कला एवं सौंदर्यशास्त्र
: अर्थ, परिभाषा, वर्गीकरण, विशेषताएँ – भारतीय
एवं पाश्चात्य
ओम प्रकाश भारती
क. कला –
अर्थ, परिभाषा, वर्गीकरण,
विशेषताएँ – भारतीय एवं पाश्चात्य
कला का शाब्दिक अर्थ सुंदर, कोमल, मधुर और सुखद माना जाता है । बृहत
अर्थों में कला को अनुकरण, अभिवव्यंजना, कौशल, संयोजन, सौंदर्य आदि कहा गया है ।
भारतीय चिंतन परंपरा में कला का
प्रयोग ललित कला के व्यापक अर्थों में किया जाता है, जिसमें संगीतकला, मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला
तथा काव्यकला को शामिल किया जाता रहा है। नृत्य को संगीत के अंतर्गत परिगणित किया
गया है । पाश्चात्य विचारकों ने पाँच
कलाएँ स्वीकार की है- स्थापत्य, मूर्ति ,चित्र, संगीत तथा
काव्य। भारतीय तथा पाश्चात्य विचारकों ने नाट्यकला को काव्य के अंतर्गत ही
रखा है।
भारतीय परंपरा में पहली बार ऋग्वेद
(1500 ई. पू.) में कला शब्द का उल्लेख हुआ है।[1]
उपनिषदों में भी ‘कला’ शब्द का प्रयोग हुआ है, यथा;
प्राचीविक कला, दक्षिणाविक कला, उदीची
टिककला। इसके अतिरिक्त ललित विस्तर में 86, वात्स्यायन के
कामसूत्र में 64, शुक्रनीति में 64,
प्रबंधकोष में 72, क्षेमेन्द्र के कला विलास में जनोपयोगी 64, सुनार की 64 , वेश्या की 64 तथा कायस्थ की 16 कलाओं
का उल्लेख हुआ है। कला विवेचन के दृष्टिकोण कालिकापुराण तथा विष्णुधर्मेतर पुराण भी उल्लेखनीय है।
मार्कण्डेय मुनि द्वारा रचित वि
ष्णुधर्मेतर पुराण में कला को धर्म, अर्थ और मोक्ष का दाता कहा गया है।[2] पाश्चात्य में यूनानी दर्शनशास्त्र के पिता
थेलीज़ (640 ई. पू. - 547ई. पू .) को कला
का पहला चिंतक कहा जा सकता है। उनके विचारों में कला और सौंदर्य पर विमर्श किया
गया है । इस तरह पिछले तीन हजार वर्षों से विचारकों ने कला की व्याख्याएँ की हैं।
लेकिन अब भी कला की व्याख्या और विवेचन जटिल बना हुआ है। कला विवेचन के संदर्भ में
निम्नलिखित तीन शब्दों के बीच के अंतरों को स्पष्ट रूप से समझ लेना अवश्यक है-
कला
शिल्प
विद्या
कला की व्याख्या के संदर्भ में ‘कला’ शब्द के अर्थ विकास
को जानना आवश्यक होगा। 'कला' शब्द की
उत्पत्ति कल् धातु में अच् तथा टापू प्रत्यय लगाने से हुई है (कल्+अच्+टापू),
जिसके कई अर्थ हैं—शोभा, अलंकरण, किसी वस्तु का छोटा अंश या चन्द्रमा का सोलहवां अंश आदि। कुछ विद्वानों ने कला शब्द की व्याख्या क +
ल = कला । और फिर ‘क’ से अभिप्रेत है –
कामदेव, आनंद, सौंदर्य, हर्ष, तथा ‘ला’ से अभिप्रेत है , देना। अर्थात सौंदर्य, आनंद तथा हर्ष प्रदान करने वाली विधा कला है। प्राचीन भारतीय लक्षण
ग्रंथों के अनुसार किसी कार्य को कौशल या निपुणता से करना कला है। संस्कृत शब्दकोश
में कला शब्द का अर्थ है- प्रेरित करना,आगे बढ़ाना,उत्साहित करना , कार्य में
लगना , निर्मित करना,रचना,बनाना ,स्थापित करना ,गिनना ठीक करना तथा महत्व देना आदि ।[3]
कल का अर्थ संख्यान है, जिसकी सिद्धि ‘ख्या’ धातु से ना होकर ‘चक्षिङ् व्यक्तायाम वाची’ से है और इसका अर्थ है ‘स्पष्ट वाणी में प्रकटन’ होता है। चक्षिङ् के स्थान पर ‘ख्या’ आदेश हो जाता है। इसका अर्थ
अवधानपूर्वक देखना भी है। उपसर्गपूर्वक इस धातु का अर्थ गिनना, गणना करना अथवा संकलन करना होता है। इस अर्थ के आधार पर ‘संख्यान’ शब्द का अर्थ मनन, चिंतन एवं ध्यान भी होता है। इस प्रकार कला शब्द का अर्थ है वह मानवीय क्रिया
है जिसका विशेष लक्षण ‘ध्यान दृष्टि से देखना’ गणना अथवा संकलन करना’, ‘मनन
और चिंतन करना’ एवं ‘स्पष्ट रूप से
प्रकट करना’ है। कला
शब्द की सिद्धि ‘ला’ धातु से होती है , कंलाति –
इस व्युत्पत्ति के अनुसार ‘आनंददायक’ यह अर्थ भी होता है।[4]
अंग्रेजी भाषा में कला शब्द का
पर्याय आर्ट (Art) है, जिसका प्रचलन तेरहवीं में हुआ । आर्ट शब्द प्राचीन लैटिन के ‘आर्स’ शब्द से विकसित है,
जिसका अर्थ है- कौशल अथवा शिल्प है या किसी किसी भी कार्य को ठीक से करना, बनाना, पैदा करना आदि। प्राचीन यूनान और रोम
में ‘आर्ट’ शब्द शिल्प के अर्थ में ही प्रचलित था । ग्रीक में कला का पर्याय ‘TEXVN’, शब्द का प्रचालन था। डॉ. कुमार विमल के अनुसार,
“संभवत: इसे ही प्लेटो ने ‘तेख्ने ’(Techne) कहा है।
तेख्ने का प्रचलित अर्थ शिल्प अथवा कौशल से था, जिसमे स्वर्णकारी,
बढ़ईगिरी, स्थापत्य तथा सर्जरी आदि शामिल थे। इस तरह शिल्प के
लिए कला अथवा ललितकला जैसे अर्थगरिमापूर्ण शब्द कलांतर में प्रचलित हुआ।[5]
प्राचीन यूनानी साहित्य की तरह पहले
भारत वर्ष में में भी कला ‘शब्द’ का प्रयोग कारीगर , कौशल, या
शिल्प के लिए होता था। शिल्प का शाब्दिक अर्थ है, ‘कारीगरी और हुनर।[6]
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार कला से अभिप्रेत कार्यकुशलता और क्षमता है।[7]
प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के कई मंडलों में
शिल्पियों का उल्लेख प्राप्त होता है। पाणिनि रचित अष्टाध्यायी (400 ई. पू.) में
शिल्प को दो भागों में विभाजित किया गया है- चारु तथा कारु । अन्य ग्रंथों में भी
कलाकार के अर्थों में शिल्पियों का उल्लेख हुआ है। प्राचीन भारत में शिल्पियों के
चार प्रकार मान्य थे – स्थपति, सूत्रग्राही, वर्धकी तथा तक्षक (मानसार)। तक्षक शिल्पी काष्ठकला , वास्तुकला , मूर्तिकला तथा लौहकला में कुशल होता था
। अन्य सभी शिल्पी वेद शास्त्रों के ज्ञान
में निपुण होते थे। कौषीतकी ब्राह्मण में नृत्य, गीत और
वाद्य को शिल्प कहा गया है– ‘त्रिवृ शिल्पं, नृत्यं, गीतं वादितमिती’।[8]
बौद्ध साहित्य में शिल्प को ही ‘सिप्प’
कहा गया है। रामायण में राम को वैहारिक शिल्पों(संगीतकला तथा चित्रकला) का ज्ञाता
कहा गया है।[9]
महाभारत के कई प्रसंगों में शिल्पियों
की चर्चा की गयी है।[10]
एक अन्य प्रसंग में युधिष्ठिर की दसियों को चौंसठ कला में निपुण कहा गया है।[11]
अष्टाध्यायी के अनुसार नर्तक, गायक ,वादक जिस नृत्य– संगीत की साधना करते हैं उस
ललित कला को भी शिल्प कहा जाता था।[12]
अष्टाध्यायी में शिल्पियों के दो श्रेणियों का उल्लेख हुआ है- ग्राम शिल्पी और राज
शिल्पी। राजशिल्पी को राजकीय संरक्षण प्राप्त था । ग्राम शिल्पी स्वजीवी थे।'पाली ग्रंथ ‘लोकनीति’ में 18
प्रकार के शिल्प गिनाये गये हैं- श्रुति, स्मृति, सांख्य, योग, नीति, वैशेषिक, गंधर्व (संगीत), गणित,
धनुर्वेद, पुराण, चिकित्सा,
इतिहास, ज्योतिष, माया
(जादू), छन्द, हेतुविद्या, मन्त्र (राजनय), और शब्द (व्याकरण)।[13]
इस प्रकार वैदिक ग्रंथों, रामायण, महाभारत, बौद्ध ग्रंथों, उपनिषदों तथा अन्य लक्षण ग्रंथों
यथा; अर्थशास्त्र , अष्टाध्यायी आदि
में उल्लेखित कला और शिल्पियों की जीविका एवं कार्यक्षेत्रों के अवलोकन के पश्चात
कहा जा सकता है कि ईस्वी पूर्व दूसरी सदी तक शिल्प एवं कला का अन्तर स्पष्ट नहीं
हो पाया था। कालजीवियों को शिल्पी अथवा कलाकार दोनों ही नामों से संज्ञापित किया
जाता था। इस संदर्भ में विद्या एक और शब्द है, जिसको लेकर
प्राचीनों के बीच भ्रम बना रहा।
विद्या
‘विद्यते ज्ञायते अनया’
अथार्त जिसके द्वारा जाना जाय वह विद्या है। ‘विद्या’ शब्द ‘विद ज्ञाने’ धातु से
व्युत्पन्न है। संस्कृत में जानने के लिए ‘ज्ञा’ धातु का प्रयोग होता है, जिससे ज्ञान शब्द निष्पन्न
हुआ है। अंग्रेजी में ‘नालेज’ (Knowledge), ‘विजडम’ (Wisdom), ‘लोर’ (Lore) शब्द ज्ञान अथवा
विद्या का पर्याय है। भारतीय संदर्भ में विद्या से अभिप्रेत केवल ज्ञान ही नहीं
अपितु सत्य, यथार्थ अथवा तात्विक ज्ञान है। ‘रुद्रहृदयोपनिषद’ के अनुसार विद्या के दो रूप हैं-
परा और अपरा ।चारों वेद तथा वेदांग
(शिक्षा ,कल्प, व्याकरण ,छंद ,निरुक्त, ज्योतिष)को अपरा
विद्या के अंतर्गत रखा गया है। परा विद्या वह है, जिससे आत्म
ज्ञान हो, मोक्षदायक हो। महाभारत में इसे सभी विद्याओं का
राजा कहा गया है।
भारतीय परंपरा में चौदह विद्या स्वीकृत है – चार वेद (ऋग्वेद,
यजुर्वेद ,सामवेद तथा अथर्व वेद), छ: वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण , आन्वीक्षिकी,
मीमांसा और स्मृति )। राजशेखर ने काव्य को सकल विद्या में श्रेष्ठ मानते हुए
पंद्रहवें विद्या(सकलविद्यास्थानैकायतनं पञ्चदशं काव्यं विद्यास्थानम) के रूप
स्थापित किया है। कौटिल्य, भार्गव,
वृहस्पति और गोभिल ने तर्क, त्रयी,
वार्ता और अर्थशास्त्र को जोड़ते हुए
विद्या की संख्या 18 माना है। विष्णु पुराण में भी 18 प्रकार के विद्याओं का
उल्लेख हुआ है-
अङ्गानि चतुरो वेदाः मीमांसा न्यायविस्तरः ।
पुराणं धर्मशास्त्रञ्च विद्याः हि एताः चतुर्दशाः ॥ २८ ॥
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः ।
अर्थशास्त्रं चतुर्थन्तु विद्या हि अष्टादशैव ताः ॥ २९ ॥
अथार्त ; छ: वेदांग, चार वेद,मीमांसा, न्याय , पुराण और धर्मशास्त्र ये ही चौदह विद्याएँ हैं । ॥ (28)॥ इन्ही में
आयुर्वेद,धनुर्वेद और गांधर्व इन तीनों को तथा चौथे
अर्थशास्त्र को मिला देने से कुल अठारह विद्या हो जाती है।। 29॥
शुक्रनीति में विद्याओं की संख्या 32 मानी गई है। ये विद्याएँ इस प्रकार हैं- चार
वेद(ऋग्वेद, यजुर्वेद ,सामवेद तथा
अथर्व वेद), चार उप वेद (आयुर्वेद,
धनुर्वेद, गंधर्व वेद और तंत्र), छ: वेदांग
(शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, ज्योतिष और छंद) षड्दर्शन (सौंदर्य बोध, मीमांसा, तर्क, सांख्य, वेदांत, योग और वैशेषिक) इतिहास, पुराण, स्मृति, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र शिल्प शास्त्र, अलंकार, काव्य, देश भाषा, यवन दर्शन, अवसरोक्ति और नास्तिक दर्शन।[14]
आज कल विद्या कभी –कभी विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है ; यथा नृत्य विद्या ,संगीत
विद्या, धनु विद्या आदि । यहाँ विद्या से अभिप्रेत ज्ञान
अथवा शास्त्र है न कि इन विधाओं को विद्या से संज्ञापित करने कि अभिवृति है ।
इस प्रकार वेद (1500 ई.पू.- 500
ई.पू.),उपनिषद(800 ई.पू.-
600 ई.पू.), रामायण (600 ई.पू.),
महाभारत (400 ई.पू.), अष्टाध्यायी(400 ई.पू.), अर्थशास्त्र (300 ई.पू.), कामसूत्र (400 ई.पू.- 200
ई.पू.), मानसार(200 ई.पू.), ललितविस्तर
(300 ई.पू.), शिवसूत्र विमर्शनी
,जयमंगला आदि ग्रंथों के कलासूची में शिल्प और
कलाओं को एक रूप में /साथ प्रस्तुत किया है। शुक्रसारनीति कला और विष्णु पुराण
में शिल्प तथा विद्या की अवधारणा बहुत
स्पष्ट नहीं है। इसमें गांधर्व (संगीत) को विद्या के अंतर्गत रखा गया है। राजशेखर ने काव्य को विद्या के अंतर्गत रखा है।
भारतीय परंपरा में सबसे पहले भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र(200 ई. पू. - 200 ई.)
में ज्ञान, शिल्प, विद्या तथा कलाओं को स्वतंत्र माना है -
‘न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला
।
न तत कर्म न वा योगो नाट्ये
सिम्न्यनन दृश्यते ।।143।।
अर्थात, ऐसा कोई ज्ञान, शिल्प ,विद्या, कला, योग, कर्म नहीं है जिसे
नाट्य के माध्यम से प्रदर्शित न किया जा सके।
स्पष्ट है कि भारत के समय तक शिल्प, विद्या
तथा कलाओं को अलग अलग सामाजिक
मान्यताएँ मिल चुकी थी। लेकिन भारत के परवर्ती विद्वानों ने कला, शिल्प और विद्या के अलग नहीं रखा। कला, विद्या तथा
शिल्प को लेकर आज तक भ्रम की स्थिति है। कला के प्रति संवेदनशील तथा जागरूक बंगाली
समाज में कलाकार(संगीत,नृत्य,नाट्य) के लिए आज भी शिल्पी शब्द मान्य अथवा प्रचलित
है। आगे कला सूचियों के वर्णन के क्रम में इसे स्पष्ट किया जायेगा ।
कला की परिभाषा
‘भरत के परवर्ती लक्षणकार अभिनव गुप्त ने कला
की व्याख्या करते हुए कहा – कला गीतवाद्यादिकौ, यथा; कला में गीत, वाद्य आदि शामिल है। क्षेमेन्द्र ने ‘शिवसूत्रविमर्शनी ‘में कला को व्यापक अर्थ देते हुए
कहा है कि – कलयति स्वरूप आवेशयति वस्तुनि वा, आथर्त किसी
वस्तु के स्वरूप को सुशोभित या अलंकृत करे वह कला है। दंडी के अनुसार- नृत्य, गीत प्रभृतय: कला: कामार्थसंश्रया:। कालिदास ने रघुवंश के इन्दुमति विलाप प्रसंग में ‘ललिते कलाविद्यौ ‘ का
उल्लेख किया है।
शैव दर्शन के अनुसार-
विश्रान्तिर्यस्या: सम्भोगे सा कला न कला मता ।
लीयते परमानन्दे ययात्मा सा परा कला ॥
अर्थात, कला वह नहीं है , जिसके संपर्क से सम्भोग के बाद-सी विश्रांति उत्पन्न हो, जो आत्मा को परम आनंद प्रदान करे वही कला है।
शैव दर्शन कला के सृजन और भावन में ज्ञान की आवश्यकता पर बल
देता है। ज्ञानहीन कला ‘दोषालया’ होती है और ज्ञानोपेत कला ‘शुभा’ होती है । भर्तृहरि और नीतिशतक के अनुसार साहित्य संगीत कला विहीन
साक्षात पशु पुच्छ विषाणु हीन कहकर कला के उच्च स्थान एवं महत्व को मानव जीवन में
स्थापित किया है । रवींद्रनाथ टैगोर ने कला की परिभाषा इस प्रकार की है –
कवि
रवींद्रनाथ टैगोर ने कला की परिभाषा इस प्रकार की है- जो सत है, जो सुन्दर है, वही कला है, कला में मानव स्वयं
अपनी अभिव्यक्ति करता है और वस्तु
की नहीं । पंडित भोला शंकर तिवारी के
अनुसार कला में मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति करता है। इन्हीं के अनुसार शारीरिक या मानसिक कौशल जिसका
प्रयोग किसी कृत्रिम निर्माण में किया जाए वही कला है, उदाहरण मिट्टी के खिलौने हैं, कलाकार मिट्टी लेता है और अनेक प्रकार के प्राकृतिक रूपों को गीली मिट्टी
से कृत्रिम रूप में बदल देता है । जैनेंद्र कुमार के अनुसार अनुभूति की अभिव्यक्ति
कला है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार एक ही अनुभूति को दूसरे तक
पहुंचा देना ही कला का रहस्य है । मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार अभिव्यक्ति की शक्ति ही कला है।
डॉ. हरव्दारी लाल शर्मा ने कला को इन शब्दों में परिभाषित किया है – ‘किसी भी कृति (करना), भणिति (कथन य कहना), गठन, निर्माण, रचना अथवा अभिव्यक्ति को हम कला कह सकते हैं जिसके विन्यास य ताने-बाने में ‘रूप’ का अनुभव हो’।
डॉ. विश्वनाथ प्रसाद के अनुसार कला सौन्दर्य को प्रकट करने का एक साधन है। रूप जितना ही प्रखर, स्पष्ट एवं प्रभावी होता है कला भी उतनी ही महान हो जाती है। निराला जी ने कला को निष्कलुष माना है।
कला की परिभाषा को हंस कुमार तिवारी ने पाँच श्रेणि यों
में विभक्त किया है[15]-
-
कला अनुकरण है ।
-
कला आत्माभिव्यक्ति है।
-
कला भावनाओं को दूसरों पर प्रतिष्ठित करने का साधन है।
-
कला सौंदर्य साधना है।
-
विविध।
हमें कला की विशेषताओं को परिभाषा समझने की भूल नहीं
करनी चाहिए, यहाँ कुछ विद्वानों के मन्तव्य है
जो मूलत: कला की विशेषताओं को उद्घाटित
करता है।
इस प्रकार भारतीय
विद्वानों ने प्राचीन काल से ही कला को परिभाषित करने कि कौशिश कि है । भारतीय
विद्वानों के मतों का समन्वय करते हुये निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि कला
मानव के उदात्त तथा अनुभूत भावनाओं की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है । दूसरे शब्दों में
अनुभवजन्य उदात्त मानवीय अभिव्यक्ति ही कला है।
पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार यूनानी दार्शनिक प्लेटो के
अनुसार कला सत्य की अनुकृति है। प्लेटो के
शिष्य अरस्तु ने कला की परिभाषा एक नवीन रूप में प्रस्तुत की है- कला अनुकरणीय है।
सोफियन
हावर ने कला को दिव्य मानकर कला को पवित्रता की अभिव्यक्ति बताया है।
प्रसिद्ध
इटालियन मूर्तिकार एवं चित्रकार माइकल एंजेलो ने कला के महान कृतियों को दिव्य झलक की
छाया कहा है। इटालियन दार्शनिक विनीत ओकरोन जी ने कहा है कि कला वही
है जैसा हर एक उसे जानता है । दूसरे शब्दों में कहें तो कला ही प्रभाव की अभिव्यक्ति
है।
वर्मन
ब्लैक के अनुसार सुंदरता को व्यक्त करना कला है।
टॉलस्टॉय
के अनुसार यदि अपने भावों को क्रिया वर्ण रेखा ध्वनि अथवा शब्द द्वारा इस प्रकार
से अभिव्यक्त किया जाए कि उसके दर्शन से अथवा श्रवण के द्वारा कलाकार के मन में
भाव जागृत हो जाए तो उसको कला से संबोधित किया जाएगा।
सिंगल
के अनसार – कला भौतिक सत्ता को व्यक्त करने का माध्यम है ।
शायद के अनुसार कला दमित वासनाओं का उभरा हुआ
रूप है।
गोते
के अनुसार कला की सबसे बड़ी समस्या यह रहती है कि किस प्रकार महान सत्य की
प्रतिकृति प्रस्तुत कर सकें।
वरमोन
ब्लेक के अनुसार – सुंदरता को व्यक्त करना ही कला है।
हीगेल
के अनुसार मनुष्यों की क्रिया की सृष्टि ही कला है ।
फगुए के अनुसार कला भाव की उस अभिव्यक्ति को कहते हैं ,
जो तीव्रता से मानव हृदय को छू सके। क्लाइव बेल के अनुसार कलाकृति या कलावस्तु का
काम दर्शकों के मन में विशिष्ट भावना को जगा देना है चार्ल्स
विलियम के अनुसार भाव के हृदय योग में कला
की स्थिति है।
टालस्टाय ने कला की व्याख्या करते हुए कहा कि कला मानवीय
चेष्टा है, एक मनुष्य अपनी उन भावनाओं को जिनका
कि उसने अपने जीवन में साक्षात्कार किया है , ज्ञानपूर्वक कुछ संकेतों द्वारा
दूसरों पर प्रकट करता है। उन भावनाओं का दूसरों पर असर पड़ता है और वे भी उनकी
अनुभूति करते हैं।
इस प्रकार भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने कला को
परिभाषित करने की चेष्टा की है ।
उपरोक्त
परिभाषाओं के विश्लेषण के बाद कहा जा सकता है कि कला मानव के उदात्त तथा
अनुभूत भावनाओं की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति
है। अनुकरण, रहस्य, नंदातिक आदि कला कि विशेषताएँ हैं ।
प्राचीन
भारत की कलाएँ तथा लक्षण ग्रंथों में उल्लेखित कला सूची
प्राचीन
भारतीय विचारकों ने विभिन्न संदर्भों में कलाओं की लम्बी सूची दी है। इन सूचियों
में कला, शिल्प तथा विद्या को
एक साथ प्रस्तुत किया गया है। यहाँ कलाओं का कोई भेद या उपभेद परलक्षित नहीं होता।
ललितविस्तर
5वीं सदी में संस्कृत भाषा में बुद्धकोष कृत मूल रूप से धम्मसंगिनी पर लिखित टीका
है। धम्मसंगिनी 3री सदी में लिखित बौद्ध ग्रंथ है। 27 परिवृत्तों में विभक्त ललितविस्तर कला ज्ञान के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ
है। ललित विस्तार के 12वें परिवृत ‘शिल्प संदर्शन’ में बौधिसत्व (सिद्धार्थ) और गोपा ( यशोधरा) के विवाह प्रसंग में 96 प्रकार के कलाओं का वर्णन है । गोपा के पिता
शाक्य दण्डपाणि ने यह कहते हुए सिद्धार्थ
के साथ अपनी बेटी के विवाह के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया कि “कुमार घर में सुख सुविधा से पले बढ़े हैं । हमारा यह कुल धर्म है कि कन्या
शिल्पज्ञ को देनी चाहिये, आशिल्पज्ञ को नहीं”।[16] फिर
बौधिसत्व ने 96 कला तथा शिल्पों को सफलता पूर्वक प्रदर्शित किया। वात्स्यायन(400
ई. पू. -200 ई. पू. ) प्रणीत ‘कामशास्त्र ’ के प्रथम अधिकरण के तृतीय अध्याय में चौंसठ कलाओं का वर्णन हुआ है।
वात्स्यायन के 64 कलाओं में आधुनिक
युग में मान्य पाँच ललित कलाओं में से काव्य ,संगीत ( गीत,वाद्य , नृत्य), आलेख्य अर्थात चित्र और वास्तु का उल्लेख हुआ है। नाटकाख्यायिका- से नाटक और काव्य विधा का बोध होता है। वात्स्यायन
ने भले ही इन कलाओं का वर्णन वेश्याओं के काम कला के परिपेक्ष्य में किया हो, लेकिन उनका दृष्टिकोण शृंगारिक
और उपयोगितावादी है। नीति ग्रंथ शुक्रनीतिसार में 64 शिल्प, विद्या तथा कलाओं
का उल्लेख हुआ है।
इस प्रकार प्राचीन भारतीय विचारकों
ने कला ,शिल्प तथा विद्याओं की
लंबी सूची प्रस्तुत की हैं , इनमें से अधिकांश राजाओं की
वैभवशीलता तथा नागर जीवन की समृद्धि तथा कमोपभोग को दर्शाता है। कुछ ऐसे शिल्प
कर्मों का उल्लेख हुआ है, जिसका संबंध आज की लोक शिल्पों से
है।
कलाओं वर्गीकरण
प्राचीन भारतीय लक्ष्णग्रंथ तथा साहित्यिक कृतियों में
कलसूचियों को प्रस्तुत करने के क्रम में कला – वर्गीकरण का प्रयास किया गया है।
भारतीय लक्ष्णग्रंथ ललितविस्तर, कामसूत्र, शुक्रनीति, कलाविलास, प्रबंध कोष के अलावा कादम्बरी , कालिका पुराण आदि
में 64 या उससे अधिक कलाओं की सूची दी गयी है। लेकिन कहीं भी
कलाओं के वर्गीकरण की प्रवृति नहीं दिखती। ये सूचियाँ केवल तत्कालीन समाज में
प्रचलित कलारूपों की परंपरा तथा समृद्धि को दर्शाती है।
वात्स्यायन के पूर्वर्ती बभ्रु के
पुत्र पंचाल ने कलाओं के दो प्रकार किए थे- मूल कला तथा आन्तर कला। बभ्रु ने चौंसठ
मूल कलाओं तथा पाँच सौ अठारह आन्तर कलाओं की सूची प्रस्तुत की है। अष्टाध्यायी
(400 ई. पू.) में शिल्प को दो भागों में विभाजित किया गया है- चारु तथा कारु ।
चारु शिल्प का संबंध
ललित कलाओं से था जबकि कारु अन्य शिल्प कलाओं का द्योतक था।
कामसूत्र' के टीकाकार जयमंगल ने दो प्रकार की कलाओं का उल्लेख किया है-
1.
'काम शास्त्रांगभूता'
2.
'तन्त्रावापौपयिकी'।
इन दोनों में से प्रत्येक में 64
कलाएँ हैं। इनमें कई कलाएँ समान ही हैं और बाकी पृथक। पहले प्रकार में 24
कर्माश्रया, 20 द्यूताश्रया,
16 शयनोपचारिका और 4 उत्तर कलाएँ,- इस तरह 64
मूल कलाएँ है; इनकी भी अवान्तर और कलाएँ हैं, जो सब मिलकर 518 होती हैं। नाट्यशास्त्र में कला , शिल्प और विद्या को अलग – अलग समझा गया है।
इस प्रकार
उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन भारतीय विचारकों
के समक्ष कलाओं के वर्गीकरण अथवा विभाजन की कोई चुनौती नहीं थी, ना
ही उन्होंने इस विषय पर गंभीरता
पूर्वक ध्यान दिया। जो कुछ भी समाज में प्रचलित था उसे सूचीवद्ध कर दिया। लेकिन इन
वृहत सूचियों से तत्कालीन समाज में प्रचलित कलारूपों की समृद्धि का पता चलता है।
मध्य काल (11
-18वीं सदी) में कलाओं की समृद्ध परंपरा रहते हुए भी कला विवेचन और वर्गीकरण के
क्षेत्र में कोई महत्त्वपूर्ण ग्रंथ नहीं हुआ। इस काल की दो महत्वपूर्ण विशेषताएँ
थी, पहली यह की लोक
परमपराएँ आस्तित्व में आ रहे थे। दूसरी की फारसी तथा मध्य एशियाई कला रूपों के
समन्वय नये कलारूपों ने स्वरूप ग्रहण किया। इन कलारूपों को राजकीय संरक्षण प्राप्त
था। इस काल की एक और महत्वपूर्ण बात थी दर्शन के क्षेत्र में सूफी दर्शन का उदय।
अत: भारतीय कला के क्षेत्र में यह समय नवोन्मेष तथा नवाचार का था।
पाश्चात्य में कला रूपों के वर्गीकरण तथा विभाजन
के क्रम में अब तक का श्रेय अरस्तू और हीगेल को जाता है, जिन्होंने कलाओं का व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत किया। कलाओं के वर्गीकरण
के संबंध में विव्दानों में मतभेद है। क्रोचे के अनुसार कला एक अखण्ड अभिव्यक्ति
है, जिसका वर्गीकरण किसी भी दृष्टि से नहीं हो सकता। उनका
कथन है कि कला एक नैसर्गिक
विधान है वह वस्तु जगत के
भिन्न-भिन्न प्रभावों का मूर्त रूप है। वास्तव में कला का मूल अनुभूति है जो
प्रत्येक कलाकार, कवि, लेखक, एवं संगीतज्ञ के हृदय में एक प्रकार से होती
है। परन्तु उसकी अभिव्यंजना प्रणाली की विविधता प्रत्येक कलाकृति को विशिष्टता
प्रदान करती है। अतः कलाओं का वर्गीकरण तात्विक दृष्टि से नहीं अपितु व्यावहारिक
दृष्टिकोण से किया जा सकता है।
अरस्तु के अनुसार काव्य कला का उद्भव मानव प्रकृति की मौलिक प्रवृत्तियों
का परिणाम है। मानव में स्वभावत : अनुकरण
की शक्ति होती है। अनुकरण क्रिया में आनंद
अनुभूति होती है जो सार्वभौमिक आनंद से कम नहीं है। अरस्तू ने अनुकरण सिद्धांत के आधार पर ही कलाओं
का वर्गीकरण किया। उन्होंने अनुकरण के
आधार पर कलाओं के तीन आधार बताया : विषय वस्तु माध्यम तथा शैली । विषय वस्तु के आधार पर कला के पुणे दो भेद किए- उपयोगी कला एवं ललितकला। उपयोगी कला के अंतर्गत उन्होंने शिल्प कलाओं को
रखा है। जबकि ललित में नृत्य, संगीत,
काव्यकला तथा नाट्यकला । अरस्तू से पूर्व प्लेटो ने कलाओं के दो भेद किए थे , उपयोगी कला और अनुकरणत्म्क कला । उन्होंने उपयोगी कला को श्रेष्ठ माना जबकि अरस्तू ने
अनुकरणत्म्क कलाओं को।
अरस्तु का कहना था कि जब अनुकरण केवल वस्तु
का होता है और साथ ही जीवन में उपयोगी भी होता है वह शिल्प कला होती है। शिल्प कला में बढ़ईगिरी, वास्तुकला आदि आ जाते हैं। इनमें मनोभावों अथवा आंतरिक अनुभूतियों का
अनुकरण नहीं हो पाता है दूसरा ललित कलाओं में आंतरिक भावों का अनुकरण होता है जैसे
चित्रकला काव्य कला संगीत कला । अरस्तू ने नाट्य कला
में भी त्रासदी को सर्वश्रेष्ठ माना है। प्लेटो ने संगीत कला को।
हीगेल ने कला
कि तीन अवस्थाओं को बताया है- प्रतीकात्मक ,शास्त्रीय तथा रोमांटिक ।
हीगेल ने वस्तुकला को प्रतीकात्मक, मूर्ति कला और आंशिक रूप से चित्रकला तथा
संगीत ,काव्यकला तथा चित्रकला को रोमांटिक कला के अंतर्गत
रखा । उनके अनुसार प्रतीकात्मक कला में सौंदर्य अथवा प्रत्यय की अपूर्ण व कलात्मक अभिव्यक्ति होती है।
शास्त्रीय कला में अंतर्वस्तु एवं रूप में समन्वय पाया जाता है जबकि रोमांसवादी कलाओं में
अभिव्यक्त सौंदर्य के साथ आत्मा के सूक्ष्म तथा सघन अंशों की अभिव्यक्ति होती है ।
अंतत: हीगेल ने कलाओं के दो प्रकार बताए –
उपयोगी तथा ललित कला।
इस प्रकार भारतीय तथा पाश्चात्य
विचारकों ने कलाओं का वर्गीकरण प्रस्तुत किया है, जो आज भी किसी न किसी रूप में
प्रचलित है। ब्रिटिश शासन के दौरान मुख्य
रूप से यूरोप प्रेरित कला विवेचन और वर्गीकरण प्रचलित रहा। आज देश के विश्वविद्यालय तथा राष्ट्रीय अकादमियों ने कला
विमर्श के में महत्वपूर्ण कार्य किया। संगीत नाटक अकादेमी की स्थापना 1952 में
हुई। यहाँ नामकरण में नृत्य लुप्त रहा, तर्क यह था कि ‘नृत्य’ संगीत में ही समाहित है। 1954 में स्थापित ललित कला अकादेमी का क्षेत्र
केवल चित्र कलाओं तक सीमित रहा । जबकि बावजूद इसके कि विश्वविद्यालय में ललित कला
विभाग, मंच कला के
अंतर्गत संगीत, नृत्य तथा नाट्यकला /नाटक/ नाट्यशास्त्र का अध्यापन और शोध कार्य
होता रहा। विश्व भारती ने तो संगीत कला विभाग के अंतरगर्त संगीत, नृत्य तथा नाट्य का अध्यापन जारी
रखा। तात्पर्य यह कि कलाओं के मानक या
समरूप वर्गीकरण को अब तक गंभीरता से नहीं लिया गया या इसकी
अवश्यकता ही नहीं है। मुझे लगता कि अकादमिक स्तर पर कलाओं का वर्गीकरण कला आलोचना
तथा विकास लिए यह अपरिहार्य है।
आजकल ‘कला’ और ‘शिल्प’ इन दोनों का प्रचलन है। किन्तु ये संस्कृत की दीर्घ लोकरुचि विकास
परम्परा के द्योतक न होकर अंग्रेजी के क्रमशः ‘आर्ट’ और ‘क्राफ्ट’ के पर्याय रूप
में ही ग्रहण किए जाते हैं। पाश्चात्य विव्दान ‘शिल्प’ और ‘कला’ दोनों में ही
प्रतिभा सूक्ष्मता और किसी न किसी रूप में कौशल के समावेश को स्वीकार करते हैं।
अन्तर इनमें वे इतना ही मानते हैं कि जहाँ ‘शिल्प’ की स्थिति में एक ओर रचयिता का प्रविधिगत अधिकार व्यक्त होता है और दूसरी
और दृष्टि रचना से जिन प्रभावों को ग्रहण करता है उनका वह विश्लेषण और अनुकरण कर
सकता है। वहाँ ‘कला’ की स्थिति में एक
ओर कलाकार की वैयक्तिक भावना की अभिव्यक्ति का प्राधान्य रहता है तथा दूसरी और
दृष्टा ओर गृहीता रचना-विषयक प्रभाव के विश्लेषण और अनुकरण की सम्भावना नहीं रहती।
सम्भवतःइसीलिए भारतीय और पाश्चात्य
विव्दानों ने आरम्भ में इनको पर्याय रूप में ग्रहण किया था। आज भी इन्हें साधारणतः
एक दूसरे के साथ ही प्रयुक्त किया जाता है, यथा ‘आर्ट बहुतायता
में प्रयोग मिलता है और प्रायः इन्हें पर्याय रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इनका
प्रयोग अंग्रेजी में क्रमशः ‘आर्ट और क्राफ्ट’ रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
भारतीय सौंदर्यशास्त्री कुमार विमल ‘कला विवेचन’ में लिखते
हैं – अट्ठारहवीं शताब्दी में जब
सौंदर्यशास्त्र के विचारक शिल्प और उसके दर्शन पर सोचने लगे , तब शिल्प तथा कला का विभाजन अथवा पृथक्करण उपयोगी एवं ललित कला के रूप
में हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के आते ही ‘कला’ (शब्द) में छिपा हुआ सौंदर्य- बोध इतना प्रबल और मुखर हो उठा कि अपने
पुराने विशेषण ‘ललित’(फाइन) को हटा
देने पर भी वह अपेक्षित अर्थ द्द्योतित करने लगी। अत: औसत व्यहार में ‘ललित कला’ के लिए केवल ‘कला’ का ही व्यवहार होने लगा।[17]
आज जो भारतीय कला के प्रचलित रूप हैं और जिस तरह से रूढ़ है या समझा जाता है इस
दृष्टि से कला का वर्गीकरण निन्म्लिखित प्रकार से किया जा सकता है-
प्रस्तुति शिल्प
एवं उदेश्य/प्रयोजन के आधार पर ,कला दो रूप-
1.
अनुष्ठान
मूलक
2.
प्रदर्शन
मूलक
कला के स्वरूपगत
विश्लेषण के आधार पर दो प्रकार हैं-
1.
ललित कला – संगीत, नृत्य , नाट्य , चित्र, मूर्ति ।
2.
शिल्प कला – वास्तु कला , हस्त शिल्प आदि ।
ख.
सौंदर्यशास्त्र
एवं सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन की अवधारणाएँ।
सौंदर्यशास्त्र
मूलत: कलाओं के सिद्धांतों का अध्ययन करता है। सौंदर्यशास्त्र कलाओं का उद्भव, वर्गीकरण, विशेषताएँ, कला
भावना, सृजन की अभिवृति, सृजन
प्रक्रिया तथा कला और मानव के अंत:
संबंधों आदि का अध्ययन करता है। यह दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान
तथा विज्ञान – से संवद्ध रहते हुये भी स्वतंत्र अध्ययन की शाखा के रूप में स्थापित
है। इसे अंग्रेजी में ‘एस्थेटिक्स’ तथा
हिन्दी में सौंदर्यशास्त्र , नंदतिकशास्त्र तथा कलाशास्त्र
के नाम से भी जाना जाता है।
‘एस्थेटिक’ शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है, जिसका मूल रूप है- atoQnTikos । यही ग्रीक शब्द बाद
में ‘Aesthesis’ बनकर उपस्थित हुआ,
जिसका अर्थ होता है- ऐंद्रिय सुख की चेतना। तदनंतर इस ‘Aesthesis’ से ‘एस्थेटिक’ शब्द बना।
पाश्चात्य साहित्य में पहले ‘एस्थेटिक’
शब्द ही प्रचलित
था,‘एस्थेटिक्स’ नहीं। बाउमगार्तेन ने भी ‘एस्थेटिक’ शब्द का प्रयोग किया है। बहुत बाद में इस
शब्द का बहुबचन रूप ‘एस्थेटिक्स’
प्रचलित हुआ।[18]
सौंदर्यशास्त्र के अधिकांश विचारक
दर्शनशास्त्र, समाज विज्ञान,
मनोविज्ञान, काव्यशास्त्र, साहित्य तथा
विज्ञान के अध्येयता रहे हैं। पाश्चात्य देशों में यूनान,
जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस तथा इटली आदि
देशों के चिंतकों ने सौंदर्यशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पूर्व
के देशों में चीन तथा भारत में कला और सौंदर्य के क्षेत्र में प्राचीन काल से ही
विमर्श होते रहे हैं। यूनान के दार्शनिक सुकरात(409 - 399 ई. पू.) प्लेटो (427-
347 ई. पू.) अरस्तु(384 - 322 ई. पू.) प्लॉटिनस(205 - 270 ई. पू.), सिसरो /- सेंट आगस्टीन, सेंट थामस एक्विनास, सेवोनरोला, अल्बर्ट ड्यूरर इटली के दार्शनिक रोशमनी
सवार्ती और ममियानी फ्रांस के कला विचारक क्राउसेज, ज्योफ्राय, पिक्टे, एमिएल, थोर, यूजिन विरोन, वैले, गुयान, बेनार्ड रूस के टालस्टाय, जेलिन्स्की, मैजकोफ जर्मनी के बामगार्टन, काण्ट(1724- 1804 ई.) , हेगेल (1770- 1831 ई.), शापेनहावर(1788- 1862 ई.), शेलिंग (1775- 1854 ई.) ,
विंकिलमन (1717- 1768 ई.), लेसिंग (1729- 1781 ई.), नित्से (1844- 1900 ई.), शिलर (1759- 1805 ई.)
ब्रिटेन के थामस रीड ,ह्यूम (1711- 76 ई.), रस्किन (1819- 1900 ई.) आदि चिंतकों ने सौंदर्य और कला के क्षेत्र में
महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत में कला तथा सौंदर्य चिंतन की समृद्ध तथा प्राचीन परंपरा रही है । इस लिहाज़ से भरत मुनि विरचित
नाट्यशास्त्र महत्वपूर्ण ग्रंथ है। वहाँ भले ही सौंदर्य शास्त्र जैसे शब्द गौण है,
लेकिन
सौंदर्य शास्त्र की परिधि में आने वाले विभिन्न तत्वों का विवेचन किया गया
है। भारत में लम्बे समय तक
काव्यशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र के
अंतरगर्त सौंदर्य शास्त्रीय विमर्श होता रहा। आधुनिक काल में के. सी. पाण्डेय, आनंद कुमार स्वामी, हरद्वारी लाल शर्मा, कुमार विमलतथा रमेश कुंतल
मेघ आदि विद्वानों ने सौंदर्य शास्त्र को
स्वतंत्र विषय के रूप स्थापित करने के महत्वपूर्ण प्रयास किए।
हिन्दी
में सौंदर्यशास्त्र शब्द कब प्रचालित हुआ यह ठीक - ठीक ज्ञात नहीं है। पाश्चात्य
सौंदर्य शास्त्र की नींव डालने का वास्तविक श्रेय यूनानी दार्शनिक अरस्तू (384 -
322 ई. पू.) को है। यूरोप में ‘एस्थेटिक्स’ शब्द के प्रचलन का श्रेय जर्मन दार्शनिक
एलेक्जेंडर बाउमगार्टेन(1714-1762) को है । उसे ‘एस्थेटिक्स’ आधुनिक का जनक माना जाता है।
भारत में सौंदर्य शास्त्र के अध्ययन आरंभ ‘एस्थेटिक्स’ के परिपेक्ष्य में ही हुआ।
‘सौंदर्य’ (ब्युटि) की अनुभूति तथा विशेषताओं के
संबंध में दिये गए अभिमतों को सौंदर्यशास्त्र (एस्थेटिक्स)
अध्ययन की परिधि तथा क्षेत्र से जोड़ देने से, भ्रांतियाँ
होती रही है।
‘सौंदर्य’ कला की अवस्था, गुण तथा तत्व है, जबकि सौंदर्यशास्त्र (एस्थेटिक्स) ज्ञान और अध्ययन
की एक शाखा अथवा विषय है। पाश्चात्य तथा भारतीय विद्वानों ने ‘एस्थेटिक्स’ अथवा सौंदयशास्त्र के अध्ययन की परिधि
का निर्धारण करते हुए अर्थगत एवं विषयगत परिभाषाएं प्रस्तुत की हैं। यहाँ हम केवल
सौंदर्यशास्त्र (एस्थेटिक्स) के अध्ययन की परिधि तथा क्षेत्र
के संबंधों में व्यक्त विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं:
पाश्चात्य विचारक
‘एस्थेटिक्स’ (सौंदर्यशास्त्र) संवेग तथा ऐंद्रिय अनुभूतियों का विज्ञान है।[19]
- बाउमगाटर्न
‘एस्थेटिक्स’ (सौंदर्यशास्त्र) ललित कलाओं का दर्शन है।[20]
- हीगेल
‘एस्थेटिक्स’ (सौंदर्यशास्त्र) अभिव्यक्ति परक /अभिव्यंजनात्म्क क्रियाओं का विज्ञान
है ।[21]
-क्रोचे
‘एस्थेटिक्स’ (सौंदर्यशास्त्र) ललित कलाओं के दार्शनिक विकल्पों और समस्याओं का
सैद्धांतिक निरूपण है।[22]
- लैंगर
सौंदर्यशास्त्र सुंदर का दर्शन है।[23]
- बोसांके
भारतीय
विचारक
सौंदर्यशास्त्र कला में अभिव्यक्त सौंदर्य का विज्ञान है।[24]
- के. एस. रमा शास्त्री
सौंदर्यशास्त्र ललित कलाओं का विज्ञान और दर्शन है। [25]
- के. सी. पाण्डेय
इसका संबंध सैद्धांतिक विवेचन से है अर्थात कला में निहित
सौंदर्य की प्रकृति, मूल तत्व, आस्वाद,
प्रयोजन और उपादान आदि का सैद्धांतिक अवधारणा मूलक विवेचन ही इसकी
विषय परिधि में आता है, यह कला समीक्षा नहीं है, बल्कि कला के मौलिक सिद्धांतों की ही संहिता है।[26]-
डॉ. नगेंद्र
सौंदर्यशास्त्र का संबंध ललित कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त सौंदर्य के साथ
है, अन्य माध्यम से अभिव्यक्त सौंदर्य के साथ नहीं । इस तरह सौंदर्यशास्त्र
ललित कलाओं के दार्शनिक विकल्पों और समस्याओं का सैद्धांतिक निरूपण है, क्योंकि कला जगत की दार्शनिक समस्याएँ प्राय: सौंदर्य, आस्वाद ,संवेग ,पुन प्रत्यक्ष
इत्यादि से ही संबद्ध रहती है।[27]
उपरोक्त परिभाषाओं में भारतीय विद्वानों की व्याख्या
में कोई नवीनता नहीं है। इन परिभाषाओं के आलावा भी सौंदर्यशास्त्र के अध्ययन
क्षेत्र को व्याख्यायित की गई है। लम्बे समय तक यह दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान तथा
काव्यशास्त्र की अध्ययन शाखा रही है।
कुमार विमल ने यहाँ तक कहा है कि
दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान ने सौंदर्यशास्त्र के स्वतंत्र व्यक्तित्व को
अपहृत करने कि कोशिश की है।[28]
मुझे लगता है कि इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि सौंदर्यशास्त्र का अध्ययन
दर्शनशास्त्र अथवा मनोविज्ञान संकाय के अध्येयता करें। संवेग, अभिव्यक्ति तथा उद्देश्य(तत्व) सृजन, कला अथवा
सौंदर्य का विशिष्ट गुण या तत्व है। इन विषयों पर दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान का
दखल रहा है। अत: कलाओं के सौंदर्य शास्त्रीय विश्लेषण में दर्शनशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक दृष्टि को अलग रखना समीचीन
नहीं होगा।
(डी. लिट. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध का
अंश)
(कलाशास्त्र की रूपरेखा, शीघ्र
प्रकाश्य पुस्तक का अंश )
[1] कलां यथा शफं ऋण संनयामसि ।
[2]
कलानां प्रबरं चित्र धर्म कामार्थमोक्षम।
[3]
मोनियर विलियम्स,
पृ 260
[4]
पाण्डेय ,
के. सी. – स्वतन्त्र कला – शास्त्र,
पृ. 5-6
[5]
कुमार विमल,
कला विवेचन ,
पृ.
[6]
संस्कृत शब्दार्थ – कौस्तुभ , पृ. 1156
[7] Art- in its most basic meaning signifies a skill or ability. Voll-2 Page. 484
[8]
कौषीतकी ब्राह्मण ,
29. 5 ।
[9] वैहारिकानां शिल्पनां- रामायण 2. 1.
28।
[10]
शिल्पं यश्वोपजीवित।अनु। 90. 9
[11]
चतुष्षष्ठिविशारदा:। सभा 61. 9 ।
[12]
पाणिनि – अष्टाध्यायी (3।1।146,3। 2। 56,4। 4। 56)।
[13] सुति सम्मुति संख्या च, योगा
नीति विसेसिका । गंधब्बा गणिका चेव, धनुबेदा च पुरणा ॥
तिकिच्छा इतिहासा च,
जोति माया च छन्दति । हेतु मन्ता च सद्दा च, सिप्पाट्ठारसका
इमे ॥
[14]
शुक्रनीति,
अनुवादक –विनय कुमार सरकार,
भुवनेश्वरी आश्रम ,
इलाहाबाद,
1923 ,
पृ. 152
[15]
कला – हंस कुमार तिवारी ,
मानसरोवर प्रकाशन ,
बोध गया,
पृ. 28
[16]
ललित विस्तर – शान्तिभिक्षु शास्त्री द्वारा संपादित , उत्तर प्रदेश
हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित,
पृष्ठ सं 282 ।
[17]
कुमार विमल – कला विवेचन ,
पृ. 26
[18]डॉ.
कुमार विमल(2015),
सौंदर्यशास्त्र के तत्व,
राजकमल प्रकाशन,
नई दिल्ली,
पृष्ठ संख्या – 27
[19]
चतुर्वेदी ,ममता
,
सौंदर्यशास्त्र ,
पृ. 93
[20]
G.W.F. Hegel: The Philosophy of Fine Arts, vol 1, Translated by F. P.B.
Osmaston, G. Bell and Sons, London,1920,p.2
[21]
Bendetto Croce, Aesthetic: translated by Douglas Ainslie, Vision Press, Petter
Owen , London,1953, p.155
[22]
Susanne K. Langer, Feeling And Form: Routledge and Kegan Paul, London,1953 p.
12
[23]
BOSANKE , History of Aesthetics,
p. 2
[24]
K.S. Rama Sastri, Indian Aesthetic, Srirangam, sri Vani Vilas Press ,1928 , p.
1
[25] Pandey, K.C. , Comprarative Aesthetics ,
Volume1 , The Chowkhambha Sanskrit Series , Banaras, 1950, p . XV
[26]भारतीय
सौंदर्य शास्त्र की भूमिका,
पृष्ठ संख्या - 3
[27]
सौंदर्यशास्त्र के तत्व- डॉ. कुमार विमल , पृ सं - 42-43
[28]
वही ,
पृ. सं. 28

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