प्रह्लाद नाटक
उड़ीसा का पारंपरिक नाट्य प्रह्लाद नाटक- डॉ. ओम प्रकाश भारती
प्रह्लाद
नाटक उड़ीसा के गंजाम जिले तथा आस –पास के अंचलों में प्रचलित पारंपरिक नाट्य है। नाटक की कथावस्तु
दशावतार के नरसिंह अवतार के प्रसंगों से लिया गया है, जिसमें विष्णु के आठवें अवतार नरसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध किया जाता
है। नाटक के मुख्य पात्र प्रहलाद के नाम पर ही इस नाट्य रूप का नाम प्रहलाद नाटक
प्रचलित हुआ । ताल, राग, संगीत शैली, नृत्य, संलाप पूर्ण संवाद,
संरचनावद्ध अभिनय पद्धति, गति एवं चारियों का प्रायोग इस
नाट्यरूप की विशिष्टता है। नाट्य प्रयोग में उड़ीसा के लोक एवं शास्त्रीय कलाओं का
अद्भभुद समन्वय हुआ है ।
उद्भव
और विकास
प्रहलाद
नाटक के प्रथम प्रयोक्ता तथा रचनाकार के रूप में राजा रामकृष्ण छोट राय का नाम
प्रचलित है। राजा राम कृष्ण उड़ीसा के जलनतर अंचल के सामंत थे। जलनतर वर्तमान में आंध्रप्रदेश राज्य के श्री
काकुलम जिले का हिस्सा है। रामकृष्ण छोट राय कला रसिक एवं कलाओं के संरक्षक थे। उन्होंने
कई कवियों तथा कलाकारों को प्रोत्साहन और संरक्षण दिया। गोपीनाथ परीछा इनमें से एक
थे। गोपीनाथ प्रतिभावान कवि एवं नाटकार थे। कहा जाता है कि उन्होंने ही राजा की इच्छा
अनुरूप प्रथम प्रहलाद नाटक की रचना और यह नाटक ना केवल राजा को समर्पित किया बल्कि नाटक के लेखक
के रूप में राजा का नाम ही लिख दिया। इसलिये इस अंचल में इसे राजा नाटक के रूप में
भी जाना जाता है।
कथावस्तु
एवं प्रस्तुति शैली को लेकर यह नाटक बहुत ही लोकप्रिय हुआ। इसकी लोकप्रियता ने आस -पास
के सामंत एवं राजाओं का ध्यान आकर्षित किया।
वैष्णव भक्ति की प्रधानता पहले से ही उड़िया समाज में थी। सुराङी के राजा
राजकिशोर चंद्र हरिचन्दन जगदेव राय, परला
खेमुंडी के राजा पदमनवा देव तथा तराला के राजा रामचंद्र शूरदेव ने इस नाट्य शैली
का अनुकरण करते हुए तीन नाटकों की रचना की। कहा जाता है कि ये नाटक भी इन राजाओं
के दरबारी कवियों ने लिखा। नाटकों की मूल पाण्डुलिपि मद्रास ओरियंटल लाइब्रेरी में
संरक्षित है। इन पाण्डुलिपियों को 1938 संरक्षित में किया गया था। बाद में इन
नाटकों का प्रकाशन उड़ीसा के संस्कृति निदेशलय द्वारा किया गया।
प्रहलद नाटक की जन्मभूमि उड़ीसा के
गंजाम जिले तथा आस-पास के क्षेत्रों में ब्रिटिश काल में कई छोटे बड़े जमीदारों सामंतों
का नियंत्रण था। ये सामंत स्थानीय स्तर पर राजा कहे जाते थे। इन राजाओं ने कला
संस्कृति और साहित्य को विशेष संरक्षण दिया। इनके दरबारों में कई कवियों ओर
कलाकारों को प्रश्रय मिला। इनका शासन काल 1857 से 1920 के बीच रहा। कहा जाता है कि
कलाकारों को विशेष प्रोत्साहन तथा
राज्यकीय संरक्षण देने के कारण ही ये सभी राज्य अर्थाभाव में चले गए, जिसके कारण ये ब्रिटिश सरकार को वार्षिक कर देने में असमर्थ हुए। और इसलिये
ब्रिटिश सरकार ने इनकी ज़मींदारी को विजय
नगर के राजा को बेच दिया। राजकीय संरक्षण बंद होने के बाद यह नाट्यरूप बिखर गया और दरबार से गाँव-समाज में पहुँच गया।
राजा नाटक प्रजा नाटक हो गया। चुकी इस नाट्य रूप का संबंध धार्मिक आस्था और भक्ति
से था, इसलिये गाँव का मंदिर इस का मुख्य प्रदर्शन स्थल और
संरक्षक गाँव के आम जनता हुई।
कथावस्तु
प्रहलाद
नाटक की कथावस्तु मिथक साहित्य और पुराणों के दशावतर प्रसंगों पर आधारित है।
हिन्दू परंपरा में ब्रहमा, विष्णु,
महेश, को त्रिदेव कहा गया है। परंपरा अनुसार ब्रहमा को सृजन, विष्णु को संरक्षण तथा महेश को संहार का देव माना जाता है। मिथक के
अनुसार मानव के रक्षार्थ विष्णु विभिन्न युगों में विभिन्न रूपों में प्रकट हुए।
यह प्रसंग दशावतार के नाम से प्रसिद्ध है। विष्णु के दस अवतारों में एक नरसिंह
अवतार है। नरसिंह का रूप, अर्द्ध मानव और सिंह का है।
मत्स्य पुराण, वाराह पुराण, कल्कि पुराण तथा नरसिंह पुराण में
अवतारों की विस्तृत कथा मिलती है। उड़िया भाषा का नरसिंह पुराण 14 वीं शताब्दी में पीताम्बर
दास द्वारा लिखा गया। नरसिंह पुराण में
नरसिंह अवतार को नृत्य तथा गीतों के साथ प्रस्तुत किया गया है। नाट्य प्रोयोक्ताओं ने इस नृत्य तथा गीतों के बीच संवाद तथा अभिनय
समावेश कर प्रह्लाद नाटक का सृजन किया।
नाटक
तथा रचना शिल्प
प्रहलाद
नाटक में गद्य संवाद के अलावा रागबद्ध गीत तथा संरचनाबद्ध नृत्य एवं चरियाँ हैं । नाटक
में कुल 42 संस्कृत के श्लोक हैं, जो विभिन्न पुराणों से
लिए गए हैं। नाटक में कुल 126 गीत हैं, जिसमें 11 संस्कृत
मिश्रित उड़ीया तथा शेष गीत ठेठ उड़ीया भाषा में है।
प्रहलाद नाटक में कुल पचीस पात्र हैं, जिसमें 20 पुरुष पात्र तथा 5 स्त्री पात्र हैं। इसके अलावा एक गहका (मुख्य गायक) एवं उद्बोधक और 5-6 कोरस और साज़िंदे होते हैं। पुरुष पात्रों में विघ्नेश्वर गणेश, ब्रह्मा, इन्द्र, नारद, हिरणकशिपु, प्रहलाद, मंत्री, शुक्राचार्य, चंदमकर, ऋषि, स्त्री, सूत्रधार, चारा, द्वारि, असुर, बहका, गजकरना, महावत(महन्ता), सपवा, कापता तथा नरसिंह है। सरस्वती, गीति(लीलावती), भूदेवी तथा दासी, नर्तकी स्त्री पात्र है।
नाट्य
दल तथा प्रबंधन
नाट्य
मंडली में ‘गहका’ ही
गुरु प्रशिक्षक तथा दल का संचालक होता है। दलनायक के रूप में उस का बड़ा समान्न
होता है। नाटक का साजो- समान आभूषण मंच सामाग्री मुखौटे आदि का रख-रखाव ‘गहका’ द्वारा ही किया जाता है। प्रहलदनाटक का
प्रदर्शन लगभग 12 घंटे में पूरा होता है। नाट्य मंचन प्राय: आधीरात से आरंभ होकर
दूसरे दिन दोपहर में समाप्त होता है।
मंच
एवं प्रदर्शन स्थल
प्रहलाद
नाटक का प्रदर्शन मुक्ताकाश में गाँव के गली चौराहा या मंदिर के प्रांगण में होता।
मंच के एक ओर पाँच या छ: सीढ़ियों से बनी ऊँची लकड़ी का तख्त रखा जाता है । इस ऊँचे तख़्त
के बीच में हिरण्यकशिपु सिंहासन का रखा
जाता है। इस मंच की ऊंचाई 5 - 6 फीट तथा चौड़ाई 10-12 फीट होती है। लकड़ी से बना यह मंच अलग अलग खोला जा
सकता है। और फिर पुनः इनको जोड़कर मंच
बनाया जा सकता है। तख्त के सामने 20x30 फिट की जगह को रस्सी से घेर कर प्रदर्शन
क्षेत्र तैयार किया जाता है। प्रदर्शन
क्षेत्र से लगभग 20 फीट की दूरी पर लकड़ी का खोखला खंभ बनाया
जाता है । इस खंभ 3x3 चौड़ाई तथा ऊंचाई 8 फीट
होती है । खंभ तीन ओर से कपड़े से ढका होता
है । इसी खंभ से नरसिंह का अवतरण होता हे।
गहका एक ऊंचे प्लेटफार्म पर प्राय:
मंच की वायीं ओर हारमोनियम के साथ बैठता है या खड़ा रहता है। बाकी साज़िंदे ‘गहका’ के दोनों ओर रहते खड़े /बैठे रहते हैं । दर्शक मंच के तीनों ओर बैठते हैं ।
तख्त सिंहासन के दाहिने ओर नरसिंह का मुखा (मास्क) कुर्सी या छोटी ऊंचाई
पर रखा रहता है। पात्रों का प्रवेश मुख्य तख्त के दायें, बायें तथा सामने से दर्शकों के
बीच से होता है। तख्त के ऊपर सिंहासन पर हिरण्यकशिपु के साथ बायीं ओर उसकी पत्नी लीलावती बैठती है। तख्त सिंहासन नीचे दायीं ओर मंत्री खड़ा रहता है।
नाटकीय अभिव्यक्ति और अभिनय में यही
तख्त हिरण्यकशिपु का सिंहासन है । यहीं नरसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु के वध दृश्य अभिनीत होता है।
पूर्वरंग
विधान
भारत
के अन्य पारंपरिक नाट्यरूपों की तरह प्रहलाद नाटक में भी मंच पूजा का विधान है। प्रदर्शन आरंभ होने से
पहले मंच तथा मुखौटा पूजने का आनुष्ठानिक विधान किया जाता है। रूप- सज्जा से पहले
नरसिंह की भूमिका वाला पात्र नरसिंह के (मास्क) मुखौटा की पूजा करता है। मुखौटे के
माथे पर चन्दन का लेप लगाया जाता है, फूल तथा दूब
चढ़या जाता है। प्रसाद के रूप में मिठाई तथा नारियल रखे जाते हैं । गंगा जल छिड़क कर
प्रदर्शन स्थल को पवित्र किया जाता है, और सभी कलाकार और
संगतकार (मास्क) मुखौटे को घेर कर भगवान विष्णु का आवाहन करते हुए प्रदर्शन की
सफलता की कामना करते हैं । नरसिंह की भूमिका करने वाले अभिनेता द्वारा प्रदर्शन
स्थल पर उपस्थित होने की कामना की जाती है। इस अनुष्ठान का मूल उदेश्य मुखौटो में
दिव्य शक्ति की पुनः स्थापना तथा प्रदर्शन स्थल को विघ्न वाधाओं से दूर रखने के संकल्प से है।
मुखौटे
प्रहलद नाटक के अभिनय में मुखौटे का
अनुष्ठानिक एवं नाटकीय महत्व है । नाट्य अभिव्यक्ति को प्रभावशाली एवं आकर्षक बनाने
में मुखौटो की विशिष्ट भूमिका होती है। नाटक में मुखौटे होते है- नरसिंह, गणपति यह मुखौटे पेपर मैसी के
बने होते है, इन मुखौटो का अनुष्ठानिक तथा धार्मिक महत्व
होता है। गंजाम जिले के आसपास के गाँव के कई मंदिरों में इन मुखौटो की पूजा होती
है। यह मुखौटे मुलायम लकड़ी की पेटियों में
जो की गहरे हरे और लाला रंग से रंगे होते हैं, मंदिरो में रखे जाते
है। इनमें से कुछ मुखौटे सौ वर्ष से भी
अधिकसमय से संरक्षित रखे गए हैं ।
वेषभूषा, आभूषण एवं रूपसज्जा
प्रहलाद नाटक की वेषभूषा तथा रूप-सज्जा बहुत
ही भड़कदार और आकर्षक होती है। वेषभूषा तथा
रूपसज्जा में यह दक्षिण भारतीय नाट्य रूप यक्षगान, कूडियट्टम से साम्य रखता है। सभी पात्र
अपनी रूप-सज्जा स्वयं करते हैं, अवशयकता पड़ने पर एक दूसरे की मदद भी करते हैं ।
हिरणकश्यपु, प्रहलाद ओर गणपती को छोड़ कर अन्य पत्रों की वेशभूषा सामान्य तथा उड़ीया लोक जीवन से प्रभावित है। हिरणकश्यपु का चहरा हल्का लाल रंग से रंगा जाता है, वह बहू रंगी घागरी जड़ी दर हाफ जाकेट एवं चमकीले क्रतिम आभूषण पहनता है। वह कलाई ओर बाहों में विशिष्ट राजकीय आभूषण पहनता है, हिरणकशिपु का मुकुट राजसी तथा चमत्कारिक होता है। यह विभिन्न रंगों की जड़ियों से मढ़कर बनाया जाता है। चमकीले शीशे के छोटे-छोटे टुकड़े मुकुट के चारों ओर जड़े होते हैं। कानों में कुंडल तथा भूरे रंग की लंबी दाढ़ी हिरणकशिपु के चरित्र को आकर्षक बनती है।
गुरु एवं कलाकार
श्रीकृष्णचन्द्र
साहू प्रह्लाद नाटक के प्रसिद्ध गुरु हैं।
प्रह्लाद
नाटक के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए वर्ष २०० में इनको संगीत नाटक अकादेमी,
दिल्ली द्वारा सम्मानित किया गया।

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