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Monday, August 29, 2022

बिहार का लोकनाट्य ‘नटुआ नाच’- ओम प्रकाश भारती

 

बिहार का लोकनाट्य नटुआ नाच’- ओम प्रकाश भारती

नटुवा नाच बिहार और नेपाल के मैथिली भाषी अंचल का जनप्रिय लोकनाट्य रूप है। दशहरा, दीवाली तथा छठ जैसे त्यौहारों पर लगने वाले मेले का मुख्य आर्कषण नटुवा नाच ही होता है। नटुवा नाच का मंचन प्राय रात्रि में फसलोत्सव, विवाह या अन्य सामाजिकोत्सवों पर होता है। फिल्म, टेलीविज़न तथा मनोरंजन के अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आए बदलाव के बावजूद नटुवा नाच की लोकप्रियता तनिक भी कम नहीं हुई है, बल्कि नाट्य दलों की संख्या और मिलने वाले मानदेय की राशि में दिनोंदिन बढ़ोतरी हुई है। मैथिली भाषी अंचल में लगने वाले मेले में फिल्म, आरकेस्ट्रा, बाईजी का नाच, कव्वाली तथा नटुवा नाच का प्रदर्शन यदि एक साथ हो रहा हो तो सबसे अद्दिक दर्शक नटुवा नाच के समक्ष देखे जा सकते हैं। आज लगभग पाँच-छह सौ नाट्य दल उत्तरी बिहार और नेपाल के दक्षिण पूर्वी अंचलों में सक्रिय हैं।




                                                      नटुवा /लौंडा /अभिनेता - पद्मश्री रामचंद्र मांझी  

नटुवा नाच दो शब्द मिलकर बना है, जहाँ नटुवा का अर्थ नर्तक और नाच का नृत्य। नाट्य सम्बन्द्दी ग्रंथों के अंतःसाक्ष्यों के अनुसार 12वीं शताब्दी से 15वीं शताब्दी के बीच नाट्य के लिए कोई अलग शब्द प्रचलित नहीं था, बल्कि नृत्य और नाट्य के लिए नाच शब्द ही रूढ़ था।

नटुवा नाच का कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है। सिर्फ वर्णरत्नाकर में लोरिक नाचका उल्लेख हुआ है। वर्णरत्नाकर में नटुवा नाच से सम्बन्धित दो शब्दों का उल्लेख हुआ है- लोरिक नाच और लेवारी। लोरिक, नटुवा नाच मंच का आज भी लोकप्रिय कथानक है। नटुवा नाच में विदूषक को लेबरा कहा जाता है तथा उसके द्वारा अभिनीत हास्यप्रसंग को लेबारी कहा जाता है। भोजपुरी में यही लेबारलबार बन जाता है और लेबारीलबारी। वर्णरत्नाकर 13वीं शताब्दी में ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा लिखित विश्वकोशीय ग्रंथ है, जिसमें तत्कालीन समाज में प्रचलित कलारूपों का उल्लेख हुआ है। लेकिन लोरिक नाच का प्रदर्शन स्वरूप क्या था इसका पता वर्णरत्नाकर से नहीं चलता है। बहुत सारे विद्वानों ने नटुवा नाच को कीर्तनियाँ, अंकिया तथा पारसी थियटर से प्रभावित और इसका काल इन नाट्यरूपों के बाद का माना है। इस विषय पर पुनर्विचार करना होगा। वर्णरत्नाकर में वर्णित लोरिक नाचऔर लेबारी, जिसका संबंध आज भी नटुवा नाच से है, किसी न किसी प्रकार सम्पुष्ट करता है कि नटुवा नाच की परम्परा 13वीं शताब्दी से ही है, भले ही आज यह उस रूप में नहीं है, जिस रूप में 13वीं शताब्दी में रहा होगा। लोरिक के अलावा बिहुला-बिषहरी, सत्य हरिश्चन्द्र तथा गोपीचन्द, भरथरी, सोरठी बृजभार आदि कथानकों का मंचन 13वीं से 15वीं शताब्दी के बीच आरंभ हुआ होगा। सलहेस, रेशमा-चूहरमल, नैका-बनिजरा जैसे कथानकों का मंचन बाद के दिनों में आरंभ हुआ, क्योंकि इन कथानकों की घटना सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच का लगता है। किसी भी स्तर में नटुवा नाच की समानता कीर्तनियाँ, बिदापत और अंकिया नाट से नहीं है। अभिनय पद्धति, गीत-संगीत, मंचशिल्प आदि रूपों में यह बिलकुल भिन्न है।

कीर्तनियाँ और अंकिया नाट्य का संगीत कहीं-न-कहीं मार्गी संगीत से प्रभावित है, जबकि नटुवा नाच में ठेठ लोक संगीत अपने मूल रूप में उपस्थित है। कीर्तनियाँ और अंकिया नाट की मंच व्यवस्था सुनियोजित है जबकि नाच में मंच व्यवस्था बहुत ही अनौपचारिक है। नटुवा नाच की वेषभूषा रामलीला और पारसी रंगमंच तथा अन्य पारम्परिक नाट्य रूपों जैसी है। अनुमानतः यह बदलाव भी उन्नीसवीं सदी के बाद आरंभ हुआ होगा। कुछ बुजुर्ग कलाकारों से सम्पर्क करने पर पता चला कि राजा, देवता या अन्य विशिष्ट पात्रों के लिए जरीदार कोट, पायज़ामा का उपयोग पहले नहीं होता था। तेरहवीं से सत्रहवीं सदी के बीच द्दोती या अंगवस्त्र पहन कर ही कलाकार, राजा या देवता की भूमिका में आते थे।

नटुवा नाच के उद्भव की परिस्थितियाँ स्थानीय रहीं। जिस अंचल में नटुवा नाच का उद्भव और विकास हुआ है, वहाँ की संस्कृति नदी मातृक है। छह महीने आवागमन लगभग बंदप्राय रहता है। अंचल के लोगों का बाहर आना-जाना कम रहा। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में रोजगार की खोज में इस अंचल के लोगों का मोरंग (पूर्वी नेपाल) और कामरूप (असम) आना-जाना शुरू हुआ। बहुत बाद में बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में कुछ लोगों का कोलकाता आना जाना शुरू हुआ, वह भी बहुतायात में नहीं। कुछ विद्वानों की राय है कि नटुवा नाच में चित्रकारी किए पर्दे का प्रयोग पारसी रंगमंच से प्रेरित है। इस संबंध में पुनर्विचार करना आवश्यक है। नटुवा नाच के रंगमंच पर चित्रकारी किये हुए पर्दों का प्रयोग पारसी रंगमंच से नहीं, बल्कि पुरानी नाट्य परम्पराओं से ग्रहण की गई है। इस इलाके में पारसी कम्पनियाँ नाटक करने गईं ही नहीं। हो सकता है एक-आद्द मेले में कोई छोटी-मोटी कम्पनियाँ कभी कभार पहुँच गई हो। कहा जाता है कि दरभंगा महाराज द्वारा किसी पारसी कम्पनी को नाट्य प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया गया था। लेकिन इन नाटकों को देखने का अवसर शायद ही नटुवा नाच के प्रयोक्ताओं और कलाकारों को मिलें हों। मगद्द अंचल में तीसरी शताब्दी में यमपटक (चित्रकारी किए हुए पर्दे) का उल्लेख मिलता है। पूर्वांचल भारत में ही विकसित पारम्परिक नाट्य अंकिया नाट में चित्रकारी किए हुए पर्दे का प्रयोग करने का उल्लेख मिलता है। वर्णरत्नाकर (13 वीं सदी) में यमनिका’ (यमनिका काँ अभ्यन्तर रंगभूमिक अथ नृत्यवर्णना-59क) का उल्लेख मंच पर पर्दे के रूप में हुआ है।

नाच कलाकार समूह को मंडली तथा अभिनेता को नटुवा और अभिनय को पाट कहा जाता है। एक मंडली में लगभग पन्द्रह-बीस नटुवा होते हैं। मंडली प्रद्दान को गुरु या मास्टर कहा जाता है, जो नटुवा नाच का प्रोड्यूसर ही नहीं, प्रशिक्षक भी होता है। स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुषों द्वारा की जाती हैं।

नटुवा नाच का पूर्वरंग गायन और नृत्य से आरंभ होता है, जो चार चरणों में पूरा होता है। प्रथम चरण में समाजी मंच पर आते हैं, जिसमें साज बजाने वालों को बजनियाँ तथा गाने वालों को गबैया कहा जाता हैं। गाने-बजाने वालों को कभी-कभी गायन-बायन भी कहा जाता है। अंकिया नाट में भी गायन-वाद्य मंडली को गायन-वायन कहा जाता है। नटुवा नाच में प्रद्दान गायक मूलगैन कहलाता है। टीम के संचालक होने की वजह से मूलगैन को गुरु, मास्टर या कम्पनी आदि नामों से पुकारा जाता  गायनवादन मंडली मंच पर पूरब या दक्षिण दिशा की ओर बैठते हैं। उसके बाद झाल, करताल, ढोलक, नगड़ा, झाझ, बाँसुरी, क्लॉरनेट आदि को एक साथ बजाकर, विशेष प्रकार की द्दुनें निकालते हैं, जिसे संगतकहा जाता है। संगत आरम्भ होते ही, दर्शक प्रदर्शन स्थल की ओर कूच करते हैं। पूर्वरंग के दूसरे चरण में मंच पूजा की जाती है। कहीं-कहीं भगत पूजा की भी परम्परा मिलती है। भगत पूजा में नटुवा अपने शरीर में देवता आने का स्वांग करता है और मंडली के अन्य सभी नटुवा को पान’ (दुष्टात्माओं से रक्षा हेतु वरदान) देता है। पूर्वरंग के तीसरे चरण में मंडली के सभी नटुवा मंच पर आते हैं और बंद्दनिया गाते हैं। बंद्दनिया में नटुवा स्थान विशेष के अनुसार चारों दिशाओं में स्थित प्रमुख देवी-देवताओं का स्मरण करते हुए नाच सफल होने में सहायता के लिए प्रार्थना करते हैं। पूर्वरंग के चतुर्थ और अंतिम चरण में होता है हँसने-हँसाने का प्रसंग। बंघनियां के बाद मंच पर नट और नटी का प्रवेश होता है। नटी स्त्री वेश में पुरुष ही होता है, वह नाच में विभिन्न पात्रों की भूमिका भी करता है। नटी का कोई अलग नाम नहीं मिलता लेकिन लेबरा उसे बार-बार-‘‘हे गे छौड़ी’’ (ऐ लड़की) कहकर पुकारता है। नट को लेबरा, जोकर, बिकटा आदि कई नामों से पुकारा जाता है, पर सबसे अद्दिक लोक प्रचलित नाम लेबरा ही है। लेबराही नाच का सूत्रद्दार और विदूषक होता है। कई पात्रों की भूमिका लेबराअकेले करता है। अद्दिकतर कथानकों में वह नायक का दोस्त और सलाहकार होता है, वह मंच का संचालन और उद्घोषणा भी करता है। सही अर्थों में लेबरा नाच को सामाजिक बनाता है।

            नाच का मंच जिसे नटुवा रंगभूमि कहते हैं, आठ-नौ चौकियों को जोड़कर बनाया जाता है। जिसकी लम्बाई-चौड़ाई क्रमशः तेरह-चौदह फुट के करीब होती है। मंच के ऊपर बाँस के सहारे तिरपाल या फूस की छत बनाई जाती है। ध्वनि व्यवस्था के लिए माइक को मंच पर खम्भे के सहारे टांग दिया जाता है। नाच के मंच को तीन भागों में बाँटा जा सकता है।  नेपथ्य, मंच (अभिनय क्षेत्र) और मंच के आगे का भाग। नेपथ्य का प्रयोग साजघर (ग्रीनरूम) के रूप में किया जाता है, साथ ही यह स्थल अभिनेताओं के द्वारा नेपथ्य से बोले जाने वाले संवाद गीत एवं आकाशभाषित आदि प्रसंगों के लिए उपयोग में लाया जाता है। मंच पर समाजी बैठते हैं तथा मुख्य अभिनय क्रिया यहीं सम्पन्न होती है। मंच के आगे या नीचे का भाग का उपयोग भी नटुवा अभिनय के लिए करता है। कई दृश्यों को एक साथ दिखाने तथा स्थान परिवर्तन बोद्द के लिए भी मंच के आगे का भाग उपयोग में लायी जाती है, जैसे एक ही समय राजा का महल और युद्ध का मैदान दिखाना होता है तो राजा के महल का दृश्य का मंच पर दिखाया जाता है और युद्ध क्षेत्र मंच के आगे।

            मंच प्रकाश के लिए पहले मशाल या गैसबत्ती का प्रयोग होता था, अब बिजली की सुविद्दा होने से साद्दारण बल्ब जलाकर काम चलया जाता है। रूपसज्जा के बारे में नटुवा अद्दिक सजग है। नटुवा अपना-अपना मेकअप स्वयं करते हैं। रूपसज्जा में सिन्दूर, कुमकुम, खड़िया, गेरू, काजल, मुर्दाशंख आदि पारम्परिक सामग्री का उपयोग किया जाता है। स्त्री पात्र के लिए विगका प्रयोग तथा बूढ़े पात्र के पके मूंछ -दाढ़ी के लिए सन (पटसन) प्रयुक्त होता है। मोटा-मोटी नाच का कथानक पौराणिक होता है, इसलिए रूपसज्जा अद्दिक चमकीली और भड़कीली होती है, जो मद्धिम प्रकाश में भी अभिनेता के चेहरे के भावों को स्पष्ट कर देता है। वेशभूषा सम्पन्न नाच मंडली उम्दा समझी जाती है। मानवेत्तर प्राणी के अभिनय के लिए मुखौटे का भी प्रयोग किया जाता है। युद्ध सामग्री बाँस या लकड़ी की बनी होती है।

            नाच की दृश्य-रचना अन्य लोकनाट्यों की तरह सांकेतिक और काल्पनिक होती है। हाव-भाव तथा कथोपकथन द्वारा स्थान परिवर्तन का सहज बोद्द कराया जाता है। यथा राजा सलहेसके नाच में लेबरा नटी से मंच को निमित कर कहता है- ई भेलो लोलन बाग फुलवारी’ (यह है लोलन बाग फुलवाड़ी)। यहाँ दर्शक समझ जाता है कि अब लोलन बाग फुलवारी वाला दृश्य यहीं होगा। कहीं-कहीं चित्रकारी किए पर्दे का प्रयोग भी दृश्य विशेष के लिए किया जाता है।

नटुवा नाच की सबसे बड़ी विशेषता है उनका अभिनय शिल्प विद्दान। अधिकांश संवाद गेय होते हैं। बीच-बीच में वार्तालाप गद्य में होता है। अच्छे अभिनेता के लिए अच्छा गायक होना जरूरी होता है। नृत्य के साथ गायिकी कठिन साधना  है और उसे नटुवा नाच के अभिनेताओं में देखा जा सकता है। गायकी भी उच्च लय में और भी कठिन है। लेबरा के हास्य प्रसंग के बाद जब पात्र मंच पर आता है, सबसे पहले सुमिरन (देखें पृष्ठ 149) और उसके बाद अपना परिचय देता है।

अइ हमरो के नाम हो लागे सिरी ते सलहेस नै यौऽऽऽ

अइ चौदह कोस राज हमरा भगवान नै देलके नै यौऽऽऽ

अइ छोट भाय के नाम लागे मोती राम दुलरूवा नै यौऽऽऽ

अइ भागिना के नाम लागे कारिकंथ दुलरूवा नै योऽऽऽ

अइ कहाँ गेले किए भेलौ मोतीराम दुलरूवा नै रेऽऽऽ

अइ जलदी से आबिहें रे बबुआ राज तँ दरबार मे नै रेऽऽऽ

अर्थात्, मेरा नाम राजा सलहेस है, राज महिसोथा मेरा घर है। छोटे भाई का नाम मोती राम है तथा भागिन का नाम कारिकंथ है। भाई मोती राम कहाँ हो, जल्दी से राज दरबार में आओ ?

पार्श्व मंच में खड़े अभिनेता को जो मोतीराम की भूमिका कर रहा है, सलहेस की पुकार सुनाई देती है। वह वहीं से गाते हुए मंच पर प्रवेश करता है -

अइ सुनिये अवाज हो भैया सब, राजा सलहेस के नै योऽऽऽ

अइ कोन तऽ बिपतिया भैया पड़लौ हो आयऽऽऽ

अइ कौन तऽ बिपतिया राज महिसोथा मेऽऽऽ

अइ एक कोस चलले मोती राम कोस तऽ दोसर वे होऽऽऽ

अइ तेसर कोस जुमलै दुलरूवा राज तऽ महल मेऽऽऽ

संवाद गीतों को गाकर, मंच पर चार तीन चक्कर लगाकर मोती राम राजा सलहेस के समक्ष जाता है, जो मंच पर ही उपस्थित है तथा राजदरबार में चहलकदमी कर रहा है। एक दूसरे की नज़रें मिलती हैं। मोतीराम झुककर प्रणाम करता है, सलहेस गले लगाते हैं। मोतीराम, (सलहेस) से ‘‘हे भाई आपको क्या बिपति आ पड़ी है, राज महिसौथा में? सो आज आपने दुलरुवा मोतीराम को याद किया।’’ राजा सलहेस कहते हैं, ‘‘देवी दुर्गा स्वप्न में प्रकट हुई थीं। उनका कहना है कि राजपोखरिया गढ़ कंचन में राजा कुलेश्वर की फुलवाड़ी में  नाना प्रकार के फूल खिले हैं, सो वहाँ से मुझे फूल लाकर देवी दुर्गा को चढ़ाने हैं, मेरे पीछे तुम राजपाट का खयाल रखना।’’ इतना कहकर राजा सलहेस कंचनगढ़ के लिए प्रस्थान करते हैं। नाटक आगे बढ़ता है। नटुआ नाच में अभिनेता संवाद या गीतों को रटते या याद नहीं करते हैं, बल्कि घटनाओं पर गीत या संवादों का तत्काल आशु रचना करते हैं। पात्रों के बीच बतकहीऔर बात से बात निकालना, उसकी व्याख्या करना, उससे भी ज़्यादा दृश्यों में संजोकर जीवन्त बनाना नटुवा नाच के अभिनय पद्धति की विशेषता है। अभिनेता को सिर्फ घटनाक्रम का पता होता है। गीत और संवादों की आशु रचना वे स्वयं करते हैं। अतः नटुवा नाच के अभिनेता, अच्छे गायक के साथ ही बेहतर आशु कवि भी होते हैं। अभिनेता मंच पर घूम-घूमकर ऊँची आवाज में लयात्मक ढंग से संवाद बोलते हैं ताकि सभी दिशाओं में बैठे दर्शक देख-सुन सकें। नटुवा नाच अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता है - भावनिरपेक्षता। ब्रेख्त के जिस नाट्य प्रयोग ने (महाकाव्य रंगमंच) बींसवी शताब्दी में थियेटर की दुनिया में द्दूम मचा दी थी, वह तत्व नाच के अभिनय में विद्यमान है। नाच में जब कोई ऐसा दृश्य आता है कि दर्शक कैथारसिस (भावप्रमणता) का शिकार हो, भावविभोर हो जाता है तो यकायक लेबरामंच पर आता है और दर्शकों से कुछ गुदगुदाने वाली बात कह हँसा देता है। इस प्रकार नाटकीय स्थिति में रुकावट तो आती है पर दर्शकों को कैथारसिस से मुक्ति मिलती है। वाचिक अभिनय के अलावे नटुवा आंगिक, अहार्य और चित्राभिनय में भी प्रवीण होते हैं। आंगिक अभिनय पर लोक जीवन की छाप होती है। नटुवा नाच के कलाकार मजदूर वर्ग से आते हैं। एक दिन मजदूरी नहीं करने की विवशता उनके परिवार को भूखा रख सकती है। श्रम से गठित शरीर मंचाभिनय में बड़ा काम आता है। नटुवा नाच के अद्दिकांश कथानक वीर और करुण रस के हैं। वीरता श्रमिक वर्ग की दमित भावना है और करुणा में तो उनका जीवन ही सराबोर है। इन दोनों भावनाओं की स्वच्छन्द अभिव्यक्ति के लिए इन अभिनेताओं को कहीं से कुछ सीखना नहीं होता है, बल्कि कुछ पल के लिए मंच पर वह अपने ही जीवन को जीता है। वीर रस के अभिनय में विशेष प्रकार के युद्ध ताल या अभियान ताल बजाए जाते हैं। नटुवा, मंच पर युद्ध के दृश्य के लिए तलवारबाजी का बेहरतर प्रदर्शन करते हैं। सैनिकों के बीच की लड़ाई का दृश्य लड़बाजी (लाठी भाँजने की कला) के द्वारा प्रदर्शित की जाती है। कभी कभार दो योद्धाओं के बीच की लड़ाई का दृश्य मल्लयुद्ध के द्वारा दिखाया जाता हैं। मल्लयुद्ध में धोबी पाट और मुसकी बांध का दृश्य बड़ा ही रोमांचक होता है। सामान्य रूप से कपड़ों को मेढ़कर बनाया गया कोड़ा भी मारपीट के दृश्य में प्रभावोत्पादक होता है। कपड़े से बने कोड़ों को इस तरह झटका जाता है कि उससे फटफट की आवाज़ें निकलती हैं तथा पीटने का भ्रम उत्पन्न होता है। मानवेत्तर प्राणियों तथा नदी, नाव, घुड़सवारी आदि दृश्य या घटनाओं को दर्शाने के लिए सांकेतिक और चित्राभिनय का सहारा लिया जाता है। अहार्य अभिनय में नटुवा माहिर होते हैं। सामान्य या पात्रोचित वेशभूषा के अलावे नटुआ नाच के कलाकार वेशभूषा के द्वारा ही विभिन्न मानवेत्तर प्राणियों की अनुकृति मंच पर प्रस्तुत करते हैं।

नटुवा नाच के अधिकांश कथानक लोकगाथाओं से लिए गए हैं। इन गाथाओं की पहचान कथानक से पहले गायकी की धुनों से कर ली जाती है। नटुवा नाच के कलाकारों ने इन सभी का प्रयोग गायकी में किया है। मसलन सलहेस और लोरिक नाच में गायकी की मुख्य धुनें सलहेस और लोरिक की गाथाओं जैसी हैं। जहाँ बीच-बीच में यथावसर पूर्वी, कजरी, बारहमासा, जँतसार, चैतार, लगनी, पराती, निर्गुण, गोदना, पमरिया, सोहर, समदौन आदि लोकद्दुनों का प्रयोग भी नटुवा नाच में होता है। सुमिरन या बंधनियाँ गाते समय प्रायः कोसिका (कोसी नदी के गीत) या देवी-देवताओं के गीत की द्दुनें प्रयुक्त होती हैं। संवाद गीतों को अभिनेताओं द्वारा गाया जाता है। अभिनेताओं द्वारा गाए गए संवाद को पुनः समाजी द्वारा गाया जाता है, जिसका नेतृत्व मूलगैनकरता है। बड़ा ही रोमांचक होती है यह पद्धति, अभिनेता संवाद गीतों को जिस लय और ताल के साथ गाते हैं, समाजी उसी संवाद गीतों को इससे अलग लय और ताल में गाते हैं। जब तक समाजी संवाद गीतों को गाते हैं तब तक अभिनेता उन गीतों के भावों को आंगिक भंगिमाओं के द्वारा अभिव्यक्त करते हैं। गीत स्वर प्रदान नहीं, बल्कि बोल प्रधान होते हैं। वाद्यों मे ढोल, नगाड़ा, हारमोनियम, पिपही (सुषिर वाद्य) झांझ, करताल आदि बजाए जाते हैं। नृत्य का कोई संयोजित या संगठित रूप नटुवा नाच में देखने को नहीं मिलता है। लेकिन संवाद गीतों के साथ अंग संचालन और विशेष भावाभिव्यक्ति के समय आंगिक विक्षेप किसी-न-किसी नृत्य परम्परा का बोध कराता है। पूर्वरंग में गायन के साथ किया जानेवाला  नृत्य भोजपुर अंचल के लौंडा नाच से साम्य रखता है। दरअसल नटुवा नाच के नृत्य में वक्ष, हाथ और पाँव के साथ कमर का संचालन बड़ा ही लुभावन होता है। ठीक इसी तरह का कमर संचालन त्रिपुरा की रियांग जनजाति के होजागिरी नृत्य में देखा जा सकता है। नर्तन की चाली, कमर और हाथ का संचालन, वक्ष और गर्दन की गतियाँ कश्मीर के पारम्परिक नाट्य भांड पाथेर के अभिनय के बीच होने वाले नृत्य बचनगमासे साम्य रखता है। नटुवा का मंडलाकार या आवर्त में भाँवरी भरते हुए नाचना रास से प्रेरित लगता है, जो वैष्णव भक्ति आन्दोलन के समय पूर्वांचल भारत में आया। लेकिन नर्त्तन की चाली और अभिनेताओं का आंगिक विक्षेप नदियों की लहर, पक्षियों का उड़ना, तथा साँप के रेगने आदि से प्रभावित लगता है। नटुवा नाच के नर्तक झुंड में पक्षियों की तरह मंच पर आते हैं और झटके से बिखरकर उन्मुक्त भाव से मंच पर तैरने लगते हैं। सलहेस नाच का चाँचर नृत्य और गीत बड़ा ही लुभावना होता है। शास्त्रीय रूप से चाँचर, चर्चरी से विकसित लगता है।

नटुवा नाच के अधिकांश कथानक लोकगाथाओं से लिए गए हैं। पौराणिक, प्रेमाख्यानक तथा वीरकथात्मक लोकगाथाओं के अलावे कुछ सामाजिक घटनाओं का मंचन भी नटुवा नाच के मंच पर होता है। मंचित होने वाली अधिकांश लोकगाथाएँ मध्यकालीन या पूर्व मध्यकाल की सामाजिक घटनाओं पर आद्दारित हैं। मध्यकालीन समाज राजनीतिक रूप से खंडित था। कुछ काल विशेष को छोड़कर बाँकी समय में समाज केन्द्रीय सत्ता से अलग-थलग था। राजा या सुल्तान सूबे को छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित कर जागीरदार और सामंतों के अधीन  कर दिया था। इन सामन्त और जागीरदारों का सामाजिक सरोकार सिर्फ कर उगाही तक सीमित था। इस व्यवस्था के प्रति कई संगठित और असंगठित विद्रोह भी हुए। इस तरह के विद्रोह निर्ममता से कुचल भी दिए गए। लेकिन लोक मानस पर इन घटनाओं का गहरा और व्यापक प्रभाव पड़ा। जागीरदारों और सामन्तों के खिलाफ लड़नेवाले, समाज के असली लोकनायक हुए। लोक कवियों ने इन नायकों के जीवन चरित्र को लेकर कई संघर्ष गाथाओं की रचना की, जो लोकगाथा के रूप में लोककंठ में प्रवाहमान है। नटुवा नाच के प्रयोक्ता भी उसी वर्ग से हुए, जिस वर्ग के ये लोकनायक और लोककवि थे। नटुवा नाच के कलाकारों ने बड़ी सहजता से इन वीरगाथाओं का नाट्य रूपान्तरण किया। वीरकथात्मक कथानकों में लोरिक मनियार, दीना-भदरी, हंसराज- बंसराज, कुँवर विजयमल्ल, गुगली घटमा, आल्हा ऊदल, नटुवा दयाल सिंह, सौंसिया महाराज, शीत-बसंत आदि प्रमुख हैं। इन वीरगाथाओं में संघर्ष का कैनवास स्थानीय रहते हुए भी विद्रोह का स्वरूप व्यापक और धारदार था।

मिथिलांचल (उत्तरी बिहार) प्राचीन काल में वैदिक शिक्षा, न्याय, दर्शन आदि प्रमुख विद्याओं  का अध्ययन केन्द्र था। लोग वैदिक द्दर्म को मानते थे। कालान्तर में कभी बौद्ध, कभी शैव, कभी शाक्त तो कभी नाथपंथ और वैष्णव आदि मार्गों को समाज ने अपनाया। इन मार्गों की स्वीकृति और अस्वीकृति में समाज ने गहरा चिंतन किया। ये चिंतन विभिन्न विद्दाओं में प्रतीकात्मक रूप में स्थान पा लिया। इनमें से एक विद्दा थी, लोकगाथा। गोपीचन्द, भरथरी, सोरठी-बृजभार (सभी नाथपंथ), बिहुला-विषहरी (शाक्त और शैव का संघर्ष) इसी श्रेणी की लोकगाथाएँ हैं, जिनका प्रदर्शन नटुवा नाच के मंच पर होता है। नटुवा नाच के कथानक में सत्य हरिश्चन्द्र और राजा नल जैसे आदर्श चरित्रों की जीवन-गाथा भी शामिल है। राजा हरिश्चन्द्र और नल दो ऐसे पौराणिक चरित्र हैं, जो प्रतिकूल परिस्थितों में भी सत्य और जीवन के आदर्श से नहीं डीगे।

लोकजीवन खास कर निम्न आर्थिक वर्ग में प्रेम की स्वीकृति और उसकी स्वच्छंद अभिव्यक्ति के प्रति संकोचभाव रहा है। वहाँ उन्होंने मर्यादित प्रेम को समर्थन दिया। ऐसी ही प्रेमकथाएँ हैं - सलहेस-कुसमा, रेशमा-चुहड़मल, नैका-बनिजरा, महुवा-घटवारिन, जालिम सिंह, हिरणी-बिरनी, ढोला कुँवर तथा सारंगा-सदावृक्ष आदि। इन प्रेमकथाओं में एक बात सामान दिखती है, वह है नायक का वीर होना। नायिका इन वीर नायकों के रूप पर मोहित नहीं होती, बल्कि उनकी वीरता पर सबकुछ न्यौछावर करती है। नायक भी नायिका के रूप शृंगार पर आसक्त नहीं होता, बल्कि यह कहते हुए उन्हें अपने से दूर रहने को कहता है कि उनका जन्म तो लोक कल्याण के लिए हुआ है। इसके अलावा कुछ ऐसे कथानकों को भी नटुवा नाच मंच पर दिखाया जाता है, जिसके केन्द्र में परिवार है। जहाँ सौतेली माँ के कारण बच्चे कष्ट पाते हैं। ऐसे नाच हैं - सुन्दर वन, रूना-झूना, शीतबसंत तथा हंसराज बँसराज आदि। इन कथानकों में बालचरित्र अवश्य हैं। ये सभी वीर बालक हैं और समय से पहले प्रौढ़ भी। एक नाच है मोतिया किसान, जिसमें जमींदार अपने रैयत की पत्नी पर मोहित होता और उस पर कर्ज नहीं अदा करने का मुकदमा चलाकर करागार में डाल उसकी पत्नी को हड़प लेता है। इस प्रकार नटुवा नाच के कथानकों में अंचल विशेष के सामाजिक जीवन के यथार्थ का चित्रण हुआ है। इन कथानकों  का विकास 12वीं शताब्दी से लेकर आज तक के विभिन्न कालखंडों में हुआ है। भारी संख्या में दर्शकों की सहभागिता का कारण इनका कथानक और प्रदर्शन शिल्प है।

            नटुवा नाच के दर्शकों में निम्न आर्थिक वर्ग और मध्य वर्ग के लोग शामिल होते हैं। नटुवा नाच को दरबार या सामन्तों का संरक्षण नहीं मिला। लगता है इसलिए इस नाट्यरूप ने किसी वर्ग विशेष की अभिरुचि का सम्पोषण नहीं किया, बल्कि यह दर्शकों की अभिरुचि और भावनाओं के अनुकूल विकसित हुआ है। दर्शकों में सबसे अद्दिक थके हारे श्रमिक होते हैं, जो दिनभर खेतों में कठिन श्रम करते हैं। इन श्रमिक वर्गों की अपनी आकांक्षाएँ एवं अभिरुचियाँ है। नटुवा नाच के अद्दिकांश कथानक वीर और करुण रस के हैं। कुछ कथानक प्रेमाख्यानों से भी लिए गए हैं, लेकिन ऐसे कथानक बहुत लोकप्रिय नहीं हैं। स्वच्छंद प्रेम का खुलेआम समर्थन/स्वीकृति इन दर्शकों के पहुँच से बाहर है। इसका कारण शायद सामंती सामाजिक ढाँचे में उनका सबसे नीचे होना है, जहाँ उन्हें सबकुछ चुपचाप सहन करना पड़ता है। वीरता इन श्रमिक वर्गों की दमित भावना है, जिन्हें अभिव्यक्त या प्रदर्शित करने का अवसर इन्हें सामाजिक ढाँचा ने नहीं दिया, इसलिए जब मंच पर अपने लोकनायकों को वीरता का प्रदर्शन करते देखते हैं तो उनका मन हर्षित होता है। जीवन की दबी हुई भावनाएँ फलित होती नज़र आती हैं। वे आँखों में रात काट लेते हैं। करुणा में तो उनका जीवन सराबोर होता है। जब कोई पात्र मंच तिरस्कृत होता है या विवशता में तड़पता है, तो उन्हें समानुभूति होती है।

अधिकांश भारतीय कलारूप अपने संरक्षक या मालिक की भावनाओं और आकांक्षाओं का सम्पोषण करती है या उसके दवाब को झेलती या महसूस करती रही है। लेकिन नटुवा नाच के विश्लेषण से स्पष्ट है कि यहाँ सर्वहारा दर्शकों की अभिरुचि और आकांक्षाओं के अनुरूप ही इस नाट्य रूप का ढाँचा विकसित हुआ है। इसलिए यह परम्परा जीवन्त है ।

(साभार : बिहार के पारंपरिक नाट्य – ओम प्रकाश भारती। प्रस्तुत पुस्तक को मौलिक शोध लेखन के 2008 का इंदिरा गांधी राजभाषा राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ)

 

जनजातीय एवं लोक कलाएँ : अर्थ, परिभाषा , विशेषताएँ एवं वर्गीकरण- ओम प्रकाश भारती

 

जनजातीय एवं लोक कलाएँ : अर्थ, परिभाषा , विशेषताएँ एवं वर्गीकरण- ओम प्रकाश भारती

मानव अपनी सहज अनुभूतियों से लेकर जटिलतम स्थितियों को, आवेग एवं संवेगों की  अनुभूतियों को कलात्मक सौंदर्य के साथ, अत्यन्त सहज प्रतीकों एवं बिम्बों के माध्यम से परंपरागत लोक कलाओं में अभिव्यक्त करते आए हैं। हजारों वर्षो में समाज विकास की धारा के साथ ये लोक कलाएं विकसित हुई हैं। इसमें संपूर्ण समाज का अनुभूत सौंदर्य बोध एवं सामाजिक यथार्थ की कलात्मक अभिव्यक्ति हुई है। लोक कलाओं में अभिव्यक्ति के लिए उपयेाग में लाए जाने वाले उपकरण प्रकृति और जीवन से जुटाए गए हैं ।

जनजातीय और लोक कलाओं पर अलग से विमर्श 18 वीं के आरंभ में हुआ। इससे पूर्व भारतीय तथा परंपरा में वैदिक ग्रंथों में लोक शब्द की व्याख्या की गयी गयी है ।  लेकिन लोक परंपरा तथा कला की अवधारणा हमें नाट्यशास्त्र के समय से ही प्राप्त होता है।  यूरोपीय विचारकों ने आदिवासी या लोक कलाओं के आरंभिक रूपों को आदिम कला (प्रिमिटिव आर्ट्स) कहा है।  कालांतर में folk (लोक) शब्द का प्रचालन हुआ।  और फिर लोक, आदिम तथा जनजातीय कलाओं की भिन्न व्याख्याएँ की गयी।  यहाँ क्रमिक रूप से हम आदिम, जनजातीय तथा लोक कलाओं के अर्थ , परिभाषा तथा विशेषताओं आदि की चर्चा करेंगे।

भारतीय संदर्भ में आदिवासी, वनवासी या जनजाति एक विशेष सांस्कृतिक परिवेश और पहचान के साथ रह रहे मानव समूह से है। जनजाति शब्द की परिभाषा को लेकर मानवशास्त्रियों में मतभेद रहा है। प्रायः जनजाति शब्द की उत्पत्ति तथा अर्थ के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण देखने को मिलते है। चूंकि जनजातियों प्रायः शहरी सभ्यता से बहुत दूर घने जंगलों, पर्वतों, घाटियों एवं पहाड़ी क्षेत्र में निवास करती आयी है। इन लोगों का जीवन प्रकृति के संघर्षमय था।

 

अतः सामान्यतः लोग उन्हें आदिवासी समझते है जो पिछड़े वर्ग और असभ्य मानव समूह के रूप में एक सामान्य क्षेत्र में निवास करते हुए समान्य संस्कृति का अनुसरण करते है। मुख्यतः भारतीय जनजातियों के संबंध में मानवशास्त्रियों एवं समाजशास्त्रियों का मत है कि ये नीग्रीटो, प्रोटोआस्ट्रेलियड़ (आस्ट्रिक या प्री-द्रविडियन) तथा मंगोलियन प्रजाति के लोग है जो भारतीय परिवेश के आदि निवासी हैं। 

भारतीय संविधान (1950) के अनुच्छेद उपखण्ड- 1 में जनजाति की परिभाषा को इस प्रकार स्वीकार किया गया है। राष्ट्रपति सार्वजनिक सूचना व्दारा जनजातियों, जनजाति या जनजातियों के भीतरी समूह मे परिभाषित किये जाएंगे, वे अब अनुसूचित जनजाति कहलायेंगे।[1] जनजाति शब्द के सन्दर्भ में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति आयुक्त ने 1952 ई. में प्रस्तुत रिपोर्ट में जनजाति समूह की निम्न विशेषताओं का वर्णन किया है[2]

1.   जनजाति समूह सभ्य समाज से दूर वनों एवं पहाड़ियों में दुरस्थ स्थानों में निवास करते है।

2.   जनजाति समूह नैग्रिटों, आस्ट्रेलियाई एवं मंगोलाइड प्रजाति वर्गो के अन्तर्गत माने जाते हैं।

3.   जनजाति समूह एक ही प्रकार की बोली बोलते हैं।

4.   जनजातियों का धर्म जीववाद कहा जा सकता है, जिसके अन्तर्गत वे प्रेत आत्माओं की पूजा करते हैं।

5.   जनजाति समूह का व्यवसाय शिकार और भोजन एकत्र करना होता है।

6.   जनजाति समूह समान्यतः मांस आदि का सेवन करते हैं।

7.   जनजाति समूह पर्वतों की घाटियों के किनारे निवास करते हैं।

8.   इनका जीवन घुमंतु प्रवृत्ति का होता है और ये नृत्य एवं मदिरापान के प्रेमी होते है।

समाजशास्त्री घूरये ने इन्हें तथाकथित आदिवासी अथवा पिछड़े हिन्दू कहा है।

धीरेन्द्र नाथ मजुमदार ने जनजाति की व्याख्या करते हुए कहा है कि जनजाति परिवारों या परिवार समूहों के समुदाय का नाम है। इन परिवारों या परिवार समूह का एक सामान्य नाम होता है ये एक ही भू भाग में निवास करते हैं, एक ही भाषा बोलते हैं विवाह, उद्योग धंधों में के ही प्रकार की बातों को निबिद्ध मानते हैं। एक- दूसरे के साथ व्यवहार के संबंध में भी उन्होंने अपने पुराने अनुभव के आधार पर कुछ निश्चित नियम बना लिए होते हैं। जनजाति शब्द की उत्पत्ति तथा अर्थ के विषय में भिन्न-भिन्न विचारधाराएँ है। सन 1981 ई. की जनसंख्या आयुक्त श्री डॉ. एन. बेन्स ने जातियों को उनके परम्परागत व्यवसाय के आधार पर वर्गीकृत किया। कृषक एवं चरवाहा जातियों की श्रेणी के अंन्तर्गत उन्होंने वन्यजातियों के नाम से एक पृथक उप शीर्षक बनाया। सन 1911 ई. में उन्हें जनजाति प्रकृतिवादी अथवा जनजातीय धर्म को मानने वाले लोग कहा गया। सन 1921 ई. की जनसंख्या रिपोर्ट में उन्हें पहाड़ी एवं वन्य जनजातियों का नाम दिया गया। सन 1931 ई. की जनसंख्या रिपोर्ट में उन्हें आदिम जनजाति कहा गया। भारत सरकार अधिनियम सन 1935 ई. में जनजातीय जनसंख्या को पिछड़ी जनजातियाँ नाम दिया गया। सन 1941 ई. की जनसंख्या रिपोर्ट में केवल जनजातियाँ कहा गया।

मानवशास्त्रियों ने जनजातियों को परिभाषित करने में मुख्य आधार या तत्व संस्कृति को माना है।  परंतु कभी कभी  ऐसा देखने में मिलता है कि किसी एक ही क्षेत्र में यद्यपि विविध जनजातियाँ रहती हैं, फिर भी उनकी संस्कृति में एकरूपता दृष्टिगत होती है। अत: जनजातियों को परिभाषित करने में केवल संस्कृति को ही आधार तत्व मानना एकांगीपन कहा जायेगा। इसके लिए हमें संस्कृति के अतिरिक्त भौगोलिक, भाषिक तथा राजनितिक अवस्थाओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक होगा।

जन जातीय कलाओं को अंग्रेजी के ट्रायबल आर्ट्स के समकक्ष समझना चाहिए। डेनिस डटन के अनुसार जनजातीय कला जिसे इथ्नोग्राफिक आर्ट भी कहा जाता है,मूल रूप से "आदिम" लोगों की सांस्कृतिक कलाकृतियों को संदर्भित करता है - अर्थात, उन जातीय समूहों को पश्चिमी मानकों पर सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत पिछड़ा माना जाता है।  
            जन जातीय कलाओं के अंतर्गत अमेरिका (जैसे कि इनुइट, दक्षिण-पश्चिम और मैदानी भारतीय और मध्य और दक्षिण अमेरिका के अलग-थलग इलाके), ओशिनिया (मेलनेशिया और ऑस्ट्रेलिया, पोलिनेशिया और न्यूजीलैंड सहित), और सबहारन अफ्रीका। और वह समाज  जो  (1) यूरोप, उत्तरी अफ्रीका या एशिया की सभ्यताओं से राजनीतिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग है  (2) साक्षरता के अभाव में मौखिक परंपराओं का अनुपालन करता है (3) छोटी, स्वतंत्र जनसंख्या 
 
समूहन, आम तौर पर कुछ सौ से अधिक लोगों के गांवों, में जो  सामाजिक संपर्क और अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण का जीवन जीते हैं, (4) निम्न स्तर का श्रम / शिल्प विशेषज्ञता प्राप्त समाज, (5) शिकार, मछली पकड़ने के द्वारा और भोजन संग्रह या छोटे पैमाने पर कृषि करने वाला समाज (6)  छोटी तकनीक, और धातु के बजाय अक्सर पत्थर का उपयोग करने वाला समुदाय  (7) यूरोपीय संपर्क में आने से पहले  सांस्कृतिक परिवर्तन की धीमी दर।  लिखित भाषा की कमी, और बड़ी सभ्यताओं से अलगाव उन समाजों की आवश्यक विशेषताएं हैं।[3] - जो इस प्रकार का जीवन यापन कर रहे हैं , इनके कलाओं को ट्रायबल आर्ट कहा जाएगा। 

डेनिस ट्रायबल आर्ट को आदिम कला का पर्याय मानते हैं।  आदिम कला शब्द का उपयोग आमतौर पर चीनी, भारतीय या इस्लामी कलाकृतियों का वर्णन करने के लिए नहीं किया जाता है, या मिस्र, ग्रीक या रोमन सभ्यताओं सहित किसी भी प्रमुख संस्कृतियों के लिए नहीं किया जाता  है।

सांस्कृतिक सृजन खासकर कला के प्रचारात्मक मूल्य की खोज मानव इतिहास के आदिकाल में ही कर ली गई और उसका भरपूर उपयोग भी किया गया।[4] भारतीय जनजातियों के कलात्मक प्रयासों व कलाओं के वैज्ञानिक तथा व्यवस्थित अध्ययन पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है । फिर भी जनजातियों की कलाओं से संबंधित जो भी आंकड़े उपलब्ध है, उनसे यह पता चलता है कि जनजातियों में विभिन्न प्रकार की कलाएं विद्यमान है। अधिकतर आदिम लोगों की कलाएं,

तकनीकी अज्ञानता, फूहड़पन से उच्च तकनीक, सरलता से विषमताओं, तथा प्रकृतिवाद व यथार्थ से लेकर परंपरागत कल्पनाओं के विस्तार की ओर विचरण करती हैं।[5]

आदिवासी प्रकृति के बीच रहने वाला ऐसा व्यक्ति है जिसने अपने रहन-सहन के तौर तरीके तथा कार्यकलाप प्रकृति से सीखें हैं। एक बाहरी या अजनजातीय सामान्य व्यक्ति के लिए अधिकतर जनजातीय कलाएं और इनके प्रदर्शन के माध्यम सुंदर या कलात्मक नहीं होंगे। परंतु इन कलाओं को पूर्णतया समझने के लिए उन तथ्यों तथा वातावरण को भी भली-भांति जानना और समझना चाहिए जिनमें इसकी रचना हुई है।[6]

आदिम कलाओं के संबंध में यह बात सत्य है क्योंकि इन कलाओं की पृष्ठभूमि ही अलग है। वेरियर एल्विन ने इस विषय पर और विस्तृत रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी मंदिर या तीर्थ में रखने के उद्देश्य से अफ्रीका के जंगलों में उपलब्ध किसी देवता या पूर्वज की मूर्ति जब अपने मौलिक वातावरण से हटाकर शीशे में बंद कर यूरोपिया हिंदुस्तान मैं किसी कमरेनुमा स्थान पर रख दी जाए तो उसका प्रभाव सामान कैसे रह सकता है। भारतीय जनजाति कलाओं का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है ,इन कलाओं का धर्म के साथ तालमेल। सभ्य समाज द्वारा धर्मनिरपेक्षता व पवित्रता के बीच का विभाजन इन लोगों में मान्य नहीं है। इस प्रकार कला तथा धर्म "एक दूसरे के एक रूप व एक रस होकर एकीकृत हो जाते हैं"। [7]

संस्कृति के संदर्भ में आदिम कला के महत्त्व का पता टेलर की प्रिमिटिव कल्चर और फ्रेजर की गोल्डन बाउ जैसी पुस्तकों से चलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक मनुष्य और उसकी कला प्रवृत्तियों को समझने के लिए आदिम मनुष्य और आदिम कला को समझना आवश्यक है।  तभी हम उन परिवेश दत्त प्राकृतिक शारीरिक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रगति का जायजा ले सकेंगे।

 

 कलाकार इस बात पर बिल्कुल परेशान नहीं है कि उनकी कलाओं को अपरिष्कृत कहा जा सकता है। किसी भी वस्तु की जैसी छवि उसके मस्तिष्क में है वे उसे वैसा ही बनाकर प्रस्तुत करते हैं। जनजाति कलाकार "अप्रशिक्षित" हो सकता है परंतु भली प्रकार से "दीक्षित" है।[8]

पिकासो ने एक बार कहा था कि उसकी एव्सट्रेक्ट’(अमूर्त) कला का प्रेरणा स्रोत अफ्रीका कि आदिम कला है ,जिसमें मुखौटे , नृत्य-मुद्राएँ ,रेखाओं का उलझाव और संगीत कि अजीब धुनें मिलती है। [9] 

संस्कृति का कार्य समाज की रक्षा करना है। आध्यात्मिक सृजन ,परंपराएं, रूढ़ियां और संस्थाएं सामाजिक संगठन के ही तरीके और साधन है। समाज के संरक्षा के संघर्ष में धर्म, दर्शन, विज्ञान और कला सब अपनी जगह है। अगर केवल कला के ही बारे में विचार करें तो सबसे पहले यह जादू टोना का औजार थी ,आदिम शिकारी समुदाय की आजीविका की रक्षा का साधन थी । फिर यह सामुदायिक हितों की रक्षा के लिए भली और बुरी आत्माओं को प्रभावित करने वाले

 

हथियार की तरह पशु पूजक धर्म में बदल गई । क्रमशः, यह सर्वशक्तिमान ईश्वर और उसके सांसारिक प्रतिनिधियों के गुण कीर्तन और भजन, ईश्वर और राजा की मूर्ति निर्माण के जरिए उनके अति रंजन में बदल गई। अंततः, कमोबेश खुले प्रचार के रूप का इसका इस्तेमाल किसी अल्पसंख्यक समूह, किसी गुट, किसी राजनीतिक पार्टी या किसी सामाजिक वर्ग के हितों के लिए होने लगा।[10]

निष्कर्षत: जनजातीय कलाओं में प्रेम और प्रकृति सहज कि सहज अभिव्यक्ति हुई है।    इस प्रकार जनजाति और जन जातीय कलाओं को लेकर दुनियाँ भर के विद्वानों ने भिन्न –भिन्न विचार प्रस्तुत किए हैं। दरअसल, एकांगी विचार देना संभव नहीं लगता, कारण यह है कि दुनियाँ के अधिकांश आदिवासी समाज ना तो आदिम अवस्था में है और ना  ही  अशिक्षित या अर्द्ध विकसित । भारतीय संदर्भ में देखें तो वे  मूल धर्म से कट चुके हैं। इसका असर उनके कला रूपों पर भी दिखाई देता है। जो कुछ भी हो प्रस्तुत शोध प्रबंध में पूर्वोत्तर भारत के जन जातियों के बीच प्रचलित कला रूपों की परंपरा और वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखकर शोध अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कला आलोचना में  जन जातीय और लोक कलाओं के शिल्प और सौंदर्य को अलग नहीं समझा जा सकता है। वस्तु के स्तर पर भिन्नता अवश्य है। क्योंकि दोनों का  समाज, धर्म और चिंतन प्रक्रिया भिन्न है।

जनजातीय कलाओं समाजशास्त्रीय और ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है कि यह भाषा और मिथक की मध्यवर्ती रही है। सौंदर्य चेतना और मानवता के विकास के अध्ययन की दृष्टि से

 

जनजातीयकला की सभी कृतियां सामाजिक इतिहासकार के लिए मोमेंट्स हिस्टॉरिक्स हैं। इतना ही नहीं इन कलाकृतियों में व्यस्त सौंदर्य समिक संदर्भों की सीमा से ऊपर उठा हुआ कालातीत सौंदर्य है। इसी तरह समाजशास्त्रीय दृष्टि से आदिम कला का महत्व इसलिए भी सुरक्षित है कि उसकी रचना जनसाधारण के बीच पली हुई भावुक मनीषा ने की है, किसी अवकाश होगी कुलीन वर्ग की सुविधा प्राप्त प्रतिभा ने नहीं।

जनजातीय कलाकार सामाजिक दायित्व निर्वाह के प्रति आधुनिक कलाकारों की अपेक्षा अधिक सजग रहें। सचमुच आदिम कला नितांत व्यक्तिगत कला नहीं थी, उसमें समाविष्ट सामाजिकता की प्रचुरता, नैतिकता के अभिज्ञान को कठिन बना दिया। यह निर्विवाद है कि जनजातीय कला में हमें सौंदर्य चेतना के विकास का पहला चरण मिलता है। साथ ही उसमें हमें धर्म भावना के प्रति आधुनिक कला के पुरुषों की प्रतिक्रियाएं मिलती है। धर्म भावना से युक्त आदिम कला का यह रूप यातुक औपचारिक अनुष्ठानों से संबंध रहा है।

 

लोक  कला अर्थ ,परिभाषा तथा विशेषताएँ

 

लोक विधाओं के नामकरण में सबसे भ्रामक लोकशब्द की व्याख्या है, जो समय-समय पर परिवर्तित होता रहा है। साथ ही अंग्रेजी के फोक’ (जो लोक का पर्याय माना जाता रहा है) का दबाव भी लोक के अर्थमान को अस्थिर होने में भरपूर सहयोग दिया। दोष सिर्फ़ अंग्रेज़ी का नहीं,

 

भारतीय भाषाओं में भी लोकको लेकर अभी तक आम सहमति नहीं बन पाई है, जबकि लोककी व्याप्ति और अवधारणा उस समय से भारतीय समाज और परम्परा में है, जब इन क्षेत्रीय भाषाओं का उद्भव नहीं हुआ था। इधर  साहित्य आलोचना में लोक, आदिम और जनजातीय के बदले मौखिकशब्द का प्रचलन बढ़ा है, वह भी अंग्रेज़ी फोकके दबाव में। प्राचीन भारतीय वाङ्मय श्रुति परम्परा में था तो क्या उसे आज के लोक या मौखिक साहित्य के दायरे में शामिल किया जाना समीचीन होगा ? कई ऐसे सवाल हैं जिन पर विमर्श होना चाहिए।

लोक को लेकर भ्रांति कुछ हद तक अंग्रेज़ी के शब्द फोक के कारण हुई। फोक (folk) की व्युत्पति जर्मन शब्द वोल्कसे(volk) मानी जाती है। ये शब्द लोक- वोल्क- फोक समानार्थी हैं। फोक या फोकलोर शब्द के प्रचलन का श्रेय विलियम जॉन थॉमस को जाता है। ब्रिटिश संग्रहालय लंदन के संग्रहालय संरक्षक सर हेनरी एलिफ़िन्स्टन ने 1813 में पॉपुलर एन्टिक्वेटिज  के नाम से कुछ सामग्रियों का संकलन किया था। 1846 में विलियम जॉन थॉमस ने एक आलेख में पॉपुलर एन्टिक्वेटिज के बदले फोकलोर’(folklore) शब्द के प्रयोग का सुझाव दिया था।[11] कहा जाता है कि थॉमस ने जर्मन भाषा के शब्द वोकसुन्डे (folklore) से प्रेरित होकर अंग्रेजी अनुवाद फोकलोर’(folklore) प्रस्तुत किया था। सन् 1878 में नृविज्ञानी ई.बी. टेलर ने फोकलोर सोसाइटी की स्थापना की। इसके बाद  पूरे यूरोप में फोकलोर शब्द का प्रचलन बढ़ा। जर्मन भाषा

 

में वोकसुन्डे शब्द कब और कैसे आया यह अभी तक ज्ञात नहीं हो पाया है। लेकिन जिस दबाव में आया था, उसका पता तो इसके अर्थ से ही चल जाता है। जर्मन शब्द वोक का अर्थ गँवारू लोगऔर सुन्डे का अर्थ  ज्ञान या समाचार होता है। अब सवाल उठता है कि कौन थे ये गँवारू लोग। पुनर्जागरण, यूरोपीय इतिहास में लगभग तीन सौ वर्षों तक चलने वाला एक महान आन्दोलन था, जिसका आरम्भ चौदहवीं सदी में इटली में हुआ था और सोलहवीं सदी तक समस्त उत्तरी यूरोप में पुनर्जागरण की हवा चल पड़ी थी। इस नये आन्दोलन में जहाँ मध्ययुगीन सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का अंत मान लिया गया था, वहीं नई शुरुआत में जो नया वर्ग आया उनमें श्रेण्यवाद(classism) की भावनाओं का जन्म हुआ। श्रेण्यवाद की यह भावना ज्ञान, विज्ञान, कला और साहित्य के क्षेत्रा में प्रबलत्तर होती गई। और इसी श्रेण्यवाद के जो सम्पोषक वर्ग थे उन्होंने ही कल्पना की थी गँवारू लोगोंकी। आरम्भ में यूरोप में भी फोक का अर्थ गँवारू तथा असभ्य समझा जाता था। लेकिन यह विचारधारा यूरोप में दीर्घायु न हो सकी। मानवतावादी सिद्धांतों ने वैज्ञानिक युग की घोषणा के लिए दबाव बनाया। जर्मनी में कान्ट से लेकर फिक्टे, शिलर, फ्रांस में देकार्त से लेकर मोन्ताएँ, वोल्तेयर और बाद में रूसो, मार्क्स, एन्जेल्स आदि अनेक लोगों के चिन्तन में मामूली आदमीने जन्म लिया। कवियों ने मानवता के स्वर दिए । जन समुदाय की मातृभाषाओं में रचनाएँ आरम्भ हुईं। मानवशास्त्रियों ने जनजातियों में ज्ञान और बौद्धिकता के विकास के दावे प्रस्तुत किये। सवाल उठा असभ्यों को पालने वाला समाजसभ्य कैसे कहा जाएगा ? ‘फोक को पुनः परिभाषित किया गया। यूरोप का फोक सभ्य और ज्ञानी हो गया। सिर्फ़

 

अनुभवजनित मौखिक ज्ञान जैसे विशेषण उनके साथ जुड़ा रहा। आज पश्चिम का सामाजिक परिवर्तन फोकको पुनःपरिभाषित करने के लिए उकसा रहा है। और हम वहीं खड़े हैं। असभ्य, निरक्षर और अशिष्ट लोगों के बीच !

ऋग्वेद के  पुरुष सूक्त में लोक शब्द का व्यवहार जीव तथा स्थान दोनों अर्थों में हुआ है।[12] पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी  में लोक तथा सर्वलोक शब्दों का उल्लेख किया है तथा इनसे ठज्ञ   प्रत्यय करने पर लौकिक:’  तथा सार्वलौकिक:  शब्दों की निष्पत्ति की है।[13] पाणिनि ने वेद से पृथक लोग शब्द की सत्ता को स्वीकार किया है । उन्होंने अनेक शब्दों की व्युत्पत्ति को बतलाते हुए लिखा है कि वेद में आमुख शब्द अमुक प्रकार है, परंतु लोक में इसका स्वरूप भिन्न है।[14]  महाभाष्यकार पतंजलि ने भी जनसाधारण के अर्थ में लोक शब्द का व्यवहार किया है।[15]

डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय के अनुसार -लोक कला किसी परिभाषा के बंधन में नहीं बंधी है यह तो उन्मुक्त व स्वच्छंद है। लोक कलाकार बिना किसी स्वार्थ के "स्वांत सुखाय" के लिए साधना करता है । ये लोक कलाकार किसी दुरु सिद्धांत व शैली की जटिलता में नहीं पड़ता अपितु सरलता व हृदय की सुबोधता से चित्रण करता है। अतः लोक कला जन के द्वारा आत्मानुभूति के लिए चित्रण करता है। इसे इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं "जन जन को जन-जन द्वारा जन जन हेतु निश्चित कला लोक कला है।

डॉ श्याम परमार के अनुसार- लोक का अर्थ लोक मन अथवा जनजीवन की सहज अभिव्यक्ति से है। लोक कलाओं से मेरा मतलब उन प्रदर्शनकारी कलाओं से है जो देहातों कस्बों और आदिवासी रीति रिवाजों और जनपदीय सौंदर्य बोध से सीधी जुड़ी हुई हैं।

ए के हल्दार ने लिखा है कि लोग कला परंपरागत कला का वह आवश्यक स्वरुप है जिसकी अपेक्षा गवारू और उबड़ खाबड़ कला कहकर नहीं की जा सकती क्योंकि इसका संबंध आनंद की भावनाओं से सीधा जुड़ा है।

शैलेंद्र नाथ डे के अनुसार लोककला जन सामान्य विशेषतः  ग्रामीण जनों को सामूहिक अनुभूति की अभिव्यक्ति है । डॉक्टर पूरनहगल के विचार में लोक कला की मूल प्रवृत्ति स्वच्छंद स्वाभाविक एवं जीवन मूल्यों का सहज चित्रण है ।मानवीय अनुभूतियों की भाव अभिव्यक्ति लोक कला और लोक कलाकारों का मूल धर्म व लक्ष्य रहा है। इसके गंगा जमुना रंगों की सातवीं छवि में हमें सर्वत्र दिखाई देती हैं। संस्कारों और सुविचारों की श्रृंखला में आबद्घ है। इसका वह स्वरूप स्वाभाविक रूप से ही सर्वत्र विकसित हुआ है।

प्रोफेसर ए. स्टीवेंसोन के अनुसार लोक कला धार्मिक प्रतीकों की नंदतिक अभिव्यक्ति है। प्रोफेसर एम. सी. वरकेट के अनुसार लोककला पौराणिक आनुष्ठानिक एवं धार्मिक आदर्शों का प्रतिबिम्ब  है।

प्रो सी एल झा के अनुसार लोक कला हमारी धार्मिक एवं आध्यात्मिक की प्रतीक है । मानव हृदय की उपज है और जिसमें कृत्रिमता  एवं प्राविधिक प्रयोगों का कोई भी स्थान नहीं है। श्री शैलेंद्र नाथ सामंत के अनुसार जन कला सामान्य जन समुदाय को सामूहिक अनुभूति की अभिव्यक्ति है।

भारत में फोलकोरके क्षेत्र में शोधकार्य उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्ध में यूरोपीय विद्वानों ने आरंभ किया। इनमें से अधिकांश विद्वान यूरोपीय श्रेण्यवाद के सम्पोषक साम्राज्यवादी राज्य और शासक थे, जिनके अन्तःमन में अभी भी असभ्य आदमी पल रहे थे। भारत में पुनर्जागरण की घोषणा की जा चुकी थी। समाज और धर्मिक सुधर की कई संस्थाएँ नगरों में खड़ी हो चुकी थीं। भारत में बौद्धिक चेतना का आन्दोलन तो चौदहवीं शताब्दी में ही आरंभ हो चुका था, जिसे भक्ति आन्दोलन कहा गया है। भक्ति आन्दोलन में जिन सामाजिक, अमानवीय व्यवस्थाओं के खिलाफ संतों ने आवाज़ें उठाई, पाँच सौ वर्ष बाद पुनर्जागरण काल के शिक्षित वर्गों ने भी उसे दुहराया और आज भी हम जाति, धर्म को संघर्ष लेकर संघर्षरत हैं। इसी ऊहापोह में लोक साहित्य/लोक कलाओं पर अध्ययन आरंभ हुआ और लोक को परिभाषित किया गया-

 इस परिभाषा में लोक का अर्थ :

                   - निरक्षर और अशिष्ट जन समूह।

                   - रहता कहाँ है? तो आधुनिक सभ्यता से दूर गाँव में।

                   - समाज या संस्कृति का सबसे पिछड़ा वर्ग।

                   - जिसकी वृत्तियाँ मौलिक रूप से आदिम और अपरिष्कृत है, आदि समझा गया।

ऐसा करने में एक तो यूरोपीय साम्राज्यवादियों का दबाव था तो दूसरा स्वयं भारतीय सामाजिक ढांचा; जबकि भारतीय परम्परा लोक के इन अर्थों का समर्थन नहीं करती हैद्ध। संस्कृत व्याकरण के अनुसार लोकशब्द की उत्पति संस्कृत की लोक दर्शनेधातु में घअ प्रत्यय जुड़ने से हुई है, जिसका अर्थ है देखना। इस तरह लोक शब्द का मूल अर्थ देखने वाला है। ऋग्वेद   के पुरुषसुक्त में

 

लोक शब्द जीव और स्थान दोनों के लिए प्रयुक्त हुआ है। पाणिनी कृत अष्टाध्यायी, पतंजलि कृत महाभाष्य तथा भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र में लोकशब्द का प्रयोग शास्त्रोतर, वेदोत्तर तथा समान्यजन के संदर्भ में किया गया है। पाणिनी काल में वेद परिपाटी एवं लोक परम्परा का पृथक रूप मुखरित हो चुका था। श्रीमद्भागवत गीता में प्रयुक्त लोक समूह शब्द का अर्थ भी साधारणजन के आचरण तथा आदर्श से है। प्राकृत, अपभ्रंश और भक्ति साहित्य काल में भी लोक शब्द वेद के प्रतिकूल जनसाधारण की परम्परा की ओर संकेत करता है। इस प्रकार भारतीय परम्परा में लोकज्ञानया अनुभव उस परिपाटी को कहा गया है, जो वेद या शास्त्र से उलट या भिन्न हो तथा जिसका आधार जनसाधारण हो। वेद या शास्त्र वर्ग विशेष का ज्ञान था, जिसका आधार मानव समुदाय का विशेष हिस्सा या वर्ग था। ये दोनों रहते भी अलग-अलग थे। एक गाँव में दूसरे नगर में। गाँव लोकका था और नगर के निवासी वेद या शास्त्र सम्मत ज्ञान के अधिकारी थे। भ्रांति तब हुई जब शास्त्र सम्मत ज्ञान का क्षेत्र नगर की सीमा के बाहर गाँव तक आ पहुँचा। और गंवई लोक, नगर आकर बस गए और अपने लोक को बृहत आयाम के साथ प्रस्तुत किया। यहाँ गाँव और नगर से तात्पर्य दो विशाल जनसमूह है, जो एक ही भौगोलिक क्षेत्र में अलग-अलग आर्थिक वर्ग से है। इस भ्रांति का दुष्प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि लोक के प्रति दृष्टिकोण ही बदल गया। गाँव के लोगों को लोक कहकर  संज्ञापित किया गया तथा शहरी जनसंख्या को लोक के दायरे से बाहर रखा गया और फिर लोक साहित्य और शिष्ट साहित्य, लोककला और शिष्टकला आदि। भारतीय चिंतन परिपाटी में लोक और शास्त्र या वेद के बीच का अंतर तो यह कतई नहीं समझाता है कि लोक से

अभिप्रेत अशिष्ट, निरक्षर या आदिम और अपरिष्कृत जन समूह है। भारतीय चिंतन परिपाटी में शास्त्रा वह है जिसका व्याकरण तय हो तथा जिसमें लिखित और सुनियोजित ज्ञान हो। लोक, अनुभवजनित मौखिकज्ञान है जो वर्षों से परम्पराशील और परिवर्तनशील है। हम सभी जानते हैं कि शास्त्र को लोक के दबाब में कई बार बदलने पड़े हैं। शास्त्र भी तो लोकजनित और लोक अनुभवों से प्रेरित है।

गाँव का कलाकार शहर आकर कॉलेज या विश्वविद्यालय में उच्चशिक्षा ग्रहण करता है और उसके बाद नौटंकी में अभिनय करता है तो क्या वह लोककलाकर नहीं कहलायेगा? बिलकुल कहलायेगा। हमें यह नहीं देखना है, कलाकार गाँव में रहता है या शहर में, पढ़ा है या मूर्ख। हमें यह देखना चाहिए कि उसके द्वारा प्रस्तुत कला की शिल्प-प्रविधि लोक जैसी है कि नहीं। पारम्परिकता का निर्वहन या सूत्र उसमें है कि नहीं।

निष्कर्ष यह है कि लोक किसी भी राष्ट्र का जन समुदाय है, वह नगर, गाँव कहीं भी रह सकता है यदि उनका ज्ञान या कला-वर्षों से परम्परित और अनुभवजन्य है तथा मौखिक परम्परा में है तो वह लोकज्ञान  (folklore)या लोककला कहें जाएँगे ।  धार्मिकता, आनुष्ठानिक, तथा प्रकृति मूलक  लोक तथा जन जातीय कलाओं की विशेषताएँ हैं।

उद्देश्य के आधार पर लोक एवं जन जातीय कलाओं का विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है-

1. आनुष्ठानिक – ऐसे कला रूप जिसका प्रदर्शन/सृजन किसी धार्मिक अथवा सामाजिक     अनुष्ठानों के निमित्त किया जाता है। 

2. प्रदर्शनमूलक – ऐसे कला रूप जिसका प्रदर्शन या सृजन पूर्णत: कलात्मक अभिव्यक्ति के निमित्त किया जाता है।

कला रूपों के स्वरूप और शैली के आधार पर जनजातीय तथा लोक कलाओं के निम्नलिखित विभाजन हो सकते हैं-

1. ललित कला- संगीत, नृत्य , नाट्य , चित्र

2. शिल्प कला – हस्त शिल्प , मुखौटा शिल्प


प्रचलित विधाओं के आधार पर लोक एवं जनजातीय कलाओं के निम्नलिखित प्रकार  हैं-

1. लोकगीत

2. लोकनृत्य

3. लोक कथाएँ

4. लोकगाथाएँ

5. लोकनाट्य

6.  लोक कहावतें 

                                              (डी. लिट. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध का अंश)

(कलाशास्त्र की रूपरेखा, शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक का अंश )



[1] Elvin, V. (1963), New Deal For Tribal India Home Ministry, Govt. of India, New Delhi, P. 1

[2] Dube, S.C. (Editor),"Tribal Heritage All India, p 2-4 Vikas Publishing House, New Delhi, pp. 5-6

[3]  Denis Dutton,The Encyclopedia of Aesthetics, edited by Michael Kelly( NY, Oxford University Press,1998), 16

[4] Ibid, 15

[5] होबेल,1954

[6]  (लीनार्ड एडम, 1949)

[7] एन के बोस 1971

[8] नदीम हसनैन , भारतीय जनजाति पृ. 299

[9] शर्मा, हरद्वारी लाल ,कला दर्शन ,पृ. 91

[10] हाउजर आर्नल्ड , कला का इतिहास दर्शन ( अनुवाद- गोपाल प्रधान ) पृ. -15 

[12] ऋग्वेद , पुरुष सूक्त 10। 90। 24

[13] अष्टाध्यायी, 5। 1। 44।   

[14] अष्टाध्यायी,2। 4। 39।

[15] महाभाष्य , 1। 84।