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Saturday, October 11, 2025

पूरबी गीतों के अमर गायक महेन्द्र मिसिर-ओम प्रकाश भारती

पूरबी गीतों के अमर गायक महेन्द्र मिसिर

 

ओम प्रकाश भारती 

लुवंत सहाय की हवेली में आस-पास के जमींदार, हुक्मरान आदि पधार चुके थे। साजिन्दों ने अपनी जगह ली। रक्कासा घूंघट काढ़े बैठी थी। कमबख़्त तबलची गांजे के सोट की खोज में कहीं गुम हो गया। मेहमान अधीर हो रहे थे और ज़मींदार साहब आग-बबूला। एक युवक ने आगे बढ़कर विनम्र भाव से जमींदार साहब से तबला बजाने की अनुमति माँगी। सहर्ष अनुमति मिलते ही तबले की गड़गड़ाहट से महफिल थिरक उठी। रक्कासा ने घूंघट उठाते हुए स्वर लिया-

छोड़ि गइले रात सुतले सेजरिया छोड़ि गइले... बालम निरमोहिया मरम न जाने तोड़ि गइले रे 'रात लगलो पिरितिया...।

बिजली कौंध गई, रस की वर्षा होने लगी। ताल, स्वर, घुंघरू और तालियों की गड़गड़ाहट में रात थम-सी गई। सुबह तक आह और वाह गूँजता रहा। तबला और घुंघरू की जुगलबन्दी और प्रतिस्पर्धा में रक्कासा बेदम होकर निढाल-सी गिर पड़ी। महफिल युवक की प्रतिभा से अभिभूत हुआ, हलुवंत सहाय ने गले लगा लिया और महेन्द्र ख्यात हो गए।

पूरबी लोकगीतों के अमर गायक और सर्जक महेन्द्र मिसिर का जन्म बिहार के सारण जिला के मुख्यालय छपरा से 12 कि.मी. उत्तर जलालपुर प्रखंड से लगे गाँव काहीं मिश्र बलिया में हुआ था। मौखिक स्रोतों के अनुसार उनके पूर्वज लगभग तीन सौ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के लगुनहीं गाँव से आए थे। महेन्द्र मिसिर ने एक गीत में अपने गाँव का उल्लेख इस प्रकार किया है-

मउजे मिश्रवलिया जहाँ विप्रन के ठट्ट बसे

सुन्दर सोहावन जहाँ बहुते मालिकाना है।

गाँव के पश्चिम विराजे गंगाधर नाथ

सुख के स्वरूप ब्रह्मलोक के निधना है।

गाँव के उत्तर से दक्षिण ले सघन बाँस

पूरब बहे नारा जहाँ काहीं का सिवाना है।

द्विज महेन्द्र रामदासपुर के ना छोड़ो आस

दुख-सुख सम सह के समय को बिताना है।

छपरा जिले के शिवबाजार मोहल्ले में हलुवंत सहाय की हवेली थी। हलुवंत सहाय मोख्तार बाबू के नाम से प्रसिद्ध थे। वे पेशे से वकील थे। मुकदमे की पैरवी और अंग्रेजों की स्वामीभक्ति से उसने अच्छी-खासी जमींदारी अर्जित कर ली थी। महेन्द्र मिसिर का गाँव काहीं मिश्र बलिया उनकी ही जमींदारी में बसा था। शिवशंकर मिसिर किसानी के अलावे पुरोहिताई भी करते थे, सो शिवशंकर मिश्र हलुवंत सहाय की जमींदारी की देखभाल करने के साथ-साथ ड्योढ़ी में पूजा-पाठ भी करवाते थे। धीरे-धीरे मिश्र जी हलुवंत सहाय के विश्वासपात्रों में से एक बने। मिश्रजी का परिवार बड़ा खुशहाल था। बस कमी थी एक पुत्र की। लोगों की सलाह पर उन्होंने अपनी पत्नी लक्ष्मीना देवी के साथ 'मेंहदार तीर्थ' की यात्रा की। कहा जाता है कि भगवान महेन्द्रनाथ की कृपा से उनकी इच्छा पूरी हुई vऔर 16 मार्च, 1886 को मिश्रजी के घर पुत्र का जन्म हुआ। यही पुत्र महेन्द्र मिसिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पंडित जी ने बड़े लाड़-प्यार से महेन्द्र को पाला-पोसा। पुरोहिताई की विद्या स्वयं पढ़ाई। गंवईं परिवेश में घुड़सवारी, कुश्ती, पहलवानी, गीत-गवनई भी सीखा। कहा जाता है कि कुछ दिनों के लिए महेन्द्र पं. नान्हू मिश्र की संस्कृत पाठशाला में अध्ययन के लिए भेजे गए थे। लेकिन महेन्द्र का सृजनशील मन कहाँ औपचारिक शिक्षा में रमने वाला था। उनका अधिकांश समय गाँव के शिवाला के भजन-कीर्तन और रामायण मंडली के संग व्यतीत होता था। महज पन्द्रह वर्ष की आयु में उसने स्वरचित महादेवी को जब संगीत में पिरोकर शिवाला में गाया तो लोगों ने दातों तले उंगलियाँ दबा लीं। कुछ ही दिनों में महेन्द्र के गीत-गंवनई की चर्चा गाँव-जवार में होने लगी।

किशोरावस्था में आते ही महेन्द्र का व्यक्तित्व और अधिक निखरा। छह फीट कद, दोहरा बदन, गौर वर्ण, सिलोटिया बान्ह देखकर कोई भी पहलवान अखाड़ा छोड़ देता था। गदा और लाठी भांजने के कौशल में गाँव-जवार में महेन्द्र का कोई जोड़ नहीं था।

शिवशंकर मिश्र तीसरी अवस्था में पहुँचे। वे अस्वस्थ रहने लगे। खेतीबाड़ी की देखभाल महेन्द्र को करनी पड़ती। साथ ही हलुवंत सहाय की पुरोहिताई और जमींदारी की देखरेख महेन्द्र के जिम्मे थी। एक दिन की बात है हलवंत सहाय के यहाँ पूजा थी। बड़े मिश्रजी अस्वस्थता के कारण जाने से असमर्थ थे। उन्होंने महेन्द्र से ड्योढ़ी जाकर पूजा करवाने को कहा। महेन्द्र पोथी-पतरा लेकर ड्योढ़ी पहुँचे। पूजा-पाठ कराते शाम हो आयी। हलुवंत सहाय के आग्रह पर ड्योढ़ी में ठहर गए। उस रात ड्योढ़ी में बनारस की मशहूर तवायफ का 56 नाच था। रात में महफिल लगी। महेन्द्र ने विनम्र भाव से जमींदार साहब से तबला बजाने की अनुमति माँगी। सहर्ष अनुमति मिलते ही तबले की गड़गड़ाहट से महफिल थिरक उठी।

महफिल महेन्द्र की प्रतिभा से अभिभूत हई, हलवंत सहाय ने गले लगा लिया। दूसरे दिन स्वयं मिसिर बलिया पहुंचकर पं. शिवशंकर मिश्र से युवा महेन्द्र को मांग लिया। महेन्द्र मिसिर बलिया छोडकर छपरा ड्योढी आ गए। महेन्द्र जमींदारी की देखभाल के संग, जहाँ कहीं भी संगीत सभा होती, वहाँ जमींदार हलुवंत सहाय के साथ जाते।

हलवंत सहाय रसिक मिजाज के थे। ड्योढी में अक्सर रक्कासा का नाच करवाते थे। आस-पास के इलाके में यदि कहीं रक्कासा का नाच होता तो वहाँ अवश्य जाते। आरंभ में महेन्द्र ने साज बजाने के अलावा बहुतेरे गीत रचे. जिसमें ठमरी और पूरबी काफी लोकप्रिय हुए। महेन्द्र के गीतों के लिए बनारस की मशहूर तवायफों में होड़ लगी रहती थी। छपरा, मुजफ्फरपुर तथा वाराणसी की मशहूर तवायफें मिसिरजी की शिष्या कहलाने में गौरव समझती थी। प्रेम, काम और विरह की भावनाओं से ओत-प्रोत महेन्द्र के गीत लोगों के हृदय में उतरते थे। कुछ ही दिनों में महेन्द्र गीतकार के रूप में ख्यात हो गए।

एक बार मुज़फ़्फ़रपुर की मशहूर तवायफ ढेलाबाई छपरा के सावन मेले में नाचने आई हुई थी। हलुवंत सहाय उसके अपूर्व सौंदर्य पर मोहित हो गए। उन्होंने महेन्द्र से अपने दिल की बात बतायी। महेन्द्र जमींदार का संदेश लेकर ढेलाबाई के पास गए। लेकिन ढेलाबाई ने महेन्द्र से अपनी शिष्या बनाकर शरण देने को कहा। महेन्द्र ने कर्त्तव्यपरायण सेवक की भूमिका निभाई। उसने जमींदार हलुवंत सहाय से ढेलाबाई को पत्नी का दर्जा देने को कहा। हलुवंत सहाय सहमत हो गए। ढेलाबाई की सुंदरता पर कई बड़े-बड़े रईस और जमीदारों की नजर गड़ी थी। महेन्द्र मिसिर ढेलाबाई को अगवा कर हवेली ले आया। ढेलाबाई हलुवंत सहाय को उपपत्नी के रूप में रहने लगी। और ढेलाबाई के बदले उसे ढेलासरकार की उपाधि मिली। ढेलाबाई के हवेली आ जाने के बाद महेन्द्र मिसिर अधिकतर छपरा रहने लगे। ढेलाबाई भी चाहती थी कि महेन्द्र उसकी आँखों के सामने रहे। मिसिर जी शिवभक्त थे। पैतृक गाँव मिसिर बलिया में उनके घर में ही शिवमंदिर था। ढेलाबाई ने वैसा ही मंदिर छपरा में हलुवंत सहाय की हवेली के प्रांगण में बनवाया। आज भी यह मन्दिर छपरा के शिवबाजार मोहल्ले में 'ढेलामंदिर' के नाम से जाना जाता है। अब मिसिर जी जब छपरा में होते थे, तो ढेलामंदिर में पूजा करते थे। ढेला का यह समर्पण हलुवंत सहाय को गवारा नहीं था। लेकिन वह विवश था। कहा जाता है कि ढेलाबाई मृत्युपर्यन्त महेन्द्र मिसिर के प्रति आसक्त रही।

हलुवंत सहाय की मृत्यु के तुरन्त बाद महेन्द्र मिसिर ड्‌योढ़ी से अलग-थलग रहने लगे। हलुवंत सहाय ने अपनी सारी जायदाद ढेलाबाई के नाम कर दी थी। जायदाद को लेकर हलुवंत सहाय के कई रिश्तेदार ढेलाबाई से उलझ गये। मामला कोर्ट पहुँचा। ढेलाबाई को एक साथ कई मुकदमों का सामना करना पड़ा। इस आसन्न विपत्ति के समय महेन्द्र ने ढेलाबाई का साथ दिया।

कहा जाता है कि मिसिर जी का संबंध स्वतंत्रता सेनानियों से था। वे स्वयं स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने अंग्रेजी सरकार को ध्वस्त करने के लिए ही जाली नोटों का कारोबार शुरू किया। लेकिन इसके प्रमाण में कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं मिलता है। बल्कि यह तर्क बनता है कि यदि महेन्द्र मिसिर स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़े होते तो वे देश भक्ति के गीत अवश्य रचते। आज उनके द्वारा रचित पाँच सौ से अधिक गीत लोक स्मृति में संरक्षित है। और लगभग एक हजार गीत प्रकाशन की प्रतीक्षा में है। ये सारे गीत भक्ति और श्रृंगार रस के हैं! मात्र एक गीत उपलब्ध है, जिसमें ब्रिटिश सरकार के प्रति आर्थिक प्रतिरोध की भावना झलकती है- 

हमरा नीको ना लागे रामा गोरन के करनी

रुपिया ले गइले, पइसा ले गइले ले गइले सारा गिनी

ओकर बदला में दे गइले ढलडी के दुआओ, हमरा...।

आलोचकों की राय जो हो लेकिन इतना तो अवश्य है कि महेन्द्र मिसिर के भक्तिपरक गीतों ने लोकचेतना को समृद्ध किया। गीत-गवनई के क्रम में मिसिर जी कई बार कलकत्ता गए। वहाँ उनकी भेंट एक अंग्रेज टकसाल अधिकारी से हुई। उसने महेन्द्र को रुपए छापने की एक मशीन दी तथा रुपए छापना भी सिखाया। महेन्द्र अपने गाँव मिसिरबलिया लौट आए तथा भैंस के बथान में बने एक गुप्त कमरे में रुपये छापने की मशीन लगाई और रुपये छापने लगे। रईसी लौटने लगी। गीत-संगीत की महफिल फिर से जमने लगी। जाली नोटों की भरमार देख ब्रिटिश सरकार के कान खड़े हो गए। ब्रिटिश हुकूमत ने फौरन आयोग गठित कर इस आर्थिक स्त्रोत का पता लगाने को कहा। लेकिन प्रयास विफल रहा। सिर्फ इतना पता चल सका कि इसका स्रोत कहीं न कहीं भोजपुर अंचल है। वायसराय के आदेश पर पटना के पुलिस मुख्यालय में उच्चाधिकारियों की एक बैठक 1921 में आहूत की गई। इस बैठक में पटना के तत्कालीन सी.आई.डी. इंस्पेक्टर जटाधारीप्रसाद को जाली रुपये छापने वाले को पकड़ने का दायित्व सौंपा गया। सहयोगी के रूप में सुरेन्द्रनाथ घोष को नियुक्त किया गया।

जटाधारी प्रसाद तीव्र बुद्धि वाले अधिकारी थे। अपने कार्य के लिए वे ब्रिटिश हुकूमत से कई सम्मान प्राप्त कर चुके थे। जटाधारी को कहीं से सुराग मिला कि यह जाली नोट छपरा जिला के किसी गाँव से छप रहा है। उन्होंने सोनपुर मेला को निगरानी केन्द्र बनाया। मेला में आने-जाने वालों पर नज़र रखने लगे। मेला में महेन्द्र मिसिर पहुँचे। मिसिर जी का डीलडौल, सिल्क का कुर्ता, धोती, पशमीना शाल, हीरे की अँगूठी और मुँह में बनारसी पान देखकर जटाधारी को शक हुआ। लेकिन जब मिसिर जी ने मेले का सबसे मंहगा घोड़ा साठ हजार में खरीदा तो जटाधारी प्रसाद का शक विश्वास में बदल गया। जटाधारी प्रसाद और सुरेन्द्रनाथ घोष देहाती का भेष धरकर महेन्द्र के यहाँ पहुँचे। वहाँ उन्होंने चाकरी पर रखने का अनुनय-विनय किया। महेन्द्र ने दोनों को चाकरी पर रख लिया। जटाधारी प्रसाद गोपीचन्द के छदम नाम से मिसिर की नौकरी खटने लगे। एक व्यक्ति मिसिर जी के लिए छपरा से बनारसी और साफ करते। धीरे-धीरे गोपीचन्द मिसिर जी के प्रिय सेवक और विश्वासपात्र बन गए और मगही पत्ता पान लाते, मिसिर जी की मालिश करते। दूसरा जन गाय-घोडा का गोबर-लीद मिसिर ने रुपये छापने का रहस्य गोपीचन्द को बता दिया। जटाधारी प्रसाद ने मुख्यालय को खबर दी। मिसिर जी रुपये अक्सर अमावस्या की रात्रि को छापते थे। योजनानुसार जिस समय नोट छापने जा रहे थे, उसी समय मिसिर बलिया गाँव को चारों ओर से ब्रिटिश पुलिस ने घेर लिया। मिसिर जी घर में सोये थे। उनका छोटा भाई और एक अन्य विश्वासपात्र सेवक करियावा रंगे हाथ नोट छापते पकड़े गये। 1924 को महेन्द्र गिरफ़्तार कर रातों-रात छपरा लाए गए। दूसरे दिन महेन्द्र सहयोगी सहित अदालत में पेश किए गए। कहा जाता है कि जिला भर से हजारों लोग अदालत परिसर में एकत्र थे। सैंकड़ों बाईयाँ अपने साजिन्दों के साथ छाती पीटर्ती अदालत पहुँची। बाईयों के हाथों में गहनों की पोटलियाँ थीं। सबने महेन्द्र की रिहाई की गुहार लगाई। लेकिन जज ने एक नहीं सुनी। तीनों को छपरा जेल भेज दिया गया।

ख़बर ढेलाबाई तक पहुँची। जमींदार हलुवंत सहाय गुजर चुके थे। ढेलाबाई ने नगर के सबसे काबिल बैरिस्टर हेमचन्द्र बनर्जी को केस की पैरवी के लिए नियुक्त किया। बैनर्जी ने सलाह दी कि यदि मिसिर जी अपने अपराध से मुकर जाएँ और दूसरों पर दोषारोपण कर दें तो वह उन्हें बचा लेंगे। लेकिन मिसिर जी इसके लिए तैयार न हुए। देशद्रोह का मुकदमा चला। चालीस वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। मिसिर जी को छपरा जेल से केन्द्रीय कारागार बक्सर भेज दिया गया।

कहा जाता है कि जिस दिन मिसिर जी अदालत में पेश हुए, जटाधारी प्रसाद पर नजर पड़ी और कंठ से अनायास स्वर फूटा-

पाकल-पाकल पानवाँ खिअवले गोपीचनवाँ

 पिरितिया लगा के तें भेजले जेहल खनवाँ ।...

गोपीचन्द ने प्रत्युत्तर दिया-

 

नोटवा के छापी-छापी गिनियाँ भैजवल ऐ महेन्दर मिसिर

ब्रिटिश के कइल हलकान ऐ महेन्दर मिसिर।

सगरी जहनवाँ में कइल बड़ा नाम ऐ महेन्दर मिसिर ।...

बाद के दिनों में यह गीत बहुत ही लोकप्रिय हुआ।

38 वर्ष की आयु में चालीस वर्ष का कारावास यानी आजीवन कारावास। लेकिन डेलाबाई ने हिम्मत नहीं हारी। उसने हाईकोर्ट में अपील की। होईकोर्ट में सुनवाई हुई तथा उनकी सजा घटाकर बीस वर्ष कर दी गई। ढेलाबाई फिर सुप्रीमकोर्ट गई। सुप्रीमकोर्ट ने यह कहा कि चूँकि पुलिस छापे के दौरान वह सो रहे थे और स्वयं नोट छापते नहीं पकड़े गए अतः देशद्रोह के आरोप से बरी करते हुए सात वर्ष की साधारण सजा मुकर्रर की जाती है। महेन्द्र मिसिर बक्सर केन्द्रीय कारागार भेज दिए गए। जेल में रहते हुए मिसिर जी ने 'अपूर्व रामायण' की रचना की। 

सात वर्ष की सजा काटने के बाद मिसिर जी 1931 में जेल से रिहा हुए। जेलप्रवास के दौरान मिसिर जी की दिनचर्या में बदलाव आया। वे सात्विक और आध्यात्मिक जोवन व्यतीत करने लगे। नियमित ईश्वर भक्ति में मग्न रहने लगे। जेल से रिहा होने के बाद मिसिर जी सीधे अपने गाँव मिसिर बलिया आ गए। ड्योढ़ी से ख़बर आई कि ढेलाबाई सख्त बीमार है। मिसिर जी ढेलाबाई से मिलने छपरा पहुँचे। कहा जाता है कि मिसिर जी से मिलने के तुरन्त बाद ढेलाबाई का प्राणान्त हुआ। वे छपरा में ही रहने लगे, रोज ढेलामन्दिर जाते और घण्टों गुमसुम बैठे रहते। ढेलाबाई के जाने से कलाकार हृदय मिसिर जी को बड़ा आघात लगा। 25 अक्टूबर, 1946 का दिन था। महेन्द्र मिसिर ढेलामन्दिर पहुँचे, शहर में खबर भिजवाई कि आज मिसिर जी की महफिल जमने वाली है। शाम ढलते ही ढेलामन्दिर दर्शकों से खचाखच भर चुका था। मिसिर जी महफिल में आए। हारमोनियम पर गाना आरम्भ किया। कार्यक्रम शिवलिंग के समक्ष चल रहा था जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा कभी मिसिर जी ने करवाई थी तथा जिसे ढेलाबाई स्वयं अपने हाथों से रोज गंगाजल और दूध से नहलाती थीं। कहा जाता है कि भजन गाते-गाते भाव-विभोर मिसिर जी शिवलिंग पर लुढ़क गए और फिर कभी नहीं उठे।

 

सृजन यात्रा

 

महेन्द्र मिसिर रचित हजारों गीत भोजपुर अंचल के लोक कंठों में परम्परित है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में गीत-गवनई का शायद ही कोई मंच होगा जहाँ महेन्द्र मिसिर के गीत नहीं गाए जाते हों। जेल में रहते हुए मिसिर जी ने भोजपुरी भाषा में आठ कांड रामायण की रचना की, जिसे अपूर्व रामायण के नाम से जाना जाता है। अपूर्व रामायण को भोजपुरी भाषा का प्रथम महाकाव्य भी कहा जाता है। अपूर्व रामायण में महेन्द्र मिसिर ने न केवल दोहा और चौपाई का प्रयोग किया है अपितु विभिन्न शास्त्रीय उपशास्त्रीय राग-रागिनियों के अलावे कजरी, पूर्वी, चौबोला, झूमर, टप्पा, सोहर और जतसार की रचना सिर्फ पाठकों के लिए नहीं बल्कि कथावाचकों, गायकों, नाच-नौटंकी आदि के कलाकारों के लिए भी की थी। अपूर्व रामायण के आरण्य कांड की प्रस्तावना में स्वयं महेन्द्र मिसिर ने अपने बारे में लिखा है।

अपूर्व रामायण के अलावा महेन्द्र मिसिर ने महेन्द्र मंजरी (चार खंड), महेन्द्र चिन्द्रका (तीन खंड), महेन्द्र मंगल (चार खंड), महेन्द्र विनोद तथा विनय कवितावली की रचना की। महेन्द्र मिसिर ने तीन नाटकों की भी रचना की चीरहरण लीला. उधो वृन्दावन गमन, गोपीहरण। इनमें से अधिकांश रचनाएँ अप्रकाशित हैं।

हुए वे महेन्द्र मिसिर कवि, नाटककार, गजलकार, गवैया कई वाद्यों के बजैया थे। मंचों से गाते वे दर्शकों का मन मोह लेते थे। उनके कई गीत लिखित रूप में उपलब्ध नहीं हैं। बल्कि लोककंठों में संरक्षित है। महेन्द्र मिसिर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनको सबसे अधिक प्रसिद्धि 'पूर्वीगायन' को लेकर मिली। महेन्द्र मिसिर ने न केवल पूर्वी गीतों की रचना की, उसका संगीत संयोजन किया और उसकी गाया भी इस लिहाज से उसे संगीत का उन्नायक कहा जाएगा। कई विद्वानों ने तो महेन्द्र मिसिर को पूर्वी संगीत का जन्मदाता कहा है।

पूर्वी को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। साहित्यशास्त्र के विद्वान इसके वस्तु और काव्य शैली को आधार मानकर इसे गीतों की अलग श्रेणी में रखते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार 'दादरा' तो कुछेक 'श्रीराग' की रागिनी और कुछ इसे 'गौड़ी' और 'गौरी' से मिलकर बनी संकर धुन मानते हैं। कल्याण राग प्रेम और श्रृंगार के लिए उपयुक्त माना जाता है। पूर्वी में भी श्रृंगार की सरस अभिव्यक्ति होती है अतः कुछ संगीतक इसे 'राग कल्याण' कहना ज्यादा उपयुक्त समझते हैं। कुछ विद्वानों ने 'गौरी राग' के दो भेद किए है- भैरव ठाठ और पूर्वी ठाठ ।

पूर्वी ठाट के गौरी राग भी आरोह में गंधार और ध्वैत स्वर वर्ण्य होते हैं। इसमें वादी स्वर दृषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसके गायन का समय संध्याकाल है। इसका उठान है-सानिश्नि, रेग, रेगमरेसारे निसा। लोकगीत प्रायः विलावल, खमाज, काफ्फी और भैरव थाट में गाए जाते हैं। महेन्द्र मिसिर के पूर्वी प्रायः विलावल और भैरव थाट में हैं-

जेठ वैसाखवा के तलपफ भुभुरिया हो महेन्द्र मिसिर।

चलत में गोड़वा मोर पिराय हो महेन्द्र मिसिर ॥

 विलावल थाट...

सभका के देलअ भोला अन धन सोनवा बनवारी हो

 हमरा के लरिका भतार लरिका भतार लेके सुतली ओसरवा

बनवारी हो जरि गइले एड़ी से कपार

 भैरव थाट...

जो भी हो पूर्वी धुन एक जातीय धुन है, जो भोजपुरी समाज के संघर्ष, आकांक्षा, हर्ष, विषाद तथा जिजीविषा से निसृत हुआ है। महेन्द्र मिसिर ने पूर्वी के सृजन में किसी संगीत प्रणाली का अनुकरण नहीं किया बल्कि स्वर, धुन और लय की नई प्रणाली को संजोया। महेन्द्र की पूर्वी को संगीतशास्त्र के नियम से सिखाना असम्भव है, बल्कि अनुकरण और अभ्यास से ही पूर्वी गायन सम्भव है। महेन्द्र के पूर्वी गायन का जो तान और आलाप है वह सप्तक से ऊँचा है, इसलिए यह लोक है। विद्वानों की राय है कि महेन्द्र मिसिर के पूर्व से ही पूर्वी की परम्परा है। कुछ हद तक यह तर्क समीचीन भी है। कबीर के कई दोहों में कबीर अपनी भाषा को पूरबी कहते हैं,

यहाँ एक दृष्टांत देखा जा सकता है-

बोली हमारी पूर्व की हमें लखै नहि

कोय हमको तो सोई लखै धुर पूरब का होय ।...

लक्ष्मी सखि, धरनी दास और भारतेन्दु के

कुछ गीतों को भी देखा जा सकता है-

सखि बिनु साम सेजरिया हो कल परत न नीन

बिछरे ना तिरछी नजरिया हो जबसे भइलन भीन

बिरहा के उठेला लहरिया हो मोरी बारी रे सीन सहीले

 लाख हजरिया हो जइसे तलपफत मीन। लक्ष्मी सखि

पिया मोरे बसेले गाउर गढ़ मैं बसों प्राग हो।

 सहजहिं लागु सनेह उपजु अनुराग हो। लक्ष्मी सखि...

लक्ष्मी सखि, धरनी दास और भारतेन्दु के इन गीतों को निर्गुण और पूर्वी भी कहा जाता है। जो भी हो निर्गुण और पूर्वी का अन्तः सम्बन्ध तो है ही। महेन्द्र मिसिर को पूर्वी को लेकर कोई दुविधा नहीं है। वह निर्गुण को निर्गुण और पूर्वी को पूरबी ही कहते हैं। गीतों के संग टेक में स्पष्ट उल्लेख है- गावत महेन्द्र मिसिर इहो रे पुरूबिया। महेन्द्र मिसिर की पूर्वी को छन्दों से मुक्त लयों में पिरोया गया है। उनके द्वारा रचित पूर्वी में भक्ति, दर्शन, श्रृंगार, करुण तथा पारिवारिक जीवन का अद्भुत चित्रण है। वह जितना अलौकिक है उतना ही लौकिक-

खेलत रहनी हम सुपुली मउनिया

ए ननदिया मोरी हे, आइ गइले डोलिया कहाँर

 बाबा मोरा रहिते रामा, भइया मोर रहितें

ए ननदिया मोरी है, पफेरि दिहतें डोलिया कहाँर...

पूर्वी मन 'मोही मन' होता है। अपनी मिट्टी, संस्कृति, राग-भाष-भूषा किसी को छोड़ना नहीं चाहता, वह अपनी परम्परा और मूल्यों से जुड़ा रहना चाहता है। परदेश गए नायक को अपनी मिट्टी की याद आती है। घर की नबब्याहता विरह दग्ध नायिका बन जाती हैं। 'सुगना' को संदेशवाहक बनाकर भेजती है-

(पूरबी)

पिया मोरा गइलें रामा पूरबी बनिजिया से दें के गइलें ना।

एगो सुगना खेलवना रामा से दे के गइलें ना ।..

लोक जीवन और पारिवारिक सम्बन्धों के विविध चित्र महेन्द्र मिसिर के पूर्वी में बिखरे पड़े हैं। सास-बहू, ननद-भौजाई, जेठानी-देवरानी के अन्तः सम्बन्धों को कवि ने बड़ी मार्मिकता से दर्शाया है। सासु से त्रस्त नवब्याहता हर तरह के अत्याचार सहने को तैयार है- इसलिए की जीवन में आशा है-

सासु मोरा मारे रामा बाँस के छिऊँकिया

ए ननदिया मोरी रे सुसुकत पनिया के जाय।...

महेन्द्र मिसिर का समय सामन्ती काल था। गीत-गवनई की धारा सामन्ती विचार और अभिरूचियों के अनुकूल प्रचलित था। जमीदारों की हवेलियों में तवायफ़ का नाच-गाना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था। महेन्द्र ने अपने गीतों को सामंती परिवेश से बाहर निकाला। उन्होंने निम्न आमजनों की भावनाओं को पूरबी गीतों में स्थान दिया।

कहा जाता है कि महेन्द्र का' पूरबी' तवायफ़ों के बीच काफ़ी लोक प्रिय था। महेन्द्र के गीतों को प्राप्त करने के लिए तवायफ़ों के बीच होड़ लगी रहती थी। निश्चित रूप से महेन्द्र ने विरह और काम के कुछ ऐसे गीत रचे जो हृदय को छूते थे। गीत द्विअर्थी होते थे। गीतों के शब्द ऐसे चुनते थे कि लोग मर्माहत हो उठते थे-


होते पराते चलि जइहो मोरे राजा।

तनिक भर बोल बतिया ल मोरे राजा।

रचि-रचि जेंवना हम अपने बनाइव बेनि

डोला के दुलार से जेंवाइब तलफत जवनिया

के तनिका जोगा के सबेरे के गाड़ी से चल जइह राजा ।...

पूर्वी की परम्परा चाहे जितनी पुरानी हो इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय महेन्द्र मिसिर को जाता है। महेन्द्र श्रेष्ठ गीतकार के संग सधे कंठ के गायक थे। वे गीतों की रचना कर स्वयं संगीत में पिरोते थे, इसलिए उनकी पूर्वी कोरी साहित्यिक होकर पुस्तकों में बन्द नहीं है, बल्कि राग और स्वर के साथ लोककंठ में प्रवाहमान है। महेन्द्र ने पूरबी गीतों को भोजपुरी के अत्यंत कारुणिक और हृदयस्पर्शी रागों में पिरोया। निर्गुण, जतसार तथा सोहर जैसी लोकधुनों की लटक वहाँ देखी जा सकती है। महेन्द्र के सृजन की पृष्ठभूमि शास्त्र से ज्यादा लोक में है, इसलिए उनकी पूर्वी जड़ता मुक्त है, उसमें लय और गति है। लोक स्मृति में रचने-बसने और उससे भी ज्यादा दीर्घायु होने की क्षमता है- इस लिहाज से महेन्द्र मिसिर 'पूर्वी' के पुरोधा कहे जा सकते हैं।