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Friday, September 10, 2021

नेपाल का पारंपरिक नाट्य 'बालन' - डॉ. ओम प्रकाश भारती

 

नेपाल का पारंपरिक  नाट्य - बालन

                                                                   डॉ. ओम प्रकाश भारती

बालन या बालुन  नेपाल का आनुष्ठानिक नाट्य है। नेपाल के अलावा इस नाट्य का प्रचलन सिक्किम तथा पूर्वोत्तर भारत के असम , मेघालय तथा अरुणाचल प्रदेश के नेपाली भाषा –भाषी के बीच है ।  इस नाट्यरूप में राम और कृष्ण जैसे चरित्रों के उच्च आदर्शों को गीत एवं नृत्यों के साथ दिखाया जाता है।


बालन 
बालन

नेपाली बृहत शब्दकोशमें बालन को संस्कृत का शब्द कहा गया है तथा इसका अर्थ  दिया गया है-“ विशेष धार्मिक  पर्व आदिमा एक जनाले भट्टायउने र सामूहिक रूपमा अरूले स्वर मिलाउने गरी गाइने राम-कृष्ण आदि देवताको चरित्र गाथा।,  ऐसा लगता है कि आरंभ में बालन गाथा के रूप में गायी जाती होगी। बालन शब्द, बाल में जुड़ने से बना है। प्राचीन नेपाली में बालशब्द का प्रयोग पुरुष के अर्थ में हुआ है। अर्थात् पुरुषों द्वारा प्रस्तुत लीला या अभिनय को बालन कहा गया है। अनुष्ठानमूलक होने के कारण कलान्तर में चरित्रों का अभिनय किया जाने लगा होगा। आज नेपाल  के लोकजीवन में बालुन खेल्नुयानी बालुन खेलना ही कहा जाता है।                                                            

नेपाल  के ग्राम जीवन में पर्व त्यौहार, मुंडन, पूजा, श्राद्ध अथवा मनोकामना पूरी होने पर प्राय रात्रि बेला में बालुन का प्रदर्शन किया जाता है। इस नाट्यरूप के पीछे धार्मिक आस्था के संग लोकरंजन की भावना भी जुड़ी है। मनोकामना पूरी होने पर गृहस्थ अपने घर बालन दल को आमंत्रित करते हैं। गाँव के मेले तथा विवाहोत्सव आदि पर भी बालन खेला जाता है। बालन प्रदर्शन के लिए कोई स्थायी मंच नहीं बना होता है, बल्कि जिस व्यक्ति के घर बालन का प्रदर्शन होता है, उसके घर का आंगन ही प्रदर्शन स्थल में तब्दील हो जाती है। बालन अभिनय के लिए रात्रि का समय उपयुक्त समझा जाता है, लेकिन दिन में भी इसके प्रदर्शन होते हैं। बालो’ ;जो बालन दल को आमंत्रित करता है, द्वारा एक सप्ताह पहले बालन के खलीफा (गुरु) को आमंत्राण दिया जाता है। शाम ढलते ही खलीफाअपने दल के साथ प्रदर्शन स्थल पर पधारते हैं।

             लोक विश्वास है कि बालन की परम्परा द्वापर युग से ही है । कहा जाता है कि यशोदा के घर में पाण्डवों ने बालन प्रस्तुत किया था । यह संभव है कि बालन की परम्परा इतनी ही प्रचीन हो । लेकिन भक्तिकाल (15वीं सदी) में आकर इसका स्वरूप निखरा । खेमराज नेपाल ने नेपाली लोक साहित्यिको रूपरेखा,  (पृ.  सं. 148) में रामचंद्र विप्र द्वारा संकलित कृष्ण चरित्राको बालुन की तिथि सन् 1653 बतायी है । शोध के दौरान रामायण  का बालुन और सीताचरित बालुन की प्रकाशित प्रति मिली, जो 1929 में गोर्खा पुस्तकालय वाराणसी  से प्रकाशित है । इस प्रकार  बालन की उपलब्ध पांडुलिपियां तीन से चार सौ वर्ष पुरानी है। मौखिक परम्परा में हो सकता है यह उससे पहले से भी हों ।

            एक प्रदर्शन दल में कुल 12-13 सदस्य होते हैं। एक खलीफा, दो सूत्राधर, दो नर्त्तक तथा बाकी अभिनेता। बालन दल का संचालक, गुरु तथा प्रशिक्षक खलीफाहोता है। खलीफा ही बालन का वेशभूषा, मंच सामग्री तथा पोथी आदि का रखरखाव करता है। खलीफा की पदवी वंशानुगत होती है। जब तक खलीफा के पुत्र स्वयं पद का त्याग कर दें, या खलीफा बनने से इनकार कर दें, ऐसी स्थिति में दल नये खलीफा का चयन करता है।

 

लिङगों – प्रदर्शन स्थल

बालन का मंचन खुले आकाश के नीचे किसी गृहस्थ के घर के आंगन या गाँव के देवालय या चौपाल में होता हैं। प्रदर्शन के दिन आंगन के बीचों-बीच केले के थम्ब का समकोणिक मंडपबनाया जाता है। मंडप के बीच मालिका माता के लिङगों की स्थापना की जाती है। इस मंडप को थानभी कहा जाता है। मंच के मध्यभाग में केले के चार थंबों  को जोड़कर चकौर मंडप तैयार किया जाता हैं। लाल, पीले, नीले रंग के पताका मंडप के चारों ओर लपेटा जाता है । कभी-कभी फला हुआ केला का समूचा पेड़ ही मंच पर रख दिया जाता है। यह पेड़ मंच सामग्री के रूप में उपयोग में लाया जाता हैं, खासकर जब हनुमान अशोक वाटिका में फलों को तोडकर खाता हैं। मंडप के बीच पानी से भरा पीतल का बड़ा घड़ा रखा जाता हैं। उसके उपर आम्रपल्लव। मंच की बायीं ओर खलीफा के बैठने के लिए ऊँची पीढ़ी रखी जाती है। दाहिनी ओर दर्शकों के लिए शीतलपाटी रख दी जाती है। अब मंच प्रदर्शन के लिए तैयार। इसी मंडप के आगे खलीफा आसनी पर बैठ बालन का सस्वर पाठ करते हैं और नर्त्तक गाते हुए अभिनय करते हैं।               

कथानक

बालन मुख्यतया दोहा और छंद में लिखा संवादगीत होता है। धार्मिक  और पौराणिक कथाओं को लेकर बालन की रचनाएँ की जाती हैं। रामायणको बालन, कृष्ण चरित्रको बालन, सीता भारत, जैमिनी भारत, दशावतार आदि उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। । पूरा का पूरा बालन पद्य में लिखा गया है। खलीपफा इसे पद्य संवाद की तरह गाते हैं।

            बालन प्रदर्शन के दिन आस पास के गाँव-टोले के लोगों को भी जुवारी’(आयोजक) द्वारा निमंत्रण भेजा जाता है। प्रदर्शन स्थल में पहुँची दाई-माई सँगिनी दल में शामिल हो जाती हैं। पुरुष दर्शक कुछ देर के लिए  जनकपुर, अयोध्या तथा लंका निवासी। सभी के सभी  सहभागी ।  

अभिनय

अभिनय के प्रसंग  में बालुन नृत्य महत्वपूर्ण होता है। बालुन नृत्य विशेष प्रकार की चारियों और मुद्राओं में निवद्ध होता है।  वाचिक तथा आंगिक अभिनय में  नेपाली लोक जीवन की अनुकृति होती है। अभिनेता पद्य संवादों के बीच प्रसंगानुसार गद्य संवाद बोलते हैं। अभिनेताओं को संवाद लिखकर रटाया नहीं जाता है, बल्कि वे स्वयं तत्काल संवादों की आशु रचना करते हैं। नेपाली समाज में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भागीदारी है, फिर भी बालन में स्त्री पात्रों की भूमिका अल्प व्यस्क पुरुषों द्वारा की जाती है। इन दिनों महिलाओं की सहभागिता बढ़ी है।

अंगाहार और मुखसज्जा

बालन की वेशभूषा सामान्य रूप से नेपाली समुदाय द्वारा दैनिक उपयोग में लाये जाने वाले वस्त्र होते हैं । पुरुष पात्र सेतो कमीज, दौरा, सरूवाला, धोती, फेटा और नेपाली टोपी आदि पहनते हैं । स्त्री  पात्र साड़ी और बांहयुक्त कमीज या छींटदार चोली पहनते हैं । स्त्री पात्र खासकर सीता की भूमिका में राजसी आभूषण पहनता है । पुरुष  पात्रा मुख सज्जा पर विशेष ध्यान  नहीं देते हैं, लेकिन राम और लक्षमण की भूमिका वाले पात्र मुख पर पाउडर और सिंदूर का हल्का लेप लगाते हैं । मृग और हनुमान की भूमिका वाले पात्र सामान्य मुखौटा पहनते हैं । हनुमान की पूंछ और गदा विशेष रूप से बनाये जाते हैं।

प्रदर्शन शैली

चूँकि आयोजन हर्षोल्लास का और आनुष्ठानिक होता है ,अतः नौमती बाजा का दल भी आमंत्रित होता है। बालो(आयोजक) द्वारा दिन का उपवास रखा जाता है। शाम को पूजा दी जाती है। पूजा के साथ ही सँगिनीनृत्य- गीत  दल, जिसमें आस पड़ोस की दाई-माई शामिल होती हैं, भी आमंत्रित होती हैं। इस प्रकार नौमती बाजा(नौ वाद्यों का समूह, सँगिनी और फिर बालन का प्रदर्शन तीनों का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध। अब नौमती बाजा और सँगिनी, बालन प्रदर्शन का हिस्सा बन चुका है। सँगिनी नृत्य-गीत। सँगिनी का अर्थ होता है सखी, सहेली, साथी यानी व्यापक अर्थ है सखी, साथी के संग मिलकर गाया गया गीत। नारी जीवन की दमित भावनाएँ, सुख-दुःख, हँसी-आँसू आदि के स्वर सँगिनी गीतों में सुनाई पड़ते हैं। रामायण का आख्यान, महाभारत की कथा, तत्कालीन सामाजिक घटना-परिघटना, व्यक्तिगत जीवन का सुख-दुःख, रति-राग तथा सास-ससुर, देवर-जेठाज्यू, ननद-आमाज्यू, देउरानी-जेठानी आदि के उत्पीड़न की कथा सँगिनी गीतों में अभिव्यक्त हुई है। नेपाल  के जनजीवन में सँगिनी सिर्फ गायी नहीं जाती बल्कि खेलीभी जाती है। विभिन्न पर्व-तिहार-चाड़ आदि के अवसर पर सँगिनी नृत्य-गान प्रस्तुत किया जाता है। तीज पर्व, तुलसी का विवाह(कार्तिक एकादशी) तथा वर-पीपल के  विवाह के अवसरों पर सँगिनी गीत-नृत्य अनिवार्यतः प्रस्तुत किया जाता है। मंगल कामना के साथ बालन का प्रदर्शन समाप्त होता है।


संगिनी नृत्य