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Friday, September 10, 2021

नेपाल का पारंपरिक नाट्य 'बालन' - डॉ. ओम प्रकाश भारती

 

नेपाल का पारंपरिक  नाट्य - बालन

                                                                   डॉ. ओम प्रकाश भारती

बालन या बालुन  नेपाल का आनुष्ठानिक नाट्य है। नेपाल के अलावा इस नाट्य का प्रचलन सिक्किम तथा पूर्वोत्तर भारत के असम , मेघालय तथा अरुणाचल प्रदेश के नेपाली भाषा –भाषी के बीच है ।  इस नाट्यरूप में राम और कृष्ण जैसे चरित्रों के उच्च आदर्शों को गीत एवं नृत्यों के साथ दिखाया जाता है।


बालन 
बालन

नेपाली बृहत शब्दकोशमें बालन को संस्कृत का शब्द कहा गया है तथा इसका अर्थ  दिया गया है-“ विशेष धार्मिक  पर्व आदिमा एक जनाले भट्टायउने र सामूहिक रूपमा अरूले स्वर मिलाउने गरी गाइने राम-कृष्ण आदि देवताको चरित्र गाथा।,  ऐसा लगता है कि आरंभ में बालन गाथा के रूप में गायी जाती होगी। बालन शब्द, बाल में जुड़ने से बना है। प्राचीन नेपाली में बालशब्द का प्रयोग पुरुष के अर्थ में हुआ है। अर्थात् पुरुषों द्वारा प्रस्तुत लीला या अभिनय को बालन कहा गया है। अनुष्ठानमूलक होने के कारण कलान्तर में चरित्रों का अभिनय किया जाने लगा होगा। आज नेपाल  के लोकजीवन में बालुन खेल्नुयानी बालुन खेलना ही कहा जाता है।                                                            

नेपाल  के ग्राम जीवन में पर्व त्यौहार, मुंडन, पूजा, श्राद्ध अथवा मनोकामना पूरी होने पर प्राय रात्रि बेला में बालुन का प्रदर्शन किया जाता है। इस नाट्यरूप के पीछे धार्मिक आस्था के संग लोकरंजन की भावना भी जुड़ी है। मनोकामना पूरी होने पर गृहस्थ अपने घर बालन दल को आमंत्रित करते हैं। गाँव के मेले तथा विवाहोत्सव आदि पर भी बालन खेला जाता है। बालन प्रदर्शन के लिए कोई स्थायी मंच नहीं बना होता है, बल्कि जिस व्यक्ति के घर बालन का प्रदर्शन होता है, उसके घर का आंगन ही प्रदर्शन स्थल में तब्दील हो जाती है। बालन अभिनय के लिए रात्रि का समय उपयुक्त समझा जाता है, लेकिन दिन में भी इसके प्रदर्शन होते हैं। बालो’ ;जो बालन दल को आमंत्रित करता है, द्वारा एक सप्ताह पहले बालन के खलीफा (गुरु) को आमंत्राण दिया जाता है। शाम ढलते ही खलीफाअपने दल के साथ प्रदर्शन स्थल पर पधारते हैं।

             लोक विश्वास है कि बालन की परम्परा द्वापर युग से ही है । कहा जाता है कि यशोदा के घर में पाण्डवों ने बालन प्रस्तुत किया था । यह संभव है कि बालन की परम्परा इतनी ही प्रचीन हो । लेकिन भक्तिकाल (15वीं सदी) में आकर इसका स्वरूप निखरा । खेमराज नेपाल ने नेपाली लोक साहित्यिको रूपरेखा,  (पृ.  सं. 148) में रामचंद्र विप्र द्वारा संकलित कृष्ण चरित्राको बालुन की तिथि सन् 1653 बतायी है । शोध के दौरान रामायण  का बालुन और सीताचरित बालुन की प्रकाशित प्रति मिली, जो 1929 में गोर्खा पुस्तकालय वाराणसी  से प्रकाशित है । इस प्रकार  बालन की उपलब्ध पांडुलिपियां तीन से चार सौ वर्ष पुरानी है। मौखिक परम्परा में हो सकता है यह उससे पहले से भी हों ।

            एक प्रदर्शन दल में कुल 12-13 सदस्य होते हैं। एक खलीफा, दो सूत्राधर, दो नर्त्तक तथा बाकी अभिनेता। बालन दल का संचालक, गुरु तथा प्रशिक्षक खलीफाहोता है। खलीफा ही बालन का वेशभूषा, मंच सामग्री तथा पोथी आदि का रखरखाव करता है। खलीफा की पदवी वंशानुगत होती है। जब तक खलीफा के पुत्र स्वयं पद का त्याग कर दें, या खलीफा बनने से इनकार कर दें, ऐसी स्थिति में दल नये खलीफा का चयन करता है।

 

लिङगों – प्रदर्शन स्थल

बालन का मंचन खुले आकाश के नीचे किसी गृहस्थ के घर के आंगन या गाँव के देवालय या चौपाल में होता हैं। प्रदर्शन के दिन आंगन के बीचों-बीच केले के थम्ब का समकोणिक मंडपबनाया जाता है। मंडप के बीच मालिका माता के लिङगों की स्थापना की जाती है। इस मंडप को थानभी कहा जाता है। मंच के मध्यभाग में केले के चार थंबों  को जोड़कर चकौर मंडप तैयार किया जाता हैं। लाल, पीले, नीले रंग के पताका मंडप के चारों ओर लपेटा जाता है । कभी-कभी फला हुआ केला का समूचा पेड़ ही मंच पर रख दिया जाता है। यह पेड़ मंच सामग्री के रूप में उपयोग में लाया जाता हैं, खासकर जब हनुमान अशोक वाटिका में फलों को तोडकर खाता हैं। मंडप के बीच पानी से भरा पीतल का बड़ा घड़ा रखा जाता हैं। उसके उपर आम्रपल्लव। मंच की बायीं ओर खलीफा के बैठने के लिए ऊँची पीढ़ी रखी जाती है। दाहिनी ओर दर्शकों के लिए शीतलपाटी रख दी जाती है। अब मंच प्रदर्शन के लिए तैयार। इसी मंडप के आगे खलीफा आसनी पर बैठ बालन का सस्वर पाठ करते हैं और नर्त्तक गाते हुए अभिनय करते हैं।               

कथानक

बालन मुख्यतया दोहा और छंद में लिखा संवादगीत होता है। धार्मिक  और पौराणिक कथाओं को लेकर बालन की रचनाएँ की जाती हैं। रामायणको बालन, कृष्ण चरित्रको बालन, सीता भारत, जैमिनी भारत, दशावतार आदि उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। । पूरा का पूरा बालन पद्य में लिखा गया है। खलीपफा इसे पद्य संवाद की तरह गाते हैं।

            बालन प्रदर्शन के दिन आस पास के गाँव-टोले के लोगों को भी जुवारी’(आयोजक) द्वारा निमंत्रण भेजा जाता है। प्रदर्शन स्थल में पहुँची दाई-माई सँगिनी दल में शामिल हो जाती हैं। पुरुष दर्शक कुछ देर के लिए  जनकपुर, अयोध्या तथा लंका निवासी। सभी के सभी  सहभागी ।  

अभिनय

अभिनय के प्रसंग  में बालुन नृत्य महत्वपूर्ण होता है। बालुन नृत्य विशेष प्रकार की चारियों और मुद्राओं में निवद्ध होता है।  वाचिक तथा आंगिक अभिनय में  नेपाली लोक जीवन की अनुकृति होती है। अभिनेता पद्य संवादों के बीच प्रसंगानुसार गद्य संवाद बोलते हैं। अभिनेताओं को संवाद लिखकर रटाया नहीं जाता है, बल्कि वे स्वयं तत्काल संवादों की आशु रचना करते हैं। नेपाली समाज में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भागीदारी है, फिर भी बालन में स्त्री पात्रों की भूमिका अल्प व्यस्क पुरुषों द्वारा की जाती है। इन दिनों महिलाओं की सहभागिता बढ़ी है।

अंगाहार और मुखसज्जा

बालन की वेशभूषा सामान्य रूप से नेपाली समुदाय द्वारा दैनिक उपयोग में लाये जाने वाले वस्त्र होते हैं । पुरुष पात्र सेतो कमीज, दौरा, सरूवाला, धोती, फेटा और नेपाली टोपी आदि पहनते हैं । स्त्री  पात्र साड़ी और बांहयुक्त कमीज या छींटदार चोली पहनते हैं । स्त्री पात्र खासकर सीता की भूमिका में राजसी आभूषण पहनता है । पुरुष  पात्रा मुख सज्जा पर विशेष ध्यान  नहीं देते हैं, लेकिन राम और लक्षमण की भूमिका वाले पात्र मुख पर पाउडर और सिंदूर का हल्का लेप लगाते हैं । मृग और हनुमान की भूमिका वाले पात्र सामान्य मुखौटा पहनते हैं । हनुमान की पूंछ और गदा विशेष रूप से बनाये जाते हैं।

प्रदर्शन शैली

चूँकि आयोजन हर्षोल्लास का और आनुष्ठानिक होता है ,अतः नौमती बाजा का दल भी आमंत्रित होता है। बालो(आयोजक) द्वारा दिन का उपवास रखा जाता है। शाम को पूजा दी जाती है। पूजा के साथ ही सँगिनीनृत्य- गीत  दल, जिसमें आस पड़ोस की दाई-माई शामिल होती हैं, भी आमंत्रित होती हैं। इस प्रकार नौमती बाजा(नौ वाद्यों का समूह, सँगिनी और फिर बालन का प्रदर्शन तीनों का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध। अब नौमती बाजा और सँगिनी, बालन प्रदर्शन का हिस्सा बन चुका है। सँगिनी नृत्य-गीत। सँगिनी का अर्थ होता है सखी, सहेली, साथी यानी व्यापक अर्थ है सखी, साथी के संग मिलकर गाया गया गीत। नारी जीवन की दमित भावनाएँ, सुख-दुःख, हँसी-आँसू आदि के स्वर सँगिनी गीतों में सुनाई पड़ते हैं। रामायण का आख्यान, महाभारत की कथा, तत्कालीन सामाजिक घटना-परिघटना, व्यक्तिगत जीवन का सुख-दुःख, रति-राग तथा सास-ससुर, देवर-जेठाज्यू, ननद-आमाज्यू, देउरानी-जेठानी आदि के उत्पीड़न की कथा सँगिनी गीतों में अभिव्यक्त हुई है। नेपाल  के जनजीवन में सँगिनी सिर्फ गायी नहीं जाती बल्कि खेलीभी जाती है। विभिन्न पर्व-तिहार-चाड़ आदि के अवसर पर सँगिनी नृत्य-गान प्रस्तुत किया जाता है। तीज पर्व, तुलसी का विवाह(कार्तिक एकादशी) तथा वर-पीपल के  विवाह के अवसरों पर सँगिनी गीत-नृत्य अनिवार्यतः प्रस्तुत किया जाता है। मंगल कामना के साथ बालन का प्रदर्शन समाप्त होता है।


संगिनी नृत्य 


Thursday, September 9, 2021

बांग्लादेश का पारंपरिक नाट्य ‘कुसान पाला ’ -डॉ. ओम प्रकाश भारती

बांग्लादेश का पारंपरिक नाट्य ‘कुसान पाला ’ -डॉ. ओम प्रकाश भारती



कुसान पाला बांग्लादेश (रंगपुर, मेमनसिंह तथा सिलेट जिले) नेपाल (झापा) तथा भारत के उत्तर बंगाल (कूच बिहार तथा जलपाईगुड़ी जिले) तथा असम (धुबरी तथा ग्वालपारा जिले) के राजवंशी समुदाय के बीच प्रचलित लोकनाट्य रूप है । इस नाट्यरूप को कुसान गान भी कहा जाता है।
कुसान गान 
कुसान गान का प्रचलन कब हुआ इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलता। लोकस्मृति के अनुसार इसका प्रचलन रामायण काल से ही है। कहा जाता है कि लव ने ताल, कुश ने बेना तथा अयोध्यावासी ने सुमधुर स्वरों में पहली बार पिता-पुत्र का परिचय गान के माध्यम से प्रस्तुत कर राम को मुग्ध कर दिया, इसके बाद से ही कुसान गान की परंपरा चल पड़ी। एक अन्य लोकश्रुति के अनुसार बाल्मीकी आश्रम प्रवास के दौरान लव के खो जाने से सीता बेचैन हो उठी कि भगवान राम को वह क्या जवाब देगी। बाल्मीकी ऋषि ने उसे सांत्वना देते हुए कहा- “कुश आन” अर्थात कुश ले आओ और फिर बाल्मीकी ने कुश और जल से एक बालक का सृजन किया, जो राम के दूसरे पुत्र कुश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। शाब्दिक रूप से कुश+आन, कुसान का अर्थ बोधक है, लेकिन कुसान के प्रदर्शन में ना तो इस प्रसंग को अभिनीत किया जाता है और ना ही यह शब्द प्रदर्शन की परंपरा को अभिव्यक्त करता है। यह मात्र भाषायी अर्थ हो सकता है। एक अन्य विश्लेषण यह है कि ‘कु=दुरात्मा तथा शान=भगाना, सफाई करना अर्थात बुराई को दूर करना।‘ यह व्याख्या भी अर्थक्षेपक है। कुसान प्रदर्शन के दौरान किसी दुरात्मा को दूर भगाने का अनुष्ठान नहीं किया जाता। केवल दिकबंदना (दिशा वंदना) के समय दुरात्मा से रक्षा की गुहार की जाती है। कुसान गान के प्रदर्शन स्वरूप को देखने से प्रतीत होता है कि यह पूर्णतः एक सामाजिक लोकनाट्य है, जिसमें राजवंशी समुदाय के सामाजी तथा संस्कृतिकरण के कई स्तर परिलक्षित होते हैं। यह परंपरा राम कथा के विस्तार की वह कड़ी है, जिसमें अलौकिक चरित्रों का लौकिककरण अथवा सामाजीकरण हुआ है। रामायण के पात्रों ने लौकिक चरित्रों के रूप में सामाजिक भूमिका निभाते हुए लोक मूल्य एवं आदर्शों का निर्माण किया। बाल्मीकी रामायण में लव कुश द्वारा बेना के साथ राम कथा का गायन प्राचीन साक्ष्य है। संभव है कि इस गायन परंपरा में कथातत्व तथा अभिनय के समावेश से कुसान गान जैसी नाट्य परंपरा का विकास हुआ हो। राजवंशियों के बीच एक अन्य प्राचीन नाट्य-नृत्य रूप ‘मदनकाम उत्सव’ का प्रचलन है। मदनकाम उत्सव का उल्लेख प्राचीन काल के कई साहित्यिक एवं नाट्यलक्षण ग्रन्थों में हुआ है। इस तरह राजवंशी समुदाय कई प्राचीन कलारूपों के संवाहक हैं। दर्ङ्ग वंशावली के अनुसार कोच राजा विश्वसिंह(1515-1540) के राज्याभिषेक के समय राम बेना बजाया गया था। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कुसान गान का प्रचलन कोच राजवंश से पहले ही था। कुसान गान की कथावस्तु मुख्य रूप से राम कथा पर आधारित है। युद्ध कांड, सीता हरण तथा लव कुश प्रकरण विशेष रूप से अभिनीत होता है। कथाश्रोत मुख्य रूप से बाल्मीकी रामायण तथा बांग्ला कृत्तिवास रामायण(श्रीराम पांचाली) है। (संदर्भ: एशिया के पारंपरिक नाट्य – डॉ. ओम प्रस्तुति शिल्प एवं शैली कुसान गान का प्रदर्शन गाँव के खुले प्रांगण में होता है। मंच वृत्ताकार तथा समतल भूमि पर होता है। वाद्य मंडली मंच के बीच बैठता है। वाद्य मंडली के चारों ओर अभिनय स्थल होता है। दर्शक चारों ओर से घेर कर बैठते हैं। नाट्य प्रदर्शन देर रात्रि से आरंभ होकर सुबह तक 6-7 घंटे तक चलता है। नाट्य दल का संचालक, गुरु तथा मुखिया को गीदाल कहा जाता है। नाट्य आरंभ में गीदल के नेतृत्व में वाद्यमंडली मंच पर गोलाकार बैठते हैं। गीदल मुख्य वाद्यकार तथा गायक होता है वह कुसान का मुख्य वाद्य बेना बाजा कर वाद्य मंडली का नेतृत्व करता है। गीदल प्रायः मंडली के मध्य में बैठता है। सहयोगी वाद्यकारों को ‘बैन’ कहा जाता है। ‘बैन’ में बंशिया (बंशी वादक) खुली (खोल वादक), जुडीदार (मंजीरा/मंदिरा वादक) तथा सरिन्ड़ा वादक (कहीं-कहीं बेहला मास्टर) आदि शामिल होते हैं। ‘खुली’ को छोडकर प्रायः सभी कलाकार कोरस गायन में सहायता करते हैं। गीदल बेना को माथे से लगते हुए दर्शकों को प्रणाम कर वंदना आरंभ करते हैं। सबसे पहले शोरशति (सरस्वती) वंदना फिर मनशा देवी (मंसा देवी), दिकबंदना (चारों दिशाओं की वंदना) और अंत में गुरु वन्दना प्रस्तुत की जाती है। वंदना के समय प्रायः सभी पात्र बैठे होते हैं तथा कोई नृत्य प्रस्तुत नहीं होता है। वंदना के बाद नचारी प्रस्तुत होता है नचारी के माध्यम से प्रस्तुत होने वाले पाला (नाटक) की भूमिका बताई जाती है। गीदल द्वारा मुख्य स्वर अलापा जाता है। गीतों की धुन पे थिरकते हुए दोहारी के नेतृत्व में छोकरा (स्त्री वेशधारी पुरुष नर्तक) का प्रवेश होता है। ‘छोकरा’ मंच पर बैठे वाद्य मंडली के चारों ओर गोलाकार चक्कर काटते हुए अपनी एक निश्चित स्थित बनाते हुए खड़ा हो जता है और गीतों के भाव पर अभिनय करते हुए गीदाल द्वारा गये गए स्वरों को दोहराते हुए गायन में भी सहयोग करता है। ‘छुकरों’ द्वारा प्रस्तुत नृत्य बड़ा लुभावना होता है। नचारी के समय प्रायः ‘भवैया’ गीत-धुनें बजाई जाती हैं। यह प्रसंग लगभग पाँच से छः मिनट तक चलता है । नचारी के बाद पलार कथा यानी कथन और संवाद। गीदाल ऊंचे लय में नाटक की भूमिका बताते हुए विषय को स्थापित करता है। ‘दोहार गीदाल द्वारा बोले गए संवाद की पुनर्व्याख्या करता है। गीदाल और दोहारी के बीच की बतकही, नाटकीय भाव और सम्प्रेषण को विस्तार देता है। दोहारी, गीदाल से तर्क-कुतर्क करता है। गीदाल की भाषा प्रायः संश्लिष्ट बांग्ला होती है और दोहारी स्थानीय बोलचाल की भाषा यथा राजवंशी/रंगपुरिया में बोलते हुए प्रदर्शन को सामाजिक बनाता है। कभी-कभी ‘पैल’ (वाद्य मंडली) के सदस्य इस प्रसंग के अभिनय में भाग लेते हैं। प्रसंग के मध्य गीत की धुनें चलती रहती है। इस दौरान कोई नृत्य प्रस्तुत नहीं होता। यह प्रसंग प्रायः दस-बारह मिनट का होता है । पलार कथा के बाद पुनः गीत एवं नृत्यों के रोमांचक टुकड़े। नृत्य और गायन के क्रम में ‘पयार’ तथा भवैया लोकप्रिय धुने होती हैं। गीदाल और ‘पैल’ गीत प्रस्तुत करते हैं। दोहारी और छोकरा गीतों की लय और ताल पर थिरकते हुए नृत्य प्रस्तुत करता है। ‘दोहारी’ का आंगिक विक्षेप हास्य रस की सृष्टी करता है। नृत्य का नियंत्रण और संचालन खुली के पास (खोल वादक) रहता है। छोकरा घुटनों पर संतुलन बनाते हुए हाथ और पाँव के संचालन से भावाभिव्यक्ति करता है। इसे स्थाई/सम या प्रस्थान बिन्दु कहा जा सकता है। और फिर चलन यानी खोल के ताल पर नृत्य करते हुए द्रुत गति में चक्कर काटते हुए पुनः तिहाई यानी प्रस्थान बिन्दु पर पहुंचता है। प्रदर्शन के दौरान यह नृत्य कई बार प्रस्तुत होता है। वस्तुतः यह नृत्य नाट्य प्रदर्शन को गति और ऊर्जा प्रदान करता है। पयार प्रायः चार पंक्तियों का छंदात्मक गीत है, जो असम के निचले भाग, उत्तर बंगाल तथा बंगलादेश के दोरला नदी घाटी में गाया जाता है। बंगलादेश के डोरला नदी घाटी में ‘पयार’ नाम से एक नाटकीयप्राय लोक विधा भी प्रचलित है। इस गीत के मुख्य भाव शृंगार और करुण हैं । ‘खोसा’ कुसान गान के प्रदर्शन के बीच प्रस्तुत होने वाला लघु प्रहसनात्मक प्रसंग है । इस प्रदर्शन में गीदाल, दोहारी तथा दो-तीन पैल भाग लेते हैं । इसका मुख्य विषय समकालीन सामाजिक या राजनैतिक प्रसंगों से जुड़ा होता है । एक रात में सात-आठ घंटे तक चलने वाले कुसान प्रदर्शन का अंत गीदाल के दोहा गायन से होता है। दोहा गायन के माध्यम से गीदल लोकमंगल की कमाना व्यक्त करते हुए दर्शकों को अगले प्रदर्शन के लिए आमंत्रित करता है। कुसान गान का वाद्य और संगीत नृत्य और गीत की परंपरा में कुसान को गीति नाट्य की श्रेणी में रखा जाएगा। कुसान की संगीत मंडली प्रायः वाद्यों के सभी प्रकार यथा अवनद्ध, सुषिर, तन्तु तथा घन वाद्य से सुसज्जित होता है। बेना मुख्य वाद्य होता है। बेना तन्तु वाद्य है। बेना को कई लोग भ्रमवश वीणा समझ लेते हैं। बेना या बना वीणा का अपभ्रंश रूप है, लेकिन आकार तथा संचालन प्रविधि में यह वीणा से भिन्न है। किसी हद तक पिनाकी वीणा से साम्य रखता है। वीणा शास्त्रीय वाद्य है जबकि बेना पूर्वोत्तर भारत तथा उत्तर बंगाल के लोक संगीत और नाट्यरूपों का प्रमुख वाद्य है। विशेषकर कुसान प्रदर्शन का यह अनिवार्य वाद्य है। बेना मणिपुर के ‘पेना’, महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान के रावणहत्था, बंगाल, बिहार के मुंडा जनजाति के केंन्द्रा तथा नागालैंड के यूबो आदि तन्तु वाद्यों से साम्य रखता है। समान्यतयः 10-11 इंच के लंबे तथा 1 से 1.5 डाई मीटर के खोखले बांस की नाली को अर्धवृत्ताकार नारियल के खप्पे के उपर जोड़ा जाता है । यह जोड़ बांस की पतले कमाची पर टिका होता है। नारियल के खप्पे के सामने का बड़ा भाग बकरे के चमड़े से आवद्ध होता है। पहले जमाने में ‘ईगुना’ (नेवला) की खाल प्रयुक्त होती थी। चमड़े कभी-कभी धुमन से चिपका दिया जाता है। कभी-कभी बांस के कमाची के ऊपर चमड़ा मढ़ कर धागे या रस्सी से नारियल के खप्पे के ऊपर मढ़ दिया जाता है। नारियल के खप्पे के छोटे और निचले सिरे में प्रायः दो छिद्र किए जाते हैं। इसका उद्देश्य तार से निकलने वाली तरंग ध्वनि को सुमधुर बनाना होता है। कभी-कभी नारियल के खप्पे के बदले लकड़ी के बने साँचे भी प्रयुक्त होता है। ऐसी स्थिति में यह शंकु आकार का होता है तथा पिछला हिस्सा एक या सवा इंच गोल आकार में कटा होता है। बांस के नली के ऊपरी हिस्से पर लकड़ी से बना सुसज्जित हस्ती मुख (हाथी का मुख) जोड़ दिया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे ‘मोगरा’ कहा जाता है। मोगरे के निचले हिस्से में छिद्र कर ‘पैग’ (कान) लगाई जाती है। पैग के सहारे तांत को निचले सिरे के अर्धवृत्ताकार नारियल की खप्पी में लगी खूंटी से बांध दिया जाता है। ताँतों की कोई निर्धारित संख्या नहीं होती, बल्कि 15-20 की संख्या का गुच्छ होता है। पहले जमाने में घोड़े के पूंछ के बाल तांत के रूप में प्रयुक्त होती थी। कुछ अंचलों में सागौन पेड़ की छाल के रेसे ही तांत के रूप में प्रयुक्त होता है। इन दिनों प्लास्टिक का प्रचालन बढ़ा है। पैग को ऐंठ या घुमाकर तन्तु को ताना जाता है। तन्तु पर घर्षण के लिए छाते के मूठ के आकार के ढांचे के दोनों सिरे तांत से तानकर बांध दिया जाता है। इस ढांचे को छड़ कहा जाता है। छड़ को विविध रंगों के धागों से मेढ़ा जाता है। छड़ के एक सिरे पर छोटे-छोटे घुंघुरू लगे होते हैं। छड़ से बेना के तन्तु पर आघात और घर्षण के द्वारा ध्वनि उत्पन्न की जाती है। बेना के अलावा सरिन्डा (तन्तु वाद्य), अर्बांशी (बांसुरी), खापी (बड़ा मंजीरा), हारमोनियम तथा ताल वाद्यों में अखरै (ढोलक) और खोल आदि शामिल है।