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Saturday, September 26, 2020

भिखारी ठाकुर और उनका नाट्य प्रयोग- डॉ. ओम प्रकाश भारती

भिखारी ठाकुर आधुनिक बोध के कविअभिनेतागायकनाटककार और नाट्यशिल्पी थे। औपनिवेशिक कालीन भोजपुरिया समाज के विस्थापन तथा उससे उपजी सामाजिक विसंगतियों को भिखारी ठाकुर ने प्रमुखता से अपनी रचनाओं के माध्यम से उद्-घाटित  किया। उनका नाट्य  प्रयोग भारतीय रंगमंच का नावाचार था । कबीर के बादहिन्दी प्रदेश में वे एक ऐसे चिंतक हुएजिन्होंने वहाँ की सामाजिक समस्याओं को अपनी रचनाओं में प्रखरता से उद्घाटित  किया।

  



बटोहीगिरमिटियारखेलिन आदि शब्दों का प्रचलन औपनिवेशिक काल में अप्रवासियों एवं विस्थापित भोजपुरी भाषियों की भावनात्मक क्षति का परिणाम था। मातृभूमि से बिछुड़ने की पीड़ा से ही बिदेसियाबटोहिया जैसे नाट्यगीत लोक हृदय से प्रस्फुटित हुए। यह सृर्जन क्रिया-प्रक्रिया जितनी रोमांचक हैउतनी ही दारुण 1857 के गदर के बाद ब्रितानी सरकार द्वाराजो भू-व्यवस्था पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के लोगों पर थोपी गईउनका परिणाम इतना भयावह हुआ कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्ध  तक इस अंचल के पच्चीस-तीस प्रतिशत लोगों को रोज़ी-रोटी की तलाश में घर-परिवारगाँवसंस्कृति को छोड़कर पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा। यह वही प्रदेश हैजहाँ 1857 के गदर के समय ब्रितानी कम्पनी सरकार का सबसे अधिक विरोध हुआ। 1857 के गदर में वे इस अंचल के जनसमूह की ताक़त सेभयभीत थे। प्रतिक्रियास्वरूप उन्होंने यहाँ के समाज को राजनैतिकसामाजिक और आर्थिक रूप से तोड़ने की योजना बनाई। उन्हें सफलता भी मिली। पूरे क्षेत्र पर औपनिवेशिक दण्डविधान लगाए गए। घोषण की नीति को कानूनी ज़ामा पहनाया गया। सामन्तवादी व्यवस्था का पुरज़ोर सम्पोषण आरंभ हुआ। सामन्तवादी व्यवस्था में आदमी तिनके की तरह उड़ जाता है। उसका परिवारउसका समाजउसकी अस्मिताउसकी जड़े  सब खोखली हो जाती हैं। तिस पर प्राकृतिक प्रकोपबाढ़ और सूखे के दंश ने लोगों को पलायन के लिए मजबूर किया। ‘इण्डेचर्ड लेबर’ व्यवस्था के तहत गिरमिटिया मज़दूर बनाकर लाखों लोग मारिशसनीदरलैण्ड्सब्रिटिश गुयानाजामासिया तथा त्रिनिडाडदक्षिण अफ्रीकासूरीनाम तथा फिज़ी आदि द्वीपों में बहला-फुसलाकर या जबरन ले जाए गए। रामायणमहाभारतगीताकबीर के दोहे के संबल के साथ कमरतोड़ मेहनत के बल पर इन लोगों ने बंजर पहाड़ और जंगलों को हरे-भरे खेतों में बदल दिया। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गए। राजनैतिक पहचान भी बनी। लेकिन जो क्षतिपूर्ति नहीं हो पाईवह हैभावनात्मक क्षति। आज डेढ़ सौ वर्ष बाद भी उनके मन से अपना गाँवसमाज और संस्कृति विस्मृत नहीं हुआ है। इसकी अभिव्यक्ति वहाँ के गीतकविताकहानीनाट्य आदि विधाओं में मिलती है। संस्कृति और मातृभूमि से बिछुड़ने की पीड़ा ने ही बिदेसिया संस्कृति को जन्म दिया। समुद्र पार जाने वाले बिदेसी हो गए। लेकिन अपने ही देश मेंघर से मात्रा चार-पाँच सौ किलोमीटर की दूरी पर रहने वालों को जब बिदेसी कहा गयातो इससे गहरी पीड़ा किसी भी समुदाय या जाति के लिए क्या हो सकती है। इसी पीड़ा से आरंभ हुआ सृजन। पीड़ा जब असहनीय हो जाती हैतब वह रागात्मक हो उठती है। इन्हीं रागों से गीतनृत्यनाट्य आदि विधाएँ निःसृत होती हैं।

विस्थापन और आप्रवासन ने ही बिदेसिया-बटोहिया संस्कृति को जन्म दिया। मारिशसनीदरलैण्ड्सब्रिटिश गुयानाजामासिया तथा त्रिनिडाडदक्षिण अफ्रीकासूरीनाम तथा फिजी आदि देशों में बिदेसिया और बटोहिया के कई गीत लोक कंठों से आज भी सुने जा सकते हैं। विस्थापन और आप्रवासन की समस्याओं को भिखारी ठाकुर ने अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया ।

भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर, 1887 कीपौष शुक्ल पंचमीसोमवार को छपरा जिले के कतुबपुर गाँव में हुआ। पिता का नाम दलसिंगार ठाकुर था। वे जाति के नाई थे। पुस्तैनी पेशा ही भरण पोषण का आधार था। गाँव के स्कूल से उन्होंने चौथी-पाँचवीं तक शिक्षा हासिल की। अपने जन्म के बारे में भिखारी ठाकुर ने एक जगह पर कहा है-

बारह सौ पंचानवबे जहिया

सुदी पूस पंचिमी हरे तहिया।

रोज सोमार ठीक दुपहरिया,

जन्म भइल ओही घरिया।।

बचपन के दिनों में भिखारी ठाकुर स्कूल के अलावा गायभैंसबकरी चराने में समय व्यतीत करते थे। रात के समय गाँव के चौपाल में भजन-कीर्तन गाना और सुनना उन्हें अच्छा लगता था। किशोरावस्था आने पर घर की ज़िम्मेदारी उन पर आ गई। भूमिहीन भिखारी के पास अर्थ उपार्जन हेतु परदेस जाने के अलावा दूसरा कोई चारा भी नहीं था। रोज़गार की खोज में खड़गपुर पहुँचे वहाँ उन्होंने हज़ामत का पुश्तैनी काम शुरू किया। उसके बाद मेदनीपुरकलकत्ता आदि कई जगहों पर घूमते रहेउनका सृजनशील व्यक्तित्व नई-नई संवेदनाओं को ग्रहण करता रहा। अपने भ्रमण के दौरान भिखारी ठाकुर ने महानगरों की समस्याओं को क़रीब से देखा। ख़ासकर रोज़गार की खोज में गाँव-घर से आए मज़दूरों की बदहाली ने उन्हें द्रवित किया। कलकत्ता इन दिनों स्वाधीनता आन्दोलन और सामाजिक जागरण का मुख्य केंद्र था। सभागोष्ठी और रंगमंच आदि माध्यमों से समाज सुधार के स्वर सुनाई पड़ते थे। भिखारी के समक्ष पूरा भोजपुर समाज थाजहाँ बाल-विवाहअनमेल-विवाहवैधव्यसंपत्तिमूलक विवादधार्मिक अंधविश्वासबहुविवाहनौजवानों का शहरों की ओर पलायन और व्यभिचार जैसी सामाजिक समस्याएँ फलित थी। भिखारी ने गाँव लौटने का निश्चय किया और वहीं सृजन कार्य आरंभ किया-

गइली मेदिनीपुर के जिला

ओहिजे देखली किछु रामलीला

घर पर आ के लगली रहे

गीत कवित कतहू केहू कहे

अरथ पूछि-पूछि के सीखी

दोहा छंद निज हाथे लिखि।

 

गीत और कविता के अलावा भिखारी ठाकुर ने लगभग एक दर्ज़न से अधिक नाटकों की रचना की। ये नाटक हैं। बिदेसियाभाई-बिरोधबेटी-वियोगविधवा-विलापकलयुग प्रेम उर्फ़ पियबा निसइलजिनगी के दीयनाअनमेल बिआहगबरघिचोरबिरहा-बहारगंगा स्नानराधेश्याम बहार तथा ननद-भौजाई आदि।

बिदेसिया नाटक

बिदेसिया परम्परा में भिखारी ठाकुर ने 1917 में बिदेसिया नाट्य की रचना की। रंगमंच पर बिदेसिया पहली बार था। बिदेसिया की समस्या को लेकर नाट्य आविष्करण भिखारी का अपना प्रयोग था तथा कला जगत के लिए नव अन्वेषण। लेकिन अन्य लोकविधाओं में बिदेसिया पहले से उपस्थित था। उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर 1850 के आसपास बिहार के चंपारण जिले के पंडितपुर गाँव (अब मोतिहारी जिलाके कबीर पंथी साधू केसोदास एक के निर्गुण में बिदेश शब्द का उल्लेख हुआ है-

भावे नही मोर भवनवाँहो  राम बिदेश गवनवाँ ।

भोजपुरी के एक अन्य कवि रामसकल द्विज ‘राम’ का सुन्दरी विलाप 1896 के आसपास प्रकाशित हुआ। इसमें बिदेसिया के गीत हैंजो सुरीनाममारिशसपिफज़ीआदि देशों में गए लोगों को संबोधित है। 1912 में कसौधन पुस्तकालय नरवास चौकगोरखपुर से एक पुस्तक प्यारी सुंदरी वियोग नाम से छपीजिसमें बिदेसिया के कुछ गीत संकलित हैं। 1887 के आसपास मुज़प्फपफ़रपुर के गुदर राय लिखित सुन्दरी विलाप में बिदेसिया के गीत मिलते हैं। भ्रमवश कुछ विद्वानों ने गुदर राय को बिदेसिया का प्रवर्तक मान लिया है। सुंदरी विलाप नाटक नहीं होकर गीतमाला हैजिसमें परदेस गए पति की ब्याहता की विरह वेदना चित्रित है। भिखारी ठाकुर का बिदेसियालोकनाट्य के शिल्प में विरचित है। निश्चित रूप से भिखारी ठाकुर का बिदेसिया नाट्य मौलिक और उनका अपना अन्वेषण है। भले ही कुछ गीत उन्होंने पहले से प्रचलित लिखित या मौखिक परम्परा से लिए हों।

बिदेसिया भिखारी ठाकुर का महत्त्वपूर्ण नाटक है। यही वह कथ्य और नाट्य श्ल्पि हैजिनसे बिदेशिया नाट्य शैली का प्रचलन हुआ। भिखारी ठाकुर की रंगदृष्टि जितनी परिपक्व बिदेसिया में हैउतनी अन्य नाटकों में नहीं।

बिदेसिया की कथावस्तु अति संक्षिप्त है। गाँव का एक युवक नवब्याहता पत्नी को छोड़कर कलकत्ता जाना चाहता है। पत्नी घर में ही रहने की विनती करती है। घर की बिगड़ती आर्थिक स्थिति से उद्विग्न युवक एक दिन पत्नी को बताए बिनालघुशंका के बहाने कलकत्ता चला जाता है। जाने से पहले अपने यार-दोस्तों को घर की देखभाल करने को कह जाता है।

कलकत्ता पहुँचकर यही ग्रामीण युवक ‘बिदेसी’ बन जाता है। कुछ दिनों में मेहनत-मज़दूरी कर अच्छा धन कमाता है। अचानक एक दिन उसकी भेंट एक रूपवती परित्यक्ता स्त्रा से हो जाती है। बिदेसी उस पर मोहित होता है। रूपवती स्त्री भी प्रेम पाश में उसे पफाँस लेती है ;भिखारी ठाकुर ने इस महिला को रंडी/रखेलिन कहा हैफिर दोनों साथ रहने लगते हैं। बिदेसी गाँवसमाज तथा अपनी नवब्याहता स्त्री को भूल जाता है।

उधर गाँव में बिदेसी की पत्नी प्यारी सुंदरीपति की याद में रोती-कलपती रहती है। पति के विदेश जाने से पूर्व संग रहने का सुख तथा जाने के बाद पति किस हाल में होंगेµकी चिन्ता से बिलखती रहती है। बस एक ही संकल्प है। एक दिन उसका पति अवश्य लौटेगा। एक दिन एक अधेड़ बटोही जो कलकत्ता कमाने जा रहा थाउनसे प्यारी सुन्दरी की भेंट होती है। सुंदरी का विलाप सुनकरबटोही उसके पति को खोजकर कलकत्ता से वापस भेज देने का वचन देता है।

इसी बीच गाँव का एक मनचला युवकजो बिदेसी को ‘भैया’ तथा प्यारी सुंदरी को ‘भौजी’ कहता हैप्यारी सुंदरी को बहला-पफुसलाकर उसका शील भंग करना चाहता है। सपफलता नहीं मिलने पर बलात्कार करने की चेष्टा करता है। प्यारी सुंदरी दृढ़ता से प्रतिवाद करती है। अड़ोस-पड़ोस के लोगों के आ जाने के कारण नक़ली देवर भाग खड़ा होता है।

कलकत्ता पहुँचने के बाद बटोही ‘बिदेसी’ को खोजना आरंभ करता है। प्यारी सुंदरी द्वारा बताए ‘डील-डौल’ से मेल खाते एक युवक से बटोही की भेंट होती है। बटोही उसे प्यारी सुंदरी की विरह दशा से अवगत कराता है। उसके अखंडित सतीत्व की पुष्टि करता है। बिदेसी की चेतना लौटती हैवह घर लौटने का निश्चय करता है। रखेलिन इस निश्चय का प्रतिवाद करती है। तरह-तरह के प्रलोभन और धमकियाँ भी देती है। बाड़ी वाला ;मकान मालिकद्धदुकानदारमोहल्ले के रंगदार सभी अपनी बकाया वसूली के बहाने बिदेसी का कपड़ासामानघड़ीनगदी छीन लेता है। बिदेसी ख़ाली हाथ गाँव लौटता है। सुंदरीपति की आवाज़ पहचानकर घर का दरवाज़ा खोलती है। ख़ुशी का ठिकाना नहींदोनों मिलते हैं। क्षेम-कुशल पूछनेकहने का दौर चलता है।

उधर कलकत्ता में रखेलिन अपने दो बच्चों के साथ गहने कपड़े लेकर बिदेसी के गाँव के लिए चलती है। कलकत्ते में राहजनी होती है। गुण्डों द्वारा सारे समान छीन लिए जाते हैं। रोती-बिलखतीपूछताछ करती रखेलिन बिदेसी के घर पहुँचने में सपफल होती है। बिदेसी उन्हें देख अचंभित होता है। हाँ-नाऔर अनुनय-विनय के बाद सभी हिलमिल कर गाँव में साथ रहने लगते हैं। मंगलकामना के साथ कथा यहीं समाप्त होती है।

भिखारी ठाकुर का बिदेसिया अपने समय के सबसे बड़े सत्य को उद्घाटित करता है। लोक-प्रचलित गीतों को उन्होंने अल्प कथानक और धारदारछोटे-छोटे संवादों में गूँथकर अद्भुत नाट्य शैली को जन्म दिया। बिदेसिया नाटक का कथानक एक नवब्याहता स्त्रा के पति को आर्थिक मजबूरी में कलकत्ता चले जाने की विवशता और पति की बाट जोहती असहाय नायिका की अन्तर्वेदना के इर्द-गिर्द घूमता है। नाटकीय घटना का विकास तब होता हैजब एक ‘बटोही’ द्वारा प्यारी सुंदरी का विरह संदेश कलकत्ता उसके पति तक पहुँचाया जाता है तथा रखेलिन के पफेर में पड़े बिदेसी को मुक्त कराकर गाँव लौटने के लिए विवश किया जाता है। बिदेसिया सिपर्फ़ असहाय विरह-दग्ध नायिका की व्यथा-कथा नहीं हैबल्कि रोज़ी-रोटी की तलाश में भटकते युवकों का गाँव से पलायन कर शहर जाने और पुनरवापसी की दारुण दास्तान भी है।

भिखारी ठाकुर ने अन्य नाटकों में तत्कालीन सामाजिक जीवन की विसंगतियों को यथार्थ रूप में उद्घाटित किया गया है। विधवा विलाप में अनमेल विवाह और बाल-विवाह पर प्रहार किया है। बेटी-बेचबा और लकाठू का ब्याह में पैसा लेकर बूढ़े के हाथ बेटी बेचने की घृणित प्रथा का भंडाफोड़ किया गया है। कहा जाता है कि छपरा जिले के किसी गाँव में एक बार बूढ़े के संग अल्पवयस की कन्या ब्याही जा रही थी। इस अवसर पर भिखारीनाच मंडली के साथ प्रदर्शन के लिए बुलाए गए थे। भिखारी ने गृहपति को बुलाकर कहाआज वे प्रदर्शन करने में असमर्थ हैंआपका ‘साटा’ वापिस किया जाता है। गृहपति ने हाथ जोड़कर कहा ‘‘ऐसा न करेंउनकी प्रतिष्ठा चली जाएगी।’’ पिफर भिखारी ने अपनी शर्त रखीकहा- ‘‘ये अपने साटे का रुपया वापस लीजिए। मैं नाच ज़रूर करूँगालेकिन अपनी पसंद के।’’ फिर भिखारी ने बेटी बेचबा का प्रदर्शन किया। नाटक बीच में रोकना पड़ाप्रसंग था बेटी बेचने वाले बाप से ससुराल से आई बेटी रो-रोकर कहती है-

          न के के लालच पाईबुढ से कइल सगाई

          माई के तू बतिया ना मनल हो बाबूजी।

          दिनवाँ बितेला रोईबात ना पूछत कोई,

          रतिया खाँ छतिया फाटत बा हो बाबूजी।।

अर्थात् ‘‘हे बाबूजी माँ के बार-बार समझाने के बाद भी आपने उसकी नहीं मानी और धन के लालच में बूढ़े से मेरा ब्याह कर दिया। दिन रोते बीतते हैं। रात में छाती फटने लगती है। कोई हाल-चाल पूछने वाला भी नहीं है।’’ बात यहीं नहीं थमती है-

          आखि से सूझत कमहरदम खींचत दम।

          मथवा के बरवा चवंरवा हटे बाबूजी।।

          मुंहवा मे दाँत नाहींभर मुँहे लार चुए।

          बोलेला तआवेला सड़ल बदबू बाबूजी।।

          पति कर देखि गतिपागल भइल मति।

          रोई-रोई करीले बिहान मोरे बाबूजी।...

अर्थात् ‘‘मेरे बूढ़े पति को आँखों से दिखाई नहीं देतावे हरदम हापँफते रहते हैं। उनके सिर के बाल झड़ गए हैं। उसे देखकर लगता है चंवर ;तालाबद्ध का पानी सूख गया है। उनके मुँह में दाँत नहीं हैमुँह से हमेशा लार टपकते रहता है। जब वह बोलता हैतो मुँह से बदबू आती है। पति की हालत देखकर मेरी पागल-सी दशा हो गई है। मैं रो-रो के रात काटती हूँ।’’

इसके बाद नाटक और शादी दोनों रुक गयालड़की के पिताजी ने पैसा वापिस करबूढ़े वर को खदेड़ दिया।

भाई विरोध में भिखारी ने समाज की टूटती संयुक्त परिवार की व्यवस्था को चित्रित किया है। यह टूटन अर्थाभाव के कारण व्यक्तिवादी दृष्ष्टिकोण से पनपी है। नाटक का केन्द्रीय पात्रा उपदर पत्नी के बहकावे में आकर सहोदर भाई की हत्या करवा देता है। भाई को मरवाने के बादपत्नी भी उसे छोड़ देने की धमकी देती है। बहुत हिल-हुज़्ज़त और मान-मनौती के बाद इस शर्त पर पत्नी साथ रहने को तैयार होती है कि उपदर उसे नए गहने ला देगा। उपदर गहने की चोरी में पकड़ा जाता है। थानेदार घूस माँगता है। उपदर घूस देने में असमर्थ है। उसकी पत्नी के पास कुछ गहने हैं। उपदर चाहता है कि उसकी पत्नी गहनों को बेचकर उसे छुड़ा लेगी। लेकिन ऐसा नहीं होताउपदर की पत्नी गहने बेचने से इनकार कर देती है। उपदर को चोरी के इलज़ाम में जेल हो जाती है।

नाटक गंगास्नान में स्त्रैण लोगों का वर्णन हैजो स्त्रा के बहकावे पर माँ-बाप को मारा-पीटा करते हैं और बाद में प्रायश्चित्त की आग में जलते रहते हैं। इसमें ऐसे-ऐसे छद्मवेशी ठगों का भी चित्राण हैजो पुत्रा देने के बहाने मेले में भोली-भाली युवतियों के तन और आभूषण से खेलते हैं। नशा समाज के लिए कोढ़ है। कलयुग प्रेम में भिखारी ठाकुर ने नशाखोरों और इनसे पनपने वाली बुराइयों पर तीखा प्रहार किया है। बेटी वियोग नाटक में बाल और अनमेल विवाह जैसी दारुण प्रथा की पोल खोली है। ननद भौजाई नाटक में भाभी के बहाने युवतियों को सतरंगी दुनिया को छोड़ गाँव के सोहदोंलुच्चों से सावधान रहने को कहा गया है। सूरवा नाटक में गाँव के अंधे और विवश लोगों का चित्राण हैजिनके पास पर्याप्त सम्पत्ति तो हैलेकिन उनका उपयोग दूसरे ही करते हैं।

दामाद वध में थोड़े पैसे के लिए साला बहनोई को अधमरा कर देता है। पति के लिए बहन भाई को पुलिस से पकड़वा देती है। कलकत्ते की हवा में मिल में काम करनेवाली ऐसी महिलाओं का वर्णन हैजो परिवार के भरण-पोषण के लिए तन बेचने को विवश है।

इस तरह भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में तत्कालीन सामाजिक बुराइयों की सिर्फ़ पोल ही नहीं खोलीबल्कि विभिन्न चरित्रों के माध्यम से उसका प्रतिकार भी किया है।

बिदेसिया नाटक में चार मुख्य पात्रा हैं। बिदेसी (गाँव का एक बेरोज़गार युवक)बटोही (एक अधेड़ पुरुष)प्यारी सुंदरी (बिदेसी की नवब्याहता स्त्री)रखेलिन (वेश्या जो कलकत्ते में रहती है)। इसके अलावा अन्य सहयोगी पात्र-देवर (गाँव का मनचला युवक)दोस्त (बिदेसी का शुभचिंतक)सूत्राधार (मल्लिक)दो बच्चे (रखेलिन के)एक ग्रामीण महिलासमाजी (दस-बारह लोगों की गायन-वाद्य मंडली) और ‘लेबार’ आदि शामिल हैं।

नाटक की भाषा भोजपुरी है। संवाद गद्य और गीत दोनों में हैं , लेकिन अधिकांश संवाद गेय हैं। जहाँ गद्य संवाद हैं- छोटेअभिव्यक्तिपूर्ण और धारदार हैं-

बटोहीसमाजी से कलकत्ता जाने का रेल किराया पूछता हैसमाजी उसे तीस रुपये की टिकट ख़रीदने को कहता है। टिकट से अंजान बटोही झुँझलाकर कहता हैउसके और कलकत्ते के बीच में सिर्फ़ रेलगाड़ी थीई टिकट कहाँ से आ गयी!

बटोही :         ए बबुआ ढब ढब!

समाजी:        का हबाबा?

बटोही :         हम टीसन पर जाइबए बबुआ!

समाजी:        ए बाबाहइहे रास्ता सीधे टीसन पर चल जाई।

बटोही :         अच्छा ए बबुआ ई बतावकि कलकाता के मसूल कतना बा।

समाज:       कलकाता के मसूल एह घरी तीस रुपया लागी।

बटोही:       (चिहाके) तीस रुपया लागीसवा रुपया में ना फरिआई?

समाजी:     सवा रुपया में त टिकठे ना मिलीमहराज!

बटोही :    बबुआकम सुने लउ काहम कहतानी रेलतूँ कहतार’ टिकठ।

समाजी:     टिकठे ना कटइबरेल प कइसे चढ़ब’?

बटोही:      का बबुआटिकठ प चढ़ा के रेल धसोर दिआई?

समाजी:     ना महाराजतीस गो रोपेया देब’ त एगो टिकठ मिली।

बटोही:      टिकठ काथी के?

समाजी:    कागज के।

बटोही:   कती मूटी के?

समाजी: हती मूटी के।

बटोही : हमरा के बुरबके समझतार’? तीस रोपेया लागे जात बात नान्ह-बार के सूते बइठे

           लायक ना होई’ लेके का कोई?

समाजी: कवना घर-दुआर ह’?

बटोही : अच्छा ए बबुआतीस रोपेया टिकठ में लाग गइल। रेल में कतना लागीबबुआ?

समाजी:  रेल में एको पइसा ना लागी।

बटोही:  अच्छा ए बबुआरेल में हमार एको पइसा ना लागी’ टिकठ के कवन काम बाहम रेल में बइठ’ के दमदमवले चल जाइब।

              (बटोही और समाजी का संवादबिदेसिया नाटक)

          लोक प्रचलित मुहावरेटकसाली शब्दों की झड़ी बिदेसिया नाटक में देखी जा सकती है। पद्य संवादस्थानीय लोकधुनों और लोक प्रचलित छंदों में लिखे हैं। लोरिकायनसोरठीआल्हाबिरहाबारहमासापूर्वीपचराकुँवर विजईनिर्गुणचौपाईकवित्त तथा चौबोला आदि लोकधुनों और छंदों का प्रयोग बिदेसिया नाटक में हुआ है। गीतों की भाषा असरदार और जीवंत है। भावअर्थध्वनि और लय अभिव्यक्ति को किस तरह धारदार बनाती हैइसकी बानगी बिदेसिया के गीतमय संवादों में द्रष्टव्य है-

बान्हि के पगरिया रगरिया मचावतारकवना नगरिया के हव’ तू बटोहिया।

हमरी जनानावाँ मकानावाँ भीतरवा मेंसाधि कर रहेली भवनवाँ बटोहिया।

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रंडी मे कुछ ना बाटेकुत्ता जइसे हाड़ चाटे,

एको नाहीं घाट तूहूँ लगबउ बिदेसिया।

छोड़ि द’ अधरममिजाज के नरम,

तूँ मनवाँ में करि लेहु सरम बिदेसिया।।

(धुन-पूर्वीप्रसंग बिदेसी-बटोही संवादनाटक-बिदेसिया)

भिखारी के नाटकों में शब्द-ध्वनि और पात्रों के नाम दर्शकों के मन में गुदगुदी पैदा करते है। भिखारी ने गंवई पात्रों का नामकरणउनके आचरण और व्यवहार के आधार पर किया है। बिदेसिया नाटक में ‘बटोही’ कलकत्ता जाते समय समाजी सेरेलवे स्टेशन का रास्ता पूछते हुए कहता है- ‘ए बबुआ ढब-एब’, यानी जो समाजी ढब-ढब की ध्वनि बजाता रहता है या जो कोई ताल नहीं बजा पाता हैउसे ढब-ढब कहा जाता है । और फिर ढब-ढब के साथ बेतुके सवाल-जवाब। बेतुकी बातें सिर्फ़ ढब-ढब को शोभा देगाभिखारी इस इल्म को बख़ूबी जानते थे। अन्य पात्रों के नाम भी उनकी सामाजिक स्थिति और आचार-व्यवहार के अनुकूल है-बिदेसीबटोहीरखेलिनउपकारीउपदरउजागरचटकलोभाउपातोझाँटलूउदबासउपदेष तथा दुखहारिन आदि। इस तरह के नाम और उनके उच्चारण ध्वनि ना सिर्फ़ दर्शकों को गुदगुदाता हैअपितु नाटकीय संप्रेषण को सघन और तीव्र बनाता है।

भिखारी ठाकुर के नाट्यदल में 18-20 कलाकार थेजिसमें सात-आठ अभिनेता और नर्त्तकतीन-चार ‘मोटिया’ (साज-सज्जा और वाद्ययंत्र ढोने वाले) तथा आठ-दस गवैये-वादक । भिखारी दल नायक थेजिन्हें दल के लोग उस्तादगुरु कहकर सम्बोधित करते थे। दल को मंडली या भिखारी तमाशा मंडली कहा जाता था। बिदेसिया नाट्य में सूत्रधार को ‘मल्लिक’, विदूषक को ‘लेबार’, अभिनेता को ‘नटुआ’ तथा नर्तक को ‘लौंडा’, (स्त्रीभेष  में पुरुष नर्तक) तथा गायन-वाद्य मंडली को समाजी कहा जाता है। नाट्य दल को मिलने वाले पारिश्रमिक में सबकी हिस्सेदारी थी। शादी-ब्याहमुंडनजनेऊ आदि मांगलिक अवसरों पर भिखारी के तमाशा दल को ‘साटा’ पर आमंत्रित किया जाता था। इसके अलावा सामाजिक आयोजनमेलेत्यौहार आदि के अवसर पर भिखारी स्वयं अपना प्रदर्शन करते थे। कहा जाता है कि नाट्यारंभ में भिखारी स्वयं दर्शकों से कह देते थे कि वे सिर्फ़ तमाशा दिखाने जा रहे हैंजिन्हें समझ में नहीं आता वो कृपया पहले ही उठ जाएँ।

बिदेसिया नाट्य का रंगमंच कोई विशेष तामझाम लिए नहीं होता है। भिखारी ठाकुर ने खुले मैदानचबूतरा तथा शहरी प्रेक्षागृह आदि जगहों पर नाट्य प्रदर्शन किए। लेकिन प्रदर्शन जब गाँवों में होता थातो दस से पंद्रह-हज़ार दर्शक होते थे। ऐसी स्थिति मेंवहाँ कोई मंच व्यवस्था कैसे कायम रह सकती थी। खुले मैदान में आठ-दस चौकियों को जोड़कर 15- 20 लम्बाई-चौड़ाई का मंच कुछ ही घंटों में तैयार कर लिए जाते थे/है। ऊपर घास-फूँस की छत्ती या चंदोबा टाँग दिया जाता है। बाँस या लकड़ी के खंबे से तीन-चार गैसबत्ती (पूर्व में मशाल) लटका दिया । बस प्रदर्शन के लिए मंच तैयार। दर्शक तीन ओर से घेरकर बैठते हैं। एक ओर समाजी बैठते हैं और उसी के पीछे साजघर होता है। कहा जाता है कि स्वतंत्रता से पहले भिखारी ठाकुर के प्रदर्शन देखने हेतु इतनी तादाद में लोग आने लगेकि ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदर्शन पूर्व अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया था। प्रदर्शन की अनुमति भी आसानी से नहीं मिल पाती थी।

बिदेसिया नाट्य में सभी कलाकार एक साथ मंच पर आते हैं। अन्य पारम्परिक नाट्य रूपों की तरह मुख्य प्रदर्शन से पूर्व पूर्वरंग का विधान यहाँ भी है। मंच पर आते ही गायन-वादन मंडली द्वारा ताल-वाद्य के सुरताल मिलान हेतुकोई लोकप्रिय धुन सामूहिक रूप से बजायी जाती है। अन्य अभिनेता भी समाजी के साथ मंच पर बैठ जाते हैं। सामूहिक वादन के बाद मंगलाचरणमंगलाचरण में विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुति की जाती हैइसे ‘सुमिरन’ भी कहा जाता है। यह ‘सुमिरन’ सूत्रधारमल्लिक या व्यास के नेतृत्व में आरंभ होता है। आरंभ में चौपाई जिसमें महादेवसीता-रामकृष्ण तथा हनुमान आदि की वंदना की जाती है। नाटक का नाम और विषयवस्तु की संक्षिप्त झलक चौपाई में ही दे दी जाती है। सिर्फ़ बिदेसिया नाटक के आरंभ में लौकिक संस्कृत में श्लोक हैंजिसमें ब्रह्माविष्णुमहेश्वरहनुमान तथा गुरु की वंदना की गई है। अन्य किसी और नाटक में संस्कृत श्लोक नहीं है। बेटी वियोग नाटक में चौपाई से पहले वार्तिक का संवाद है। यह भोजपुरी गद्य में है तथा दर्शकों को सम्बोधित है। भिखारी ठाकुर के बिदेसिया नाट्य में पूर्वरंग सिर्फ़ ‘सुमिरन’ या प्रदर्शन पूर्व की तैयारी तक सीमित नहीं हैंबल्कि सम्पूर्ण नाटक की संक्षिप्त भूमिका विभिन्न गीतों और गद्य संवादों के द्वारा पूर्वरंग में ही प्रस्तुत कर दी जाती है। इससे दर्शकों के दिल-दिमाग़ में नाटक की पृष्ठभूमि तैयार हो जाती हैजो नाट्यान्त तक प्रदर्शन से बँध जाते हैंजुड़ जाते हैं। भाव-विषय को लेकर ये गीत-संवाद जितने धारदार होते हैंउतना ही इसका संगीत पक्ष आकर्षक होता है। बिदेसिया नाटक के पूर्वरंग में जँतसारीलोरिकायनसोरठीबिरहा तथा निर्गुण जैसे लोकप्रिय धुनों पर आधारित गीत हैं। और बीच-बीच में सूत्रधार का ‘टोन’ ‘टोक’ पूर्वरंग को बड़ा ही सरस बनाता है। दो से तीन घंटों तक चलने वाले इस गीत-संवाद से दर्शकों का मन तनिक भी नहीं ऊबता है। रात गहराती हैबचे-खुचे लोग भी प्रदर्शन स्थल पर पहुँच जाते हैं। और अब समाजी की चौपाई के साथ पात्रों का (बिदेसी और प्यारी सुंदरी) मंच पर प्रवेशमुख्य अभिनय यहीं से आरंभ होता है।

भिखारी ठाकुर स्वयं एक अच्छे अभिनेता थे। बिदेसिया नाट्य के प्रायः सभी अभिनेता गाने में निपुण होते हैं। संवाद ऊँचे स्वरों में लयात्मक बोले जाते हैं। अभिनय की आधार भूमि लोक की अनुकृति है। भिखारी का प्रेरणा स्रोत लोक हैं । उनके नाटकों के पात्र सारे चरित्र लोक जीवन के प्रतिनिधि चरित्र है। भिखारी के सभी पात्र दर्शक के समक्ष ‘समाजी’ के साथ बैठते हैं। वहीं से बारी आने पर अभिनय के लिए उठते हैं और भूमिका समाप्त होने पर वापिस बैठ जाते हैं। पात्रों की वेशभूषा और रूपसज्जा आंचलिक और पारम्परिक होती है। कलाकार गेरूखड़ियाकाजलतथा मुर्दाशंख के सहारे स्वयं अपना ‘मेकअप’ करते हैं। वेशभूषा और रूपसज्जा के लिए भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में अद्भुत संकेत दिए हैं। गीतों की कड़ियों से ही पात्रों की वेशभूषा और डील-डौल का पता चलता हैयथा :

धोती पढ़धरिया धइ के कान्हावा पर चदरिया हो,

बबरिया झारिके नाहोइब’ कवना सहरिया हो बवरिया झारिके ना।

करिया ना गोर बाटेलामा नाही हउवन नाटे,

मझिला जवान साम सुन्दर बटोहिया,

घुठी प’ ले धोती कोरनकिया सुगा के ठोर,

सिर पर टोपीछाती चाकर बटोहिया।

किसी भी कल्पनाशील निर्देशक के लिए यह संकेत पर्याप्त है।

बिदेसिया नाट्य की संगीत योजना अति विशिष्ट है। भिखारी ठाकुर भोजपुरी लोक धुनों और छंदों के ज्ञाता थे। अकेले बिदेसिया नाटक की संगीत योजना के बारे में कहा जाए तोसम्पूर्ण भोजपुर अंचल के लोक धुनों का गुच्छ है। यदि किसी अध्येयता को भोजपुरी लोकगीत/संगीत और संस्कृति पर शोध करना हो तो उनके लिए भिखारी के नाटक पर्याप्त हैं। संस्कार गीतकार्य या श्रमगीतभक्तिपरक आदि गीतों की प्रचलित धुनों पर भिखारी ने गीत रचे। पूर्वीकजरीबारहमासाचैतीफागबिरहानिर्गुणझूमरजँतसारीसौरठीलोरिकायनआल्हापचरा (देवी गीत)चौबोलादोहाखेमटासवैयाकवित्त तथा चौपाई आदि लोकप्रिय धुन और छंदों का प्रयोग भिखारी ने अपने नाटकों में यथास्थान किया है। वाद्य यंत्रों मेंढोलकनगाड़ाहारमोनियममजीराझालखरताल भिखारी ठाकुर के रंगप्रयोग को विद्वानों ने बिदेसिया शैली/नाट्य कहा है। यह नामकरण तो रूढ़ हो चला हैलेकिन विभिन्न सभा गोष्ठी और मंच पर इस विषय पर बहस-विमर्श चल रहा है। विवाद तब अधिक गहरायाजब प्रसिद्ध रंग निर्देशक और अभिनेता सतीश आनंद ने अपने रंग प्रयोग को बिदेसिया कहा। सतीश जी ने बिदेसिया शैली में अमलीमाटी गाड़ीमैला आँचल आदि नाटकों की सफलतम प्रस्तुति की। भिखारी ठाकुर का बिदेसिया नाट्य लोकनाट्य के शिल्प में सृजित हैजिसमें सूत्राधारविदूषक (लेबार)समाजीगायन-वादन मंडलीआदि के सहारे नाट्य प्रस्तुति की जाती है। सतीश जी के बिदेसिया शैली में नट-नटीसूत्रधार विदूषकसमाजीगायन-वादन मंडली है। सिर्फ़ नट-नटी को छोड़कर अन्य सभी भिखारी के नाट्य प्रयोग में भी हैंकेवल भिखारी ही क्योंलगभग तत्कालीन सभी लोकनाट्यों में किसी-न-किसी रूप में उपस्थित है। लेकिन सतीश जी का नाट्य प्रयोग न लोकनाट्य है और न ही केवल लोकनाट्य शैलियों के शिल्प पर आधारित है। सतीश जी की ‘बिदेसिया’ शैली एक आधुनिक रंग प्रयोग हैजहाँ तमाम लोक विधाओंगीतनृत्यनाट्य को नाटकीय संप्रेषण बढ़ाने के उपकरण के रूप में प्रयोग में लाया गया है। भिखारी के बिदेसिया नाट्य में अधिकांश संवाद गीतों की कड़ियों में है। सतीश जी ने लोकगीतों और नृत्यों का प्रयोग नाटकीय अनुभूति को सघन और तीव्र बनाने के लिएगद्य संवादों के बीच किया है। यह तुलना इसलिए की गई हैकि दोनों ही प्रयोक्ताओं के प्रयोगों को अलग-अलग समझा जा सके। दोनों ही प्रयोक्ताओं का रंग अन्वेषण मौलिक है। भिखारी ठाकुर ने अपनी पूर्व परम्परा का समावेश अपने नाट्य प्रयोगों में किया है। सतीश जी के प्रयोगों में भी लोक परम्पराएँ उपस्थित हैंजिसके केन्द्र में बिहार की अन्य नाटकीय लोकविधाओं के अलावा भिखारी ठाकुर और बिदेसिया नाट्य भी है। बल्कि इस तरह के प्रयोग से मौलिकता का रंग कभी फीका नहीं होता। सतीश जी के प्रयोग से भिखारी ठाकुर की लोकप्रियता अंचल से बाहर देश भर में बढ़ीकारण दूसरे भी रहेलेकिन यह तथ्य भी अस्वीकार करने योग्य नहीं है। बिहार के दूसरे प्रतिभावान निर्देशक संजय उपाध्यायपिछले बीस वर्षों से भिखारी ठाकुर के बिदेसिया नाटक का मंचन आधुनिक शिल्प विधान के साथ करते आ रहे हैं।

जहाँ तक बिदेसिया को लोकनाट्य या पारम्परिक नाट्य कहने का सवाल है। बिदेसिया भिखारी ठाकुर द्वारा लोकनाट्य के शिल्प में विरचित नाट्य रूप है। भिखारी से पूर्व बिदेसिया के मंचन की परम्परा भोजपुर अंचल में नहीं थी और न ही भिखारी के बाद परम्परा बन पाई है। लेकिन भिखारी ने जिन गीतों/धुनों का प्रयोग अपने नाटकों में किया है उनमें से कुछ गीत भिखारी से पूर्व भी प्रचलित थे और आज भी लोककंठ में प्रवाहयमान है। आज भिखारी के नाटकों का मंचन उनके ही सहकर्मियों द्वारा किया जाता है। सिर्फ बिदेसिया और गबरघिचोर नाटकों का मंचन आधुनिक रंगप्रयोग के साथ विभिन्न शहरों में रहा है। भिखारी ठाकुर के सहकर्मियों द्वारा जो नाट्य मंचन हो रहे हैंवह निश्चित रूप से लोकनाट्य की प्रविधि और शिल्प में है। भिखारी ठाकुर के बिदेसिया नाट्य को लोक या पारम्परिक नाट्य कहलाने में बस एक कमी है वह है पारम्परिकता का निर्वाहजिसकी प्रतीक्षा की जा सकती है। अभी तत्काल तो बिदेसिया भिखारी ठाकुर का निजी रंग प्रयोग है।

आज भी भिखारी ठाकुर के नाटक की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। भिखारी के बाद उनके नाट्य दल को चलाने वाले कोई सुयोग्य उत्तराधिकारी नहीं हैफिर भी यह हैरत की बात है कि आज भिखारी ठाकुर को गुज़रे तीस वर्ष हुएउनका नाट्य दल बिखरा नहीं है। उनके पुराने सहयोगी बिदेसिया नाटकों का प्रदर्शन कर रहे हैं।

(  विशेष संदर्भ देखें: बिहार के पारंपरिक नाट्य – ओम प्रकाश भारती )

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रेम, प्रकृति और सौंदर्य का उत्सव - असमिया बिहु

 


लुइतर पारे पारे नासि थका नासोनी
कार जीर्यार तई
लुइत के पारे पारे नाचने वाली लड़की किसकी जियरी’ हैजिसके नाचने से धूल उड़ रही है...!

बोकाखात गाँव में सोमनाथ बोरा ने ढ़ोल की थाप और पैंपा की गगनभेदी आवाज़ के संग बीहु  का स्वर अलापा तो हजारों युवक-युवतियाँ किलकारियों के साथ थिरकने लगे। गूंजने लगे प्रेम और सौंदर्य के राग लुइत के पारे पारे’ (लुइत> ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे किनारे)। लुइत (लोहित) भी इतराने लगाउसके पारे- पारे कहूँआ’ (एक प्रकार का सफेद फूल) खिले हैंगाँव के डेका’(युवक) अपनी प्रेमिकाओं के लिए कपोफूल और नाहर फूल पाने के लिए लुइत के पारे - पारे खाक छान रहे हैं। काल को ईर्ष्या हो रही है वह लुइत से मौन प्रश्न कर रहा है- लुइत यह कैसा उत्सव है क्या तुम भूल गए निरीह लोगों की चीखअभी-अभी तो घाटी में दहशतगर्दों ने हजारों गीतों को हृदय में दफन कर दिया। लुइतक्या तुम गा सकते हो उसके लिए कोई गीतजिसकी प्रेमिका बिहुबान से अब आँखें पोंछ रही है। लुइततुम नाच सकते हो उसके बेकसूर- युवक का नाचजो अपनी प्रेमिका को कपोफूल भेंट करने की लालसा लिए असमय मृत्यु के आगोश में समा गया। लुइत क्या तुम गा सकते हो कोई हुसोरी’ जिससे इन दहशतगर्दों का पाषाण हृदय पिघले। लुइत क्या तुम बुला सकते हो शंकरदेव जैसे महापुरुषों कोजो इन्हे समझा सके। लुइत कल गरू’ बिहु  थाआज मानहू’ बिहु  है। मानूह बिहु  यानि मानव बिहु  । लुइत आज कुछ करोहम ऐसे नहीं थे देखो ना- गरूमानवप्रकृति हमारे पुरुखों ने सबके राग गाये हैंलुइत चलो इन्हें समझाएँ-  मानहुहे मानूहोर बाबे जोदिहे अकनो नाभाबे अकनो सहानुभूतिरे भिबिबो कोने नो कोआसमोनिया ....! (मानव यदि मानव के लिए नहीं सोचेंगेथोड़ी सी भी सहानुभूति से भी नहीं सोचेंगेतो कहो कोन सोचेगा ?) *


बिहु नृत्य 

* आलेख का प्रस्तुत अंश पूर्वोत्तर प्रवास के दौरान लिखा था, संदर्भ था-  बिहु  के समय 2007 में बराक घाटी में आतंकियों द्वारा बड़ी संख्या में  बिहार और उत्तर प्रदेश के निरीह प्रवासी मजदूरों की हत्या कर दी गयी थी।- प्रेम, प्रकृति और मानव को पूजने वाला समाज हिंसक कैसे हो सकता है ! आलेख का कुछ अंश रंग –प्रसंग(2007) के अंक में प्रकाशित है। ( पूरा आलेख पी डी एफ लिंक से पढ़ें)https://drive.google.com/file/d/1jQobHbIYsbnQyYyrCC-l2AVVNz4b0VyC/view?usp=sharing

आदिकालीन नाट्य - हरिवंश पुराण का नाट्य –अभिनय प्रसंग

 

आदिकालीन नाट्य रूपों  के संदर्भ में  ‘हरिवंश पुराण’ का विष्णुपर्व उल्लेखनीय है । हरिवंश पुराण का रचना काल 3री सदी माना जाता है । कुछ विद्वान इसे अश्वघोष(2री सदी) से पहले का मानते हैं। प्रदर्शनकारी कलाओं के  दृष्टिकोण से यह  महत्वपूर्ण ग्रंथ है । हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व में नृत्य और अभिनय संबंधी सामग्री अपने मौलिक रूप में मिलती है। इस पर्व के अंतर्गत दो प्रसंगों में ‘छालिक्य’ का उल्लेख हुआ है। छालिक्यवाद्य संगीत- नृत्यमय  अभिनयपरक कला ज्ञात होता है। मुद्रा तथा हाव- भावों का प्रदर्शन इस नृत्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हरिवंश पुराण में विष्णु के दस अवतारों का दृश्यपरक वर्णन हुआ है । कालांतर में कई लोकनाट्यों में दशावतार प्रसंग और हरिवंश पुराण के अन्य विविध प्रसंगों की मंचन परंपरा आरंभ हुई । हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व (91-93  अध्यायमें भद्र नामक नट तथा यादव कुमारों यथा प्रद्युम्नसाम्ब आदि द्वारा वज्रनाभपुर में ‘रामायण’ और ‘रंभाभिसार’ नाटक के प्रदर्शन का उल्लेख हुआ है-

...तदनन्तर वर प्राप्त किये हुए उस नटने वहाँ सुपुर में नृत्य किया और पुरवासियों के मन में महान् हर्ष भर दिया।  उसने रामायण नामक महाकाव्य की कथावस्तु को लेकर वहाँ एक नाटक किया। उसमें यह दिखाया गया कि राक्षस राज रावण के वध की इच्छा से अप्रमेय स्वरूप भगवान् विष्णु का भूतल पर अवतार हुआ ।[1] भरतनन्दन!  रामलक्ष्मणशत्रुघ्न , भरतऋषि शृंग  तथा शान्ता का वेश उन्हीं के जैसे रूपवाले नटों ने धारण किया था।।8  राजन्! जो राम के समय में जीवित थेवे बूढ़े दानव भी उन्हें देखकर आश्चर्य चकित हो गये और कहने लगेइनका रूप तो ठीक उन्हीं व्यक्तियों के तुल्य है।।उनके संस्कार (वेश-धारण)अभिनयप्रस्तावों (क्रिया-प्रसंगों ) का धारण तथा प्रवेश (पात्रों का प्रथम दर्शन) देखकर सभी दानव बड़े विस्मय में पड़ गये थे।।10 उस नाटक में अनुरक्त हुए वे असुरगण नाट्य  विषयों में बारम्बार उठ-उठकर बड़ी प्रसन्नता के साथ आश्चर्ययुक्त कोलाहल करते और संतुष्ट  हो नटों को वस्त्रगले का भूषणकंकणमनोहर हेमवैदूर्यभूषित हार देते थे।।11-12 दानवराज का वह आदेश सुनकर शाखा नगर निवासी असुर नटवेशधारी यादवों को रमणीय वज्रपुर में ले गये। तत्पश्चात् जब वे नट पूर्ण विश्राम कर चुकेतब महाबली वज्रनाभ ने उन्हें बहुत-से रत्न देकर नाट्यकला का प्रदर्शन करने के लिए आज्ञा दी।।19 नरेश्वर! अन्तःपुर की स्त्रियों को पर्दे की ओट में जहाँ से वे अपने नेत्रों द्वारा सब कुछ देख सकती थींबिठाकर मनस्वी वज्रनाभ स्वयं भी जाति-भाइयों के साथ उन नटों का अभिनय देखने के लिये बैठा।।20 भयंकर कर्म करने वाले वे यादव कुमार भी उपयुक्त  शृंगार करके नटवेश धारण किये और नृत्य का उपक्रम करने लगे।।21 फिर तो घन (झाँझ और करताल आदि)सुषिर (मुरली)मुरज (मृदंग)आनक (ढोल या नगाड़ा) तथा वीणा के स्वरों से मिश्रित दूसरे-दूसरे बाजे उन नटों द्वारा बजाये जाने लगे।।22।। तम्पश्चात् यादव कुमारों के साथ आयी हुई वारांगनाएँ देव गांधार नामक छालिक्य का गान करने लगींजो कानों को अमृत के समान मधुर प्रतीत होता था। वह श्रोता के मन और कान दोनों को सुख देने वाला था।।23।। गांधार  आदि सातों को व्याप्त करके स्थित होने वाले जो त्रिविध ग्राम (स्वरों के समूह)वसन्त आदि राग तथा गंगावतरण नामक गीत विशेष हैंउन्हें रागान्तर से मिश्रितव्याप्त तथा रमणीय बनाकर वे अपनी मधुर स्वर सम्पत्ति के द्वारा गाने लगीं।।24।। कार्यवश नटभाव को प्राप्त हुए पराक्रम सम्पन्न प्रद्युम्नगद और साम्ब नान्दी[2] बजाने लगे।।26।। उस समय नान्दी (मांगलिक पद्य पाठ)- के अंत में रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न ने गंगावतरण  से सम्बन्ध रखने वाले श्लोक का उत्तम अभिनय के साथ पाठ किया।।27।।

तत्पश्चात् कुबेर लोक संबंधी ‘रम्भाभिसार’ नामक नाटक का वे सब लोग अभिनय करने लगे। शूर नामक यादव रावण रूप से उपस्थित हुए। मनोवती नामक वारंगना  ने रम्भा का वेष धरण किया।।28।। प्रद्युम्न ही नलकूबर बने। साम्ब उनके विदूषक बनकर तदनुरूप कार्य करने लगे। यादव कुमारों ने माया से वहाँ कैलास को ही मूर्तिमान कर दिया।।29।। क्रोध में भरे हुए नलकूबर ने जिस प्रकार दुरात्मा रावण को शाप दिया और जिस तरह रम्भा को सान्तवना प्रदान कीइस प्रकरण काजिसके द्वारा सर्वज्ञ महात्मा नारद मुनि की कीर्तिपर प्रकाश पड़ता हैउन वीर यादव कुमारों  ने नाटक द्वारा प्रदर्शन किया।।30-31।। अत्यन्त तेजस्वी भीमवंशियों के पाद-विक्षेपपूर्वक किये गये नृत्य और अभिनय से संतुष्ट हुए ।

भरतनन्दन ! उन दानवों ने यादव कुमारों को दिव्य शीतल एवं सरस चन्दनअगुरु आदि श्रेष्ठ सुगन्धित  पदार्थ तथा चिन्तन करने मात्र से सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवाले उदार चिन्तामणि नामक रत्न भी दिये। पुरुषप्रवर! नरेश्वर! वहाँ बहुत बार नाटक देखने को अवसर मिले 35-37।।

 

उपरोक्त उल्लेखों में  नाट्य प्रदर्शन संबंधी निम्नलिखित तथ्य अवलोकनीय है-

 

-          नाट्य प्रदर्शन में गीतवाद्य  एवं नृत्यों सा समुचित प्रयोग हुआ है।(श्लोक संख्या- 22)

-           नट /अभिनेता गायन ,वाद्य तथा नृत्य में निपुण हैं ।(श्लोक संख्या- 26-27)

-          प्रदर्शन में विदूषक की उपस्थिति है । (श्लोक संख्या- 29)

-          प्रस्तावना और नांदी पाठ का प्रचलन था । (श्लोक संख्या- 1027 )

-          नाट्य प्रस्तुति में स्त्रियों की सहभागिता थी तथा स्त्री पात्रों की भूमिका स्त्रियों द्वारा की जाती थी ।

(श्लोक संख्या- 23,28 )

-          रूपसज्जावस्त्र तथा अलंकरण पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता था ।(श्लोक संख्या- 10)

-          पात्रों की भूमिका (रोल) का निर्धारण कलाकारों के शारीरिक एवं चारित्रिक विशेषताओं के आधार पर निर्धारित होता थी। (श्लोक संख्या- 9)

-          नाट्य प्रदर्शन के लिए  प्रेक्षकों द्वारा उपहार या मानदेय देने का प्रचलन था। (श्लोक संख्या- 11, 35)

 

उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि हरिवंश पुराण में वर्णित नाट्य प्रस्तुति का शिल्प लोकनाट्यों के समीप है ।  “तत्पश्चात् कुबेर लोक संबंधी ‘रम्भाभिसार’ नामक नाटक का वे सब लोग अभिनय करने लगे” (हरिवंश पुराण के श्लोक 28)- यहाँ लोक संबंधी नाटक से तात्पर्य , लोक नाट्य परंपरा से हो सकता है।  हरिवंश पुराण का यह विवरण एक ओर नाट्यशास्त्र आधारित प्रदर्शन पद्धति को संपुष्ट करता हैवहीं तत्कालीन समाज में लोकनाट्यों के प्रदर्शन की उपस्थिति को दर्शाता है।

 

 

 

शोध प्रश्न : 1. भारतीय परंपरा में किसी भी प्रकार की नाट्य प्रस्तुति का क्या ये पहला विवरण है?  तर्क , विवरण के साथ अभिमत दें।

2. अश्व घोष और भास के नाटक क्या इस समय तक लिखे जा चुके थे ? अश्वघोष और भास के नाटकों में       

    उल्लखित रंग निर्देशों से तुलनात्मक अध्ययन करें।

    3. संस्कृत नाटक की प्रस्तुति शिल्प और हरिवंश पुराण में वर्णित नाट्य प्रस्तुति के  शिल्प में क्या

         समानताएँ और  विभिन्नताएँ हैं , टिप्पणी करें।

 

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[1] रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम्।

 जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ।।6

 

[2] एक प्रकार का विशिष्ट वाद्य