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Tuesday, November 25, 2025

लोकनाट्य नौटंकी - ओम प्रकाश भारती


लोकनाट्य नौटंकी - ओम प्रकाश भारती 

नौटंकी उत्तरप्रदेश का सर्वाधिक लोकप्रिय नाट्यरूप है। उत्तरप्रदेश के अलावा नौटंकी के कुछ रूपों का प्रचलन हरियाणा, पंजाब और राजस्थान आदि के ग्राम्यांचलों में भी है। इसे स्वांग, सांगीत और भगत जैसे लोकनाट्यों से उद्भित और विकसित माना जाता है।


                                                           फोटो साभार   गुरु राम दयाल शर्मा 

            नौटंकी आज लोकनाट्य के लिए रूढ़ शब्द हो चुका है। लेकिन इसके नामकरण को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। नौटंकी की व्युत्पत्ति नाटक शब्द से मानी जाती है-नाटक, नाटकी, नौटंकी। कुछ विद्वानों का मानना है कि चूंकि टिकट नौटंके का होता था इसलिए इस प्रदर्शन का नाम नौटंकीपड़ा। एक मत यह भी है कि नौ प्रकार के नक्कारे बजाये जाते थे, इसलिए इसका नाम नौटंकी पड़ा। नौटंकी के संबंध में एक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि पंजाब के एक राजा की बेटी का नाम नौटंकी था, जो अत्यंत सुन्दर थी। अपनी भाभी के ताने सुन-सुनकर फूलसिंह नामक एक युवक उससे शादी करने के लिए निकल पड़ा। एक मालिन की सहायता से वह स्त्रीवेश में नौटंकी के महल में पहुँचा। दोनों में दोस्ती हो गई। एक दिन नौटंकी हँसी-हँसी में बोली अगर हममें से एक पुरुष होता तो कितना अच्छा होता। फूलसिंह तत्काल अपने पुरुष भेष में आ गया। नौटंकी पहले तो घबराई, फिर शादी करने के लिए तैयार हो गयी। नौटंकी के पिता को यह स्वीकार्य नहीं था। उसने फूलसिंह को प्राणदण्ड की सजा सुनायी। नौटंकी ने विद्रोह कर अपने प्रेमी की रक्षा की और अंत में दोनों की शादी हो गयी। इस कथा के आधार पर पं. नत्थाराम शर्मा ने एक नौटंकी लिखी है- सांगीत नौटंकी राजकुमारी उर्फ अय्यारा औरत। कानपुर के कृष्ण पहलवान की नौटंकी नौटंकी शहजादीमें यही कथा दुहरायी गई है। लगता है कि शहजादी नौटंकी और फूलसिंह की प्रणय कथा इतनी लोकप्रिय हुई कि यह नाट्य प्रस्तुति उत्तर भारत की इस लोकनाट्य शैली का पर्याय हो गई। संगीत और नृत्य तत्त्व तो इसने अपने पूर्व प्रचलित परंपराओं से ग्रहण किया।

 

उद्भव और विकास की पृष्ठभूमि

       सत्राहवीं सदी के आस-पास पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान में ख्याल गायकी प्रसिद्ध काव्यशैली के रूप में स्थापित हो चुकि थी। ख्याल की काव्यरचना में कवित्त, सवैया, छप्पय, दोहा, चौपाई, झेला, हरिगीतका, रेख्ता आदि छंदों का प्रयोग विशेष रूप से हो रहा था। इसी ख्याल गायकी में चौबोलाछंद और गायकी जुड़ने से नौटंकी का विकास हुआ। आर.सी. टेम्पल ने 1800 ई. के आस-पास बंसीलाल स्वांगिये से सुनकर गुरु गुग्गा, गाथा राजा गोपीचंद और राजा नल नामक स्वांग को लिपिबद्ध किया। ये स्वांग दी लीजेन्डस् ऑफ दी पंजाबमें प्रकाशित है। इन स्वांगों में दोहा, चौबोला, सोरठा, लावणी तथा रागिनी आदि छंदों में गीत रचे गये हैं। स्वांग, सांगीत, भगत तथा नौटंकी नाम से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा तथा पंजाब में अट्ठारहवीं शताब्दी से ही अभिनय और गायन की परम्परा चल रही है। ये सभी विधाएं गायकी प्रधान हैं। काव्यरचना की छंदों और गायकी की धुन में इतनी अधिक समानताएं हैंकि कभी-कभी इन विधाओं को अलग समझने में बड़ी कठिनाई होती है। अतः विद्वानों में एक भ्रम की स्थिति बनी रही कि कभी वे नौटंकी को स्वांग, भगत तथा संगीत से उद्भित मानते हैं या कभी वे इन विधाओं को नौटंकी का पर्याय मानते हैं। सांग की पहचान हरियाणा के लोकनाट्य के रूप में है और आज भी यह परम्परा जीवित है। स्वांग नाम से पश्चिमी उत्तर प्रदेश विशेषकर कुरूअंचल (मेरठ, सहारनपुर, गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद, ज्योतिबा फूले नगर) में लोकनाट्य की एक अलग परम्परा है। इसी तरह भगत ब्रजके आस-पास के अंचलों का लोकनाट्य है। सांगीत की परम्परा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग सभी अंचलों में प्रचलित रही है। ये सभी कलारूप नौटंकी से पूर्व के हैं। निश्चित रूप से नौटंकी के उद्भव के उत्स में इन कलारूपों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा होगा। स्वांग, भगत, ख्याल तथा सांगीत का प्रधान तत्व गायकी है, जबकि नौटंकी में गायकी के साथ उत्कृष्ट अभिनय और रंगमंच के अन्य आवश्यक गुण भी मौजूद हैं। नौटंकी का यह गुण इन्दर सभाके प्रदर्शन और कुछ हद तक पारसी रंगमंच से प्रेरित हैं।

            उन्नीसवीं शताब्दी में लखनउ के प्रसिद्ध उर्दू शायर आगा हसन अमानत ने इन्दर सभानामक नाटक की रचना की। इन्दर सभा मूलतः संगीत नाटक था। इनके गीत पारम्परिक तथा लोकधुनों पर आधारित थे। गीतों की रचनाओं में हिन्दी और उर्दू के प्रचलित छंदों का समावेश था। नाटक के संवाद लयबद्ध गद्य और पद्य थे। गीति संवाद/नाट्यगीत इन्दर सभा के माध्यम से इस अंचल के कलारूपों के लिये एक नव-अन्वेषण था। साथ ही इसके प्रदर्शन में तत्कालीन दरबारी और लोकनृत्यों को भी शामिल किया गया था। कुल मिलाकर यह प्रदर्शन इतना लोकप्रिय हुआ कि1850 ई. तक कानपुर और आस-पास के अंचलों की नौटंकी कम्पनियों ने अलग-अलग तरीके से इसका प्रदर्शन शुरू किया। इन्दर सभा के नाट्यगीति संवाद शैली ने नौटंकी में गायकी के बीच संवादों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

            जिन दिनों नौटंकी अपने उत्कर्ष पर पहुंचने के लिये स्वरूप ग्रहण कर रही थी, उन दिनों पारसी रंगमंच चोटी पर स्थापित था। पारसी थियेटर व्यवसायिक कम्पनी थी। नौटंकी की सीधी टक्कर पारसी रंगमंच की लोकप्रियता और व्यावसायिकता से हुई। नौटंकी के पास सुदृढ़ गायकी और अभिनय मौजूद था। या कहें कि इस मामले में वह पारसी रंगमंच से आगे था। पारसी रंगमंच का दृश्य संयोजन (जिसमें कथानक के अनुसार चित्रकारी किये हुये पर्दो का प्रयोग होता था), मंच व्यवस्था तथा वेशभूषा नाटकीय दृष्टिकोण से व्यवस्थित था। पारसी थियेटर की देखा-देखी में नौटंकी के प्रयोक्ताओं ने वेशभूषा (कथानुसार), दृश्य संयोजन और मंच आदि नाटकीय सज्जा का पुर्नसंयोजन किया। इससे भी बड़ी चुनौती थी, पारसी थियेटर में आकर्षक युवती नर्त्तकियों का होना। नौटंकी में यह काम पुरुषों द्वारा ही किया जाता था। नौटंकी के प्रयोक्ताओं ने भी महिलाओं को नौटंकी में लाने की कोशिश आरम्भ की। लेकिन एक तो तकनीकि और दूसरी सामाजिक बाधाएं सामने थी। समाज सामंती था। प्रदर्शनकारी कलाओं में महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। तकनीकि परेशानी यह थी कि नौटंकी के कलाकार को नृत्य और गायकी में प्रवीण होना चाहिये था। उसमें भी गायकी उच्च लय और तान की। 1930 ई. में गुलाब बाई ने प्रथम महिला कलाकार के रूप में  त्रिमोहन लाल एण्ड कम्पनीकानपुर, के माध्यम से नौटंकी में प्रवेश किया। इसी समय दूसरी महिला कृष्णा बाई भी इस कम्पनी से जुड़ गयी। बाद में श्यामा और अन्नो बाई हाथरस अखाड़े की प्रसिद्ध महिला कलाकार हुई।

            गायकी नृत्य और संवाद की तरह नौटंकी के कथानकों का विकास भी पूर्व प्रचलित परम्पराओं से हुआ। नौटंकी के लेखकों ने मौखिक परम्परा के लोकआख्यानों पर आधारित नाटकों की रचना की। इस समय तक पारसी और उर्दू प्रेमाख्यान भी लोक परम्परा के अंग बन चुके थे। इन प्रेमाख्यानों को आधार बनाकर कई नौटंकियां लिखी गयी यथा; स्याह पोश, सब्जपरी गुलफाम। नौटंकी की भाषा उर्दू मिश्रित खड़ी बोली है।

            इस प्रकार नौटंकी ने अपना आरंभिक रंगमंचीय स्वरूप पूर्व प्रचलित परम्पराओं तथा आस-पास के अंचलों में प्रचलित कलारूपों से ग्रहण किया। लेकिन उसका विकास पूर्णतः उत्तर प्रदेश में ही हुआ। 

नौटंकी के प्रमुख अखाड़े

नौटंकी के तीन सबसे बड़े केंद्र रहे हैं कानपुर (स्वर और ताल के लिए), हाथरस (साहित्य और लिखित ड्रामे के लिए), लखनऊ (तहजीब और उर्दू अदब के लिए)। बाकी अखाड़े इन्हीं से निकले या प्रभावित हुए। यहाँ कुछ अखाड़ों का परिचय और विशेषताएँ डी जा रहीं हैं-

1.      कानपुर अखाड़ा

o    सबसे पुराना और सबसे प्रतिष्ठित अखाड़ा माना जाता है।

o    शुरुआत: पंडित श्रीकृष्ण खत्री और उनके शिष्य नत्थू लाल, इन्द्रमणि पंडित आदि।

o    विशेषता: शुद्ध हिन्दुस्तानी ठेठ स्वांग, दुरुस्त ताल-लय, शास्त्रीय रागों का प्रयोग (जैसे पूरवी, ख्याल, दादरा, कहरवा)।

o    प्रसिद्ध नौटंकियाँ: सुल्ताना डाकू, अमर सिंह राठौड़, लैला-मजनूँ (हिन्दी रूपांतर)।

o    यहाँ के कलाकारों की आवाज बहुत ऊँची और दूर तक जाती थी, इसलिए कानपुरी रंगबहुत मशहूर हुआ।

2.      हाथरस अखाड़ा

o    संस्थापक: पंडित नारायण प्रसाद बेताबऔर उनके बाद उनके पुत्र बल्लभ बेताब

o    विशेषता: लिखित ड्रामा की परंपरा शुरू की। पहले नौटंकी मौखिक होती थी, इन्होंने छपे हुए ड्रामे लिखे।

o    भाषा: परिष्कृत उर्दू-हिन्दी मिश्रित, काव्यात्मक संवाद।

o    प्रसिद्ध रचनाएँ: इन्द्रसभा (प्रथम छपी नौटंकी), भक्त प्रह्लाद, शीरीं-फरहाद।

o    आज भी हाथरसी ठेठको सबसे साहित्यिक नौटंकी माना जाता है।

3.      लखनऊ अखाड़ा

o    विशेषता: उर्दू का बड़ा प्रभाव, तहजीबी अंदाज़, परदे के पीछे से औरतों के रोल करने की परंपरा (लखनऊ में औरतों का मंच पर आना वर्जित था)।

o    प्रसिद्ध कलाकार: गुलाब बाई (प्रथम महिला नौटंकी कलाकार जो खुले मंच पर आईं), पंडित रामदयाल, हफीज मियां।

o    राग-रागिनियों में अवधी और पूर्वांचली ठुमरी का पुट।

o    नौटंकियाँ: लैला-मजनूँ, शीरीं-फरहाद, नल-दमयंती।

4.      मथुरा-आगरा अखाड़ा (ब्रज अखाड़ा)

o    विशेषता: ब्रजभाषा का प्राबल्य, राधा-कृष्ण और आल्हा-ऊदल की नौटंकियाँ ज्यादा।

o    ढोलक-नगाड़े की तेज थाप, “रंगीला स्वांग

o    प्रसिद्ध: गुल बकावली, आल्हा, भक्त पूरनमल।

5.      बरेली अखाड़ा

o    विशेषता: रोहतक और मेरठ से प्रभावित, तेज गति, मार-धाड़ वाली नौटंकियाँ।

o    सुल्ताना डाकू, हीर-रांझा, फूल सिंह नाई जैसी डाकू और प्रेम कथाएँ।

6.      दानपुर (बुलंदशहर) अखाड़ा

o    गुरु: पंडित रामस्वरूप मस्तऔर उनके शिष्य।

o    विशेषता: बहुत ऊँचे स्वर का गायन, “दानपुरी रंगके नाम से प्रसिद्ध।

o    आवाज इतनी तेज होती थी कि बिना माइक के कई किलोमीटर दूर तक सुनाई देती थी।

7.      पटना-भोजपुरी अखाड़ा

o    बिहार में प्रचलित, भोजपुरी में नौटंकी।

o    विशेषता: भोजपुरी लोकगीतों का मिश्रण, ज्यादा नाच-गाना।

हाथरस और कानपुर की नौटंकी का शिल्पगत एवं शैलीगत विश्लेषण

बिंदु

हाथरस शैली (स्वांग/हाथरसी सांगीत)

कानपुर शैली (कानपुरी नौटंकी)

संस्थापक/प्रमुख हस्ती

पं. नाथूराम शर्मा गौड़’, पं. श्रीकृष्ण खत्री (प्रारम्भिक), नारायण प्रसाद बेताब’, बल्लभ बेताब

पं. श्रीकृष्ण पहलवान (दूसरे), नत्थूलाल, इंद्रमणि पंडित, मुंशी दयानारायण, हबीब राजा

मुख्य नाम

स्वांग, हाथरसी सांगीत, बेताबी नौटंकी

ठेठ नौटंकी, कानपुरी रंग, पहलवानी नौटंकी

कथ्य का महत्व

सर्वोपरि काव्यात्मक, दार्शनिक, भक्ति-प्रधान (प्रह्लाद, हारून-होशरुबा, इन्द्रसभा)

गौण रोचकता, ड्रामा, डाकू-प्रेम कथाएँ (अमरसिंह राठौड़, सुल्ताना डाकू, लैला-मजनूँ)

संगीत का स्थान

80–90% हिस्सा पूरी नौटंकी राग-रागिनी में गाई जाती है

30–40% हिस्सा गाने कम, संवाद ज्यादा

राग-रागिनियों का प्रयोग

शास्त्रीय एवं उप-शास्त्रीय रागों का भरपूर प्रयोग पीलू, खमाज, भैरवी, काफी, पूरवी, सोहनी, देश, जंगला, ठुमरी अंग

सीमित राग कहरवा, दीपचंदी, दादरा, चौताल; ज्यादातर लोक धुनें और ढोलक-नगाड़े की तेज थाप

ताल

मध्य लय और विलंबित तालें (एकताल, तिलवाडा, झपताल)

तेज लय तेज कहरवा, अड्डा, लाठी ताल (पहलवानी थाप)

गायकी की शैली

बंदिशें, बोल-बनाव, बोल-बांत, लंबी तानें, आलाप

छोटे-छोटे गीत, रंगीले बोल, दोहा-चौबोला, लावनी अंदाज़

रंगा’ (जोकर) का स्थान

नहीं होता (हाथरस वाले इसे अशिष्ट मानते थे)

बहुत महत्वपूर्ण रंगा ही दर्शकों को बाँधे रखता है, फूहड़ चुटकुले, स्थानीय बोली में हास्य

संवाद

कम, काव्यात्मक, उर्दू-हिन्दी मिश्रित, छंदबद्ध

बहुत ज्यादा, खड़ी बोली, मुहावरे, गाली-गलौज तक, तत्काल संवाद (इम्प्रोवाइजेशन)

अभिनय

संयत, संगीतमय, मंच पर ज्यादा हाव-भाव नहीं

अतिरंजित, पहलवानी स्टाइल, लठैतों की लड़ाई, तलवारबाजी, नाच-गाना कम, मार-धाड़ ज्यादा

भाषा

परिष्कृत उर्दू-हिन्दी, फारसी शब्दावली ज्यादा

खालिस देहाती हिन्दी, कानपुरी बोली, अवधी-बुंदेली मिश्रण

मंच-सज्जा

सादगी एक तख्त, परदा, हारमोनियम-तबला-सरंगी

भव्य बड़ा रंगमंच, लाइटें, लठैतों के हथियार, डाकू पोशाक

स्त्री-पात्र

पहले पुरुष ही करते थे, बाद में भी संयत वेशभूषा

पहले पुरुष, बाद में महिलाएँ भी (गुलाब बाई से प्रभावित) लेकिन अभिनय ज्यादा बोल्ड

दर्शक वर्ग

शहरों के शिक्षित एवं ग्रामीण मध्य वर्ग

मुख्यतः ग्रामीण, मजदूर, निम्न मध्य वर्ग जो तत्काल रोमांच चाहते हैं

लिखित परंपरा

सबसे मजबूत बेताब ने सैकड़ों छपे ड्रामे लिखे

मौखिक परंपरा लिखित बहुत कम, कलाकार अपनी मर्जी से संवाद जोड़ते-घटाते हैं

प्रसिद्ध नौटंकियाँ

इन्द्रसभा, भक्त प्रह्लाद, शीरीं-फरहाद, हारून-होशरुबा

अमरसिंह राठौड़, सुल्ताना डाकू, फूलसिंह नाई, लैला-मजनूँ (संवाद प्रधान संस्करण)

प्रभाव क्षेत्र

आगरा, अलीगढ़, मथुरा, इटावा, फिरोजाबाद

कानपुर, उन्नाव, फर्रुखाबाद, कन्नौज, लखनऊ (ग्रामीण), इटावा

 

नौटंकी के क्षेत्र में गुलाब बाई का योगदान

गुलाब बाई (1915–1996) नौटंकी की पहली महिला कलाकार थीं जिन्होंने खुले मंच पर स्त्री पात्र स्वयं निभाया। इससे पहले नौटंकी में सभी स्त्री भूमिकाएँ पुरुष ही करते थे । गुलाब बाई ने न सिर्फ इस रूढ़ि को तोड़ा, बल्कि नौटंकी को एक नया रंग, सम्मान और व्यावसायिक ऊँचाई दी।





                                                   पदमश्री गुलाब बाई 

  • असली नाम: गुलाब जान
  • जन्म: सन् 1926, अमेठी (तत्कालीन संयुक्त प्रान्त, अब उत्तर प्रदेश) के पास बेलवा गाँव में।
  • परिवार: गरीब मुस्लिम तवायफ़ परिवार। माँ हकीमन बाई और मौसी सुल्तान बाई छोटी-मोटी मीरासी गायिका थीं।
  • पिता का नाम अज्ञात (कुछ स्रोतों में कहा जाता है कि वे अनाथ थीं और मौसी ने पाला)।
  • बचपन से ही ठुमरी-दादरा और लोकगीत सुन-सुन कर गला पकड़ लिया था। 8-9 साल की उम्र में ही गाँव के मेले में गाने लगी थीं।

1.      महिला कलाकार के रूप में प्रवेश (1932-33 से)

o    गुलाब बाई महज 13-14 साल की उम्र में लखनऊ की मशहूर ग्रेट इण्डियन ओपेराकंपनी में शामिल हुईं।

o    पहली बार 1933 में लखनऊ के कैसरबाग बारादरी में लैला-मजनूँमें लैला का किरदार किया यह नौटंकी में किसी महिला द्वारा किया गया पहला खुला प्रदर्शन था।

o    दर्शकों ने पहले तो विरोध किया, पत्थर फेंके, लेकिन उनकी आवाज और अभिनय देखकर तालियाँ बजने लगीं।

2.      अपनी अलग कंपनी की स्थापना (1940 के आसपास)

o    नाम: ग्रेट गुलाब थिएटरया मून लाइट थिएटर” (चाँदनी रातों में खेलने के लिए मशहूर)।

o    यह नौटंकी की पहली पूर्णतः महिला-प्रधान मंडली थी जिसमें अधिकांश मुख्य भूमिकाएँ महिलाएँ ही निभाती थीं।

o    कंपनी उत्तर भारत के गाँव-गाँव, मेलों और कस्बों में घूमती थी। 1950-60 के दशक में यह सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा कमाई करने वाली नौटंकी कंपनी थी।

o    1950-70 के दशक में यह उत्तर भारत की सबसे बड़ी और सबसे महँगी कंपनी थी। एक रात का किराया 5000 से 15,000 रुपये तक (उस ज़माने में बहुत बड़ी रकम)।

o    कंपनी में 70-80 कलाकार होते थे, जिनमें अधिकांश महिलाएँ थीं।

 

3.      गायकी और संगीत में योगदान

o    उनकी आवाज बहुत मधुर, ऊँची और लंबी साँस वाली थी।

o    ठुमरी, दादरा, गजल और ख्याल अंग की गायकी को नौटंकी में लोकप्रिय बनाया।

o    प्रसिद्ध रागिनियाँ: पहाड़ी”, “पीलू”, “खमाज”, “भैरवीमें लैला-मजनूँ के बोल आज भी गुलाब बाई स्टाइलकहलाते हैं।

o    उनके गाए कुछ मशहूर बोल:लैला दीवानी हो गई रे…”, “दिल की बस्ती उजड़ गई सैया…” आदि।

4.      लोकप्रिय नौटंकियाँ जिन्हें उन्होंने अमर बनाया

o    लैला-मजनूँ

o    शीरीं-फरहाद

o    नल-दमयंती

o    हीर-राँझा

o    गुल-बकावली

o    इन्द्रसभा (उन्होंने इसे नया रंग दिया)

5.      महिलाओं को नौटंकी में लाने का रास्ता खोला

o    उनके बाद सैकड़ों महिला कलाकार आईं जैसे मिस इंदु, मिस कमला, हीरा बाई, सरस्वती बाई, गंगू बाई, रेशमा बाई, चंदा बाई आदि।

o    आज भी उत्तर प्रदेश-बिहार की अधिकांश नौटंकी मंडलियों में महिलाएँ मुख्य गायिका-नर्तकी होती हैं इसका श्रेय सीधे गुलाब बाई को जाता है।

6.      सम्मान और पुरस्कार

o    1975 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।

o    लखनऊ में उनके नाम पर गुलाब बाई स्मृति भवनऔर एक सड़क का नामकरण हुआ।

o    1990 में पद्मश्री से सम्मानित होने की घोषणा हुई थी, लेकिन मरणोपरांत नहीं दिया जाता इसलिए नहीं मिल सका।

 “गुलाब बाई ने नौटंकी को पुरुषों के एकालाप से निकालकर उसे एक संपूर्ण पारिवारिक मनोरंजन का माध्यम बनाया और स्त्री को उसका असली चेहरा और आवाज वापस दी। नौटंकी की संगीत पद्धति (संगीत-शैली और राग-रागिनी का प्रयोग) नौटंकी मूलतः गायन-प्रधान नाट्य है। नृत्य और अभिनय तो होते हैं, लेकिन कथा आगे बढ़ती ही संगीत से है। इसलिए नौटंकी का संगीत ही उसकी आत्मा है।

नौटंकी की संगीत पद्धति

1. मुख्य तालें (ताल-चक्र)

नौटंकी में मुख्य रूप से चार तालों का प्रयोग होता है:

दादरा (6 मात्रा) प्रेम प्रसंग, रूमानी दृश्य, दर्द भरे गीत

कहरवा (8 मात्रा) सामान्य संवाद, हल्के-फुल्के दृश्य

दीपचंदी/चांचर (14 मात्रा) वीर रस, युद्ध दृश्य, डाकू के प्रवेश

तेवता (7 मात्रा) बहुत तेज गति वाले युद्ध दृश्य, घुड़सवारी, तलवारबाजी के दृश्य

2. प्रमुख राग-रागिनियाँ

नौटंकी में शास्त्रीय रागों का खड़ा प्रयोग नहीं होता, बल्कि लोक-शैली में उनके अंश लिए जाते हैं।

भाव और रस के अनुसार कुछ मुख्य राग:

बैरवी युद्ध के बाद वीर की मृत्यु, अंतिम दृश्य

काफी प्रेम और वियोग

पीलू हल्के प्रेम गीत

खमाज रंगीले, चंचल गीत

भैरवीं, मांड, सोहनी, यमन वैराग्य और भक्ति प्रसंगों में

आल्हा राग आल्हा-ऊदल वाली नौटंकियों में विशेष रूप से

 

3. संगीत के प्रमुख अंग (क्रम से)

रंगीन/रंगीला (प्रारंभिक गीत)

मंच खाली होता है, सिर्फ ढोलक-हारमोनियम बजता है और कलाकार गाते हैं

उदाहरण: अरे ओ रंगरंगीले, नौटंकी वाले आए रे…”

बहंगी/बहंगिया

नायिका का प्रवेश गीत (स्त्री पात्र ढोलक पर थाप के साथ नाचते-गाते आती है)

प्रसिद्ध बहंगी: बहंगिया ला दो रे सजनी…”

दुआरी (दोहा-चौबोला)

दो पंक्तियों या चार पंक्तियों का छंद जो हर दृश्य के बाद गाया जाता है। यही नौटंकी की पहचान है।

उदाहरण:

सुल्ताना डाकू आया रे, बंदूक लिए हाथ में

गरीबों का मसीहा बनकर, जमींदार के छक्के छुड़ाया रे…”

नगमा

शास्त्रीय राग पर आधारित लंबे गीत। प्रायः प्रेम या वीर रस के।

फिल्मी अंदाज के गीत (आधुनिक नौटंकी में)

1970-80 के बाद से फिल्मी धुनें भी खूब इस्तेमाल होने लगीं, जैसे मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम हैको नौटंकी स्टाइल में गाना।

4. वाद्य यंत्र (परंपरागत व आधुनिक)

परंपरागत:

ढोलक (मुख्य ताल वाद्य)

नगाड़ा

हारमोनियम

सारंगी (पुरानी नौटंकियों में)

मंजीरा, चिमटा, डफली

आधुनिक जोड़:

बनजो, बुलबुल तरंग, ऑक्टोपैड, सिंथेसाइजर, ड्रम सेट

5. गायकी की शैली

बहुत ऊँचा स्वर (चिल्लाकर गाना, दूर तक आवाज जाए इसलिए)

हाहाहायहाय…” जैसे आलाप

दो-तीन कलाकार एक साथ एक ही लाइन को अलग-अलग स्वर में गाते हैं (हarmonic effect)

अंत में हर गीत का तानबहुत लंबा खींचा जाता है

6. प्रसिद्ध नौटंकी संगीतकार/गायक

गुलाब बाई (मथुरा) पहली प्रसिद्ध महिला नौटंकी गायिका

रामदयाल शर्मा (कानपुर)

छोटी अमीना बाई

संक्षेप में कहें तो नौटंकी का संगीत लोक + अर्ध-शास्त्रीय + फिल्मी का अनोखा मिश्रण है, जिसमें ढोलक की थाप और ऊँचे स्वर की गायकी ही असली जादू पैदा करती है। यही कारण है कि दूर खेतों में बैठा किसान भी रात भर नौटंकी के गीत गुनगुनाता रहता है।

लोकनाट्य नौटंकी में प्रयोग होने वाले प्रमुख राग-रागिनी इस प्रकार है । दोहा, चौबोला, बहरतबील, सोरठा, लावणी, कड़ा, वार्ता, माड़, गीत, कड़ाशौर, गज़ल, छन्द, ठेठर, थियेटर, मसनवी, आसावरी, वीर छन्द, शैरख्याली, लावणी बनाम, शिकश्त, लगड़ी, गमक, खटका कब्बाली, दौड़, गाना, दादरा, झर, बेलमा, दुबोला, राग-विहाग, रेख्ता, भजन, गारी, आल्हा, कवित्त, छंदशिख, खमसा, गजल बहर कब्बाली, लावणी रंगत लँगड़ी, लावणी राग विहाग, दा. सा, सोहनी, दुबोला मत., सौ., चँ. खाँ., चतुरंग, थौ., लावणी ख्याल भैरवीसांड, दोग, ला.रं, सि. भौ. रंगत, रंगत रागिनी, बड़ी शिकश्त, ठुमरी, गज़ल मुस्ताद, सि. भौ., बहरतबील कब्बाली, लँगड़ी रंगत छोटी, मीड, मुरकी, गज़ल बनाम कब्बाली, कंलागड़ा, ड्रामा, पद्मा, कीर्तन, सारंग, दादरा, कहरवा, पूर्वी, झूमर, यमन, लावणी बहरतबील लावणी बहर शिकश्त, मुरकियाँ, तर्ज, झड़ी, काफिया, ख्याल, मल्हार, डोली, बारहमासा, बड़ा ख्याल, छोटी बहर का ख्याल, सखी दौड़, शेर, शार्दूल, विकिडित, डेढ़तुकी, सबैया, हरिगीतिका, जिले की ठुमरी, नारान्तक, कब्बाली तर्ज बहरे तबील, विकिडित, सवैया, रसिया,  इत्यादि धुनों का प्रयोग नौटंकी में किया जाता है । ऐसी लगभग एक सौ पचास धुनें है, जिनका प्रयोग नौटंकी में किया जाता है ।

नौटंकी में चौबोला” (चौबोले की बहर)

नौटंकी में सबसे ज़्यादा गाया जाने वाला और दर्शकों का सबसे चहेता अंदाज़ यही चौबोला है।

लोग इसे चौबोलाइसलिए कहते हैं क्योंकि हर मिसरा चार बोल (चार टुकड़े) का लगता है और उसकी लय बहुत तेज़, नाचने-थिरकने वाली होती है।

चौबोले की असली बहर (नौटंकी स्टाइल):

यह असल में बहर-ए-मुजारे मुसम्मन अख़रब मक़फ़ूफ़ महधूफ़ का लोक रूप है, लेकिन नौटंकी वालों ने इसे बहुत आसान और स्थिर कर दिया।

हर मिसरा ठीक १६ मात्राएँ का होता है और चार हिस्सों में बँटा लगता है:

४ + ४ + ४ + ४ = १६ मात्राएँ

वज़न (स्कैंडियन):

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन

या सरल बोलचाल में:

तक़-तक़ धुम-तक़ / तक़-तक़ धुम-तक़ / तक़-तक़ धुम-तक़ / तक़-तक़ धुम-तक़

ढोलक का ठेका भी यही बैठता है:

धा धिन धिन धा / धा धिन धिन धा / धा धिन धिन धा / ता धिन धिन धा

नौटंकी की मशहूर चौबोले की मिसालें:

सजन घर जाएँ तो जाइयो ना

मोसे रूठी रे साँवरिया ना

दिल ने पुकारा है आजा आजा

छोड़ के मत जा रे साँवरिया ना

अलबेला साँवरिया मोरा

काहे को सतावे मोरा

दिल की बात ना जाने कोई

दिल तोड़ के चले गए हो ना

 

लै जा रे कागा मोहे सन्देसवा

मोरे साँवरिया को पहुँचा देना

बिरहा की आग में जल रही हूँ मैं

उनको मेरी ख़बर सुना देना ।

बहर-ए-तवील

(असल में यह बहर-ए-तवील का एक ज़िहाफ़ वाला रूप है)

वज़न:

फ़ऊलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन मफ़ाईलुन

या बोलचाल में:

दुम-दुम तक़-तक़ दुम-तक़ तक़-तक़ दुम-दुम तक़-तक़ तक़-तक़

असली नौटंकी की मिसालें:

दिल में समंदर लिए फिरते हैं हम

आँखों में तूफ़ान लिए फिरते हैं हम

(दिल-मे-समं-दर-लिए-फिरते-हैं-हम × १४ मात्रा)

हाथ में तलवार लिए आ गए हैं

इश्क़ के बज़्म में हम छा गए हैं

ऐसे न देखो तो मर जाएँगे हम

तुम से बिछड़ कर तो मर जाएँगे हम

एक नज़र देख लो यारों ज़रा

दिल की पुकार सुनो यारों ज़रा

नौटंकी में खास बातें:

हर मिसरा ठीक १४ मात्रा का होना ज़रूरी है।

आख़िरी लफ़्ज़ में तुक (रदीफ़ + काफ़िया) बहुत सख़्ती से मिलाया जाता है।

ढोलक और नगाड़े पर दुम-तक़ तक़-तक़की ठेका इसी बहर पर बैठती है।

राग अक्सर पीलू, काफी, भैरवींमें गाए जाते हैं।