भारतीय लोकनाट्य: परम्परा एवं सौन्दर्य ओम प्रकाश भारती
लोकनाट्य को पारम्परिक,
परम्पराशील, लोकधर्मी नाट्य, जननाट्य, क्षेत्रीय या प्रादेशिक, ग्रामीण नाट्य अथवा
आंचलिक नाट्य आदि कई नामों से अभिहित किया जाता रहा है। कभी-कभी तो लोकगाथा और
लोकनृत्य को भी लोकनाट्य से संज्ञापित कर भ्रम पैदा की जाती है। हमें यह ज्ञात है
कि लोक में या लिखित साहित्य की परम्परा में किसी भी विधा की उपस्थिति की आवश्यकता
और अर्थ है। लोकगाथा, लोकनृत्य और लोकनाट्य इसीलिए है कि समाज को इन तीनों की
अलग-अलग आवश्यकता है। भिन्न-भिन्न कारणों से समाज में इनकी उपस्थिति अनिवार्य है।
इन अनिवार्यताओं को समझते हुए, इनकी स्वतंत्र पहचान और नामकरण भी अति आवश्यक है।
यहाँ हम केवल लोकनाट्य पर विमर्श करेंगे। लोकनाट्य सामाजिक पद है, जिसके सामान्यतः
दो अर्थ निकाले जा सकते हैं- लोक का नाट्य और लोक के लिए नाट्य। इस संदर्भ में दो
शब्द विवेच्य हैं- लोक और नाट्य।
प्रस्तुत आलेख को निम्नलिखित क्रम में प्रस्तुत किया गया है-
1. लोक – अर्थ ,
परिभाषा , स्वरूप
2. लोकनाट्य- अर्थ, परिभाषा , विशेषताएँ , वर्गीकरण
3. लोक
नाट्यों का उद्भव और विकास
4. भारत के पारंपरिक तथा लोकनाट्य
1. लोक – अर्थ ,
परिभाषा , स्वरूप
लोक विधाओं के नामकरण में सबसे भ्रामक ‘लोक’ शब्द की व्याख्या है,
जो समय-समय पर परिवर्तित होता रहा है। साथ ही अंग्रेजी के ‘फोक’ (जो लोक का पर्याय
माना जाता रहा है) का दबाव भी लोक के अर्थमान को अस्थिर होने में भरपूर सहयोग दिया।
दोष सिर्फ़ अंग्रेजी का नहीं, भारतीय भाषाओं में भी ‘लोक’ को लेकर अभी तक आम सहमति
नहीं बन पाई है, जबकि ‘लोक’ की व्याप्ति और अवधारणा उस समय से भारतीय समाज और
परम्परा में है, जब इन क्षेत्रीय भाषाओं का उद्भव नहीं हुआ था। इधर साहित्य आलोचना
में लोक, आदिम और जनजातीय के बदले ‘मौखिक’ शब्द का प्रचलन बढ़ा है, वह भी अंग्रेज़ी
‘folk ’ के दबाव में। लोक को लेकर भ्रांति कुछ हद तक अंग्रेज़ी के शब्द ‘फोक’ के
कारण हुई। ‘फोक’(folk) की व्युत्पति जर्मन शब्द ‘वोल्क’ से ‘Volk’ मानी जाती है। ये
शब्द लोक >वोल्क > फोक समानार्थी हैं। फोक या फोकलोर(folklore) शब्द के प्रचलन का
श्रेय विलियम जान थामस को जाता है। ब्रिटिश संग्रहालय लंदन के संग्रहालय संरक्षक सर
हेनरी एलिस ने 1813 में ‘पापुलर एन्टिक्वेटिज’ (Popular Antiquities) के नाम से कुछ
सामग्रियों का संकलन किया था। 1846 में विलियम जान थामस ने एक आलेख में ‘पापुलर
एन्टिक्वेटिज’ के बदले ‘फोकलोर’ शब्द के प्रयोग का सुझाव दिया था। कहा जाता है कि
थामस ने जर्मन भाषा के शब्द ‘वोकसुन्डे’(Volksunde) से प्रेरित होकर अंग्रेजी
अनुवाद ‘फोकलोर’ प्रस्तुत किया था। सन् 1878 में नृविज्ञानी ई.बी. टेलर ने ‘फोकलोर
सोसाइटी’ की स्थापना की। इसके बाद पूरे यूरोप में ‘फोकलोर’ शब्द का प्रचलन बढ़ा।
भारत में ‘फोलकोर’ के क्षेत्र में शोधकार्य उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्ध में यूरोपीय
विद्वानों ने आरंभ किया। इनमें से अधिकांश विद्वान यूरोपीय श्रेण्यवाद के सम्पोषक
साम्राज्यवादी राज्य और शासक थे, जिनके अन्तःमन में अभी भी असभ्य आदमी पल रहे थे।
19वीं सदी के अंतिम दशक में भारत में पुनर्जागरण का आरंभ हुआ । समाज और धर्मिक
सुधार की कई संस्थाएँ नगरों में खड़ी हो चुकी थीं। भारत में बौद्धिक चेतना का
आन्दोलन तो चौदहवीं शताब्दी में ही आरंभ हो चुका था, जिसे भक्ति आन्दोलन कहा गया
है। भक्ति आन्दोलन में जिन सामाजिक, अमानवीय व्यवस्थाओं के खिलाफ निरक्षर संतों ने
आवाज़ें उठाई, पाँच सौ वर्ष बाद पुनर्जागरण काल के शिक्षित वर्गों ने भी उसे दुहराया
और आज भी हम जाति, धार्म को संघर्ष लेकर संघर्षरत हैं। इसी ऊहापोह में लोक /लोक
कलाओं पर अध्ययन आरंभ हुआ और लोक को परिभाषित किया गया- इस परिभाषा में लोक का अर्थ
:
- निरक्षर और अशिष्ट जन समूह।
- रहता कहाँ है?- तो आधुनिक सभ्यता से दूर गाँव
में।
- समाज या संस्कृति का सबसे पिछड़ा वर्ग।
- जिसकी वृत्तियाँ मौलिक रूप से आदिम
और अपरिष्कृत है, आदि समझा गया।
ऐसा करने में एक तो यूरोपीय साम्राज्यवादियों का
दबाव था तो दूसरा स्वयं भारतीय सामाजिक ढांचा, जहाँ अधिकांश लोक कलाओं के जनक
शोषित, दलित , आदिवासी तथा पिछड़े समाज के लोग थे। जबकि भारतीय परम्परा लोक के इन
अर्थों का समर्थन नहीं करती है।
संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘लोक’ शब्द की उत्पति
संस्कृत की ‘लोक दर्शने’ धातु में घ प्रत्यय जुड़ने से हुई है, जिसका अर्थ है देखना।
इस तरह लोक शब्द का मूल अर्थ देखने वाला है। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में लोक शब्द जीव
और स्थान दोनों के लिए प्रयुक्त हुआ है। पाणिनी कृत अष्टाध्यायी, पतंजलि कृत
महाभाष्य तथा भरतमुनि कृत नाट्यशस्त्र में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग शास्त्रोत्तर,
वेदोत्तर तथा समान्यजन के संदर्भ में किया गया है। पाणिनी काल में वेद परिपाटी एवं
लोक परम्परा का पृथक रूप मुखरित हो चुका था। श्रीमद्भगवत गीता में प्रयुक्त लोक
समूह शब्द का अर्थ भी साधारणजन के आचरण तथा आदर्श से है। प्राकृत, अपभ्रंश और भक्ति
साहित्य काल में भी लोक शब्द वेद के प्रतिकूल जनसाधारण की परम्परा की ओर संकेत करता
है। इस प्रकार भारतीय परम्परा में ‘लोकज्ञान’ या अनुभव उस परिपाटी को कहा गया है,
जो वेद या शास्त्र से भिन्न हो तथा जिसका आधार जनसाधारण हो। वेद या शास्त्र वर्ग
विशेष का ज्ञान था, जिसका आधार मानव समुदाय का विशेष हिस्सा या वर्ग था। ये दोनों
रहते भी अलग-अलग थे। एक गाँव में दूसरे नगर में। गाँव ‘लोक’ का था और नगर के निवासी
वेद या शास्त्र सम्मत ज्ञान के अधिकारी थे। भ्रांति तब हुई जब शास्त्र सम्मत ज्ञान
का क्षेत्र नगर की सीमा के बाहर गाँव तक आ पहुँचा। और गंवई लोक, नगर आकर बस गए और
अपने लोक को बृहत आयाम के साथ प्रस्तुत किया। यहाँ गाँव और नगर से तात्पर्य दो
विशाल जनसमूह है, जो एक ही भौगोलिक क्षेत्र में अलग-अलग आर्थिक वर्ग से है। इस
भ्रांति का दुष्प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि लोक के प्रति दृष्टिकोण ही बदल गया। गाँव
के लोगों को लोक कहकर संज्ञापित किया गया तथा शहरी को लोक के दायरे से बाहर रखा गया
और फिर लोक साहित्य और शिष्ट साहित्य, लोककला और शिष्टकला आदि। भारतीय चिंतन
परिपाटी में लोक और शास्त्र या वेद के बीच का अंतर तो यह कतई नहीं समझाता है कि लोक
से अभिप्रेत अशिष्ट, निरक्षर या आदिम और अपरिष्कृत जन समूह है। भारतीय चिंतन
परिपाटी में शास्त्र वह है जिसका व्याकरण तय हो तथा जिसमें लिखित और सुनियोजित
ज्ञान हो। लोक, अनुभवजनित मौखिकज्ञान है, जो वर्षों से परम्पराशील और परिवर्तनशील
है। हम सभी जानते हैं कि शास्त्र को लोक के दबाब में कई बार बदलने पड़े हैं। शास्त्र
भी तो लोकजनित और लोक अनुभवों से प्रेरित है। गाँव का कलाकार शहर आकर कॉलेज या
विश्वविद्यालय में उच्चशिक्षा ग्रहण करता है और उसके बाद नौटंकी में या किसी
लोकनाट्य में अभिनय करता है तो क्या वह लोककलाकर नहीं कहलायेगा? बिल्कुल कहलायेगा।
हमें यह नहीं देखना है, कलाकार गाँव में रहता है या शहर में, पढ़ा है या मूर्ख। हमें
यह देखना चाहिए कि उसके द्वारा प्रस्तुत कला की शिल्प-प्रविधि लोक जैसी है कि नहीं।
पारम्परिकता का निर्वहन या सूत्र उसमें है कि नहीं। निष्कर्ष यह है कि ‘लोक किसी भी
राष्ट्र का जन समुदाय है, वह नगर, गाँव कहीं भी रह सकता है यदि उनका ज्ञान या कला-
वर्षों से परम्परित और अनुभवजन्य है तथा मौखिक परम्परा में है तो वह लोकज्ञान या
लोककला कहें जाएँगे । लोक के उपरांत यहाँ नाट्य ,नृत्य ,नृत्त के भेद को समझ लेना
आवश्यक है।
नाट्य पुरुषवाचक संस्कृत का शब्द है। वर्तमान समय में थिएटर,
नाट्य का पर्याय माना जाता है। भारतीय नाट्य लक्षणग्रंथों में ‘नाट्य’ की व्याख्या
के संदर्भ में बार-बार नृत्त और नृत्य शब्द की चर्चा होती है। इन शब्दों को सही-सही
समझने पर नाट्य और नृत्य के बीच का भ्रम दूर हो सकता है।
नृत्त - लय और ताल पर
आधारित पद्धति विशेष की देह मुद्राएँ और गतियाँ नृत्त हैं। नृत्त में गीत या अभिनय
नहीं वरण लय और ताल पर आधारित स्थिर और गतिमान मुद्राएँ होती हैं।
नृत्य- ताल
आधारित मुद्राओं और गतियों के साथ गीत और अभिनय शामिल होने से नृत्य कहलाता है।
यानी नृत्त में जब गीत और अभिनय जुड़ जाते हैं तो वह नृत्य हो जाता है। अभिनय, नाट्य में भी होता है, लेकिन वहाँ वह ताल के साथ संयुक्त नहीं होता। नृत्य
और नाट्य दोनों अनुकरणप्रधान कलाएँ है। लेकिन नृत्य में केवल भावों का अनुकरण होता
है, जबकि नाट्य में अवस्था का। गीत की बजाय संवाद जो प्रायः गद्यरूप में होता है,
नाट्य के लिए अपरिहार्य है।
लोकनाट्यों के गद्य संवाद-गीत न होकर, संवाद गीत है, जो गद्य जैसा है। जाहिर है कि ऐसे संवाद नाट्यगत चरित्रों के होते हैं। नृत्य
दृश्य विधा है, जबकि नाट्य को दृश्य और श्रव्य दोनों कहा गया है।
इस प्रकार प्राचीन
भारतीय मान्यताओं और लक्षणकारों की व्याख्या के अनुसार नाट्य ऐसी प्रदर्शनकारी कला
है, जो
- अवस्था का अनुकरण करती है।
- दृश्य और श्रव्य दोनों है।
- चरित्र होता है
तथा उनका विकास भी।
- रसाश्रित होने के कारण वाक्य अभिनय आधारित होता है। आज नाटक
सिर्फ़ दृश्य रह गया है । श्रव्य परम्परा का औचित्य समाप्त होता जा रहा है।
लोकनाट्य की परिभाषा
किसी समाज अथवा समुदाय में प्रचलित/परंपरित नृत्य-गीत तथा
अभिनय मूलक वह प्रदर्शन जिसका शिल्प बंधन/शास्त्र मुक्त हो /किसी विशेष परिधि या
नियम से मुक्त हो, उसे लोकनाट्य कहा जाएगा।
नाट्य को किससे अलग समझा जाय ? नाट्य
जैसी और कौन सी प्रदर्शन मूलक विधा है जिससे भ्रम की स्थिति होती है- नृत्य ,
नृत्त, गाथा गायन तथा अन्य अनुष्ठान मूलक /परक प्रदर्शन । अब यहाँ देखें कि इनकी
विशेषताएँ क्या है-
गीत- स्वर+लय/ताल + भाव >रस – दर्शक वैकल्पिक
लोक गाथा -
स्वर+लय/ताल + संवाद गीत + अभिनय + भाव >रस- वर्णात्मक - दर्शक अनिवार्य
नृत्य –
लय/ताल + भाव – मुद्रा + अभिनय >रस - दर्शक अनिवार्य
नाट्य – संवाद + अभिनय> रस -
दर्शक अनिवार्य ।
नृत्य, गीत वैकल्पिक लेकिन लोकनाट्यों के लिए अनिवार्य।
भारत के
लोकनाट्यों की निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती है-
नाटक प्राय: मौखिक
परम्परा में तथा लेखक अज्ञात होता है, अपवाद के रूप में माच, जात्रा, नौटंकी तथा
तमाशा आदि लोकनाट्यों में लेखक/नाटकार का नाम ज्ञात होता है ।
- अधिकांश लोकनाट्यों
के कथानक पौराणिक, आख्यान मूलक तथा लोक कथा/गाथाओं पर आधारित होते हैं । जात्रा,
तमाशा , नाचा , नटुवा नाच , भवाई तथा शूमांगलीला जैसे लोकनाट्यों ने समयानुकूल
समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों को भी मंच के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है
।
- अभिनेता संवाद या गीत याद नहीं करेंगे, बल्कि घटनाओं पर तत्काल आशुरचना करते
हैं । नाटक लिखित होने की स्थिति में अभिनेता संवाद और विशेषकर गीतों का अभ्यास
करते हैं ।
- कुछ विशिष्ट लोक नाट्यों (माच, तेरूकुथु, यक्षगान तथा तमाशा आदि) को
छोड़कर मंच व्यवस्था/विधान अनौपचारिक होती है । अधिकांश लोकनाट्यों की मंच व्यवस्था
मुक्ताकाशीय होती है।
- मंच आलोक पारंपरिक संसाधनों( गैसबत्ति, पंचलाईट, मशाल ) पर
आधारित होता था । इन दिनों मंच प्रकाश के आधुनिक उपकरणों का प्रचलन बढ़ा है ।
- रूप
सज्जा चरित्रगत तथा भड़कीली होती है। पहले रूप सज्जा के पारंपरिक संसाधनों (गेरू,
लाल मिट्टी ,स्याही , शंख , घोंघा आदि ) प्रयुक्त होता था, जिससे प्रकाश के
पारंपरिक संसाधनों में भी चेहरा निखर उठता था।
- वस्त्र सज्जा चरित्रगत तथा स्थानीय
सामाजिक परिपाटी के अनुरूप होता है। मसलन राजस्थान के ख्याल के राजा पात्र और
तेलंगाना के ओग्गूकथा के राजा पात्र की वेशभूषा वहाँ की संस्कृति के अनुरूप होगी ।
- अभिनय प्राय: शैलीबद्ध रहते हुए भी किसी सीमा या बंधनों से मुक्त होता है ।
अभिनेता कहीं भी किसी परिस्थिति में अभिनय या प्रदर्शन कर सकेगा। अभिनय प्राय: अंचल
विशेष के लोकाचार, मानवीय अभिव्यक्ति तथा हाव भाव से प्रेरित होता है ।
-
लोकनाट्यों की भाषा सहज, जीवंत तथा समकालीन होती है। अधिकांश लोकनाट्यों - अंचल
विशेष के लोकधुनों और नृत्यों का समुचित प्रयोग ।
- पारम्परिकता का निर्वाह ।
पारंपरिक नाट्य
पारम्परिकता का निर्वाह लोक का प्रथम और आवश्यक गुण है। परम्परा से
तात्पर्य है वह जो वर्षों से प्रचलित हो तथा परिवर्तनशील होते हुए भी चिरंजीवी हो।
‘मानव हिन्दी कोश’ में परम्परा के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें कही गई हैं :
- वह
व्यवहार जिसमें पुत्रा, पिता की, वंशज, पूर्वजां की और नई पीढ़ी वाले पुराने पीढ़ी
वालों की देखा-देखी उनके रीति-रिवाज़ों का अनुकरण करते हैं।
- वह रीति-रिवाज़ जो
बड़ों, पूर्वजों या पुरानी पीढ़ी उनके रीति रिवाज़ों का अनुकरण करते हैं।
- नियम या
विधान से भिन्न अथवा अनुलिखित वह कार्य जो बहुत दिनों से एक ही रूप में होता चला आ
रहा है और इसलिए जो सर्वमान्य हो। (मानव हिन्दी कोश, खण्ड, 3, पृ. 396) भारतीय लोक
की विशेषता है चिरनवीनता और यह परम्पराधर्मी होने के करण ही संभव है। परम्परा की
चेतन सत्ता के आधार पर नित नए प्रयोग, नए मूल्य तथा धारणाएँ कायम की जा सकती है। इस
प्रकार परम्परा की छाप प्रत्येक युग में अभिव्यक्ति के पीछे रहती है। प्रत्येक युग
में परम्परा को अपनाकर नए प्रयोग किए जाते रहे हैं। कहने का अर्थ है कि हम अतीत से
बंधे तो अवश्य हैं, परन्तु परम्परा का यह अर्थ नहीं है कि हम उसे ढोते चलें।
परम्परा तभी जीवन्त होगी जब हम वर्तमान के साथ उसका समन्वय करें, उसमें नए प्रयोग
करें। और यही प्रयोग प्रत्येक युग से अपना समन्वय स्थापित कर उस युग के अनुकूल एवं
लोक बन जाता है और अनंत काल के लिए जीवित भी। जो परम्परा परिवर्तन का आकांक्षी नहीं
होगी या परम्परा में परिवर्तन की लचक नहीं होगी, तो वह अवरूद्ध होगी और मर जाएगी।
इस तरह परम्पराशीलता लोक का प्रथम और आवश्यक गुण है । जो लोक है, पारम्परिक भी है।
अतः लोकनाट्यों को पारम्परिक नाट्य कहना अधिक समीचीन है । भारतीय नाट्यरूपों में
कुछ ऐसे नाट्यरूप हैं, जिनकी परम्परा तो है लेकिन वह तो लोकनाट्य के दायरे से बाहर
है। ऐसे नाट्यरूपों में कुट्टियाट्टम, किरतनिया, यक्षगान तथा अंकिया नाट आदि हैं ।
इन नाट्यरूपों को पारम्परिक नाट्य ही कहा जाता है। लोक और पारम्परिक नाट्यरूपों की
धारा को अलग-अलग समझने के लिए अलग से विमर्श की आवश्यकता है । लोकनाट्यों का
वर्गीकरण विषय वस्तु के आधार पर के आधार पर लोकनाट्यों का वर्गीकरण समीचीन नहीं
होगा । क्योंकि प्राय: अधिकांश लोकनाट्यों में सामाजिक, धार्मिक या राजनीतिक विषय
शामिल होते हैं। कुछ ऐसे लोकनाट्य है, जिसमें केवल धार्मिक और पौराणिक विषयवस्तु पर
आधारित नाटक प्रस्तुत होते है। लेकिन लोक मंच के प्रयोक्ताओं ने धार्मिक और पौराणिक
विषय के साथ समसामयिक घटनाओं को जोड़ते से समकालीन बनाया है।
प्रस्तुति या प्रदर्शन
शैली/शिल्प के आधार पर लोक नाट्यों के दो प्रकार माना जा सकता है-
गीत नाट्य
नृत्य
नाट्य
गीत नाट्य - इस श्रेणी के नाट्य रूपों में गायन की प्रधानता होती है । अभिनय
या भावाभिव्यक्ति संवाद गीतों के माध्यम से प्रस्तुत होता है । गीतों के माध्यम से
नाटकीय घटना क्रम का वर्णन किया जाता है। नौटंकी , माच ,बिदेसिया ,तमाशा , नाचा ,
ख्याल आदि इस श्रेणी के नाट्य हैं। माच का पारंपरिक मंच 12-15 फीट ऊँचा होता था ।
स्त्री पात्र चेहरे पर किसी प्रकार के मेकअप नहीं करते । स्त्री की भूमिका कर रहे
पुरुष मूंछे नहीं मुंडवाते । वे चेहरों को होठों तक घूँघट से ढके रहते हैं । इनकी
गायकी राग – रागिनीबद्ध तथा उच्च कोटि की होती है । दर्शक गीतों में अभिव्यक्त
भावों के माध्यम से रस का आनंद लेते हैं। इस श्रेणी के नाट्य रूपों में नृत्य कथानक
या घटना क्रम की माँग के अनुरूप प्रस्तुत होता है।
नृत्य नाट्य – इस श्रेणी के
नाट्य रूपों में भाव, मुद्रा तथा आंगिक चरियों की प्रधानता रहती है । दूसरे शब्दों
में अभिनय या भावाभिव्यक्ति नृत्य तथा आंगिक चरियों के माध्यम से प्रस्तुत होता है
। यक्षगान, छऊ, तेरूकुथु आदि इस श्रेणी के नाट्य हैं । इस श्रेणी के नाट्य रूपों के
अधिकांश गीत नृत्य का सहयोगी है । कला प्रस्तुति का कोई ना कोई प्रयोजन या उद्देश्य
होता है । भारतीय लोक नाट्यों के प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन और अनुष्ठानिक
रहा है । लोक नाट्यों की प्रस्तुति किसी सामाजिक समारोह के दौरान या धार्मिक
अनुष्ठानों के अवसर पर होता रहा है ।
प्रदर्शन के उद्देश्य के आधार पर लोकनाट्यों
का दो प्रकार माना जा सकता है-
1. प्रदर्शन मूलक
2. आनुष्ठानिक प्रदर्शनमूलक (Performative)
प्राचीन भारत के कई ग्रंथों में कलाजीवी समुदाय का उल्लेख हुआ है । इन
कालजीवियों को राजकीय अथवा सामाजिक संरक्षण प्राप्त था। ये कलाजीवी मनोरंजन के साथ
संरक्षक या आश्रयदाता की भावनाओं की तुष्टि भी करता था। बड़े राजकीय या सामाजिक
समारोह में बड़ी संख्या में उपस्थित दर्शकों के बीच ये प्रदर्शन करते थे। अत: इन
कलारूपों में प्रदर्शन के तत्व (मंच, दर्शक, प्रेषणीयता ) सुनियोजित रूप से प्राप्त
होते हैं । आनुष्ठानिक (Ritualistic) भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों की मान्यता है
कि धार्मिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों से कई नाट्य रूपों का विकास हुआ । सदियों तक ये
नाट्य अनुष्ठान के रूप में प्रस्तुत होते रहे । ऐसे नाट्य रूपों में प्रदर्शन तत्व
का आभाव देखा गया है। आनुष्ठानिक नाट्यों में मूलत: दर्शक कोई नहीं होता, समारोह
स्थल पर उपस्थित सभी के सभी लोग अनुष्ठान का सहभागी होता है। बिहार का जट – जटिन,
महाराष्ट्र का भारूर तथा गोंधल, केरल का तेय्यम आदि इस श्रेणी के नाट्य हैं । इन
नाट्य रूपों ने धीरे –धीरे अपने आनुष्ठानिक स्वरूपों का त्याग किया है । इनका
प्रदर्शनात्मक स्वरूप निखरा है। नाटकीप्राय विधा नाटकीप्राय अर्थात , नाटक नहीं
नाटक जैसा । वह विधा जिसमें नाटक के सभी नहीं बल्कि कुछ तत्व की उपस्थिति रहती है ।
वर्तमान परिपेक्ष्य में अभिनय, संवाद, कथोपकथन, दृश्यात्मकता, अभिव्यक्ति परक तथा
प्रदर्शनमूलक नाटक के तत्व अथवा विशेषताएँ कही जायगी। इनमें से कोई भी एक विशेषता
या तत्व की उपस्थिति होने पर वह कला रूप अथवा विधा नाटकीप्राय काही जाएगी। चूंकि
भारत के अधिकांश लोकनाट्य आनुष्ठानिक परंपराओं से विकसित हुआ है । अत: इन नाट्य
रूपों में आज भी प्रदर्शनात्मक तत्वों से अधिक आनुष्ठानिक तत्वों की बहुलता है ।
पारम्परिक/लोक नाट्य एवं नाटकीयप्राय लोकविधाएं
असम : अंकिया नाट, भावना- धुलिया,
खुलिया, कमरुपिया
आन्ध्र प्रदेश : वीथिनाटकम् तेलंगना : ओग्गु कथा, बुर्रा कथा
सिक्किम : बालुन, इन्द्रजात्रा त्रिपुरा : ढबजात्रा
मणिपुर : गौड़लीला, शुमांगलीला
बंगाल : जात्रा, गंभीरा, अलकाप
बिहार : बिदापत, किरतनियां, नटुवा नाच, जट-जटिन
उड़ीसा : प्रह्लाद नाटक, भारतलीला, मुग़ल तमाशा
झारखंड : छऊ (नृत्य-नाटक)
छत्तीसगढ़ :
नाचा
मध्यप्रदेश : माच
उत्तर प्रदेश : नौटंकी, स्वांग
उत्तरांचल : नारदपात्तर,
पांडवलीला
हिमाचल : करियाला, बुछैन, बांठड़ा, हिरणात्तर, होरिङफो
हरियाणा : सांग
पंजाब : नक्कल
जम्मू-कश्मीर : भांडपाथेर
राजस्थान : गवरी, ख्याल
गुजरात : भवाई
महाराष्ट्र : तमाशा, गोंधळ
गोवा : तियाटर
कर्नाटक : यक्षगान
तमिलनाडु : तेरूकूथु
केरल : कुडियाट्टम, वेलकिळ, तेय्यम, मुटियेट्ट, पोराट्टनाटकम्, एषामुत्तिक्कलि,
यात्रकलि (संघकलि), चविट्टनाटकम्।