक रूप से रखी जाती हैं। गणेश वंदना से प्रदर्शन आरंभ होता है। गाँव के नाई और उसक पोता प्रदर्शन के दौरान हास्य प्रसंग प्रस्तुत कर दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। पुतलों के संवाद संचालक द्वारा बोला जाता है। संवाद के बीच गीतों के टुकड़े प्रस्तुति को मोहक बनाते हैं। गायन वाद्य मंडली के पास ढ़ोलकताल तथा काबूजी (मजीरा) आदि लोकवाद्य होता है।

बोम्मालट्टम

तमिलनाडु आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक के सीमावर्ती क्षेत्रों में धागा एवं छड़ पुतुल की परंपरा बोमालट्टम के नाम से प्रसिद्ध है। प्राचीन तमिल ग्रंथ तिरुक्कुरलमरपव्वे कहकर हुआ है। 18विन्न ष्टब्दी में तंजावूल के शासकों ने पुतुल नाट्य को विशेष संरक्षण दिया। तमिलनाडु के लोक जीवन में पुतलियों का प्रदर्शन लोक आस्था एवं धार्मिक अनुष्ठानों का अंग रहा है। लोक आस्था है कि पुतलियों का नृत्य कल्यानकारी होता है। और उसके सहारे अमंगलकारी तत्वों और महामारियों को हटाकर समृद्धि हासिल की जा सकती है। साथ ही पुतली नृत्य देवी लक्ष्मी द्वारा असुरों को मोहित करके उनका विनाश करने के लिए किए गए ग्यारह नृत्यों में से एक का अनुकरण माना जाता है।

बोम्मालट्टम के धागा- छड़ पुतुल लगभग 90 सेंटीमीटर ऊंचे होते हैं। पुतुल के सिर और हाथ लकड़ी के बने होते हैं। पुतुलों के कंधे कोहनी नितंबघुटने तथा कलाइयों आदि में जोड़ होते हैं। देवताओं के वाहन यथा मोरएरावत हाथी आदि को संबन्धित देवता पुतुल के साथ जोड़ दिया जाता है। हाथों का संचालन छड़ द्वारा किया जाता है जबकि अन्य कई जोड़ों पर जबकि पुतुल के सिर एवं अन्य अंग धागे से संचालित किए जाते हैं। भारतीय परंपरा में प्रायः छड़ों का संचालन नीचे से किए जाता है। जबकि यहाँ हाथ से जुड़े छड़ों का संचालन पुतलिकार ऊपर से करते हैं। छोटे पुतले केवल धागे से संचालित किए जाते हैं। पुतले सुसज्जित एवं अलंकृत होते हैं। पोशाकें आकर्षक एवं चरित्रगत होता है।      

बोम्मालट्टम पुतुल नाट्य की प्रमुख कथाएँ रामायणमहाभारत तथा भागवत पर आधारित होती है। प्रदर्शन गणेश पुजा से आरंभ होता है। प्रदर्शन शैली को लेकर बोम्मालट्टम

ने तमिल लोकनाट्यतेरूकुथु एवं आधुनिक रंगमंच से बहुत कुछ प्रेरणा ली। तेरूकुथु का विदूषक कोमली की उपस्थिती यहाँ देखि जा सकती है। लोकनृत्यों के अलावा भरतनाट्यम के विभिन्न प्रसंगों की झलक यहाँ देखि जा सकती है। मृदंगमशहनाईपीतल के घड़ियाल एवं मंजीरे आदि के वादन से प्रभावोत्पादक संगीत का सायोंजन प्रदर्शन को प्रभावी बनाता है। गायन दल में एक पुरुष और एक स्त्री अनिवार्य रूप से होते हैं।   

मंच पर यवनिका के रूप में करीब 3 मीटर ऊंचाई का काला पर्दा टांग दिया जाता है। संचालक के चेहरे को छुपाने के लिए 7 से 8 फीट ऊंचाई पर सफ़ेद पट्टिका लगा दी जाती है। ठीक इसी तरह नीचे के भाग में भी सफ़ेद पट्टिका टांग दी जाती है। पुतली संचालक काले पर्दे के पीछे खड़े होकर ऊपर से काले पर्दे के सामने पुतलियों का संचालन करते हैं।

प्रकाश के लिए मंच के दोनों और रेंड़ी के तेल के बड़े-बड़े दीपक जला दिये जाते हैं। प्रदर्शन रात्रि के 10 बजे से सुबह 4 बजे तक चलता है।

तोलु बोम्मालट्टम 

तमिलनाडु के तंजावूर क्षेत्र में प्रचलित छाया पुतुल की कला तोलु बोम्मालट्टम के नाम से से जानी जाती है। कहा जाता है कि यह कलाकार 18वीं शताब्दी के आस पास महाराष्ट्र से आंध्र प्रदेश होते हुए तमिलनाडु पहुंचे। आज भी यह कलाकार आपस में मराठी में बात चीत कराते हैं जबकि प्रदर्शन की भाषा तमिल होती है। तोलु बोम्मालट्टम की पुतलियाँ अपेक्षाकृत बड़ी होती हैंजो प्रायः भेडबकरी की पतली झिल्लिनुमा चमड़ी से बनाई जाती है। पुतली के विभिन्न अंगों यथा हाथबांहकलाईगर्दन आदि को काट कर इस प्रकार जोड़ा जाता है कि उसका हलन चलन हो सके। पुतलियाँ आकर्षक एवं सुसज्जित होती हैं। उन्हें गहरे सूखे रंगों से रंगकर स्त्री-पुरुषदेवी-देवतापशु-पक्षियों या असुर- राक्षसों की मुखाकृतियाँ दी जाती है। संचालन के लिए छड़ लगी होती है तथा छड़ से विभिन्न अंगों का नियंत्रण जुड़ा रहता है।

 तोलु बोम्मालट्टम  पुतुल नाट्य के विषय रामायण से लिए गए होते हैं। पूरी रामकथा की प्रस्तुति 8 से 10 रात्रि में समाप्त होती है पारंपरिक रूप से प्रदर्शन का उद्देश्य अनुष्ठाणिक होता हैजिसमें इन्द्र देवता को मनाने की स्तुति की जाती है। यदि प्रदर्शन गाँव में हो तो प्रदर्शन का खर्च गांव सामूहिक रूप से उठाता है।

प्रदर्शन के लिए प्रायः एक से डेढ़ मीटर का सफ़ेद पर्दा टांग दिया जाता है। पर्दे के पीछे रोशनी के लिए मशाल जलाई जाती है। पुतुल का संचालन लकड़ी की किसी तख्त पे खड़े होकर किया जाता है। पुतुल का संवाद संचालक बोलता है। संवाद के साथ संचालक गीत भी गाते हैं। गीतों की टेक को सहयोगी पात्र जो प्रायः स्त्री या संचालक की पत्नी होती हैहारमोनियम बजाते हुए दोहराती है। अन्य संगति वाद्यों में मृदंग प्रमुख होता है। संचालक के पाँव में लकड़ी की एक पट्टी बंधी होती हैजिसका उपयोग विसेश प्रभाव के लिए यथाक्रोध या युद्ध के समय लकड़ी के तख्त पर पटक कर विशेष ध्वनि उत्पन्न की जाती है।

सूत्रदा गोम्बेयाट्टा

सूत्रदा गोम्बेयाट्टा कर्नाटक का लोकप्रिय धागा पुतुल नाट्य है। यह कर्नाटक के तटीय जिलों में यक्षगान गोम्बेयाट्टाउत्तरी कर्नाटक में गोम्बेयाट्टा तथा दक्षिणी मैसूर अंचल में सूत्रदा गोम्बेयाट्टा के नाम से प्रसिद्ध है। कर्नाटक में इस पुतुल नाट्य का प्रदर्शन विश्वकर्म समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता था। आरंभ में यह लोग मंदिरों में पुतलियाँ नचाते थे। कालांतर में सामाजिक समारोह एवं अन्य सामाजिक उत्सवों पर भी पुतलियों के प्रदर्शन करने लगे।

कर्नाटक के प्राचीन ग्रन्थों में पुतली परंपरा के कई अन्तः साक्ष मिलते हैं। 10वीं -11वीं शताब्दी के नेमीनाथ पुराण में चमड़े की पुतलों और 12वीं शताब्दी के संत कवि वाषव वन्ना द्वारा धागे पुतुल का उल्लेख किया गया है। 15वीं से 17वीं शताब्दी के बीच विजय नगर के राजाओं ने पुतुल कलाओं को विशेष संरक्षण दिया। कुमारव्यास भारत के आदि पर्व रत्ना करवाणी के काव्य वचन साहित्य और दासों के कीर्तन में पुतलियों का उल्लेख मिलता है। मैसूर प्रदेश में कीलु गोम्बेयाट्टा नाम से पुतलों नाट्य की परंपरा थीजो अब लुप्तप्राय है।

एक मीटर ऊंचे और छः से आठ किलोग्राम वजन वाले सूत्रदा गोम्बेयाट्टा के पुतुल हल्की और टिकाऊ क़िस्मों की लकड़ी से बनाए जाते हैं। सिर से लेकर पाँव तक सारे अंग पेड़ की मोटी टहनियों के बने होते हैं। शरीर या धड़ के लिए मजबूत टहनी जबकि सिरहाथ तथा अन्य अंगों के लिए कोमल टहनियाँ उपयोग में लाई जाती हैं। कर्नाटक पुतुल नाट्य के नृत्यसंगीतसाहित्य और वैषभूषा आदि पर वहाँ के लोक नाट्यों यथा यक्षगान,दो ड्डात तथा वायलाटा आदि का व्यापक प्रभाव पड़ा। कर्नाटक के तटीय जिलों में इसे यक्षगान बायलाटा के नाम से ही जाना जाता है। चित्रदुर्गतुंगकुलबैंगलूरकोलारमंडेय तथा मैसूर जिले के प्रदर्शन में मुड़ल पात्र यक्षगान का प्रभाव परिलक्षित होता है। तो शिवमोगा चिकमंगलूर तथा दक्षिण कन्नड जिलों में पडुवलपाय का प्रभाव है। उत्तर कर्नाटक जैसे बल्लरीधारवाड़ बीजापुरगुलबर्गा रायचूर तथा वीदर आदि प्रदेशों में दोदात्त का प्रभाव पुतले की वैशभूषा तथा चेहरों के रंग उनके स्वभाव के अनुसार तय किए जाते हैं। राजपत्र के लिए मुख्वर्णिका में पीले रंग के साथ लाल और काले का भी लेप लगाया जाता है। किरीट कंठाहरभुजतिथि आदि का निर्माण कोमल टहनियों से किया जाता है। पुराणिक एवं देवताओं की अनुकृति पुराने मंदिरों में स्थापित मूर्तियों की बनावट से प्रेरित है। उनके किरीट एवं आभूषण प्राचीन मंदिरों में स्थापित देवताओं की मूर्तियों के समान ही है। रावण पात्र के लिए 10 सिर बनाए जाते हैं स्त्री पात्र की मुख का रंग पीलाहोठगाल और आँख के  भीतरी भाग के लिए लाल रंग प्रयुक्त किया जाता है। दक्षिण भाग की पुतलियाँ वायलाटा की वेषभूषा से प्रेरित होती है। स्त्री पात्र ब्लाउज और साड़ी पहनते हैं। ऋषि की वेषभूषा सन्यासियों जैसी होती है। हास्य पात्र विविध रंगों की वेषभूषा धारण करते हैं। दक्षिण कन्नड प्रान्तों के पुतलिकार प्रकृतिक रंगों का प्रयोग करते थे। सफ़ेद रंग के लिए मिट्टी काले रंग के लिए दीपक की स्याही तथा अन्य रंग पत्थर को घिस कर तैयार करते थे। इन दिनों रासायनिक रंगों का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। दक्षिणी कर्नाटक के पुतलों के पाँव नहीं होते वे लंबे लहंगे पहने होते हैं। उत्तरी और तटीय कर्नाटक के पुतलों के नाक नक्श उनके पैरनितंब और घुटनों के जोड़ विशिष्ट होते हैजिनके कारण वह जटिल अंग विच्छेद और नृत्य कर सकते हैं। पुतलों के संचालन के लिए विभिन्न अंग छः काले धागों से जुड़े होते हैं। इनामे दो धागे कान दो घुटने तथा दो धागों को हाथ से जोड़ा जाता है। धागों के जोड़ियों को लकड़ी के तीन छड़ों में बांध दिया जाता हैजो प्रायः 12 से 15 इंच लंबी होती है। इन्हीं लकड़ियों को पकड़ पुतलों का संचालन किया जाता है। संचालक विभिन्न चरित्रों का संवाद बोलता तथा गाता है।

पुतल नाटक के कथानक रामायणमहाभारत तथा पौराणिक आख्यानों पर आधारित है। मुख्य संगीतकार भगवातार होते हैंजिनके पास ताल होता है। अन्य सहगायकों के पास मददलचेंडेहारमोनियम तथा मुख वीणा जैसे वाद्य होते हैं।

सूत्रदा गोम्बेयाट्टा का मंच की बनावट में क्षेत्र भिन्नता है। पहले जमाने में मंच प्रायः काली मंदिर के बाहर बनाया जाता था। मंच का सामने का भाग 1.80* 1.2 सेंटीमीटर लंबा और चोड़ा तथा 75 सेंटीमीटर गहरा होता था । शेष भाग कपड़ों से ढाका होता थाजिससे की पुतुल संचालक और कलाकार दिखाई न पड़े।

मैसूर और बेंगलूर क्षेत्र में धागा और छड़ से संचालित पुतुल नाट्य शैली को सलाकी गोम्बेयाट्टा के नाम से जाना जाता है। पुतलों की वैषभूषा तथा बनावट प्रायः सूत्रदा गोम्बेयाट्टा के समान ही होता है। केवल संचालन के लिए हाथों को छड़ों से तथा सिर और कानों को धागे से जोड़ के चलाया जाता है। विशेष क्षण यथा युद्ध के समय संचालक अपने घुटनों से भी पुतुल को धकेलता है।

तोगालू गोम्बेयट्टा

कर्नाटक के करावली अंचल को छोड़कर अन्य सभी भागों में प्रचलित छाया पुतुल की एक विशिष्ट शैली को तोगालू गोम्बेयट्टा कहा जाता है। पुतली कलाकार मूलतः महाराष्ट्र के किल्लीकेय्टा कबीले के हैजो कभी कर्नाटकआंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में बस गए। इन कलाकारों की आपस में बातचीत मराठी में होती है। जबकी खेल दिखाते समय वह कन्नड भाषा का प्रयोग करते हैं। कन्नड लोग इन कलाकारों को किल्लेक्यतासिल्लेक्यताकटुबूक्याताकोलुक्यताअस्त्रीक्यताकटंबरकालीक्याताबुण्डेक्याल आदि अनेक नामों से पुकारते हैं। अनुमानतः यह सभी नाम उनके अलग- अलग कबीले से होने का द्योतक है। यह लोग अपने को रामायण/राम के आदि वंशज मानते है। इन लोगों का विश्वास है कि राम के शाप के कारण ही उन्हे पुतुल कला के व्यवसाय से जुड़ना पड़ा। इस पुतुल नाट प्रदर्शन का दूसरा अनुष्ठाणिक पक्ष है। जिसमें वर्षा के आहवाहन तथा गायों को रोगों से मुक्ति हेतु पुतुल नाट का प्रदर्शन किया जाता है। कालांतर में पारिवारिक तथा सामाजिक उत्सवों पर इसके प्रदर्शन होने लगे।

 तोगालू गोम्बेयट्टा के कलाकार मानते हैं कि इस कला का प्रदर्शन वह रामायण काल से ही करते आ रहे हैं लेकिन 10वीं-11वीं शताब्दी के नेमीनाथ पुराण में चमरे से बने पुतलों की एक परंपरा का उल्लेख हुआ है।

तोगालू गोम्बेयट्टा के पुतुल आकार के हिसाब से दो प्रकार के हैं- छोटे आकार वाले चमड़े के पुतुल को चिक्का तोगालू गोम्बेयट्टा जबकि बड़े आकार वाले को डोड्डा तोगालू गोम्बेयट्टा कहा जाता है। चिक्का पुतलियाँ प्रायः 30 सेंटीमीटर ऊंचे होते हैंजो हिरण या बकरी के खाल से बनाए जाते है। इस तरह की पुतलियाँ मैसूरबेलारीबीजापुररायचुर में बनाई जाती है। रामायणमहाभारत तथा अन्य दिव्य पात्रों की पुतलियाँ आवश्यक रूप से हिरणों की खाल से बनाई जाती थी। अब हिरणों की खाल उपलब्ध न होने पर बकरे की खाल से बनाई जाती है। कर्नाटक और आंध्र के सीमावर्ती इलाके में प्रचलित डोड्डा तोगालू गोम्बेयट्टा की पुतलियाँ बड़े आकार की 1.8 मीटर ऊंचे होते हैं। पुतली के आकार बड़े होने के कारण भैंस के चमड़े का इस्तेमाल किया जाता होगा। चमड़े को बारीकी से घिस कर बड़ा किया जाता है फिर उसकी आकृति अनुसार कटाई की जाती है। कटाई के दौरान आभूषणकिरीटभुज कृति आदि विशेष रूप से उकेरी जाती है। पुतलियों की रंगाई में चरित्रों की सामाजिक स्थिति और मनोविज्ञान का विशेष ध्यान रखा जाता है। यथा देवता चरित्र के लिए नीलालालकाला तथा पीला चोर पात्र के लिए नीरा सिंदूरीगाढ़ा लालकाला तथा काले रंग का उपयोग किया जाता है। पहले जमाने में कलाकार स्वयम रंग तैयार करते थे। आज कल रासायनिक रंगों का प्रयोग करने लगे। पुतलियों को खड़े करने के लिए लकड़ी के छड़ को सुई धागे से पुतली के साथ सिल दिया जाता है। हाथपाँवगर्दन के संचालन और नियंत्रण के लिए अलग-अलग छड़ लगे होते हैं। पुतलियों की वेषभूषा समान्यतः कर्नाटक के आंचलिक लोकनाट्य बयलाटा से प्रेरित है। रानी पुतलियाँ विशेष रूप से अलंकृत एवं सज्जित होती हैं। हीडम्बा तथा शुपनेखा जैसे राक्षसियों की पुतलियाँ अलग होती हैं। स्त्री पात्र की पुतलियों की बड़ी नाकआँखें चोखी लंबे तथा पुष्पसज्जित बालनाककानहाथ सभी आभूषण जड़ित होते हैं।

पारंपरिक रूप से तोगालू गोम्बेयट्टा का प्रदर्शन फसल की कटाई के बाद गाँव के सार्वजनिक स्थल तथा मंदिर के प्रांगणों में पदर्शित किया जाता था। कलाकार घुमंतू होते थे और प्रदर्शन स्थल बदलते रहते थे। गाँव में आयोजन के लिए गाँव के अधिपतियों की अनुमति प्राप्त करनी होती थी। प्रदर्शन के समय दीप की व्यवस्था गाँव के अधिपतियों द्वारा की जाती थी साथ ही कुछ अनाज या पैसे भी आयोजक द्वारा कलाकारों को भेंट किया जाता था।

इन दलों के पास मोबाइल मंच होता था जिसे आसानी से एक जगह से दूसरे जगह ढो  कर ले जाया जा सके। बारह बांस के खंबों को रेडीमेड शोकेट पर फिट कर दिया जाता था जिसे रस्सियों से आपस में मजबूती से बांध दिया जाता था। मंच को तीन दिशाओं से ऊपर तथा नीचे के हिस्सो को पर्दे से ढक दिया जाता था। ताकि पुतुल कलाकर अंदर बैठ सके और दर्शकों को दिखाई भी न दे। बांस के खंबों में शुभ संकेत बंदनबार भी बांधे जाते थे। यह चकोर घेरा प्रायः छह से आठ फीट लंबाई चोड़ाई का होता था। प्रकाश के लिए पारंपरिक बड़े आकार के दीपों का प्रयोग होता था। इन दिनों गैस बत्ती का उपयोग प्रकाश के लिए किया जाता है।  

पुतुल नाट्य की कथा रामायणमहाभारत पुराण तथा जनपद कथा ( लोककथा) पर आधारित होती थी। अधिकांश नाटक यक्षगान के प्रसंग होते थे। पुतलों का संवाद संचालक कलाकार बोलता था। गीत मूलतः कन्नड में और बीच बीच में मराठी एवं टेलगु में भी गाये जाते थे लेकिन संवाद अंततः कन्नड में ही होते थे। गायन मंडली में स्त्री स्वर के साथ मद्दलमताल तथा गेज्जे( घुंघरू) आदि वाद्य आवश्यक रूप से होते है। प्रदर्शन का आरंभ गणपति तथा शारदा वंदना के बाद मुख्य प्रदर्शन आरंभ होता है।       

       

 

 

  

 

  

 

 

    

   


 पारंपरिक पुतुल नाट्य -  ओम प्रकाश भारती