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Thursday, October 7, 2021

उड़ीसा का पारंपरिक नाट्य प्रहलाद नाटक- डॉ. ओम प्रकाश भारती

प्रहलाद नाटक
प्रहलाद नाटक उड़ीसा का पारंपरिक नाट्य है। नाटक की कथावस्तु दशावतार के नरसिंह अवतार के प्रसंग से लिया गया, जिसमें विष्णु के आठवें अवतार नरसिंह द्वारा हिरणकश्यपु का वध किया जाता है। नाटक के मुख्य पात्र प्रहलाद के नाम पर ही इस नाट्य रूप का नाम प्रहलाद नाटक प्रचलित हुआ । ताल, राग, संगीत शैली, नृत्य, संलाप पूर्ण संवाद, संरचनावद्ध अभिनय पद्धति, गति एवं चारियों का प्रायोग इस नाट्य रूप की विशिष्टता है। नाट्य प्रयोग में उड़ीसा के लोक एवं शास्त्रीय कलाओं का अद्भभुद समन्वय हुआ। प्रहलाद नाटक के प्रथम प्रयोक्ता तथा रचनाकार के रूप में राजा रामकृष्ण छोट राय का नाम प्रचलित है। राजा राम कृष्ण उड़ीसा के जलनतर अंचल के सामंत थे। जलनतर वर्तमान में आंध्रप्रदेश राज्य के श्री काकुलम जिले का हिस्सा है। छोट राय कला रसिक एवं कलाओं के संरक्षक थे। उन्होंने कई कवियों तथा कलाकारों को प्रोत्साहन और संरक्षण दिया। गोपीनाथ परीछा इन में से एक थे। गोपीनाथ प्रतिभावान कवि एवं नाटकार थे। कहा जाता है कि उन्होंने ही राजा की इच्छा के अनुरूप प्रथम प्रहलाद नाटक की रचना, और यह नाटक न केवल राजा को समर्पित किया बल्कि नाटक के लेखक के रूप में राजा का नाम ही लिख दिया। इसलिये इस अंचल में इसे राजा नाटक के रूप में भी जाना जाता है। कथावस्तु एवं प्रस्तुति शैली को लेकर यह नाटक बहुत ही लोकप्रिय हुआ। इसकी लोकप्रियता ने आस पास के सामंत एवं राजाओं का ध्यान आकर्षित किया। वैष्णव भक्ति की प्रधानता पहले से ही उड़िया समाज में थी। सुराङी के राजा राजकिशोर चंद्र हरिचन्दन जगदेव राय, परला खेमुंडी के राजा पदमनवा देव तथा तराला के राजा रामचंद्र शूरदेव ने इस नाट्य शैली का अनुकरण करते हुए तीन नाटकों की रचना की। यह भी कहा जाता है कि इन नाटकों की रचना राजाओं के दरवारी कवियों ने किया । नाटकों की मूल पाण्डुलिपि मद्रास ओरियंटल लाइब्रेरी में संरक्षित है। इन पाण्डुलिपियों को 1938 संरक्षितमें किया गया था। बाद में इन नाटकों का प्रकाशन उड़ीसा के संस्कृति निदेशलय द्वारा किया गया। प्रहलाद नाटक की जन्मभूमि उड़ीसा के गंजाम जिले तथा आस-पास के क्षेत्रों में ब्रिटिश काल में कई छोटे बड़े जमीदारों सामंतों का नियंत्रण था। ये सामंत स्थानीय स्तर पर राजा कहे जाते थे। इन राजओं ने कला संस्कृति और साहित्य को विशेष संरक्षण दिया। इनके दरबारों में कई कवियों और कलाकारों को प्रश्रय मिला। इनका शासन काल 1857 से 1920 के बीच रहा। कहा जाता है कि कलाकारों को विशेष प्रोत्साहन तथा राज्यकीय संरक्षण देने के कारण ही ये सभी राज्य अर्थाभाव में चले गए, जिसके कारण ये ब्रिटिश सरकार को वार्षिक कर देने में असमर्थ हुए। और इसलिये ब्रिटिश सरकार ने इनकी जमींदारी को विजय नगर के राजा को बेच दिया। राजकीय संरक्षण बंद होने के बाद यह नाट्य बिखर गया और दरबार से गाँव-समाज में पहुँच गया। राजा नाटक प्रजा नाटक हो गया। चुकी इस नाट्य रूप का संबंध धार्मिक आस्था और भक्ति से था, इसलिये गाँव का मंदिर इसका मुख्य प्रदर्शन स्थल और संरक्षक गाँव के आम जनता हुई। प्रहलाद नाटक की कथावस्तु मिथक साहित्य और पुराणों के दशावतर प्रसंगों पर आधारित है। हिन्दू परंपरा में ब्रहमा, विष्णु, महेश, को त्रिदेव कहा गया है। परंपरा अनुसार ब्रहमा को सृजन, विष्णु को संरक्षण तथा महेश को संहार का देव माना जाता है। मिथक के अनुसार मानव के रक्षार्थ विष्णु, विभिन्न युगों में विभिन्न रूपों में प्रकट हुए। यह प्रसंग दशावतार के नाम से प्रसिद्ध है। विष्णु के दस अवतारों में एक नरसिंह अवतार है। नरसिंह का रूप अर्द्ध मानव और सिंह का है। मत्स्य पुराण, वाराह पुराण, कल्कि पुराण तथा नरसिंह पुराण में अवतारों की विस्तृत कथा मिलती है। उड़िया भाषा का नरसिंह पुराण 14 वीं शताब्दी में पीताम्बर दास द्वारा लिखा गया। इन पुराणों में नरसिंह अवतार को नृत्य तथा गीतों के साथ प्रस्तुत किया गया है। नाट्य प्रयोक्ता ने मूल कथावस्तु को संगीत नाटक के रूप में प्रस्तुत किया है। नाटक तथा रचना शिल्प प्रहलाद नाटक में गद्य संवाद के अलावा रागवद्ध गीत तथा संरचनाबद्ध नृत्य एवं चारी है। नाटक में कुल 42 श्लोक हैं, जो विभिन्न पुराणों से लिए गए हैं। नाटक में कुल 126 गीत हैं, जिसमें 11 संस्कृत मिश्रित उड़ीया तथा शेष गीत ठेठ उड़ीया भाषा में है। प्रहलाद नाटक में प्राय: 20 पुरुष पात्र तथा 5 स्त्री पात्र होते हैं। इसके अलावा एक गहका (मुख्य गायक) एवं उद्बोधक और 5-6 कोरस और साज़िंदे होते हैं। पुरुष पात्रों में विघ्नेश्वर गणेश, ब्रह्मा, इन्द्र, नारद, हिरण्यकशिपु, प्रहलाद, मंत्री, शुक्राचार्य, चंदमकर, ऋषि, सूत्रधार, चारा, द्वारि, असुर, बहका, गजकरना, महावत(महन्ता), सपवा, कापता तथा नरसिंह आदि हैं । सरस्वती, गीति(लीलावती) भूदेवी तथा दासी स्त्री पात्र हैं । नाट्य दल तथा प्रबंधन नाट्य मंडली में ‘गहका’ ही गुरु, प्रशिक्षक तथा दल का संचालक होता है। दलनायक के रूप में उसका बड़ा समान्न होता है। नाटक का साजो- समान, आभूषण, मंच सामाग्री, मुखौटे आदि का रख-रखाव ‘गहका’ द्वारा ही किया जाता है। प्रहलाद नाटक का प्रदर्शन लगभग 12 घंटे में पूरा होता है। नाट्य मंचन प्राय: आधीरात से आरंभ होकर दूसरे दिन दोपहर में समाप्त होता है। मंच एवं प्रदर्शन स्थल प्रहलाद नाटक का प्रदर्शन मुक्ताकाश में गाँव के चौराहे या मंदिर के प्रांगण में होता। मंच के एक ओर पाँच या छ: सीढ़ियों से बना लगभग 6 फीट लकड़ी का तख्त रखा जाता है, सबसे ऊपरी सीढ़ी देड़ से दो फीट ऊंचाई से तीनों ओर से घेर दिया जाता है । सीढ़ी के बीच में हिरण्यकशिपु का सिंहासन रखा जाता है। नाट्यकीय अभिव्यक्ति के समय यही तख्त राजा का सिंहासन है और हिरण्यकशिपु का वध स्थल भी । इस मंच की ऊंचाई 5 से 6 फीट तथा चौड़ाई 10-12 फीट होती है। लकड़ी से बना यह मंच अलग- अलग खोला जा सकता है। और फिर पुनः इनको जोड़कर मंच बनाया जा सकता है। सीढ़ीनुमा तख्त के सामने 20 x 30 फीट की जगह को रस्सी से घेर कर प्रदर्शन क्षेत्र तैयार किया जाता है। प्रदर्शन क्षेत्र से लगभग 20 फीट की दूरी पर लकड़ी, कपड़े या टीन से 3x3 फीट लंबाई -चौड़ाई तथा 8 फीट ऊंचा खोखला खंबा बना दिया जाता है। इसी खंबे से नरसिंह का अवतरण होता है । गहका एक ऊंचे प्लेटफार्म/लकड़ी के तख्त पर प्राय: मंच की वायीं ओर हारमोनियम के साथ बैठता है या खड़ा रहता है। बाकी साज़िंदे ‘गहका’ के दोनों ओर खड़े रहते हैं । अभिनेता के लिये 3-4 फीट जगह छोड़ दी जाती है। दर्शक मंच के तीनों ओर से घेरकर बैठते हैं । तख्त सिंहासन के दाहिने ओर नरसिंह का मुखा (मास्क) कुर्सी या छोटी ऊंचाई पर रखा रहता है। पात्रों का प्रवेश मुख्य तख्त के दायें, बायें तथा सामने से दर्शकों के बीच से होता है। तख्त के ऊपर सिंहासन पर हिरण्यकशिपु के साथ बायीं ओर उनकी पत्नी लीलावती बैठती है। सीढ़ीनुमा मंच के नीचे दायीं ओर मंत्री खड़ा रहता है। पूर्वरंग तथा अनुष्ठानिक विधान भारत के अन्य पारंपरिक नाट्यरूपों की तरह प्रहलाद नाटक में भी मंच पूजा का विधान है।प्रदर्शन आरंभ होने से पहले मंच तथा मुखौटा पूजने का आनुष्ठानिक विधान किया जाताहै। रूप- सज्जा से पहले नरसिंह की भूमिका वाला पात्र नरसिंह के (मास्क) मुखौटा की पूजा करता है। मुखौटे के माथे पर चन्दन का लेप लगाया जाता है, फूल तथा दूब चढ़या जाता है। प्रसाद के रूप में मिठाई तथा नारियल रखे जाते है। गंगा जल छिड़क कर प्रदर्शन स्थल को पवित्र किया जाता है, और सभी कलाकार ओर संगतकार (मास्क) मुखौटे को घेर कर भगवान विष्णु का आवाहन करते हुए प्रदर्शन की सफलता की कामना करते है। नरसिंह की भूमिका करने वाले अभिनेता द्वारा प्रदर्शन स्थल पर उपस्थित होने की कामना की जाती है। इस अनुष्ठान का मूल उद्देश्य मुखौटो में दिव्य शक्ति की पुनः स्थापना तथा प्रदर्शन स्थल को विघ्न बाधाओं से दूर रखने का संकल्प लिया जाता है। मुखौटे प्रह्लाद नाटक के अभिनय में मुखौटे का आनुष्ठानिक एवं नाटकीय महत्व है । नाट्य अभिव्यक्ति को प्रभावशाली एवं आकर्षक बनाने में मुखौटो की विशिष्ट भूमिका होती है। नाटक में नरसिंह तथा गणपति के मुखौटे होते हैं। ये मुखौटे पेपर मैसी के बने होते हैं , इन मुखौटो का अनुष्ठानिक तथा धार्मिक महत्व होता है। गंजाम जिले के आसपास के गाँव के कई मंदिरों में इन मुखौटो की पूजा होती है। मुखौटे गहरे हरे और लाल रंग से रंगे होते हैं । मंदिरो में रखे कुछ मुखौटे सौ वर्ष से भी अधिक पुराने हैं । वेषभूषा, आभूषण एवं रूपसज्जा प्रहलाद नाटक की वेषभूषा अलंकरण तथा रूप-सज्जा बहुत ही भड़कदार और आकर्षक होती है। वेषभूषा तथा रूपसज्जा में यह दक्षिण भारतीय नाट्य रूप यक्षगान,कूडियट्टम का प्रभाव परिलक्षित होता है। सभी पत्र अपनी रूप-सज्जा स्वयं करते हैं ,अवशयकता पड़ने पर एक दूसरे की मदद भी करते हैं । हिरण्यकशिपु, प्रहलाद और गणपती को छोड़कर अन्य पत्रों की वेशभूषा सामान्य तथा उड़िया लोक जीवन से प्रभावित है। हिरण्यकशिपु का चेहरा हल्का लाल रंग से रंगा जाता है, वह बहुरंगी घाघरी, जड़ीदार हाफ जैकेट एवं चमकीले कृत्रिम आभूषण पहनता है। वह कलाई और बाहों में विशिष्ट राजकीय आभूषण पहनता है। हिरणकशिपु का मुकुट राजसी तथा चमत्कारिक होता है। यह विभिन्न रंगों की जड़ियों से मढ़कर बनाया जाता है। चमकीले शीशे के छोटे-छोटे टुकड़े मुकुट के चारों ओर जड़े होते हैं। कानों में कुंडल तथा भूरे रंग की लंबी दाढ़ी हिरण्यकशिपु के चरित्र को आकर्षक बनाती है।