लोकगाथा के नए प्रतिमान
प्रो. ओम प्रकाश भारती
लोकगाथा भारतीय जनजीवन का सामाजिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है । सामंतों, जमींदारों, राजाओं तथा औपनिवेशिक शासकों के अत्याचार और शोषण के
प्रतिरोध का स्वर भारतीय लोकगाथाओं में मुखर हो उठा है । मौखिक इतिहास का महत्वपूर्ण श्रोत रहते हुए भी
अब तक उपेक्षित है ।
(चित्र, लोरिक -चंदा 14 वीं सदी )
भारत के लोक जीवन में लगभग तीन हज़ार से ऊपर लोक गाथाएँ प्रचलित हैं। इनमें से
लगभग दो सो लोकगाथाएँ प्रेमाख्यानक है और कुछ इतने ही भक्तिपरक । शेष गाथाओं
में गोचर संस्कृति की जिजीविषा तथा थान और बथान के लिए संघर्ष, सामंती अत्याचार
के प्रति प्रतिरोध । लोकगाथाओं के अधिकांश नायक उपेक्षित तथा शोषित बहुजन समाज से
हैं । लोकगाथा प्राय: सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्सवों पर गायी जातीं रहीं है । कुछ
लोक गाथाएँ कालजीवी समुदाय यथा, जोगी, गंधर्व, भाट तथा पमरिया आदि समुदायों द्वारा गायी जाती है। ये
कालजीवी प्राय: यायावरी जीवन जीते हैं ।
लोक गाथाओं का नामकरण
हिन्दी तथा उनकी बोलियों में कथागीत के लिए लोकगाथा शब्द रूढ़ हो चुका है। यह पूर्णत:
अकादमिक रूप से गढ़ा गया शब्द है। लोक जीवन में कथागीत के लिए अंचल विशेष में
अलग-अलग शब्द प्रचलित हैं , यथा ; भगैत महराई, गीत, राछरे, पोवाड़ा तथा मलिता
आदि । भारतीय परंपरा में कल्पना प्रसूत कहानी को कथा कही गयी है और ऐतिहासिक
कथावृत्त को आख्यान या आख्यायिका कहा गया है। प्राचीन वैदिक तथा बौद्ध ग्रन्थों
में गाथा और गाथिन शब्दों का भी प्रचलन था। बौद्ध काल में गाथा गायक को गाथिन कहा
गया है। प्राचीन भारत में गाथा बृहत कथानक वाले छंदवद्ध गीतों को कहा जाता था। भारत लोक जीवन में प्रचलित आज के अधिकांश कथा
गीत किसी ना किसी ऐतिहासिक घटनाओं से प्रेरित है। दूसरे शब्दों में भारतीय कथा गीत
जन मानस की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति है। गाथा शब्द कथा गीत के गेयता अथवा स्वरूप को
अभिव्यक्त करता है। विषय/अंतर्वस्तु
तथा गायन –सृजन के उद्धेश्य के
दृष्टिकोण से कथा- गीत को लोक आख्यान कहना अधिक उचित प्रतीत होता है।
यदि लोक गाथा शब्द को ही बनाए रखना है तो ऐसी स्थिति में आख्यान के गुणों को
लोकगाथा में समाहित करना होगा। आख्यान के
गुणों में सबसे महत्वपूर्ण है उनका ऐतिहासिक इतिवृत्त होना। जो निश्चित रूप भारतीय
कथा गीतों में है ।
अंग्रेजी में लोकगाथा
के लिए ‘बैलेड’ शब्द प्रयुक्त
होता है। बैलेड की व्युत्पत्ति लेटिन के ‘बैलारे’ शब्द
से मानी जाती है, जिसका अर्थ है नाचना, अर्थात वह गीत जो नाच/नृत्य के साथ गाया जाता है उसे ‘बैलेड’ कहते हैं। पर,
भारतीय लोकगाथा के संदर्भ में यह परिभाषा सटीक और
अर्थक्षेपक नहीं है। यहाँ गीत के साथ केवल नृत्य नहीं, बल्कि कथा कथन होती
है। अधिकांश लोक गाथाएँ बैठकर या खड़े होकर गायी जाती है। गाथा गाते प्रदर्शन स्थल
पर झूमना अथवा घुमना या विशेष भवाव्यक्ति
के क्षण गायकों का अंग विक्षेप नृत्य की श्रेणी नहीं गिना जाएगा । अत: भारतीय लोक
गाथा के लिए अँग्रेजी में ‘बैलेड” शब्द का प्रयोग उचित प्रतीत नहीं होता । यहाँ अँग्रेजी
प्रचलित में दो और शब्द पर विचार करना होगा- ‘लीजेंड और एपिक’ । भारतीय लोक
गाथाओं के आरंभिक संग्रह कर्ताओं में एक आर.
सी. टेंपल ने 1884 में ‘दी लेजेण्ड्स
आफ पंजाब’ नामक
ग्रंथ में पंजाब के वीरों की शौर्य गाथाओं का संग्रह किया । टेंपल का भारतीय कथा
गीतों/लोकगाथों के लिए ‘लीजेंड’ शब्द प्रयोग अधिक
अर्थवान है। यूरोप में ‘लीजेंड’ ऐसी विधा को कहा गया जिसमें ऐतिहासिक इतिवृत्त के साथ
परम्पराओं का समावेश हो। ‘लेजेंड’ भारतीय आख्यायिका के समानार्थी शब्द है। ‘लेजेंड’ का प्रचलन
मध्यकालीन यूरोप में हुआ । अंग्रेजी शब्द ‘लेजेंड’, एंग्लो-फ्रेंच
और मध्यकालीन लैटिन ‘लेजेंडा’ से विकसित हुआ
जिसका शाब्दिक अर्थ है - इकट्ठा करना, चुनना, पढ़ना। मध्यकालीन यूरोप में ‘लेजेंड’ पुरा तथा संत आदि की कथाओं के लिए प्रयुक्त होता था । कालांतर में ऐतिहासिक
आख्यायिकाओं को ‘लेजेंड’ कहा गया ।
कई ‘लेजेंड’ कभी –कभी
कल्पनाओं से भरा होता है , प्रतिभागियों
द्वारा उन पर पूरी तरह से विश्वास नहीं किया किया जाता, लेकिन कभी
उनपर दृढ़ता से संदेह नहीं किया जाता।[1]
‘लेजेंड’ को कभी –कभी मिथक से अलग किया जाता है, क्योंकि वे
मुख्य रूप से मानवों से संबन्धित होते हैं। और जरूरी नहीं है कि उनकी उत्पत्ति
अलौकिक हो । कभी –कभी उनका आधार ऐतिहासिक होता है, जबकि मिथकों
का आमतौर पर ऐसा नहीं होता।[2]
‘लेजेंड’ की कथाएँ
ऐतिहासिक होती है।[3] लोकविद्याविद टिमोथी आर. टैंगहेरलिनी(1990) ने ‘लेजेंड’ को परिभाषित करते
हुए लिखा है - लीजेंड्स, आम तौर पर, एक छोटी (मोनो-) शृंखलावद्ध , पारंपरिक, अत्यधिक
समसामयिक ऐतिहासिक कथा है जो कथोपकथन(नेरेटिव) रूप में प्रदर्शित की जाती है, जो
मनोवैज्ञानिक स्तर पर लोक विश्वास और सामूहिक अनुभवों का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व
करती है और उस समूह के आम मूल्यों की पुनः पुष्टि के रूप में कार्य करती है, जिसकी परंपरा
से यह संबंधित5 है।[4] कई पीढ़ियों से
मौखिक रूप से संरक्षित इतिहास अक्सर समय के साथ कथा-आधारित या पौराणिक रूप ले लेता
26 है।[5]
इस प्रकार लेजेंड/ लोक आख्यान/लोकगाथा समुदाय अथवा जाति की ऐतिहासिक
अभिव्यक्ति है। मौखिक परंपरा में वह कई
पीढ़ियों से समुदाय द्वारा साझा की गई स्मृति, ज्ञान और अनुभव की अभिव्यक्ति है । इसमें जनसाधारण के उन दमित भावनाओं की भी अभिव्यक्ति
जिसे वर्ग विशेष ने उन्हें अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं दिया । यह लोक गीत,कथा और नृत्य से
भिन्न है। यहाँ समुदाय की कोमल भावनाओं के
साथ उनकी कठोर भावनाओं की भी अभिव्यक्ति
हुई है। अत: भारतीय संदर्भ में लोकगाथा की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है- मौखिक परंपरा में प्रचलित वह कथा–गीत, जिसमें समुदाय या जाति के शौर्य, आदर्श, मूल्य
तथा दमित भावनाओं की स्वछंद अभिव्यक्ति
हुई है।
लोक गाथाओं की विशेषताएँ
अधिकांश विद्वानों ने लोक लोकगाथा की विशेषताओं का निर्धारण पूर्वाग्रह पूर्ण
किया है, यथा ; अलंकृत शैली का भाव, इतिहास की संदिग्धता
आदि। जबकि लोक विम्ब, प्रतीक तथा छंदों की बानगी लोक गाथाओं की अन्यन्य
विशेषताएँ हैं । कुछ गाथाएँ तो केवल ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है, और शेष मौखिक अथवा
लोक इतिहास का महत्वपूर्ण श्रोत है। इस प्रकार लोकगाथाओं की निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती है:
1.
पारंपरिकता- लोकगाथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी प्रचलित हैं । पारंपरिकता
लोकगाथाओं का अनिवार्य गुण है।
2.
संगीतात्मकता/
गेयता- लोक गाथाओं
को कथा तथा गीतों और के माध्यम से प्रस्तुतु किया जाता है ।
3.
बृहत
कथानक – लोकगाथाओं का कथानक
विस्तृत तथा कई खंडों में विभक्त होता है।
4.
महाकाव्यात्मक – अधिकांश लोकगाथाएँ अपने समय और समाज के प्रतिनिधि आदर्श
चरित्रों को प्रस्तुत करता है। भारतीय काव्य ग्रंथो में
महाकाव्यों के लिए निर्धारित सभी सभी विशेषताएँ लोक गाथा में समाहित है।
5.
मौखिक
इतिहास का महत्वपूर्ण श्रोत- लोक
गाथाएँ अपने समाज और समय का महत्वपूर्ण श्रोत है।
6.
सामाजिक
प्रतिरोध- लोक गाथाओं में शोषण, सामंती, जमींदारी तथा
बेगारी जैसे अमानवीय प्रथा के प्रति प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है।
7.
सामाजिक
आदर्श एवं मूल्यों का निर्माण- लोकगाथाओं
के नायकों का त्याग,शौर्य तथा बलिदान सामाजिक आदर्श एवं मूल्यों का निर्माण
करता है। समाज और व्यक्ति में नैतिक ऊर्जा का संचरण करता है।
8.
संस्कृति
तथा परम्पराओं का चित्रण- लोक
गाथाओं में स्थानीय गीत, नृत्य, नदी, पहाड़, मेले, शादी-विवाह, उत्सव तथा अन्य
परम्पराओं का चित्रण हुआ है।
9.
चिरनवीनता- लोकगाथाएँ जितनी पुरानी है, उतनी ही नवीन। वह
दो–तीन सौ वर्ष पुरानी रहते हुए भी उसकी भाषा
आज की होती है। लोक गाथा गायक आज के कई
संदर्भों कों जोड़कर गायन प्रस्तुत करते हैं।
10. काल्पनिकता – लोकगाथाओं
में समुदाय अपनी दमित भावनाओं का कल्पनाओं को मिथकों के माध्यम से अभिव्यक्त करता है।
लोकगाथाओं का उद्भव
उद्भव काल
लोकगाथा समुदाय का ऐतिहासिक अभिव्यक्ति है।
लोकगाथा की उत्पत्ति तथा रचना के सम्बन्ध में मतैक्य नहीं है। रचयिता का पता ही नहीं चलता है। जिन गाथाओं में
लेखक ज्ञात हैं उनमें भी क्षेत्र विशेष के गवैयों द्वारा इतना परिवर्तन कर दिया
जाता है कि उसमें लेखक का व्यक्तित्व लोप हो जाता है। लोकगाथाओं के उद्भव
लेकर पाश्चात्य विचारकों ने
विभिन्न मत तथा सिद्धान्त प्रस्तुत किये । इन्हीं मतों तथा सिद्धांतों का अनुकरण
करते हुए साठ के दशक में भारतीय विद्वानों
ने लोकगाथाओं के उद्भव को लेकर विभिन्न मत दिये, ये हैं –
लोक निर्मिति या समुदायवाद - इस मत के
प्रवर्तक जैकब ग्रिम, विल्हेम ग्रिम तथा समर्थक स्टीन पाल माने जाते हैं। इस मत
के अनुसार ‘बैलेड’ की रचना जन
समूह/समुदाय (एक साथ एक स्थान पर बैठकर ) ने की ।
व्यक्तिवाद- इस मत के प्रवर्तक श्लेगल हैं । उनके
अनुसार लोकगाथा की रचना पहली बार किसी एक व्यक्ति ने की ।
जातिवाद – यह
विभिन्न यूरोपीय विद्वानों द्वारा स्थापित मत है। इस मत के अनुसार लोकगाथाओं
की रचना अलग- अलग जातियों के द्वारा की
गयी।
व्यक्तित्वहीन व्यक्तिवाद – चाइल्ड ने सर्वप्रथम इस मत का प्रतिपादन किया । बाद में स्टेनस्ट्रीप
ने इसका समर्थन किया। इसके अनुसार ‘बैलेड’ की रचना व्यक्ति
और समुदाय ने की है।
इस प्रकार पाश्चात्य विचारकों ने यूरोपीय परंपरा ‘बैलेड’ को ध्यान में रखकर
लोकगाथा की उत्पत्ति की व्याख्या की है। भारतीय लोक गाथाओं के उद्भव के संबंध में
समन्वित रूप से उपरोक्त सभी मत उचित प्रतीत होता है। लेकिन भारतीय लोकगाथाओं का
संदर्भ कुछ अलग है ।
लोक अभिव्यक्तिवाद
भारत में लोकगाथाओं का सृजन समुदाय
एवं जतियों द्वारा किया गया। किसी एक
व्यक्ति ने नहीं, बल्कि सामूहिक रूप
से पीढ़ी दर पीढ़ी विभिन्न चरणों में विकास हुआ है। हमें उन परिस्थितियों या कारणों पर
विमर्श करना होगा जिन सामाजिक –आर्थिक कारणों से लोक लोकगाथाओं की उत्पत्ति या आरम्भ हुआ होगा।
लोक गाथाओं का वर्गीकरण
लोक साहित्यविद डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय ने लोक गाथाओं का वर्गीकरण
किया है: प्रेम –कथात्मक गाथाएँ, वीर – कथात्मक गाथाएँ, रोमांच – कथात्मक गाथाएँ
।
गाथा गायक स्मृति तथा अनुभाविक को
विम्ब, प्रतीक और कल्पनाओं के माध्यम से
अभिव्यक्त करता है। इसके लिए वे लौकिक तथा अलौकिक विम्बों तथा घटनाओं को मुख्य कथा
में क्षेपक के रूप में जोड़ता है। इस तरह रोमांच सभी श्रेणी की लोक गाथाओं में
निहित है। इसके लिए कोई अलग श्रेणी समीचीन प्रतीत नहीं होता। लोक गाथाओं को
श्रेणीवद्ध करने में बड़ी सावधानी रखनी होगी। प्रेम गाथाओं के नायक प्राय: वीर हैं
। उनकी वीरता के कारण नायिका उस पर मोहित होती हैं । भोजपुरी की लोक गाथा लोरिकायन
वीर गाथा है। लेकिन ‘चंदेनी’ ( छत्तीसगढ़ी लोकगाथा) में लोरिक और
चंदा की प्रेम प्रसंगों को प्रमुखता दी गयी है, जबकि भोजपुरी,मगही तथा मैथली रूपों में लोरिक की वीरता का प्रसंग गाया जाता है। मुल्ला
दाऊद() ने ‘लोर-चंदा’ में लोरिक और चंदा
की प्रेम प्रसंगों को ही केंद्र रखकर काव्य रचना की है। विषय वस्तु के आधार पर लोक
गाथाओं का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है-
शौर्य गाथाएँ
प्रेम गाथाएँ
भक्ति गाथाएँ
लोक गाथा के गायक
लोकगाथा गायन न तो सीखी जाती है और न ही कोई गुरु होते हैं। परिवेश स्वयं कलाकार चुन लेता है। गाथा
गायक की अधिक संख्या मजदूर वर्ग से है। यह
मजदूर जो गाँव में अक्सर महाजनों या गृहस्थों के खेतों में दिनभर कठिन श्रम करते
हैं और रात में उसके पशुधन और फसलों को जोगने के लिए रतजगा करते हैं । इन एकान्त
क्षणों में गाथा की आशुरचना करते हैं। एक
तो यह होता है कि कोई भी चोर गाने की आवाज
सुनकर समझ जाता है कि पहरेदार जाग रहा है। दूसरा लाभ कुछ गाते रहने से एकाकीपन दूर
होता है।गाथा गायकों का एक दूसरा वर्ग भी है मध्यवर्गीय किसान है। गाँव में आये
दिन प्राकृतिक आपदायें आती रहती हैं। इसका निदान भी गाँव के लोग पारम्परिक रूप से
करते हैं। महामारी या प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए स्थानीय देवी-देवताओं का
आनुष्ठानिक आवाहन करते हैं। इस अवसर पर देवी-देवताओं के जीवन से जुड़ी आख्यानों को
गाते हैं। इस तरह के आख्यान धीरे-धीरे परम्परा का अंग बन चुका है। इस तरह की
भक्तिपरक गाथाओं को उत्तर बिहार में भगैत कही जाती है। गाथा गायकों का एक अन्य
वर्ग भी है, जिसे जोगी (योगी) कहा जाता है। जोगी मुख्यतया नाथपंथी होते हैं,
जो सारंगी पर गोपीचन्द और भरथरी की गाथाएँ गाते हुए
गाँव-गाँव भिक्षाटन करते हैं।
लोक गाथाओं का इतिहास
प्राचीन काल
भारत में गाथा गायन या कथा गायन का अन्त: साक्ष्य ऋगवेद में प्राप्त होता है ।
बौद्ध काल में ‘गाथिन’गाथा गायक होते थे। इन कथा गायकों के विषय वस्तु तथा
उद्देश्य मूल रूप धार्मिक होते थे। कालांतर
में राज्य और गणतन्त्र बने । शक्ति संरचना के नायक राजा और अधिनायक हुए। इसी प्रक्रिया में दरबारी प्रशस्ति गायकों
की परंपरा आरंभ हुई । ईस्वी सन सातवीं शताब्दी से ही दरबारी कवि,
चारण, भाट आदि अपनी रचनाओं के द्वारा राजाओं में सर्वश्रेष्ठ नायक,
देवगुण सम्पन्न, समाज और युग का आदर्श पुरुष आदि गुणों का आरोपण करते दीखते
हैं। जो काम ऊँचे पुरस्कार और प्रतिष्ठा पाकर दरबारी गाथा गायक करते थे। ये दरबारी
गाथा गायक अपने नायक (राजा) के प्रति इतना बड़ा आत्ममोह और ऊंची श्रद्धा लिए रहता
था कि उनकी कमजोरियों पर वे खामोशी साध लेता था। इसलिए इस समय की रचनाओं में पूर्वाग्रह
का आधिक्य है। इस परम्परा में अनेक गाथा काव्य रचे गये। चंदबरदायी लिखित प्रसिद्ध
गाथा काव्य पृथ्वीराज रासो इसी परम्परा में रखे गये। यह दौर गाथा रचना का आरम्भिक
काल था। यह परंपरा मध्यकाल या उसके बाद भी
छिटफुट चलती रही। इस परंपरा की गाथाएँ अपने
आश्रय दाता शासकों की अभिरूचि तथा भावनाओं के अनुरूप विकसित हुई । लोक जीवन में प्रचलित इस काल की गाथाएँ अप्राप्त
हैं ।
पूर्व मध्यकाल
लोकगाथा के विकास का दूसरा दौर या कहें कि लोक परंपरा की लोकगाथाओं का आरंभ इतिहास
के पूर्व मध्यकाल में हुआ, जो अभी तक चल रहा
है। ये गाथाएँ अभी प्राप्त हैं तथा गायन
परंपरा में हैं । पूर्व मध्यकाल राजनीतिक
अस्थिरता का दौर है। सामंतवाद पराकाष्ठा
पर था। इस दौर में भारत पर बाहरी आक्रमण हुए । ये आक्रमण विदेशी संस्कृति
द्वारा भारतीय सांस्कृतिक अवदानों को नष्ट करने की दुष्प्रवृत्ति साथ लाया था। दरबारी
कलाकारों
के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिये गये । फलस्वरूप दरबारी कवि,
चारण, भाट गाँव में आश्रय
लिए। परम्परा को भूलना इन लोक रचनाकारों के लिए आसान नहीं था। वहाँ भी उन्होंने रचना आरम्भ किए। अब गाथा रचना दरबारी
परिवेश में नहीं बल्कि गोचर संस्कृति में होने लगी। लोक गाथाओं के प्रतिनिधि चरित्र, राजनायक की जगह लोकनायकों ने लिया।
इस दौर में बड़े स्तर पर गाथाएँ रचि गयी, जिसका सम्बन्ध लोक से था।
छोटे –छोटे सल्तनत और राज्य बने । राजा और सुल्तान ‘जनपिट्टा’ यानि जनता कों
पड़तारित करने वाला। वर्षों तक भारतीय
लोकमन अविजित एवं लोक आस्था उनसे दूर रहा। जागीरदारों और सामंतों ने नदी, पोखर तथा चरागाह
का आमलोगों के उपयोग के लिए प्रतिबंधित किया। पशुचारक तथा खेतिहर चूंकि जातियों में विभक्त थे । कहीं जातिगत रूप
से तो कहीं सामुदायिक रूप से प्रतिरोध और संघर्ष आरंभ हुए। इस संघर्ष में कई वीर
नायकों ने सामंतों और जागीरदारों का दमन किया। और कई सामंतों और जागीरदारों के दमन
के शिकार हुए। लोगों ने अपने-अपने जाति के वीरनायकों के जीवन आदर्श को लोक गाथाओं
के माध्यम से प्रस्तुत किया। बाद की पीढ़ी
इन वीरनायकों को मनुष्यदेवा के रूप पूजने लगे। इससे एक तो जातिगत लोकगाथाएँ आरम्भ हुए, दूसरा धार्मिक या भगैत (भक्ति परक) परम्परा का जन्म हुआ । बिहार
के जातिगत लोक गाथाओं में लोरिकायान, राजा सलहेस, दीना – भदरी, रेशमा चूहरमल, नैका बनिजरा तथा
मानसराम –छेछनमल आदि प्रमुख है।
औपनिवेशिक काल
कालांतर में औपनिवेशिक तंत्र स्थापित हुआ। गुलामी,
राष्ट्रवाद जैसी भावना लोकमन को भी हुआ। इस दौर में अनेक
सर्ववर्ग तथा सर्वजाति मान्य लोकनायकों के प्रति समर्पित लोकगाथा रचे गये,
जैसे राव किसान गोपाल, वीर
कुंवर सिंह, ताना भगत आदि। इस तरह कहा जा सकता है
कि सातवीं सदी के बाद जो लोकगाथा रचने की
परम्परा राजदरबार से आरम्भ हुई, पूर्व मध्यकाल में गाँव आ गयी और बीसवीं शताब्दी तक इसका
फलक राष्ट्रीय हो गया। इस बीच की सामाजिक गतिशीलता और परिवर्तन ने लोकगाथाओं की रचनाओं
के लिए विषय दिया। शैली तो लोक कलाकारों को विरासत में ही मिली थी।
