यक्षगान कर्नाटक का पारंपरिक नाट्य है । इनका आरंभ सोहलवीं शताब्दी के आस-पास
कर्नाटक के तटवर्ती जिले से हुआ। आज ‘यक्षगान’ कहने से एक विशिष्ट नाट्य-परंपरा का बोध होता है। वस्तुतः
प्रारम्भ में ‘यक्षगान’ एक विशिष्ट संगीत शैली का नाम रहा है। कालांतर में यह कर्नाटक में
प्रचलित लोकानुरंजन गीत प्रधान ‘जबकुपाट’ और नृत्य प्रधान कुरवंजि तथा नृत्य-नाट्य
ताल-मद्यले, दोड्डाट
और मूडल पाया आदि से प्रभावित हुआ। फिर लोककवियों ने प्रसंगों की रचना की। इस प्रकार परंपरागत गायन शैली में
नृत्य और कथानकों के समावेश से लोकनाट्य यक्षगान का उद्भव हुआ। कथानकों का निर्वाह
पद्यवद्ध संवादों के माध्यम से होने लगा और भागवत, रामायण, महाभारत और पुराणों के कथानक यक्षगान मंच के विषय वस्तु
बनते गए।
यक्षगान के प्रसिद्ध प्रसंगकार
रामपुत्र विष्णु: प्रसंग-विराट पर्व, बाणासुर वद्ध
सुब्रहमण्य : प्रसंग-रावण वध
देविदास: प्रसंग-कृष्ण संधान, भीष्म पर्व
पाण्डेश्वर केंकट: प्रसंग-कर्णार्जुन-कालगा
रामभट : प्रसंग-कंसवध, द्रोपदी स्वयंवर
सुव्वा: प्रसंग-रूक्मिणीस्वयंवर तथा वेंकटरमणैया
बरसात के महीनों को छोड़कर वर्ष के शेष सभी महीनों में
मंदिरों के प्रांगणों और खुले मैदानों में यक्षगान का प्रदर्शन रात भर होता है।
मंच के लिए 20 30 फीट विस्तार वाले समतल स्थान को चार-पाँच बाँस गाड़कर घेर लिया
जाता है। बाँस के खंभों को ताड़ पत्रों और आम्र-पल्लवों से सजाया जाता है। इस समतल
रंगमंच के पिछले पार्श्व में एक ऊँचा मंच बनाया जाता है जो भागवत, संगीतकार और मांदल आदि बजाने वालों के बैठने के लिए होता
है। दर्शक तीनों तरफ से घेरकर बैठते हैं। पास ही चौकी (साजघर) में कलाकार वेश धारण
करते हैं। प्रकाश के लिए नारियल तेल की मशाल प्रयुक्त होती है।
यक्षगान की प्रदर्शन मंउली
को मेल तथा प्रदर्शन ;नाटकद्ध
को आटा ;यक्षगान आटाद्ध कहा जाता है। चौक रंगस्थली तथा साजघर चौकी
कहलाता है। एक मेल में लगभग बीस व्यक्ति होते हैं। सूत्राधार को भागवत तथा
हास्यकार विदूषक को हनुमनायक कहा जाता है। यक्षगान में पूर्वरंग परंपरा का
निर्वाह किया जाता है। आरंभ में गणेश और सरस्वती की वंदना की जाती है। सभी पात्रा
दर्शकों की ओर पीठ करके मंच पर पंक्तिब( खड़े हो जाते हैं। भागवत पात्रा परिचय
कराता है। परिचय के बाद प्रत्येक पात्रा अपनी भूमिकानुसार नृत्य करता है। और पिफर
भागवत और हनुमनायक के बीच वार्तालाप के साथ नाटक आरंभ होता है। पात्रा भूमिकानुसार
याथार्थपरक वेश धरण करते हैं। रूप सज्जा में अतिरेक या तड़क-भड़क की विशिष्टताऐं
होती हैं। स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुष
ही करते हैं।

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