भिखारी ठाकुर आधुनिक बोध के कवि, अभिनेता, गायक, नाटककार और नाट्यशिल्पी थे। औपनिवेशिक कालीन भोजपुरिया समाज के विस्थापन
तथा उससे उपजी सामाजिक विसंगतियों को भिखारी ठाकुर ने प्रमुखता से अपनी रचनाओं के
माध्यम से उद्-घाटित किया। उनका नाट्य प्रयोग भारतीय रंगमंच का नावाचार था । कबीर के बाद, हिन्दी प्रदेश में वे एक ऐसे चिंतक हुए, जिन्होंने
वहाँ की सामाजिक समस्याओं को अपनी रचनाओं में प्रखरता से उद्घाटित किया।
बटोही, गिरमिटिया, रखेलिन
आदि शब्दों का प्रचलन औपनिवेशिक काल में अप्रवासियों एवं विस्थापित भोजपुरी
भाषियों की भावनात्मक क्षति का परिणाम था। मातृभूमि से बिछुड़ने की पीड़ा से ही
बिदेसिया, बटोहिया जैसे नाट्य, गीत लोक हृदय से प्रस्फुटित हुए। यह सृर्जन क्रिया-प्रक्रिया जितनी रोमांचक
है, उतनी ही दारुण 1857 के गदर के बाद ब्रितानी सरकार द्वारा, जो
भू-व्यवस्था पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के लोगों पर थोपी गई, उनका परिणाम इतना भयावह हुआ कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्ध तक इस अंचल के पच्चीस-तीस प्रतिशत लोगों को रोज़ी-रोटी की तलाश में
घर-परिवार, गाँव, संस्कृति
को छोड़कर पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा। यह वही प्रदेश है, जहाँ 1857 के गदर के समय ब्रितानी कम्पनी
सरकार का सबसे अधिक विरोध हुआ। 1857 के गदर में वे
इस अंचल के जनसमूह की ताक़त से, भयभीत थे।
प्रतिक्रियास्वरूप उन्होंने यहाँ के समाज को राजनैतिक, सामाजिक
और आर्थिक रूप से तोड़ने की योजना बनाई। उन्हें सफलता भी मिली। पूरे क्षेत्र पर
औपनिवेशिक दण्डविधान लगाए गए। घोषण की नीति को कानूनी ज़ामा पहनाया गया। सामन्तवादी
व्यवस्था का पुरज़ोर सम्पोषण आरंभ हुआ। सामन्तवादी व्यवस्था में आदमी तिनके की तरह उड़
जाता है। उसका परिवार, उसका समाज, उसकी अस्मिता, उसकी जड़े सब खोखली हो जाती हैं। तिस पर प्राकृतिक प्रकोप, बाढ़ और सूखे के दंश ने लोगों को पलायन के लिए मजबूर किया। ‘इण्डेचर्ड लेबर’ व्यवस्था के तहत गिरमिटिया
मज़दूर बनाकर लाखों लोग मारिशस, नीदरलैण्ड्स, ब्रिटिश गुयाना, जामासिया तथा त्रिनिडाड, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम तथा फिज़ी आदि द्वीपों
में बहला-फुसलाकर या जबरन ले जाए गए। रामायण, महाभारत, गीता, कबीर के दोहे के संबल के साथ कमरतोड़
मेहनत के बल पर इन लोगों ने बंजर पहाड़ और जंगलों को हरे-भरे खेतों में बदल दिया।
आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गए। राजनैतिक पहचान भी बनी। लेकिन जो क्षतिपूर्ति
नहीं हो पाई, वह है- भावनात्मक
क्षति। आज डेढ़ सौ वर्ष बाद भी उनके मन से अपना गाँव, समाज
और संस्कृति विस्मृत नहीं हुआ है। इसकी अभिव्यक्ति वहाँ के गीत, कविता, कहानी, नाट्य
आदि विधाओं में मिलती है। संस्कृति और मातृभूमि से बिछुड़ने की पीड़ा ने ही बिदेसिया
संस्कृति को जन्म दिया। समुद्र पार जाने वाले बिदेसी हो गए। लेकिन अपने ही देश में, घर से मात्रा चार-पाँच सौ किलोमीटर की दूरी पर रहने वालों को जब बिदेसी
कहा गया, तो इससे गहरी पीड़ा किसी भी समुदाय या जाति के
लिए क्या हो सकती है। इसी पीड़ा से आरंभ हुआ सृजन। पीड़ा जब असहनीय हो जाती है, तब वह रागात्मक हो उठती है। इन्हीं रागों से गीत, नृत्य, नाट्य आदि विधाएँ निःसृत होती हैं।
विस्थापन और आप्रवासन ने ही बिदेसिया-बटोहिया
संस्कृति को जन्म दिया। मारिशस, नीदरलैण्ड्स, ब्रिटिश गुयाना, जामासिया तथा त्रिनिडाड, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम तथा फिजी आदि देशों में बिदेसिया और बटोहिया के कई गीत लोक कंठों
से आज भी सुने जा सकते हैं। विस्थापन और आप्रवासन की समस्याओं को भिखारी ठाकुर ने
अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया ।
भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर,
1887 की, पौष शुक्ल पंचमी, सोमवार को छपरा जिले के कतुबपुर गाँव में हुआ। पिता का नाम दलसिंगार ठाकुर
था। वे जाति के नाई थे। पुस्तैनी पेशा ही भरण पोषण का आधार था। गाँव के स्कूल से
उन्होंने चौथी-पाँचवीं तक शिक्षा हासिल की। अपने जन्म के बारे में भिखारी ठाकुर ने
एक जगह पर कहा है-
बारह सौ पंचानवबे जहिया
सुदी पूस पंचिमी हरे तहिया।
रोज सोमार ठीक दुपहरिया,
जन्म भइल ओही घरिया।।
बचपन के दिनों में भिखारी ठाकुर स्कूल के अलावा गाय, भैंस, बकरी चराने में समय व्यतीत करते थे। रात के समय गाँव के चौपाल में
भजन-कीर्तन गाना और सुनना उन्हें अच्छा लगता था। किशोरावस्था आने पर घर की
ज़िम्मेदारी उन पर आ गई। भूमिहीन भिखारी के पास अर्थ उपार्जन हेतु परदेस जाने के
अलावा दूसरा कोई चारा भी नहीं था। रोज़गार की खोज में खड़गपुर पहुँचे वहाँ उन्होंने
हज़ामत का पुश्तैनी काम शुरू किया। उसके बाद मेदनीपुर, कलकत्ता
आदि कई जगहों पर घूमते रहे, उनका सृजनशील व्यक्तित्व
नई-नई संवेदनाओं को ग्रहण करता रहा। अपने भ्रमण के दौरान भिखारी ठाकुर ने महानगरों
की समस्याओं को क़रीब से देखा। ख़ासकर रोज़गार की खोज में गाँव-घर से आए मज़दूरों की
बदहाली ने उन्हें द्रवित किया। कलकत्ता इन दिनों स्वाधीनता आन्दोलन और सामाजिक
जागरण का मुख्य केंद्र था। सभा, गोष्ठी और रंगमंच आदि
माध्यमों से समाज सुधार के स्वर सुनाई पड़ते थे। भिखारी के समक्ष पूरा भोजपुर समाज
था, जहाँ बाल-विवाह, अनमेल-विवाह, वैधव्य, संपत्तिमूलक विवाद, धार्मिक अंधविश्वास, बहुविवाह, नौजवानों का शहरों की ओर पलायन और व्यभिचार जैसी सामाजिक समस्याएँ फलित
थी। भिखारी ने गाँव लौटने का निश्चय किया और वहीं सृजन कार्य आरंभ किया-
गइली मेदिनीपुर के जिला
ओहिजे देखली किछु रामलीला
घर पर आ के लगली रहे
गीत कवित कतहू केहू कहे
अरथ पूछि-पूछि के सीखी
दोहा छंद निज हाथे लिखि।
गीत और कविता के अलावा भिखारी ठाकुर ने लगभग एक दर्ज़न से अधिक
नाटकों की रचना की। ये नाटक हैं। बिदेसिया, भाई-बिरोध, बेटी-वियोग, विधवा-विलाप, कलयुग प्रेम उर्फ़ पियबा निसइल, जिनगी के दीयना, अनमेल बिआह, गबरघिचोर, बिरहा-बहार, गंगा स्नान, राधेश्याम बहार तथा ननद-भौजाई आदि।
बिदेसिया नाटक
बिदेसिया परम्परा में भिखारी ठाकुर ने 1917 में बिदेसिया नाट्य की रचना की।
रंगमंच पर बिदेसिया पहली बार था। बिदेसिया की समस्या को लेकर नाट्य आविष्करण
भिखारी का अपना प्रयोग था तथा कला जगत के लिए नव अन्वेषण। लेकिन अन्य लोकविधाओं
में बिदेसिया पहले से उपस्थित था। उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर 1850 के आसपास बिहार के चंपारण जिले के पंडितपुर गाँव (अब मोतिहारी जिला) के कबीर पंथी साधू केसोदास
एक के निर्गुण में बिदेश शब्द का उल्लेख हुआ है-
भावे नही मोर भवनवाँ, हो राम बिदेश
गवनवाँ ।
भोजपुरी के एक अन्य कवि रामसकल द्विज ‘राम’ का सुन्दरी
विलाप 1896 के आसपास प्रकाशित हुआ। इसमें बिदेसिया
के गीत हैं, जो सुरीनाम, मारिशस, पिफज़ी, आदि देशों में गए लोगों को संबोधित है। 1912 में कसौधन पुस्तकालय नरवास चौक, गोरखपुर से एक
पुस्तक प्यारी सुंदरी वियोग नाम से छपी, जिसमें
बिदेसिया के कुछ गीत संकलित हैं। 1887 के आसपास
मुज़प्फपफ़रपुर के गुदर राय लिखित सुन्दरी विलाप में बिदेसिया के गीत मिलते हैं।
भ्रमवश कुछ विद्वानों ने गुदर राय को बिदेसिया का प्रवर्तक मान लिया है। सुंदरी
विलाप नाटक नहीं होकर गीतमाला है, जिसमें परदेस गए पति
की ब्याहता की विरह वेदना चित्रित है। भिखारी ठाकुर का बिदेसिया, लोकनाट्य के शिल्प में विरचित है। निश्चित रूप से भिखारी ठाकुर का
बिदेसिया नाट्य मौलिक और उनका अपना अन्वेषण है। भले ही कुछ गीत उन्होंने पहले से
प्रचलित लिखित या मौखिक परम्परा से लिए हों।
बिदेसिया भिखारी ठाकुर का महत्त्वपूर्ण नाटक है।
यही वह कथ्य और नाट्य श्ल्पि है, जिनसे बिदेशिया नाट्य शैली का प्रचलन हुआ। भिखारी ठाकुर की रंगदृष्टि
जितनी परिपक्व बिदेसिया में है, उतनी अन्य नाटकों में
नहीं।
बिदेसिया की कथावस्तु अति संक्षिप्त है। गाँव का एक युवक नवब्याहता
पत्नी को छोड़कर कलकत्ता जाना चाहता है। पत्नी घर में ही रहने की विनती करती है। घर
की बिगड़ती आर्थिक स्थिति से उद्विग्न युवक एक दिन पत्नी को बताए बिना, लघुशंका के बहाने कलकत्ता
चला जाता है। जाने से पहले अपने यार-दोस्तों को घर की देखभाल करने को कह जाता है।
कलकत्ता पहुँचकर यही ग्रामीण युवक ‘बिदेसी’ बन जाता है।
कुछ दिनों में मेहनत-मज़दूरी कर अच्छा धन कमाता है। अचानक एक दिन उसकी भेंट एक
रूपवती परित्यक्ता स्त्रा से हो जाती है। बिदेसी उस पर मोहित होता है। रूपवती
स्त्री भी प्रेम पाश में उसे पफाँस लेती है ;भिखारी
ठाकुर ने इस महिला को रंडी/रखेलिन कहा है, फिर दोनों
साथ रहने लगते हैं। बिदेसी गाँव, समाज तथा अपनी
नवब्याहता स्त्री को भूल जाता है।
उधर गाँव में बिदेसी की पत्नी प्यारी सुंदरी, पति की याद में रोती-कलपती
रहती है। पति के विदेश जाने से पूर्व संग रहने का सुख तथा जाने के बाद पति किस हाल
में होंगेµकी चिन्ता से बिलखती रहती है। बस एक ही संकल्प है।
एक दिन उसका पति अवश्य लौटेगा। एक दिन एक अधेड़ बटोही जो कलकत्ता कमाने जा रहा था, उनसे प्यारी सुन्दरी की भेंट होती है। सुंदरी का विलाप सुनकर, बटोही उसके पति को खोजकर कलकत्ता से वापस भेज देने का वचन देता है।
इसी बीच गाँव का एक मनचला युवक, जो बिदेसी को ‘भैया’ तथा प्यारी सुंदरी को ‘भौजी’ कहता है, प्यारी सुंदरी को बहला-पफुसलाकर उसका
शील भंग करना चाहता है। सपफलता नहीं मिलने पर बलात्कार करने की चेष्टा करता है।
प्यारी सुंदरी दृढ़ता से प्रतिवाद करती है। अड़ोस-पड़ोस के लोगों के आ जाने के कारण
नक़ली देवर भाग खड़ा होता है।
कलकत्ता पहुँचने के बाद बटोही ‘बिदेसी’ को खोजना आरंभ करता है। प्यारी सुंदरी द्वारा बताए ‘डील-डौल’ से मेल खाते एक युवक से बटोही की भेंट
होती है। बटोही उसे प्यारी सुंदरी की विरह दशा से अवगत कराता है। उसके अखंडित
सतीत्व की पुष्टि करता है। बिदेसी की चेतना लौटती है, वह
घर लौटने का निश्चय करता है। रखेलिन इस निश्चय का प्रतिवाद करती है। तरह-तरह के
प्रलोभन और धमकियाँ भी देती है। बाड़ी वाला ;मकान
मालिकद्ध, दुकानदार, मोहल्ले
के रंगदार सभी अपनी बकाया वसूली के बहाने बिदेसी का कपड़ा, सामान, घड़ी, नगदी
छीन लेता है। बिदेसी ख़ाली हाथ गाँव लौटता है। सुंदरी, पति
की आवाज़ पहचानकर घर का दरवाज़ा खोलती है। ख़ुशी का ठिकाना नहीं, दोनों मिलते हैं। क्षेम-कुशल पूछने, कहने का
दौर चलता है।
उधर कलकत्ता में रखेलिन अपने दो बच्चों के साथ
गहने कपड़े लेकर बिदेसी के गाँव के लिए चलती है। कलकत्ते में राहजनी होती है।
गुण्डों द्वारा सारे समान छीन लिए जाते हैं। रोती-बिलखती, पूछताछ करती रखेलिन बिदेसी
के घर पहुँचने में सपफल होती है। बिदेसी उन्हें देख अचंभित होता है। हाँ-ना, और अनुनय-विनय के बाद सभी हिलमिल कर गाँव में साथ रहने लगते हैं।
मंगलकामना के साथ कथा यहीं समाप्त होती है।
भिखारी ठाकुर का बिदेसिया अपने समय के सबसे बड़े
सत्य को उद्घाटित करता है। लोक-प्रचलित गीतों को उन्होंने अल्प कथानक और धारदार, छोटे-छोटे संवादों में
गूँथकर अद्भुत नाट्य शैली को जन्म दिया। बिदेसिया नाटक का कथानक एक नवब्याहता
स्त्रा के पति को आर्थिक मजबूरी में कलकत्ता चले जाने की विवशता और पति की बाट
जोहती असहाय नायिका की अन्तर्वेदना के इर्द-गिर्द घूमता है। नाटकीय घटना का विकास
तब होता है, जब एक ‘बटोही’ द्वारा प्यारी सुंदरी का विरह संदेश कलकत्ता उसके पति तक पहुँचाया जाता है
तथा रखेलिन के पफेर में पड़े बिदेसी को मुक्त कराकर गाँव लौटने के लिए विवश किया
जाता है। बिदेसिया सिपर्फ़ असहाय विरह-दग्ध नायिका की व्यथा-कथा नहीं है, बल्कि रोज़ी-रोटी की तलाश में भटकते युवकों का गाँव से पलायन कर शहर जाने
और पुनरवापसी की दारुण दास्तान भी है।
भिखारी ठाकुर ने अन्य नाटकों में तत्कालीन सामाजिक
जीवन की विसंगतियों को यथार्थ रूप में उद्घाटित किया गया है। विधवा विलाप में
अनमेल विवाह और बाल-विवाह पर प्रहार किया है। बेटी-बेचबा और लकाठू का ब्याह में
पैसा लेकर बूढ़े के हाथ बेटी बेचने की घृणित प्रथा का भंडाफोड़ किया गया है। कहा
जाता है कि छपरा जिले के किसी गाँव में एक बार बूढ़े के संग अल्पवयस की कन्या
ब्याही जा रही थी। इस अवसर पर भिखारी, नाच मंडली के साथ प्रदर्शन के लिए बुलाए गए थे।
भिखारी ने गृहपति को बुलाकर कहा, आज वे प्रदर्शन करने
में असमर्थ हैं, आपका ‘साटा’ वापिस किया जाता है। गृहपति ने हाथ जोड़कर कहा ‘‘ऐसा न करें, उनकी प्रतिष्ठा चली जाएगी।’’ पिफर भिखारी ने अपनी शर्त रखी, कहा- ‘‘ये अपने साटे का रुपया वापस लीजिए। मैं नाच ज़रूर करूँगा, लेकिन अपनी पसंद के।’’ फिर भिखारी ने बेटी
बेचबा का प्रदर्शन किया। नाटक बीच में रोकना पड़ा, प्रसंग
था बेटी बेचने वाले बाप से ससुराल से आई बेटी रो-रोकर कहती है-
न के के लालच पाई, बुढ से कइल सगाई
माई के तू बतिया ना मनल हो बाबूजी।
दिनवाँ बितेला रोई, बात ना पूछत कोई,
रतिया खाँ छतिया फाटत बा हो बाबूजी।।
अर्थात् ‘‘हे
बाबूजी माँ के बार-बार समझाने के बाद भी आपने उसकी नहीं मानी और धन के लालच में
बूढ़े से मेरा ब्याह कर दिया। दिन रोते बीतते हैं। रात में छाती फटने लगती है। कोई
हाल-चाल पूछने वाला भी नहीं है।’’ बात यहीं नहीं थमती
है-
आखि से सूझत कम, हरदम खींचत दम।
मथवा के बरवा चवंरवा हटे बाबूजी।।
मुंहवा मे दाँत नाहीं, भर मुँहे लार चुए।
बोलेला त, आवेला सड़ल बदबू बाबूजी।।
पति कर देखि गति, पागल भइल मति।
रोई-रोई करीले बिहान मोरे बाबूजी।...
अर्थात् ‘‘मेरे
बूढ़े पति को आँखों से दिखाई नहीं देता, वे हरदम हापँफते
रहते हैं। उनके सिर के बाल झड़ गए हैं। उसे देखकर लगता है चंवर ;तालाबद्ध का पानी सूख गया है। उनके मुँह में दाँत नहीं है, मुँह से हमेशा लार टपकते रहता है। जब वह बोलता है, तो मुँह से बदबू आती है। पति की हालत देखकर मेरी पागल-सी दशा हो गई है।
मैं रो-रो के रात काटती हूँ।’’
इसके बाद नाटक और शादी दोनों रुक गया, लड़की के पिताजी ने पैसा वापिस कर, बूढ़े वर को खदेड़ दिया।
भाई विरोध में भिखारी ने समाज की टूटती संयुक्त
परिवार की व्यवस्था को चित्रित किया है। यह टूटन अर्थाभाव के कारण व्यक्तिवादी
दृष्ष्टिकोण से पनपी है। नाटक का केन्द्रीय पात्रा उपदर पत्नी के बहकावे में आकर
सहोदर भाई की हत्या करवा देता है। भाई को मरवाने के बाद, पत्नी भी उसे छोड़ देने की
धमकी देती है। बहुत हिल-हुज़्ज़त और मान-मनौती के बाद इस शर्त पर पत्नी साथ रहने को
तैयार होती है कि उपदर उसे नए गहने ला देगा। उपदर गहने की चोरी में पकड़ा जाता है।
थानेदार घूस माँगता है। उपदर घूस देने में असमर्थ है। उसकी पत्नी के पास कुछ गहने
हैं। उपदर चाहता है कि उसकी पत्नी गहनों को बेचकर उसे छुड़ा लेगी। लेकिन ऐसा नहीं
होता, उपदर की पत्नी गहने बेचने से इनकार कर देती है।
उपदर को चोरी के इलज़ाम में जेल हो जाती है।
नाटक गंगास्नान में स्त्रैण लोगों का वर्णन है, जो स्त्रा के बहकावे पर
माँ-बाप को मारा-पीटा करते हैं और बाद में प्रायश्चित्त की आग में जलते रहते हैं।
इसमें ऐसे-ऐसे छद्मवेशी ठगों का भी चित्राण है, जो
पुत्रा देने के बहाने मेले में भोली-भाली युवतियों के तन और आभूषण से खेलते हैं।
नशा समाज के लिए कोढ़ है। कलयुग प्रेम में भिखारी ठाकुर ने नशाखोरों और इनसे पनपने
वाली बुराइयों पर तीखा प्रहार किया है। बेटी वियोग नाटक में बाल और अनमेल विवाह
जैसी दारुण प्रथा की पोल खोली है। ननद भौजाई नाटक में भाभी के बहाने युवतियों को
सतरंगी दुनिया को छोड़ गाँव के सोहदों, लुच्चों से
सावधान रहने को कहा गया है। सूरवा नाटक में गाँव के अंधे और विवश लोगों का चित्राण
है, जिनके पास पर्याप्त सम्पत्ति तो है, लेकिन उनका उपयोग दूसरे ही करते हैं।
दामाद वध में थोड़े पैसे के लिए साला बहनोई को अधमरा कर देता है। पति
के लिए बहन भाई को पुलिस से पकड़वा देती है। कलकत्ते की हवा में मिल में काम
करनेवाली ऐसी महिलाओं का वर्णन है, जो परिवार के भरण-पोषण के लिए तन बेचने को विवश
है।
इस तरह भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में तत्कालीन सामाजिक बुराइयों
की सिर्फ़ पोल ही नहीं खोली, बल्कि विभिन्न चरित्रों के माध्यम से उसका प्रतिकार भी किया है।
बिदेसिया नाटक में चार मुख्य पात्रा हैं। बिदेसी (गाँव का एक बेरोज़गार युवक), बटोही (एक अधेड़ पुरुष), प्यारी सुंदरी (बिदेसी की नवब्याहता स्त्री), रखेलिन (वेश्या जो कलकत्ते में रहती है)। इसके
अलावा अन्य सहयोगी पात्र-देवर (गाँव का मनचला युवक), दोस्त (बिदेसी का शुभचिंतक), सूत्राधार (मल्लिक), दो बच्चे (रखेलिन के), एक ग्रामीण महिला, समाजी (दस-बारह लोगों की गायन-वाद्य मंडली) और ‘लेबार’ आदि शामिल हैं।
नाटक की भाषा भोजपुरी है। संवाद गद्य और गीत दोनों
में हैं , लेकिन अधिकांश संवाद गेय हैं। जहाँ गद्य संवाद हैं- छोटे, अभिव्यक्तिपूर्ण और धारदार हैं-
बटोही, समाजी
से कलकत्ता जाने का रेल किराया पूछता है, समाजी उसे तीस
रुपये की टिकट ख़रीदने को कहता है। टिकट से अंजान बटोही झुँझलाकर कहता है, उसके और कलकत्ते के बीच में सिर्फ़ रेलगाड़ी थी, ई टिकट कहाँ से आ गयी!
बटोही : ए बबुआ ढब ढब!
समाजी: का ह, बाबा?
बटोही : हम टीसन पर जाइब, ए बबुआ!
समाजी: ए बाबा, हइहे रास्ता सीधे टीसन पर चल जाई।
बटोही : अच्छा ए बबुआ ई बताव, कि कलकाता के मसूल कतना
बा।
समाज: कलकाता के मसूल एह घरी तीस रुपया लागी।
बटोही: (चिहाके) तीस रुपया लागी? सवा रुपया में ना
फरिआई?
समाजी: सवा रुपया में त टिकठे ना मिली, महराज!
बटोही : बबुआ, कम सुने लउ का? हम कहतानी रेल, तूँ कहतार’ टिकठ।
समाजी: टिकठे ना कटइब, त, रेल
प कइसे चढ़ब’?
बटोही: का बबुआ, टिकठ प चढ़ा के रेल धसोर दिआई?
समाजी: ना महाराज, तीस गो रोपेया देब’ त एगो टिकठ मिली।
बटोही: टिकठ काथी के?
समाजी: कागज के।
बटोही: कती मूटी के?
समाजी: हती मूटी के।
बटोही :
हमरा के बुरबके समझतार’? तीस रोपेया लागे जात बा, त नान्ह-बार के सूते बइठे
लायक ना होई, त’ लेके
का कोई?
समाजी: कवना घर-दुआर ह’?
बटोही :
अच्छा ए बबुआ, तीस रोपेया टिकठ में लाग गइल। रेल में
कतना लागी, बबुआ?
समाजी: रेल में एको पइसा ना लागी।
बटोही: अच्छा ए बबुआ, रेल में हमार एको पइसा ना लागी, त’ टिकठ के कवन काम बा? हम रेल में बइठ’ के दमदमवले चल जाइब।
(बटोही और समाजी का संवाद, बिदेसिया नाटक)
लोक प्रचलित मुहावरे, टकसाली शब्दों की झड़ी
बिदेसिया नाटक में देखी जा सकती है। पद्य संवाद, स्थानीय
लोकधुनों और लोक प्रचलित छंदों में लिखे हैं। लोरिकायन, सोरठी, आल्हा, बिरहा, बारहमासा, पूर्वी, पचरा, कुँवर विजई, निर्गुण, चौपाई, कवित्त तथा चौबोला आदि लोकधुनों और
छंदों का प्रयोग बिदेसिया नाटक में हुआ है। गीतों की भाषा असरदार और जीवंत है। भाव, अर्थ, ध्वनि और लय अभिव्यक्ति को किस तरह
धारदार बनाती है, इसकी बानगी बिदेसिया के गीतमय संवादों
में द्रष्टव्य है-
बान्हि के पगरिया रगरिया मचावतार, कवना नगरिया के हव’ तू
बटोहिया।
हमरी जनानावाँ मकानावाँ भीतरवा में, साधि कर रहेली भवनवाँ बटोहिया।
$$$ $$$ $$$
रंडी मे कुछ ना बाटे, कुत्ता जइसे हाड़ चाटे,
एको नाहीं घाट तूहूँ लगबउ बिदेसिया।
छोड़ि द’ अधरम, मिजाज के नरम,
तूँ मनवाँ में करि लेहु सरम बिदेसिया।।
(धुन-पूर्वी, प्रसंग
बिदेसी-बटोही संवाद, नाटक-बिदेसिया)
भिखारी के नाटकों में शब्द-ध्वनि और पात्रों के नाम दर्शकों के मन
में गुदगुदी पैदा करते है। भिखारी ने गंवई पात्रों का नामकरण, उनके आचरण और व्यवहार के
आधार पर किया है। बिदेसिया नाटक में ‘बटोही’ कलकत्ता जाते समय समाजी से, रेलवे स्टेशन का
रास्ता पूछते हुए कहता है- ‘ए बबुआ ढब-एब’, यानी जो समाजी ढब-ढब की ध्वनि बजाता रहता है या जो कोई ताल नहीं बजा पाता
है, उसे ढब-ढब कहा जाता है । और फिर ढब-ढब के साथ
बेतुके सवाल-जवाब। बेतुकी बातें सिर्फ़ ढब-ढब को शोभा देगा- भिखारी इस इल्म को बख़ूबी जानते थे। अन्य पात्रों के नाम भी उनकी सामाजिक
स्थिति और आचार-व्यवहार के अनुकूल है-बिदेसी, बटोही, रखेलिन, उपकारी, उपदर, उजागर, चटक, लोभा, उपातो, झाँटलू, उदबास, उपदेष तथा दुखहारिन आदि। इस तरह के नाम और उनके उच्चारण ध्वनि ना सिर्फ़
दर्शकों को गुदगुदाता है, अपितु नाटकीय संप्रेषण को सघन
और तीव्र बनाता है।
भिखारी ठाकुर के नाट्यदल में 18-20 कलाकार थे, जिसमें सात-आठ अभिनेता और नर्त्तक, तीन-चार ‘मोटिया’ (साज-सज्जा और वाद्ययंत्र ढोने वाले) तथा
आठ-दस गवैये-वादक । भिखारी दल नायक थे, जिन्हें दल के
लोग उस्ताद, गुरु कहकर सम्बोधित करते थे। दल को मंडली
या भिखारी तमाशा मंडली कहा जाता था। बिदेसिया नाट्य में सूत्रधार को ‘मल्लिक’, विदूषक को ‘लेबार’, अभिनेता को ‘नटुआ’ तथा नर्तक को ‘लौंडा’, (स्त्रीभेष में पुरुष नर्तक) तथा गायन-वाद्य मंडली को समाजी कहा जाता है। नाट्य दल को
मिलने वाले पारिश्रमिक में सबकी हिस्सेदारी थी। शादी-ब्याह, मुंडन, जनेऊ आदि मांगलिक अवसरों पर भिखारी के
तमाशा दल को ‘साटा’ पर
आमंत्रित किया जाता था। इसके अलावा सामाजिक आयोजन, मेले, त्यौहार आदि के अवसर पर भिखारी स्वयं अपना प्रदर्शन करते थे। कहा जाता है
कि नाट्यारंभ में भिखारी स्वयं दर्शकों से कह देते थे कि वे सिर्फ़ तमाशा दिखाने
जा रहे हैं, जिन्हें समझ में नहीं आता वो कृपया पहले ही
उठ जाएँ।
बिदेसिया नाट्य का रंगमंच कोई विशेष तामझाम लिए
नहीं होता है। भिखारी ठाकुर ने खुले मैदान, चबूतरा तथा शहरी प्रेक्षागृह आदि जगहों पर
नाट्य प्रदर्शन किए। लेकिन प्रदर्शन जब गाँवों में होता था, तो दस से पंद्रह-हज़ार दर्शक होते थे। ऐसी स्थिति में, वहाँ कोई मंच व्यवस्था कैसे कायम रह सकती थी। खुले मैदान में आठ-दस चौकियों
को जोड़कर 15- 20 लम्बाई-चौड़ाई का मंच कुछ ही घंटों
में तैयार कर लिए जाते थे/है। ऊपर घास-फूँस की छत्ती या चंदोबा टाँग दिया जाता है।
बाँस या लकड़ी के खंबे से तीन-चार गैसबत्ती (पूर्व में
मशाल) लटका दिया । बस प्रदर्शन के लिए मंच तैयार। दर्शक तीन ओर से घेरकर बैठते
हैं। एक ओर समाजी बैठते हैं और उसी के पीछे साजघर होता है। कहा जाता है कि
स्वतंत्रता से पहले भिखारी ठाकुर के प्रदर्शन देखने हेतु इतनी तादाद में लोग आने
लगे, कि ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदर्शन पूर्व अनुमति
प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया था। प्रदर्शन की अनुमति भी आसानी से नहीं मिल
पाती थी।
बिदेसिया नाट्य में सभी कलाकार एक साथ मंच पर आते हैं। अन्य
पारम्परिक नाट्य रूपों की तरह मुख्य प्रदर्शन से पूर्व पूर्वरंग का विधान यहाँ भी
है। मंच पर आते ही गायन-वादन मंडली द्वारा ताल-वाद्य के सुरताल मिलान हेतु, कोई लोकप्रिय धुन सामूहिक
रूप से बजायी जाती है। अन्य अभिनेता भी समाजी के साथ मंच पर बैठ जाते हैं। सामूहिक
वादन के बाद मंगलाचरण, मंगलाचरण में विभिन्न
देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है, इसे ‘सुमिरन’ भी कहा जाता है। यह ‘सुमिरन’ सूत्रधार, मल्लिक
या व्यास के नेतृत्व में आरंभ होता है। आरंभ में चौपाई जिसमें महादेव, सीता-राम, कृष्ण तथा हनुमान आदि की वंदना की
जाती है। नाटक का नाम और विषयवस्तु की संक्षिप्त झलक चौपाई में ही दे दी जाती है।
सिर्फ़ बिदेसिया नाटक के आरंभ में लौकिक संस्कृत में श्लोक हैं, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, हनुमान तथा गुरु की वंदना की गई है।
अन्य किसी और नाटक में संस्कृत श्लोक नहीं है। बेटी वियोग नाटक में चौपाई से पहले
वार्तिक का संवाद है। यह भोजपुरी गद्य में है तथा दर्शकों को सम्बोधित है। भिखारी
ठाकुर के बिदेसिया नाट्य में पूर्वरंग सिर्फ़ ‘सुमिरन’ या प्रदर्शन पूर्व की तैयारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण नाटक की संक्षिप्त भूमिका विभिन्न गीतों और गद्य संवादों
के द्वारा पूर्वरंग में ही प्रस्तुत कर दी जाती है। इससे दर्शकों के दिल-दिमाग़ में
नाटक की पृष्ठभूमि तैयार हो जाती है, जो नाट्यान्त तक
प्रदर्शन से बँध जाते हैं, जुड़ जाते हैं। भाव-विषय को
लेकर ये गीत-संवाद जितने धारदार होते हैं, उतना ही इसका
संगीत पक्ष आकर्षक होता है। बिदेसिया नाटक के पूर्वरंग में जँतसारी, लोरिकायन, सोरठी, बिरहा
तथा निर्गुण जैसे लोकप्रिय धुनों पर आधारित गीत हैं। और बीच-बीच में सूत्रधार का ‘टोन’ ‘टोक’ पूर्वरंग को
बड़ा ही सरस बनाता है। दो से तीन घंटों तक चलने वाले इस गीत-संवाद से दर्शकों का मन
तनिक भी नहीं ऊबता है। रात गहराती है, बचे-खुचे लोग भी
प्रदर्शन स्थल पर पहुँच जाते हैं। और अब समाजी की चौपाई के साथ पात्रों का (बिदेसी और प्यारी सुंदरी) मंच पर प्रवेश, मुख्य
अभिनय यहीं से आरंभ होता है।
भिखारी ठाकुर स्वयं एक अच्छे अभिनेता थे। बिदेसिया
नाट्य के प्रायः सभी अभिनेता गाने में निपुण होते हैं। संवाद ऊँचे स्वरों में लयात्मक
बोले जाते हैं। अभिनय की आधार भूमि लोक की अनुकृति है। भिखारी का प्रेरणा स्रोत
लोक हैं । उनके नाटकों के पात्र सारे चरित्र लोक जीवन के प्रतिनिधि चरित्र है।
भिखारी के सभी पात्र दर्शक के समक्ष ‘समाजी’ के साथ बैठते
हैं। वहीं से बारी आने पर अभिनय के लिए उठते हैं और भूमिका समाप्त होने पर वापिस
बैठ जाते हैं। पात्रों की वेशभूषा और रूपसज्जा आंचलिक और पारम्परिक होती है।
कलाकार गेरू, खड़िया, काजल, तथा मुर्दाशंख के सहारे स्वयं अपना ‘मेकअप’ करते हैं। वेशभूषा और रूपसज्जा के लिए भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में
अद्भुत संकेत दिए हैं। गीतों की कड़ियों से ही पात्रों की वेशभूषा और डील-डौल का
पता चलता है, यथा :
धोती पढ़धरिया धइ के कान्हावा पर चदरिया हो,
बबरिया झारिके ना, होइब’ कवना सहरिया हो बवरिया झारिके ना।
करिया ना गोर बाटे, लामा नाही हउवन नाटे,
मझिला जवान साम सुन्दर बटोहिया,
घुठी प’ ले
धोती कोर, नकिया सुगा के ठोर,
सिर पर टोपी, छाती
चाकर बटोहिया।
किसी भी कल्पनाशील निर्देशक के लिए यह संकेत पर्याप्त है।
बिदेसिया नाट्य की संगीत योजना अति विशिष्ट है।
भिखारी ठाकुर भोजपुरी लोक धुनों और छंदों के ज्ञाता थे। अकेले बिदेसिया नाटक की संगीत
योजना के बारे में कहा जाए तो, सम्पूर्ण भोजपुर अंचल के लोक धुनों का गुच्छ है। यदि किसी अध्येयता को
भोजपुरी लोकगीत/संगीत और संस्कृति पर शोध करना हो तो उनके लिए भिखारी के नाटक
पर्याप्त हैं। संस्कार गीत, कार्य या श्रमगीत, भक्तिपरक आदि गीतों की प्रचलित धुनों पर भिखारी ने गीत रचे। पूर्वी, कजरी, बारहमासा, चैती, फाग, बिरहा, निर्गुण, झूमर, जँतसारी, सौरठी, लोरिकायन, आल्हा, पचरा (देवी गीत), चौबोला, दोहा, खेमटा, सवैया, कवित्त
तथा चौपाई आदि लोकप्रिय धुन और छंदों का प्रयोग भिखारी ने अपने नाटकों में
यथास्थान किया है। वाद्य यंत्रों में- ढोलक, नगाड़ा, हारमोनियम, मजीरा, झाल, खरताल भिखारी ठाकुर के रंगप्रयोग को
विद्वानों ने बिदेसिया शैली/नाट्य कहा है। यह नामकरण तो रूढ़ हो चला है, लेकिन विभिन्न सभा गोष्ठी और मंच पर इस विषय पर बहस-विमर्श चल रहा है।
विवाद तब अधिक गहराया, जब प्रसिद्ध रंग निर्देशक और
अभिनेता सतीश आनंद ने अपने रंग प्रयोग को बिदेसिया कहा। सतीश जी ने बिदेसिया शैली
में अमली, माटी गाड़ी, मैला
आँचल आदि नाटकों की सफलतम प्रस्तुति की। भिखारी ठाकुर का बिदेसिया नाट्य लोकनाट्य
के शिल्प में सृजित है, जिसमें सूत्राधार, विदूषक (लेबार), समाजी, गायन-वादन मंडली, आदि के सहारे नाट्य प्रस्तुति
की जाती है। सतीश जी के बिदेसिया शैली में नट-नटी, सूत्रधार
विदूषक, समाजी, गायन-वादन
मंडली है। सिर्फ़ नट-नटी को छोड़कर अन्य सभी भिखारी के नाट्य प्रयोग में भी हैं, केवल भिखारी ही क्यों? लगभग तत्कालीन सभी
लोकनाट्यों में किसी-न-किसी रूप में उपस्थित है। लेकिन सतीश जी का नाट्य प्रयोग न
लोकनाट्य है और न ही केवल लोकनाट्य शैलियों के शिल्प पर आधारित है। सतीश जी की ‘बिदेसिया’ शैली एक आधुनिक रंग प्रयोग है, जहाँ तमाम लोक विधाओं- गीत, नृत्य, नाट्य को नाटकीय संप्रेषण बढ़ाने के
उपकरण के रूप में प्रयोग में लाया गया है। भिखारी के बिदेसिया नाट्य में अधिकांश
संवाद गीतों की कड़ियों में है। सतीश जी ने लोकगीतों और नृत्यों का प्रयोग नाटकीय
अनुभूति को सघन और तीव्र बनाने के लिए, गद्य संवादों के
बीच किया है। यह तुलना इसलिए की गई है, कि दोनों ही
प्रयोक्ताओं के प्रयोगों को अलग-अलग समझा जा सके। दोनों ही प्रयोक्ताओं का रंग
अन्वेषण मौलिक है। भिखारी ठाकुर ने अपनी पूर्व परम्परा का समावेश अपने नाट्य
प्रयोगों में किया है। सतीश जी के प्रयोगों में भी लोक परम्पराएँ उपस्थित हैं, जिसके केन्द्र में बिहार की अन्य नाटकीय लोकविधाओं के अलावा भिखारी ठाकुर
और बिदेसिया नाट्य भी है। बल्कि इस तरह के प्रयोग से मौलिकता का रंग कभी फीका नहीं
होता। सतीश जी के प्रयोग से भिखारी ठाकुर की लोकप्रियता अंचल से बाहर देश भर में
बढ़ी, कारण दूसरे भी रहे, लेकिन
यह तथ्य भी अस्वीकार करने योग्य नहीं है। बिहार के दूसरे प्रतिभावान निर्देशक संजय
उपाध्याय, पिछले बीस वर्षों से भिखारी ठाकुर के
बिदेसिया नाटक का मंचन आधुनिक शिल्प विधान के साथ करते आ रहे हैं।
जहाँ तक बिदेसिया को लोकनाट्य या पारम्परिक नाट्य
कहने का सवाल है। बिदेसिया भिखारी ठाकुर द्वारा लोकनाट्य के शिल्प में विरचित
नाट्य रूप है। भिखारी से पूर्व बिदेसिया के मंचन की परम्परा भोजपुर अंचल में नहीं
थी और न ही भिखारी के बाद परम्परा बन पाई है। लेकिन भिखारी ने जिन गीतों/धुनों का
प्रयोग अपने नाटकों में किया है उनमें से कुछ गीत भिखारी से पूर्व भी प्रचलित थे
और आज भी लोककंठ में प्रवाहयमान है। आज भिखारी के नाटकों का मंचन उनके ही
सहकर्मियों द्वारा किया जाता है। सिर्फ बिदेसिया और गबरघिचोर नाटकों का मंचन
आधुनिक रंगप्रयोग के साथ विभिन्न शहरों में रहा है। भिखारी ठाकुर के सहकर्मियों
द्वारा जो नाट्य मंचन हो रहे हैं, वह निश्चित रूप से लोकनाट्य की प्रविधि और शिल्प में है। भिखारी ठाकुर के
बिदेसिया नाट्य को लोक या पारम्परिक नाट्य कहलाने में बस एक कमी है वह है
पारम्परिकता का निर्वाह, जिसकी प्रतीक्षा की जा सकती
है। अभी तत्काल तो बिदेसिया भिखारी ठाकुर का निजी रंग प्रयोग है।
आज भी भिखारी ठाकुर के नाटक की लोकप्रियता कम नहीं
हुई है। भिखारी के बाद उनके नाट्य दल को चलाने वाले कोई सुयोग्य उत्तराधिकारी नहीं
है, फिर
भी यह हैरत की बात है कि आज भिखारी ठाकुर को गुज़रे तीस वर्ष हुए, उनका नाट्य दल बिखरा नहीं है। उनके पुराने सहयोगी बिदेसिया नाटकों का
प्रदर्शन कर रहे हैं।
( विशेष संदर्भ
देखें: बिहार के पारंपरिक नाट्य – ओम प्रकाश भारती )
