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Thursday, September 19, 2024

लोकनाट्यों का उद्भव एवं विकास-ओम प्रकाश भारती

 


लोकनाट्यों का उद्भव एवं विकास

अभी तक दुनिया भर के नाट्यविदों में आमराय बन चुकी है कि लोकनाट्यों का आविर्भाव धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक उत्सवों से हुआ। यूनान में डाइनीसस पूजा के अवसर पर वेदी पर लगभग पचास व्यक्ति कोरस में देवता का गान करते करते थे और उसी के साथ युद्ध , संघर्ष, कला, ब्याधि, पाप, सत्-असत् के आख्यान प्रस्तुत होते थे। धीरे-धीरे यह कोरस गायन अभिनय में परिणत हो गया। यह तथ्य सिर्फ यूनानी नाटकों के लिए नहीं है, बल्कि भारत में भी कई नाट्यरूपों का उद्भव आनुष्ठानिक क्रियाओं से हुआ। केरल का तेय्य्म , गुजरात का भवाई, बिहार का जट-जटिन, राजस्थान का गवरी, उत्तरांचल का नारद पात्तर, हिमाचल का करियाला और बुछैन, सिक्किम का बालुन, मणिपुर का शूमांगलीला आदि पारम्परिक नाट्यों का आविर्भाव आनुष्ठानिक क्रियाओं से हुआ है। इनमें से कुछ नाट्यरूपों ने धीरे-धीरे आनुष्ठानिक स्वरूप को त्याग कर नाटकीय स्वरूप को निखारा है।

आनुष्ठानिक क्रिया से नाट्य विकसन की प्रक्रिया मैंने अभी हाल में प्रत्यक्षतः देखें हैं। उत्तरी बिहार के ग्राम्यअंचलों में भगैत गायन की परम्परा है। भगैत-भक्तिपरक लोकगाथा है। इसमें लोकनायक के चमत्कारिक जीवन चरित्रों को कथागीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। एक दल में लगभग सात-आठ व्यक्ति होते हैं। झाल और टुभकी (तन्तु वाद्य) के साथ कथागायन प्रस्तुत किया जाता है। वर्ष में एक बार चैत्र के त्रयोदशी के दिन भगतियों की एक सभा होती है। जिसे सहमिलन कहा जाता है। इस सहमिलन में लगभग चार सौ दल भाग लेते हैं। 72 घंटे तक अनवरत गायन चलता है। अलग-अलग दल आता है और गायन प्रस्तुत कर चला जाता है। दर्शकों की भारी संख्या होती है। अब इतने लम्बे समय तक गायन और कथा ऊबाउ हो सकती है। पिछले पाँच-छः वर्षों में यह देखने में आया है कि कुछ दल के सदस्यों ने गाथा में आने वाले पात्रों का अभिनय/अनुकृति आरंभ कर दिया है। बीच-बीच में पात्र संवाद भी बोलने लगे हैं। मेरा अनुमान है कि अगले दस वर्षों में भगैत का नाटकीय स्वरूप निखर आएगा और उसे लोकनाट्य कहा जाएगा।

भारत में आज जो लोकनाट्यों की परम्परा जीवन्त है या कुछ नाट्यरूप जो 19वीं सदी के अंत तक प्रदर्शित होते थे। उनके विकास को निम्नलिखित क्रमों में समझा जा सकता है-

1. पहला चरण (ई.पू. 1500-1300 ई.)- आदिकाल

2. दूसरा चरण  (1400-1600 ई.)- उत्कर्ष काल

3. तीसरा चरण (1700 से आज तक)

 

 

उपरोक्त विभाजन इसलिए भी जरूरी है कि भारत में ऐतिहासिक और सामाजिक परिवर्तन कुछ हद तक इसी क्रम में हुआ है।

1. पहला चरण (ई.पू. 1500-1300 ई.)- आदिकाल

पहले चरण के (ई.पू. 1500-1300 ई.) के बीच लोकनाट्यों का स्पष्ट रूप हमें प्राप्त नहीं होता है। आरंभ के अधिकांश लोकनाट्य आनुष्ठानिक रूप में थे। भारतीय इतिहास लेखन में लोक की सदैव उपेक्षा हुई है। तत्कालीन नाट्यलक्षण ग्रन्थों या कलाग्रन्थों में लोकपरम्पराओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। यदि कहीं-कहीं संकेत मिलता भी है तो उनके प्रदर्शन रूप का पता नहीं चलता है। बहरहाल हम उपलब्ध  साक्ष्यों पर विमर्श करेंगे।

भरतमुनि विरचित नाट्यशास्त्र में जितने विस्तार के साथ नाट्य प्रस्तुति के विधानों और प्रयोगात्मक अनुष्ठानों का विवरण दिया गया है, उसके आधार पर यह कहना संगत लगता है कि उससे पहले नाट्य प्रस्तुतियां होती थीं। संस्कृत नाटकों की प्रस्तुतीकरण के ढांचे में पारम्परिक नाट्य के कई तत्व स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। संस्कृत नाट्य परम्परा के प्रतिफलन में निश्चित रूप से तत्कालीन या उससे पूर्व प्रचलित लोक परम्पराओं का योगदान रहा होगा। सांची, खजुराहो, रामगिरी, सीताबेंगा, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो आदि के गुफा मंचों से तत्कालीन समाज में नाट्य प्रचलित होने के संकेत मिलते हैं। वैदिक काल में स्वतंत्र विधा के रूप में नाटक का साक्ष्य नहीं मिलता है, परन्तु ऋग्वेद में लगभग एक दर्जन संवाद सूत्र हैं, जिनमें कथानक के साथ नाटकीय कार्य व्यापार की झलक है। इनमें से कुछ संवाद हैं-पुरुरवा-उर्वशी, यम-यमी, इन्द्र-अदिति-वामदेव, विश्वामित्र-नदी, नेम-भार्गव, इन्द्र-मरुत, अगस्त्य-लोपामुद्रा, इन्द्र-इन्द्राणि-वृषाकपि तथा शर्मा-पणिस आदि के संवाद। सामवेद के रचना-काल में संगीत का विकास हो चुका था। अथर्ववेद में पुरुषों के नर्तन और गायन का उल्लेख है। यजुर्वेद के तीसवें अध्याय में नाट्य के पात्र, नेपथ्य की विधियों, सामग्रियों और वाद्ययन्त्रों का उल्लेख हुआ है। सूत के लिए नृत्य, गीत के लिए शैलूष, हास्य के अनुकरण के लिए कारि, वामन और कुब्ज आदि का उल्लेख वैदिक साहित्य में हुआ है। गन्धर्व, अप्सरा, चित्रकारिणी, वीणावादक, पाणिध्न (हाथ से बजाने वाला वाद्य), तूणवध्म (तबला जैसा वाद्य), तबला तथा मागध का उल्लेख (यजुर्वेद 30/6, 8, 10, 10, 20) तत्कालीन समाज में कलारूपों की समृद्धि  को दर्शाता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में कई कलारूपों के प्रदर्शन के उल्लेख हुए हैं। महाब्रात योग में अग्निवेदी के चारों ओर नृत्य एवं गायन करती महिलाएं इन्द्र से वर्षा और कृषि की समृद्धि  के लिए प्रार्थना करती थीं (शंखायन आरण्यक, पृ. 72)। वर्षा के आह्वान के लिए आज भी कई अनुष्ठानमूलक नाट्य-नृत्य प्रचलित हैं। बिहार का जट-जटिन इसी तरह का नाट्यरूप है। ईसा के दो-तीन सदी पूर्व पातंजलि  के महाभाष्य में कंसवध एवं बलिवध नामक दो प्रदर्शनों के  नाम आए हैं । महाभाष्य में उल्लेखित है कि शौभनिक कंस का वध अथवा बलि को बांधने का अभिनय करते हैं और ग्रन्थिक कथा गायन करते हैं। इसी तरह की अभिनय पद्धति बाद के लोकनाट्यों में परिलक्षित होती है।

बौद्ध  और जैन साहित्य में नाट्य प्रयोग के प्रेक्षण सम्बन्धी विधि-निषेधों की चर्चा की गई है। राउपसेनिय सूत्र (राजप्रश्निक सूत्र) जैनागम में प्रेक्षागृह,  मण्डप तथा उसके लिए अन्य सामग्रियों का बहुत स्पष्ट विवरण मिलता है-सत्वं क्लिपियं गीतं, सब्बंनट्टं विडम्बनम्। (उत्तराध्ययन 13/16 तथा राजप्रश्नीय, पृ, 87-90)। राजप्रश्निक सूत्र में ही तीर्थंकर चरित नामक नाट्यविधि का उल्लेख हुआ है, जिसमें महावीर के देवलोक से अवतार और उनके सांसारिक जीवन की घटनाओं को नृत्य-संगीत के साथ प्रस्तुत किया गया था।

आरम्भ के बौद्ध ग्रंथों में नाट्यकला के प्रति उदासीनता है तथा उसे निषिद्ध  कहा गया है। लेकिन ललित विस्तार, दिव्यावदान और अवदान शतकों में स्वयं  बुद्ध नाट्यगुणालंकृत प्रयोक्ता के रूप में चित्रित किये गये हैं। एक अन्य कथा में नाट्याचार्य बुद्ध के  वेश में और शेष नट भिक्षु वेश में अवतरित होते हैं (अवदान शतक, पृ. 185-87)। यह परम्परा आगे समृद्ध  होती चली गई। चौदहवीं शताब्दी में तिब्बती लामा थांग तोंग ग्यलपा ने रंगमंच को बौद्ध  धर्म के प्रचार का सशक्त माध्यम बनाया। यह नाट्य प्रयोग बुछैन के नाम से प्रसिद्ध  हुआ और देखते ही देखते तिब्बत सहित भारत के हिमालयांचल में इसका प्रदर्शन होने लगा। हिमाचल प्रदेश के लाहोल-स्फीति अंचल में बुछैन का आनुष्ठानिक प्रदर्शन आज भी होता है। वात्साययन के कामसूत्र में नटों द्वारा अभिनीत नाटक की चर्चा है। जैनागमों में इन्द्रध्वजोत्सव का विवरण मिलता है। वेदों में कई स्थलों पर इन्द्र की शक्ति और ओजस्विता का सोत्साह गायन किया गया है। भरत विरचित नाट्यशास्त्र में दैत्यदानवनाशन नाटक का प्रदर्शन महेन्द्र विजयोत्सव के अवसर पर  हुआ था। इस प्रथम नाट्य प्रदर्शन में दिखाया गया है कि किस तरह देवताओं ने दैत्यों पर विजय प्राप्त किया था। इस महासंग्राम में इन्द्रध्वज द्वारा इन्द्र ने दानवों को जर्जर किया था। सिक्किम के नेपाली मूल के लोगों के बीच आज भी इन्द्रध्वज यात्रा का आनुष्ठानिक प्रदर्शन होता है। इस प्रकार ऊपर वर्णित नाट्यरूपों को लोक या पारम्परिक नाट्यों का आदिरूप कहा जा सकता है।

भरत ने नाट्यशास्त्र में नाट्यांगों की चर्चा की है, जिनमें से एक धर्मी है। धर्मी के दो भेद बताए गए हैं-लोकधर्मी और नाट्यधर्मी। फिर लोकधर्मी नाट्य की प्रवृत्ति को इन खण्डों में स्पष्ट किया गया है-

स्वभावभावोपगतं बुद्ध  तु अविकृतं तथा।

लोकवार्ताक्रियोपेत मंगलीला विवर्जितम्।।

स्वभावाभिनयोपेतं ना स्त्रीपुरुषाश्रयस।

यदीदृशं भवेन्नादयं लोकधर्मी तु स्मृता।।

(भाषान्तर)

ध्यातव्य है कि भरत द्वारा निर्दिष्ट लोकधर्मी नाट्य का दूर-दूर तक लोकनाट्यों से कोई रिश्ता नहीं है। बल्कि नाट्यधर्मी, को लोकनाट्य के निकट माना जा सकता है। लेकिन बिना इस तथ्य की पहचान किए कई अन्वेषकों ने भरत के लोकधर्मी को लोकनाट्य जैसा कह कर भ्रांतियां पैदा की हैं। इतना अवश्य है भरत और उनके परवर्ती लक्षणकारों यथा;कोहल, दत्तिल, अश्मकुट्ट-नखकुट्ट, वादरायण, शातकर्णी, अभिनवगुप्त, उदभट, भट्टलोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, मातृगुप्ताचार्य, हर्ष- वार्तिकाकार हर्ष, शकलीगर्भ तथा भट्टतोत ने रूपक और उपरूपक के जितने भेद किये हैं, उनमें से कई (ईहामृग, समवकार, डिम, नाट्यरास, भाणिका आदि) लोकटनाट्यों के पुराने रूप कहे जा सकते हैं। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी इन रूपकों के सम्बन्ध में विमर्श करते हुए कहते हैं- ‘‘अचरज की बात है कि इतने विशाल संस्कृत साहित्य में इन रूपकों, उपरूपकों में से अधिकांश को उदाहरणस्वरूप समझने के लिए मुश्किल से एकाध पुस्तक मिल पाती है। कभी-कभी तो एक भी नहीं मिलती। संभवतः ये लोकनाट्य के रूप में जीते हों (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, भाग 7, पृ. 75)।

लोकनाट्यों के संदर्भ में  प्राचीन ग्रंथों में हरिवंश पुराण का विष्णुपर्व उल्लेखनीय है। हरिवंश पुराण का रचना काल 3री सदी माना जाता है । कुछ विद्वान इसे अश्व घोष(2री सदी) से  पहले का मानते हैं। प्रदर्शनकारी कलाओं के दृष्टिकोण सेयह  महत्वपूर्ण ग्रंथ है । हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व में नृत्य और अभिनयसंबंधी सामग्री अपने मौलिक रूप में मिलती है। इस पर्व के अंतर्गत दो स्थलों में छालिक्य का उल्लेख हुआ है। छालिक्य वाद्य–संगीत- नृत्यमय अभिनयपरक कला ज्ञात होता है। मुद्रा,हाव भावों का प्रदर्शन इसनृत्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। विष्णु के दस अवतारों का हरिवंश पुराण में दृश्यपरक वर्णन हुआ है। कलांतर में कई लोकनाट्यों में दशावतार प्रसंग और  हरिवंश पुराण के अन्य विविध प्रसंगों की मंचन परंपरा आरंभ हुई । हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व (91-93 अध्याय ) में भद्र नामक नट तथा यादव कुमारों यथा  प्रद्युम्न, सांब आदि द्वारा वज्रनाभपुर में रामायण और रंभाभिसार नाटक के प्रदर्शन का उल्लेख हुआ है-

...तदनन्तर वर प्राप्त किये हुए उस नटने वहाँ सुपुर में नृत्य किया और पुरवासियों के मन में महान् हर्ष भर दिया उसने रामायण नामक महाकाव्य की कथावस्तु को लेकर वहाँ एक नाटक किया।उसमें यह दिखाया गया कि राक्षस राज रावण के वध की इच्छा से अप्रमेय स्वरूप भगवान् विष्णु का भूतल पर अवतार हुआ ।[1] भरतनन्दन! राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न , भरत,ऋषि शृंग  तथा शान्ता का वेश उन्हीं के जैसे रूपवाले नटों ने धरण किया था।।8 राजन्! जो राम के समय में जीवित थे, वे बूढ़े दानव भी उन्हें देखकर आश्चर्य चकित हो गये और कहने लगे, इनका रूप तो ठीक उन्हीं व्यक्तियों के तुल्य है।।9 उनके संस्कार (वेश-धारण), अभिनय, प्रस्तावों (क्रिया-प्रसंगों ) का धारण तथा प्रवेश (पात्रों का प्रथम दर्शन) देखकर सभी दानव बड़े विस्मय में पड़ गये थे।।10 उस नाटक में अनुरक्त हुए वे असुरगण नाट्य  विषयों में बारम्बार उठ-उठकर बड़ी प्रसन्नता के साथ आश्चर्ययुक्त कोलाहल करते और संतुष्ट  हो नटों को वस्त्र, गले का भूषण कंकण, मनोहर हेमवैदूर्यभूषित हार देते थे।।11-12 दानवराज का वह आदेश सुनकर शाखा नगर निवासी असुर नटवेशधारी यादवों को रमणीय वज्रपुर में ले गये। तत्पश्चात् जब वे नट पूर्ण विश्राम कर चुके, तब महाबली वज्रनाभ ने उन्हें बहुत-से रत्न देकर नाट्यकला का प्रदर्शन करने के लिए आज्ञा दी।।19 नरेश्वर! अन्तःपुर की स्त्रियों को पर्दे की ओट में जहाँ से वे अपने नेत्रों द्वारा सब कुछ देख सकती थीं, बिठाकर मनस्वी वज्रनाभ स्वयं भी जाति-भाइयों के साथ उन नटों का अभिनय देखने के लिये बैठा।।20 भयंकर कर्म करने वाले वे यादव कुमार भी उपयुक्त  शृंगार करके नटवेश धारण किये और नृत्य का उपक्रम करने लगे।।21 फिर तो घन (झाँझ और करताल आदि), सुषिर (मुरली), मुरज (मृदंग), आनक (ढोल या नगाड़ा) तथा वीणा के स्वरों से मिश्रित दूसरे-दूसरे बाजे उन नटों द्वारा बजाये जाने लगे।।22।। तम्पश्चात् यादव कुमारों के साथ आयी हुई वारांगनाएँ देव गांधार नामक छालिक्य का गान करने लगीं, जो कानों को अमृत के समान मधुर प्रतीत होता था। वह श्रोता के मन और कान दोनों को सुख देने वाला था।।23।। गांधार  आदि सातों को व्याप्त करके स्थित होने वाले जो त्रिविध ग्राम (स्वरों के समूह), वसन्त आदि राग तथा गंगावतरण नामक गीत विशेष हैं, उन्हें रागान्तर से मिश्रित, व्याप्त तथा रमणीय बनाकर वे अपनी मधुर स्वर सम्पत्ति के द्वारा गाने लगीं।।24।। कार्यवश नटभाव को प्राप्त हुए पराक्रम सम्पन्न प्रद्युम्न, गद और साम्ब नान्दी[2] बजाने लगे।।26।। उस समय नान्दी (मांगलिक पद्यपाठ)- के अंत में रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने गंगावतरण  से सम्बन्ध रखने वाले श्लोक का उत्तम अभिनय के साथ पाठ किया।।27।।

तत्पश्चात् कुबेर लोक संबंधीरम्भाभिसार नामक नाटक का वे सब लोग अभिनय करने लगे। शूर नामक यादव रावण रूप से उपस्थित हुए। मनोवती नामक वारंगना  ने रम्भा का वेष धरण किया।।28।। प्रद्युम्न ही नलकूबर बने। साम्ब उनके विदूषक बनकर तदनुरूप कार्य करने लगे। यादव कुमारों ने माया से वहाँ कैलास को ही मूर्तिमान कर दिया।।29।। क्रोध में भरे हुए नलकूबरने जिस प्रकार दुरात्मा रावण को शाप दिया और जिस तरह रम्भा को सान्तवना प्रदान की, इस प्रकरण का, जिसके द्वारा सर्वज्ञ महात्मा नारद मुनि की कीर्तिपर प्रकाश पड़ता है, उन वीर यादव कुमारों  ने नाटक द्वारा प्रदर्शन किया।।30-31।। अत्यन्त तेजस्वी भीमवंशियों के पाद-विक्षेपपूर्वक किये गये नृत्य और अभिनय से संतुष्ट हुए ।

भरतनन्दन ! उन दानवों ने यादव कुमारों को दिव्य शीतल एवं सरस चन्दन, अगुरु आदि श्रेष्ठ सुगन्धित  पदार्थ तथा चिन्तन करने मात्र से सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवाले उदार चिन्तामणि नामक रत्न भी दिये। पुरुषप्रवर! नरेश्वर! वहाँ बहुत बार नाटक देखने को अवसर मिले 35-37।।

 

उपरोक्त उल्लेखों में  नाट्य प्रदर्शन संबंधी निम्नलिखित तथ्य अवलोकनीय है-

 

-            नाट्य प्रदर्शन में गीत, वाद्य  एवं नृत्यों सा समुचित प्रयोग हुआ है।(श्लोक संख्या- 22)

-             नट /अभिनेता गायन ,वाद्य तथा नृत्य में निपुण है।(श्लोक संख्या- 26-27)

-            प्रदर्शन में विदूषक की उपस्थिति है । (श्लोक संख्या- 29)

-            प्रस्तावना और नांदी पाठ का प्रचलन था । (श्लोक संख्या- 10, 27 )

-            नाट्य प्रस्तुति में स्त्रियों की सहभागिता थी तथा स्त्री पात्रों की भूमिका स्त्रियों द्वारा की जाती थी ।

(श्लोक संख्या- 23,28 )

-            रूपसज्जा, वस्त्र तथा अलंकरण पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता था ।(श्लोक संख्या- 10)

-            पात्रों की भूमिका (रोल) का निर्धारण कलाकारों के शारीरिक एवं चारित्रिक विशेषताओं केआधार पर निर्धारित होता थी। (श्लोक संख्या- 9)

-            नाट्य प्रदर्शन के लिए  प्रेक्षकों द्वारा उपहार या मानदेय देने का प्रचलन था। (श्लोक संख्या- 11,35)

 

उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि हरिवंश पुराण में वर्णित नाट्य प्रस्तुति का शिल्प लोकनाट्यों के समीप है ।  “तत्पश्चात् कुबेर लोक संबंधीरम्भाभिसार नामक नाटक का वे सब लोग अभिनय करने लगे”(हरिवंश पुराण के श्लोक 28)- यहाँ लोक संबंधी नाटक से तात्पर्य , लोक नाट्य परंपरा से हो सकता है।  हरिवंश पुराण का यह विवरण एक ओर नाट्यशास्त्र आधारित प्रदर्शन पद्धति को संपुष्ट करता है, वहीं तत्कालीन समाज में लोक नाट्यों के प्रदर्शन की उपस्थिति को दर्शाता है।

हमें ज्ञात है कि संस्कृत नाट्य के श्रेण्य युग में रसिकों की अभिरुचि के दबाव के कारण तत्कालीन नाट्य प्रयोक्ताओं ने एक ऐसी नाट्य पद्धति को विकसित किया जिसमें संगीत और नृत्य का प्राचुर्य था। इस अभिनव नाट्य रूप को संगीतक कहा गया। संगीतक का सर्वप्रथम उल्लेख वररुचि के उभयासारिका नामक चतुर्भाणी में हुआ है। वाणभट्ट के कादम्बरी में भी चतुर्भाणी का उल्लेख मिलता है। सातवीं शताब्दी तक इस गौण उपरूपक ने संगीत-नाटक या संगीतक के रूप में अपनी पहचान बना ली थी। कालान्तर में इस नाट्यरूप ने भाषा संगीतक (किरतनियां और अंकिया) के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

संस्कृत रंगमंच के पतन के साथ ही संस्कृत भाषा का भी पतन आरंभ हो चुका था। दसवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी के बीच लोकव्यवहार की भाषा अपभ्रंश और प्रादेशिक बोलियां हो चुकी थीं। तत्कालीन नाट्य प्रयोक्ताओं ने नाटकीय प्रेषणीयता बढ़ाने के लिए संस्कृत नाटकों में देशी भाषा के गीतों का समावेश किया। इस परम्परा के आदि प्रणेता केरल के शासक कुलशेखर वर्मन थे, जिन्होंने संस्कृत नाटकों को जनसाधारण में बोधगम्य बनाने के लिए चाक्यार को विदूषक की भूमिका में प्रस्तुत कर स्थानीय भाषा में गीत, टिप्पणी, व्याख्या एवं समसामयिक और सामाजिक परिहास पद्धति का नाट्य प्रदर्शन में समावेश किया। यही नाट्य बाद में कुडियाट्टम के नाम से प्रसिद्ध  हुआ। आलोच्य  काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी, गीतगोविन्द की रचना। 1198 ई. में जयदेव ने गीतगोविन्द की रचना कर प्रदर्शनकारी कला के क्षेत्र में अभिनय और नृत्य की नवीन पद्धति को प्रचलित किया। गीतगोविन्द राग- रागिनीवद्ध दृश्य काव्य है। गीतगोविन्द परवर्ती सभी कलारूपों नाट्य, नृत्य, गीत आदि को प्रभावित किया। कश्मीर से लेकर केरल तक के राजदरबारों से लेकर ग्रामीण कलारूपों पर गीतगोविन्द का प्रभाव परिलक्षित होता है।

निष्कर्षतःकह सकते हैं कि आलोच्यकाल (1500 ई.पू. से 1300 ई.) में अधिकांश लोकनाट्यों का स्वरूप आनुष्ठानिक था। इस कलावधि में राज्यदरबारों में जो नाट्य परम्पराएं प्रचलित हुई उनका लोक से कुछ लेना-देना नहीं था। उनमें से तो कुछ संस्कृत रंगमंच को केवल जीवित रखने के लिए प्रतिबद्ध  था, बाकी, समान्तों, जागीरदारों तथा संरक्षणदाताओं की अभिरुचियों के दबाव का सम्पोषक था। इस काल के कई नाट्यरूप आज भी भारत के ग्राम्यअंचलों में आनुष्ठानिक स्वरूपों में प्रदर्शित हो रहे है, जिन पर गहन शोधकार्य की जरूरत है।

2. दूसरा चरण  (1400-1600 ई.)- उत्कर्ष काल

1400ई. से 1600ई. के  लोकनाट्य नाट्य अस्तित्व में आया। यह समय मूलरूप से लोकनाट्यों का उत्कर्ष काल माना जायगा ।उत्तर सामंत काल – भक्ति काल

दूसरे चरण में जहाँ राजदरबारों में नाट्यकला को प्रोत्साहन और संरक्षण मिलता रहा वहीं भक्ति आन्दोलन ने नाट्यकला को महत्त्वपूर्ण सामाजिक चेतना के माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया। इस काल में उद्भित अधिकांश नाट्यरूपों का गहरा सामाजिक सरोकार था। पहले राजदरबारों में विकसित नाट्यरूपों की चर्चा।

चौदहवीं शताब्दी में मिथिला में कर्णाटवंशी शासक हरिहरसिंह देव ने नाट्यकलाओं और नाटककारों को प्रश्रय दिया। उनके ही दरबार में ज्योतिरीश्वर ठाकुर ने धूर्त्तसमागम और उमापति ने पारिजातहरण नाटक की रचना की। बाद में हरिहर सिंह देव, ग्यासउद्दीन तुगलक से पराजित होकर नेपाल चले गए वहाँ भी उन्हांने नाट्यकला का प्रश्रय जारी रखा। यह नाट्य परम्परा किरतनियां के नाम से प्रसिद्ध हुई तथा बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक परम्परित रही। इस परम्परा में ज्योतिरीश्वर, उमापति के अलावे, विद्यापति, गोविन्द, ब्रह्मदास, देवानन्द, रमापति, श्रीकान्त कवि तथा विश्वनाथ जैसे नाटककार हुए। किरतनियां नाट्य परम्परा में उमापति द्वारा 1325 में विरचित पारिजातहरण बहुत ही लोकप्रिय नाटक हुआ, जिसका मंचन दक्षिण भारत के राजदरबारों में हुआ तथा अपने समकालीन और परवर्ती नाट्यरूपों को प्रभावित भी किया। पारिजातहरणको भारतीय देशज भाषा का पहला नाटक माना जाएगा।  आरंभ के किरतनियां नाटक राजदरबार के संरक्षण में फलित जरूर हुआ, लेकिन दरबार के साथ ही लोक में भी इसके प्रदर्शन होते रहे। मिथिला के अलावे दक्षिण भारत के राजदरबारों में नाट्यकला और नाटककारों को संरक्षण मिला। दक्षिण में भागवत मेल और यक्षगान जैसे पारम्परिक नाट्यरूपों को राज्यदरबार में विशेष संरक्षण मिला। सन् पन्द्रह सौ ईस्वी के आसपास तक भगवान के विग्रह या मंडप के सम्मुख पूजन-नृत्य करने वाली देवदासियों को यह छूट मिल गई थी कि वह मंदिर के बाहर राजदरबारों के नृत्य, संगीत के आयोजनों में भाग ले सकें। कुछ  आचार्यों को यह हजम नहीं हुआ, उन्हें परम्परा में भ्रष्टता दिखी। उन्होंने धार्मिक विषयों पर नृत्यरूपकों को प्रस्तुत किया जिसे बाद में नाट्यमेल या भागवत मेल कहा गया। विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय (1507-1530) के समय में भागवत मेल की विशेष अभिवृद्धि हुई। सोलहवीं शताब्दी के अन्त में अच्युतप्पा नायक नामक तंजोर नरेश ने तमिलनाडु के मेलात्तूर नामक गाँव में पाँच सौ एक भागवतुल ब्राह्मणों को आन्ध्र के कुचीपुड़ी क्षेत्र से ला बसाया और उन्हें नाट्य रचना के लिए भरपूर संरक्षण दिया। मेलात्तूर ग्राम के ये नाटक बाद में वीथिनाटकम, तेरुकुथू एवं भागवत मेल के नाम से विख्यात हुए। ये नाटयरूप राजदरबारों के साथ आमजनों में भी लोकप्रिय हुए। अच्युतप्पा नायक के बाद तंजोर नरेश विजयराघव नायक  (1633-1676ई.)नाट्यकला के बड़े संरक्षक हुए। उन्होंने स्वयं रघुनाथअभ्युदयम् तथा उनकी पत्नी रंगजम्मा ने मन्तारदासविलासम् नाटक लिखे। ये नाटक तेलुगु भाषा में यक्षगान की शैली में निबद्ध  थे। दक्षिण के साथ उत्कल में गजपति कपिलेन्द्र देव (पन्द्रहवीं सदीद्) और कश्मीर में जैनुल अबादीन ने नृत्य, संगीत और नाट्यकला को विशेष संरक्षण दिया। सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के उत्तराद्ध  तक भारत के विभिन्न अंचलों में सामन्त और जागीरदारों ने नाट्यकला को विशेष प्रोत्साहन दिया।

इन दरबारी परंपराओं के नाट्य रूपों  के अलावे दसवीं सदी से ही कुछ लोकनाट्य रूपों का स्वरूप निखर रहा था। इस काल के कुछ लोकनाट्य रूपों का उल्लेख मिथिला में ज्योतिरीश्वर ठाकुर (1280-1340ई.) लिखित विश्वकोशीय ग्रंथ वर्णरत्नाकर में मिलता है। वर्णरत्नाकर में लोरिक नाच, विदाओंत  और विरहा जैसे नाट्यरूपों  की चर्चा हुई है। इन नाट्य रूपों का परवर्ती रूप आज भी मिथिला के लोकजीवन में प्रदर्शित होते हैं।

पन्द्रहर्वी शताब्दी तक भक्ति आन्दोलन का प्रसार उत्तर और पूर्व भारत में हो चुका था। ब्रजमंडल देश के वैष्णव भक्तों का केन्द्र बना। भक्तिकाल में कृष्ण और राम के चरित्रों एवं लीलाओं को संवाद नृत्य-गीत तथा अभिनय के द्वारा प्रस्तुत किया गया। रामलीला और रासलीला का नाटकीय स्वरूप निखरा और समूचे हिन्दी प्रदेश का मुख्य पारम्परिक नाट्य बन गया। पूर्वांचल तथा पूर्वोत्तर भारत में अंकिया, भावना, ढब जात्रा, गौड़लीला, जात्रा, आदि पारम्परिक नाट्यरूप अस्तित्व में आया। मिथिला में विदाओंत जो नाट्य रासक की प्रस्तुति करते आ रहे थे, भक्तिकाल में जयदेव और विद्यापति के भक्तिपरक गीतों के साथ संवाद जोड़कर नई पद्धितियों की शुरुआत की, जो आज बिदापत के नाम से प्रदर्शित होता है।

तीसरा चरण (1600 से आज तक)

भक्तिकाल के बाद सामाजिक रूपों में बदलाव आया। राजनैतिक भगदड़ कुछ वर्षों के लिए थम गई। सोलहवीं शताब्दी के उत्तराद्ध तक उत्तर और पश्चिम भारत में नये नाट्यरूप तमाशा, भवाई, ख्याल, माच, नाचा, नटुआ नाच, भांड़पाथेर, स्वांग या सांग आदि अपनी पहचान बना चुके थे। ये नाट्यरूप आकस्मिक  प्रकट नहीं हुए थे बल्कि पूर्व से चली आ रही परम्पराओं का परवर्ती रूप या नया संस्करण थे। इन नाट्यरूपों के कथानकों में युगानुकूल परिवर्तन होता रहा। आरंभ में पौराणिक और प्रेमाख्यानों कथनाकों का मंचन होता रहा। लेकिन पुनर्जागरण काल (19वीं सदी) में विशेषकर तमाशा, स्वांग और जात्रा जैसे नाट्यमंचों पर राष्ट्रवादी भावना को सम्पुष्ट करने वाले कथनाकों के मंचन हुए।

 

पारम्परिक नाट्य एवं नाटकीयप्राय लोकविधाएं

असम                :           अंकिया नाट, भावना- धुलिया, खुलिया, कमरुपिया

आन्ध्र प्रदेश        :           वीथिनाटकम्

सिक्किम                        :           बालुन, इन्द्रजात्रा

त्रिपुरा                :           ढबजात्रा

मणिपुर               :           गौड़लीला, शूमालीला

बंगाल               :           जात्रा, गंभीरा, अलकाप

बिहार                :           बिदापत, किरतनियां, नटुवा नाच, जट-जटिन

उड़ीसा               :           प्रह्लाद नाटक, भारतलीला

झारखंड             :           छऊ (नृत्य-नाटक)

छत्तीसगढ़           :           नाचा

मध्यप्रदेश           :           माच

उत्तर प्रदेश          :           नौटंकी, स्वांग

उत्तरांचल           :           नारदपात्तर, पांडवलीला

हिमाचल            :           करियाला, बुछैन, बांठड़ा, हिरणात्तर, होरिङफो

हरियाणा             :           सांग

पंजाब                :           नक्कल

जम्मू-कश्मीर       :           भांडपाथेर

राजस्थान            :           गवरी, ख्याल

गुजरात               :           भवाई

महाराष्ट्र             :           तमाशा, गोधंल

गोवा                 :           तियाटर

कर्नाटक             :           यक्षगान

तमिलनाडु          :           तेरूकूथु

केरल                 :           कुडियाट्टम, वेलकिळ, तेय्यम, मुटियेट्ट,

                        पोराट्टनाटकम्, एषामुत्तिक्कलि, यात्रकलि (संघकलि), चविट्टनाटकम्।

 



[1]रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम्।

जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ।।6

 

[2]एक प्रकार का विशिष्ट वाद्य

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