भारतीय संदर्भ में कला आध्यात्मिक तथा आनंदमय अनुभूति है। ललित कला का मूलाधार संस्कृति रही है। मानवीय संबंधों और स्थितियों की विविध भावलीला और उसके माध्यम से चेतना को कला प्रकाश्यमान करती है। भारतीय कलाकारों ने प्रत्येक युग में धार्मिक कृतियों के साथ–साथ लौकिक तथा धर्मेत्तर कृतियों का सृजन किया है। परिवर्तन और नित्य नवीनता भारतीय कला की अन्यन विशेषताएँ हैं- “क्षणे क्षणे यद् नवतामुपैति तदेव रूप्ं रमणीयतायाः” अर्थात् जो क्षण-क्षण नवीन होता रहे, यही रमणीयता है ।

1. गौरवशाली अतीत तथा वर्तमान स्वरूप
भारतीय परंपरा
में पहली बार ऋग्वेद (1500 ई. पू.) में कला शब्द का उल्लेख हुआ है। उपनिषदों में
भी ‘कला’ शब्द का प्रयोग हुआ है, यथा;
प्राचीविक कला, दक्षिणाविक कला,
उदीचीविककला। ललित विस्तर के 12वें परिवृत ‘शिल्प संदर्शन’ में बौधिसत्व (सिद्धार्थ) और गोपा (यशोधरा) के विवाह प्रसंग में 96 प्रकार के कलाओं का वर्णन है । इसके अतिरिक्त
वात्स्यायन के कामसूत्र में 64, शुक्रनीति में 64, प्रबंधकोष में 72, क्षेमेन्द्र के कला विलास में
जनोपयोगी 64, सुनार की 64 , वेश्या की
64 तथा कायस्थ की 16 कलाओं का उल्लेख हुआ है। कला विवेचन के दृष्टिकोण कालिकापुराण
तथा विष्णुधर्मेतर पुराण भी उल्लेखनीय है। मार्कण्डेय मुनि द्वारा रचित विष्णुधर्मेतर
पुराण में कला को धर्म, अर्थ और मोक्ष का दाता कहा गया है।
प्राचीन भारत में भरत, अभिनवगुप्त,
मतंग, नान्यदेव तथा
ज्योतिरीश्वर आदि ललित कलाओं के प्रमुख
व्याख्याकार और आचार्य हुए।
भारतमुनि विरचित नाट्यशास्त्र (200 ई. पू.) ललित कलाओं का प्राचीन एवं
विश्वकोशीय ग्रंथ है। नाट्यशास्त्र में कला दर्शन, सिद्धांत
तथा नाट्य(संगीत,नृत्य तथा अभिनय) प्रयोग के विभिन्न पक्षों
का सर्वांगीण विवेचन है। नाट्यशास्त्र के अनुसार नाट्य के सृजक स्वयं प्रजापति
ब्रह्मा हैं, जिन्होंने
ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रस का परिग्रह कर सार्ववर्णिक पंचम वेद का
प्रादुर्भाव किया। नाट्यशास्त्र कालीन कला का क्षेत्र व्यापक था -
‘न तज्ज्ञानं न
तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
न तत कर्म न वा योगो नाट्ये सिम्न्यनन दृश्यते ।।143।।
अर्थात, ऐसा कोई ज्ञान, शिल्प ,विद्या, कला, योग, कर्म नहीं है जिसे नाट्य के माध्यम से
प्रदर्शित न किया जा सके।
नट, संगीत, नृत्य का आदि श्रोत वैदिक ग्रंथ है। यह ऋग-सामवेद
तथा अथर्व से उद्भित माना जाता है। ऋगवेद की रचना 15वीं सदी ई पू है।पाश्चात्य
नाट्य का बीज यूनानी थियेटर के रूप में ईसा पूर्व 5वीं सदीमें पड़ा। नाट्यशास्त्र, अभिनव भारती, बृहदेशी, तथा
भरत भाष्य के अलावा अन्य प्राचीन भारतीय लक्षणग्रंथों में ललित कलाओं संबंधी चिंतन/विचारों
का प्रकाशन हुआ है। ईसा पूर्व 15वीं सदी से 11वीं सदी के मध्य 50 से अधिक कला
लक्षण ग्रंथ उपलब्ध हैं। नाट्यशास्त्र, कला अध्ययन का बीज
ग्रंथ है। नाट्शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय कला सिद्धांत,
दर्शन और प्रयोग है। कला सिद्धांत तथा प्रयोग का नाट्यशास्त्र जैसा समग्र ग्रंथ
विश्व में अनुपलब्ध है। ईसा पूर्व पंद्रह सौ वर्ष पहले जो चिंतन परंपरा ऋग्वेद से
आरंभ होती है वह भरत, अभिनव गुप्त,
मतंग, नान्यदेव,ज्योतिरीश्वर से होते
हुये भारतीय शास्त्रीय तथा लोक परंपराओं में फलीभूत होती है । संस्कृत नाटक इन्हीं
चिंतन धाराओं तथा प्रायोगिक सिद्धांतों का प्रतिफलन है।कला ग्रंथों की बहुलता, कला अध्ययन क्षेत्र की व्यापकता,कला दर्शन तथा चिंतन आदि की परंपरा प्राचीन भारत में कला प्रयोग तथा
अध्ययन की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है।
प्राचीन
भारत के विश्वस्तरीय विद्यापीठ नालंदा, विक्रमशिला
तथा तक्षशिला आदि में ललित कलाओं की शिक्षा गुरु कुल पद्धतियों में प्रचलित था।
वर्षों तक भारतीय कलाओं का शिक्षण तथा अन्वेषण गुरुकुल परंपरा में होता रहा।
मध्यकाल की सांस्कृतिक टकराहट ने गुरुकुल पद्धति को अवरुद्ध किया। औपनिवेशिक काल
में भारत के शिक्षण संस्थाओं में विशेषकर नाट्यकला का अध्ययन और शोध अंग्रेजी
विभाग के जिम्मे था। जहाँ यूरोपीय कलाचार और सिद्धांतों को प्रमुखता दी गई। मैकाले
की शिक्षा पद्धति जो यूरोप केंद्रित थी ने यूरोपीय श्रेण्यवाद की भावना को विभिन्न
क्षेत्रों में स्थापित किया और आज तक भी मैकाले का भूत जीवित है। और तो और भारत के
कुछ उच्चस्थ कोटि वे विश्वविद्यालय में ललित कलाओं का शोध और अध्ययन आज तक
उपेक्षित है। यह सुखद है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति -20 में प्राथमिक विद्यालय से
विश्वविद्यालय तक कि शिक्षा में ललित कलाओं को आवश्यक रूप से जोड़ने की अनुशंसा की गई
है।
स्वतंत्रता के बाद कला के विकास और
संरक्षण के लिए राष्ट्रीय अकादमियाँ यथा; संगीत नाटक
अकादमी (1953), ललित कला अकादमी (1954) बनी। संगीत नाटक अकादमी,प्रदर्शनकारी कला( संगीत,नृत्य, नाट्य) तथा ललित कला अकादमी, चित्रकला और स्थापत्य
कला के विकास और संरक्षण की ओर अग्रसर रही। संगीत नाटक अकादमी ने राष्ट्रीय नाट्य
विद्यालय(1959), राष्ट्रीय कथक केंद्र(1964) की स्थापना कर
अपनी कलानीति का विस्तार किया। कालांतर में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र(1985)
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र(1985) तथा सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण
केंद्र (1979) जैसे राष्ट्रीय संस्थान बने । राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तथा
राष्ट्रीय कथक केंद्रका मूल स्वरूप शिक्षण संस्थान का रहा। दोनों ही संस्थानों ने
शिक्षण पद्धति को उन्मुक्त रखा तथा गुरु शिष्य/गुरु कुल परंपरा का अनुसरण किया।
राष्ट्रीय कथक केंद्र, दिल्ली, कलाक्षेत्र, चेन्नई, सत्रीय केंद्र गुवाहाटी तथा जवाहर लाल नेहरू मणिपुरी नृत्य अकादेमी, इम्फ़ाल जैसे भारतीय कलाओं के लिए समर्पितराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा संचालित पाठ्यक्रम अब गुरु शिष्य परंपरा के अनुरूप पाठ्यक्रम संचालित करते हैं। इन संस्थानों से कई कलाकारों ने शिक्षा प्राप्त की जो आज राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यात हैं। ये संस्थाएं स्वयं डिग्रियाँ देती हैं। इन संस्थाओं द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों/उपाधियों को कहीं से कोई मान्यता या संबद्धता नहीं है। ना ही यहाँ के गुरु, विशेषज्ञ और प्रबंधक इसके लिए तैयार हैं। इसके लिए जब कभी पहल हुई तो इस तर्क के साथ ख़ारिज कर दी गई कि हम कलाकार बनाते हैं, डिग्री लेनी हो तो अन्यत्र जाया जाए। यह बहुत पहले स्पष्ट हो गया कि कलाकार बनना(शिक्षण) कालविद (अध्ययन) बनने से भिन्न है। इन्हीं ऊहापोह में महाविद्यलयोंतथाविश्वविद्यालयों में ललित कला संकाय खुले और संगीत, नृत्य, नाट्य तथा चित्रकला विभाग बने। संगीत, नृत्य के क्षेत्र में भारतीय कलाओं की समृद्धि और ऊँचाइयों के समकक्ष यूरोप कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं कर सका। अत: संगीत और नृत्य का अध्ययन और शोध ‘इंडोसेंट्रिक’ रहा। लेकिन चित्रकला और नाट्यकला यूरोकेंद्रित हो गया। जबकि ब्रेख्त और यूजीनोबर्बा के जैसे यूरोपीय नाट्य प्रयोक्ताओं के प्रयोगों में भारतीयता के प्रति आग्रह देखा जा सकता है। तब भी भारतीय कला दर्शन, कला सिद्धांत तथा प्रयोग पद्धतियों की उपेक्षा होती रही। देश के शीर्षस्थ कला संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों में ‘मैकाले के भूतों’ का पुनर्जन्म होता रहा। देश मेंपिछले सत्तर वर्षों में गौरवशाली संस्कृत नाट्य के प्रस्तोता गिने चुने हुये, जबकि यूरोपीय नाटक भारतीय रंगमंच की शोभा बढ़ाता रहा। आख्यानमूलक तथा देशज कलाओं का प्रतिरूप लोकनाट्यों को तो अकादमिक परिधि से ही बाहर रखा गया। ऐसी परिस्थिति में जिस भारतीयता की खोज और पुनर्स्थापना की मूल संकल्पना के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 20 आयी है, वह कई नयी आशा और संभावनाओं को जन्म देती है ।
2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-20 में ललित कलाओं के शिक्षण तथा शोध की मूल संकल्पनाएँ
राष्ट्रीय शिक्षा
नीति-20 में मूल रूप से कला अध्ययन, शिक्षण तथा
शोध की भारतीय पद्धति,राष्ट्र निर्माण तथा व्यक्तिगत तथा
समूहगत नैतिकता तथा मूल्यों का निर्माण, जीवनोपयोगी,रोजगारोन्मुख, अंतर-अनुशासनिक(कला चिकित्सा, कला पत्रकारिता, शिक्षण के कलात्मक माध्यम), कला प्रलेखन, कला संरक्षण आदि पर विशेष बल दिया गया
है। इस नई परिकल्पना में व्यक्ति कलाकार भी बनेंगे और उन्हें रोजगार भी मिलेगा। राष्ट्रीय
शिक्षा नीति-20 में ललित कलाओं के अध्ययन, अध्यापन तथा शोध की
मूल संकल्पनाओं के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु इस प्रकार हैं-
- भारत की सांस्कृतिक संपदा का संरक्षण
भारत की सांस्कृतिक संपदा का संरक्षण संवर्धन एवं प्रसार देश की उच्च प्राथमिकता
होना चाहिए क्योंकि यह देश की पहचान के साथ-साथ इसकी अर्थव्यवस्था के लिए भी बहुत
महत्वपूर्ण है भारतीय कला एवं संस्कृति का संवर्धन ना सिर्फ राष्ट्र बल्कि
व्यक्तियों के लिए भी महत्वपूर्ण है बच्चों में अपनी पहचान और अपनेपन के भाव तथा
अन्य संस्कृतियों और पहचानो की सराहना का भाव पैदा करने के लिए सांस्कृतिक
जागरूकता और अभिव्यक्ति जैसी प्रमुख क्षमताओं को बच्चों में विकसित करना जरूरी है
बच्चों में अपने सांस्कृतिक इतिहास, कला, भाषा, परंपरा का ज्ञान और ज्ञान के विकास के द्वारा ही एक सकारात्मक सांस्कृतिक
पहचान और आत्मसम्मान बच्चों में निर्मित किया जा सकता है अतः व्यक्तिगत एवं
सामाजिक कल्याण के लिए सांस्कृतिक जागरूकता और अभिव्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण है।
(22.2,रा. शि. नी.)
- ...हमारी संस्कृति भाषाओं में समाहित है साहित्य, नाटक, संगीत, फिल्म आदि के रूप में कला की पूरी तरह
सराहना करना बिना भाषा के संभव नहीं है संस्कृति के संवर्धन संरक्षण और प्रसार के
लिए हमें उस संस्कृति की भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन करना होगा। स्कूली स्तरों पर संगीत कला और हस्तशिल्प पर बल
देना होगा। स्थानीय कलाकारों लेखकों अस्त कलाकारों एवं अन्य विशेषज्ञों को स्थानीय
विशेषज्ञता के विभिन्न विषयों में प्रशिक्षक के रूप में जोड़ना होगा। (22.2, 22.8,रा. शि. नी.)
- संस्कृति का प्रचार -प्रसार करने का
सबसे प्रमुख माध्यम कला है। कला- सांस्कृतिक पहचान, जागरूकता को समृद्ध करने और समुदायों को उन्नत
करने के अलावा व्यक्तियों में संज्ञानात्मक और सृजनात्मक क्षमताओं को बढ़ाने तथा
व्यक्तिगत प्रसन्नता को बढ़ाने के लिए जानी जाती है। व्यक्तियों की प्रसन्नता/कल्याण, संज्ञानात्मक विकास और सांस्कृतिक पहचान वह महत्वपूर्ण कारण है जिसके लिए
सभी प्रकार की भारतीय कलाएं, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल
और शिक्षा से आरंभ करते हुए शिक्षा के सभी स्तरों पर छात्रों को प्रदान की जानी
चाहिए। (22.3,रा.
शि. नी.)
- ...मानविकी विज्ञान, कला, हस्तकला और खेल में भारतीय पारंपरिक ज्ञान का समावेशन करना, जब भी ऐसा करना प्रासंगिक हो; पाठ्यचर्या में अधिक
लचीलापन, विशेषकर माध्यमिक स्कूल में और उच्चतर शिक्षा में
ताकि विद्यार्थी एक आदर्श संतुलन कायम रखते हुए अपने लिए कोर्स का चुनाव कर सकें
जिससे वह स्वयं के सृजनात्मक, कलात्मक,
सांस्कृतिक एवं अकादमिक आयामों का विकास कर सके। (22.8,रा.
शि. नी.)
- ...स्थानीय संगीत, कला, भाषाओं एवं हस्तशिल्प को प्रोत्साहित करने के लिए यह सुनिश्चित करने के
लिए कि छात्र जहां अध्ययन कर रहे हो वह वहां की संस्कृति एवं स्थानीय ज्ञान को जान
सकें उत्कृष्ट स्थानीय कलाकारों एवं हस्तशिल्प में कुशल व्यक्तियों को अतिथि
शिक्षक के रूप में नियुक्त किया जाएगा। प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान प्रत्येक
स्कूल और स्कूल कंपलेक्स यह प्रयास करेगा कि कलाकार वही निवास करें जिससे कि छात्र
कला सृजनात्मकता तथा क्षेत्र देश की समृद्धि को बेहतर रूप से जान सके। (22.9,रा. शि. नी.)
- उच्चतर शिक्षा व्यवस्था के अंतर्गत
अनुवाद और विवेचना, कला और संग्रहालय, प्रशासन,
पुरातत्व, कलाकृति संरक्षण, ग्राफिक
डिजाइन एवं वेब डिजाइन के उच्च गुणवत्तापूर्ण कार्यक्रम एवं डिग्रियों का सृजन भी
किया जाएगा। अपनी कला एवं संस्कृति को
संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाली
सामग्री विकसित करना, कलाकृतियों का संरक्षण करना, संग्रहालय और विरासत या पर्यटन स्थलों को चलाने के लिए उच्चतर योग्यता
प्राप्त व्यक्तियों का विकास करना जिससे पर्यटन उद्योग को भी काफी मजबूती मिल
सके।(22.11,रा. शि. नी.)
- अभी भी हजारों की संख्या में
अकादमियां, संग्रहालय, कला वीथिकाएँ और धरोहर स्थल हैं जिनको
सुचारू रूप से संचालित करने के लिए योग्य व्यक्तियों की आवश्यकता है। जैसे ही
योग्य व्यक्तियों से रिक्त पदों को भरा जाएगा एवं अधिक कलाकृतियों को जुटाया जाएगा
और संरक्षित किया जाएगा, इसके अतिरिक्त संग्रहालय (जिनमें
आभासी (वर्चुअल) संग्रहालय/ई– संग्रहालयों
सहित) वीथिकाएँ और धरोहर स्थल हमारी विरासत और भारत के पर्यटन उद्योग को
संरक्षित रख पाएँगी। (22.13,रा. शि. नी.)
- ... स्थानीय कला एवं संस्कृति के
संरक्षण हेतु सभी भारतीय भाषाओं एवं और उनसे संबंधित स्थानीय कला एवं संस्कृति का, वेब आधारित
प्लेटफार्म/पोर्टल/विकिपीडिया के माध्यम से दस्तावेजीकरण किया जाएगा। प्लेटफार्म
पर वीडियो, शब्दकोश रिकॉर्डिंग एवं अन्य सामग्री होगी जैसे
लोगों द्वारा भाषा बोलना (विशेषकर बुजुर्गों द्वारा),
कहानियां सुनाना, कविता पाठ करना, नाटक
खेलना, लोक गायन एवं नृत्य करना आदि। (22.19,रा. शि. नी.)
- ...कला एवं संस्कृति के अध्ययन के लिए
सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए छात्रवृत्ति की स्थापना की जाएगी...। (22.20,रा. शि. नी.)
3. लक्ष्य की प्राप्ति तथा भविष्य की योजनाएं
मध्यकालीन
संतों के विचार और वाणी पर आधारित कई देशज कलारूपों का विकास हुआ। मध्यकाल में
चैतन्य देव, शंकर देव तथा सूर,
तुलसी, तुकाराम जैसे संतों की वाणी और रचनाओं ने ललित कलाओं
के लिए सृजनात्मक पृष्ठभूमि दी। लीला
नाट्यों की परंपरा में यात्रा, गौड़लीला, अंकिया नाट, रामलीला, रासलीला, पारिजात लीला, भागवत मेल,
दशावतार, कृष्णाट्टम तथा कथकली जैसे नाट्य-नृत्य रूप
अस्तित्व में आया। संतों की वाणी तथा काव्य रचना से भक्ति संगीत की समृद्ध परंपरा
आरंभ हुई। मानवतावाद की स्थापना इन संतो का मुख्य स्वर था। यह मानवतावाद, योरोपीय मानवतावाद से भिन्न था। यह कोरा और शुष्क र्दशन मात्र नहीं था, जीवन के दीर्घ अनुभव और तपस्या से उपजा था। इनके आदर्श और नायक राम तथा कृष्ण
थे। संत परंपरा ने विचारों और कलाओं की वह सृजनात्मक पृष्ठभूमि तैयार की जिससे आज
भी भारतीय लोक जीवन अनुप्राणित है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इन विचारों तथा कला
रूपों के अध्ययन-अध्यापन का अवसर दिया है।
एशियाई
देशों के साथ भारत का सांस्कृतिक संबंध प्राचीन युग से है। दक्षिण तथा दक्षिण
पूर्व एशियाई देशों में भारतीय दर्शन,कला तथा
संस्कृति का विकास हुआ। श्रीलंका, कम्बोडिया, थाईलैंड, मलेशिया, म्यांमार
तथा वियतनाम आदि देशों में भारतीय महाकाव्यों पर आधारित नृत्य-नाट्य आज भी प्रदर्शित
हो रहे हैं। इनमें कई कलारूपों रामायण, महाभारत, पुराण तथा बौद्ध जातक पर आधारित हैं। राम कथा पर आधारित नाट्य-नृत्य खोन
(थाईलैंड),कुसान पाला (बांग्लादेश) को यूनेस्को ने विश्व
मानवता के धरोहर तथा बोधगम्य सम्पदा के रूप मान्यता दी है। भारतीयता के विस्तार को
समझने तथा इन देशों के साथ सांस्कृतिक तथा भावनात्मक संबंध को संपुष्ट करने के लिए
शोध तथा अध्यापन में इन कलारूपों को शामिल करना होगा। यूरोपीय या पाश्चात्य कलारूपों
का भारतीय चिंतन धारा से साम्य नहीं है। न ही भारतीय सामाजिक विकास की प्रकिया को
रेखांकित करती है।
ललित
कला को रोजगारोन्मुख बनाने के लिए अंतर-अनुशासनिक अध्यापन तथा शोध के द्वाराप्रोत्साहित
करना होगा। कला चिकित्सा, कला पत्रकारिता, शिक्षण के कलात्मक माध्यम जैसे नवाचार को शोध के स्तर पर विस्तारित करना
होगा। लक्ष्य प्राप्ति के लिए समाजकार्य, जनसंचार तथा शिक्षा
के विद्यार्थियों के लिए विशेष पाठ्यक्रम की परिकल्पना की जा सकती है।स्थानीय तथा
देशज कला परंपरा को संरक्षित करने के लिए स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रममें शामिल
किया जाय तथा लघु-शोध प्रबंध लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
शिक्षा
नीति की मूल संकल्पनाओं में यह कहा गया है कि कला समाज को भावनात्मक रूप से जोड़ती
या ऐसे वातावरण का निर्माण करती है कि व्यक्ति सहजता के साथ एक दूसरों से जुड़ते
हैं।विचारों को कार्यरूप देने के लिए स्नातकोत्तर
के विद्यार्थियों को क्षेत्र भ्रमण के तहत्त सुदूर गाँव में कलाकारों के बीच भेजा
जा सकता है। विद्यार्थी गाँव में प्रवास करें और कलारूपों के साथ वहाँ की संस्कृति
के अन्य पक्षों का अध्ययन करें। यदि ये विद्यार्थी अंतर-क्षेत्रों का भ्रमण करें
तो सांस्कृतिक आदान–प्रदान की भावना संपुष्ट होगी। अंतर-विश्वविद्यालय सांस्कृतिक
आदान-प्रदान को और अधिक नियमित और विस्तारित करने की ओर अग्रसर होना होगा।
शिक्षा
नीति ने कला प्रलेखन, संरक्षण तथा कला संग्रहालय को
गंभीरता से लिया है। शिक्षा नीति ललित कलाओं के विद्यार्थियों लिए कला संस्थानों, कला प्रलेखन, संरक्षण तथा कला संग्रहालयके क्षेत्र
में रोजगार के अवसर बताए गए हैं । इसके लिए अलग-अलग पाठ्यक्रमों की परिकल्पना की
जा सकती है। साथ ही ललित कला विषयों के स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रमों में कला
वस्तुओं का संरक्षण, प्रलेखन तथा कला प्रशासन से जुड़े विषयों
को अध्यापन में शामिल किया जा सकता है।
राष्ट्रीय
शिक्षा नीति प्राचीन और सनातन भारतीय ज्ञान, कला परंपरा
तथा वर्तमान समय की चुनौतियों के आलोक में तैयार की गई है। भारतीयता पहला लक्ष्य
है और फिर रोजगार। इस नीति के और भी कई विकल्प हैं यथा; आप
कलाकार बनेंगे,कला प्रशासक बनेंगे , ‘प्रोफेसनल’ बनेंगे । यह पहली बार है जब ललित कलाओं
के अध्ययन और शोध को बहुआयामी बनाया गया है। शिक्षा नीति में गौरवशाली भारतीय संस्कृति की प्राचीनता, महानता, देशज ज्ञान, सांस्कृतिक विविधता आदि सभी पक्षों और विशेषताओं को समाहित किया गया है।
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