लोकनाट्य: अर्थ , परिभाषा, वर्गीकरण, विशेषताएँ
लोकनाट्य को पारम्परिक, परम्पराशील, लोकधर्मी नाट्य, जननाट्य, क्षेत्रीय या प्रादेशिक, ग्रामीण नाट्य अथवा आंचलिक नाट्य आदि कई नामों से अभिहित किया जाता रहा है। कभी-कभी तो लोकगाथा और लोकनृत्य को भी लोकनाट्य से संज्ञापित कर भ्रम पैदा की जाती है। हमें यह ज्ञात है कि लोक में या लिखित साहित्य की परम्परा में किसी भी विधा की उपस्थिति की आवश्यकता और अर्थ है। लोकगाथा, लोकनृत्य और लोकनाट्य इसीलिए है कि समाज को इन तीनों की अलग-अलग आवश्यकता है। भिन्न-भिन्न कारणों से समाज में इनकी उपस्थिति अनिवार्य है। इन अनिवार्यताओं को समझते हुए, इनकी स्वतंत्र पहचान और नामकरण भी अति आवश्यक है। यहाँ हम केवल लोकनाट्य पर विमर्श करेंगे। लोकनाट्य सामाजिक पद है, जिसके सामान्यतः दो अर्थ निकाले जा सकते हैं- लोक का नाट्य और लोक के लिए नाट्य।
(नर्तकी यह एक कांस्य मूर्ति है जो मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई थी जो सिन्धु घाटी की सभ्यता का एक स्थल है। माना जाता है की इसे २५०० ईसापूर्व के आसपास बनाया गया होगा। मोहनजोदड़ो के एक घर से एक और कांस्य मूर्ति प्राप्त हुई थी जो लगभग इसी की तरह है। )
नाट्य ,नृत्य ,नृत्त का भेद
नाट्य
नाट्य
पुरुषवाचक संस्कृत का शब्द है। वर्तमान समय में थिएटर, नाट्य का पर्याय माना जाता है। भारतीय नाट्य लक्षणग्रंथों में ‘नाट्य’ की व्याख्या के संदर्भ में बार-बार नृत्त और
नृत्य शब्द की चर्चा होती है। इन शब्दों को सही-सही समझने पर नाट्य और नृत्य के
बीच का भ्रम दूर हो सकता है।
नृत्त
- लय और ताल पर आधारित पद्धति विशेष की देह मुद्राएँ और
गतियाँ नृत्त हैं। नृत्त में गीत या अभिनय नहीं वरण लय और ताल पर आधारित स्थिर और
गतिमान मुद्राएँ होती हैं।
नृत्य- ताल आधारित मुद्राओं और गतियों के साथ गीत और
अभिनय शामिल होने से नृत्य कहलाता है। यानी नृत्त में जब गीत और अभिनय जुड़ जाते हैं तो वह नृत्य
हो जाता है।
नाट्य-
अभिनय,
नाट्य में भी होता है, लेकिन वहाँ वह ताल के
साथ संयुक्त नहीं होता। नृत्य और नाट्य दोनों अनुकरणप्रधान कलाएँ है। लेकिन नृत्य
में केवल भावों का अनुकरण होता है, जबकि नाट्य में अवस्था
का। गीत की बजाय संवादजो प्रायः गद्यरूप में होता है, नाट्य
के लिए अपरिहार्य है। लोकनाट्यों के गद्य संवाद-गीत न होकर, संवाद
गीत है, जो लयब( गद्य जैसा है। जाहिर है कि ऐसे संवाद
नाट्यगत चरित्रों के होते हैं। नृत्य दृश्य विधा है, जबकि
नाट्य को दृश्य और श्रव्य दोनों कहा गया है।
नाट्य
और नृत्य में अभिनय के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। नृत्य में पदार्थ का अभिनय होता है
और नाट्य रसाश्रित होने के कारण वाक्य अभिनय प्रदान करता है। दशरूपक के प्रथम
प्रकाश में इसकी चर्चा की गई है-
अन्यद्मावाश्रंय
नृत्यम्,
नृत्नं ताललयाश्रम।
अवस्ंथानुकृतिनार्टयम्, दशमैव
रसाश्रम्।।
भारतीय नाट्य लक्षणकारों ने
नाटकीय प्रभाव को सघन और उज्ज्वलतर बनाने के लिए नाट्य में नृत्त और नृत्य के
प्रयोग करने की सलाह दिए हैं। भरत विरचित नाट्यशास्त्र के चौथे अध्याय में इसका
उल्लेख है कि शिव ने ब्रह्मा को बताया कि नृत्य का नाट्य में प्रयोग कैसे हो। ‘महागीतेषु’ चैवार्थान सम्यगेवाभिनेष्यसि यानी इस (नृत्य) के जरिए तुम पूर्वरंग में गाए जाने वाले गीतों में निहित संवेदन
तत्वों को भावक तक सम्प्रेषित कर सकते हो। संगीत नृत्य के लिए आवश्यक है, जबकि नाट्य के लिए वैकल्पिक। इस प्रकार प्राचीन भारतीय मान्यताओं और
लक्षणकारों की व्याख्या के अनुसार नाट्य ऐसी प्रदर्शनकारी कला है, जो
-
अवस्था का अनुकरण करती है।
-दृश्य और श्रव्य दोनों है।
-
चरित्र होता है तथा उनका विकास भी।
-
रसाश्रित होने के कारण वाक्य अभिनय आधारित होता है।
आज
नाटक सिर्फ़ दृश्य रह गया है। श्रव्य परम्परा का औचित्य समाप्त होता जा रहा है। भरत मुनि के अनुसार
‘न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
न
तत कर्म न वा योगो नाट्ये सिम्न्यनन
दृश्यते ।।143।। नाट्यशास्त्र
अर्थात, ऐसा कोई ज्ञान, शिल्प ,विद्या, कला, योग, कर्म नहीं है जिसे नाट्य के माध्यम से
प्रदर्शित न किया जा सके।
प्राचीन
भारतीय आचार्यों ने नाटक के तीन तत्व माने
हैं- वस्तु, नेता (नायक) और रस।
यूरोपीय विद्वानों ने नाटक के छह तत्त्व माने हैं- कथावस्तु, पात्र, कथोपकथन, देशकाल,
उद्देश्य और शैली। यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो यूरोपीय
विद्वानों द्वारा सुझाए गए छह तत्त्व भारतीय आचार्यों के तीन तत्त्वों में समाहित
हैं। कुछ भारतीय आचार्यों ने अभिनय को चौथा तत्त्व मानकर, इसका
विवेचन भी किया है।
भारतीय
अध्येयताओं ने कथावस्तु या कथानक के अन्तर्गत तीन तथ्यों के उल्लेख किए हैं-
-
पूर्वरंग
-
घटनाचक्र
-
भरतवाक्य
पूर्वरंग
के भाग हैं-नांदीपाठ या मंगलाचरण, प्ररोचना,सूत्रधार नट-नटी का वार्तालाप, जिसमें कथावस्तु का परिचय और उसके उद्देश्य की सूचना दी जाती है।
प्रस्तावना- कथा का प्रांरभ चमत्कारपूर्ण ढंग से कर दिया जाता है।भरतवाक्य नाटक के
अंत में, घटनाओं की समाप्ति के उपरांत आशीर्वचन और मंगलकामना
के रूप में कह या गा दिया जाता था। समकालीन भारतीय नाटकों में भी पूर्वरंग और
भरतवाक्य आदि का विधान प्रायः नहीं होता है। कुछ प्रयोगात्मक प्रदर्शन को छोड़ कर
आज कथावस्तु से सिर्फ नाटकीय व्यापारों या घटनाचक्र के ही बीच होता है।
निर्माण
की दृष्टि से भारतीय आचार्यों ने कथावस्तु
के तीन भेद किए हैं-
प्रख्यात-जिसका आधार पुराण, इतिहास या जनश्रुति है।
उत्पाद्य
-जो
कल्पित हो।
मिश्र
-जिसमें
इतिहास और कल्पना का मिश्रण हो।
इस
तरह यदि प्राचीन आचार्यों की नाट्य सम्बन्धी व्याख्या का विश्लेषण किया जाए तो साफतौर
पर यह प्राचीन रंगमंच के साथ आज के लोकनाट्य से
साम्य रखता है।
लोकनाट्य
की परिभाषा
किसी समाज अथवा समुदाय में प्रचलित/परंपरित नृत्य-गीत
तथा अभिनयमूलक वह प्रदर्शन, जिसका प्रदर्शन शिल्प किसी विशेष परिधि या नियम से
मुक्त हो, उसे लोकनाट्य कहा जाएगा।
नाट्य को किससे अलग समझा जाय ? नाट्य जैसी और कौन सी प्रदर्शनमूलक विधा है, जिससे
भ्रम की स्थिति होती है- नृत्य ,नृत्त, गाथा गायन तथा अन्य अनुष्ठान मूलक /परक
प्रदर्शन । अब यहाँ देखें कि इनकी विशेषताएँ क्या है-
गीत-
स्वर+लय/ताल + भाव + रस – दर्शक वैकल्पिक ।
लोक गाथा -
स्वर+लय/ताल + संवाद गीत + अभिनय + भाव +रस- वर्णात्मक -
दर्शक अनिवार्य ।
नृत्य –लय/ताल + भाव – मुद्रा + अभिनय + रस -दर्शक अनिवार्य ।
नाट्य – संवाद + अभिनय> रस - दर्शक अनिवार्य । नृत्य, गीत वैकल्पिक, लेकिन लोकनाट्यों के लिए अनिवार्य ।
भारत
के लोकनाट्योंकी निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती है-
-नाटक प्राय: मौखिक परम्परा में तथा लेखक
अज्ञात होता है, अपवाद के रूप में माच,
जात्रा, नौटंकी तथा तमाशा आदि लोकनाट्यों में लेखक/नाटकार का
नाम ज्ञात होता है।
- अधिकांश लोकनाट्यों के कथानक पौराणिक, आख्यान मूलक तथा लोक कथा/गाथाओं पर आधारित होते हैं । जात्रा, तमाशा , नाचा , नटुवा नाच , भवाई तथा शूमांगलीला जैसे लोकनाट्यों ने समयानुकूल समकालीन सामाजिक एवं
राजनीतिक विषयों को भी मंच के माध्यम से प्रस्तुत कियाजाता है ।
- अभिनेता संवाद या गीत याद नहीं करेंगे, बल्कि घटनाओं पर तत्काल आशुरचना करते हैं। नाटक लिखित होने की स्थिति में अभिनेता संवाद और विशेषकर
गीतों का अभ्यास करते हैं ।
- कुछ विशिष्ट लोक नाट्यों (माच, तेरूकुथु, यक्षगान तथा तमाशा आदि) को छोड़कर मंच व्यवस्था/विधानअनौपचारिक होती है। अधिकांश लोकनाट्यों की मंच व्यवस्था मुक्ताकाशीय होती
है।
- मंच आलोक पारंपरिक संसाधनों( गैसबत्ति, पंचलाईट, मशाल )परआधारित होता था । इन दिनों मंच
प्रकाश के आधुनिक उपकरणों का प्रचलन बढ़ा है ।
- रूप सज्जा चरित्रगत तथा भड़कीली होती है।
पहले रूप सज्जा के पारंपरिक संसाधनों (गेरू, लाल मिट्टी ,स्याही , शंख , घोंघा आदि )
प्रयुक्त होता था, जिससे प्रकाश के पारंपरिक संसाधनों में भी
चेहरा निखर उठता था।
- वस्त्र सज्जा चरित्रगत तथा स्थानीय सामाजिक
परिपाटी के अनुरूप होता है। मसलन राजस्थान के ख्याल के राजा पात्र और तेलंगाना के
ओग्गूकथा के राजा पात्र की वेशभूषा वहाँ की संस्कृति के अनुरूप होगी ।
- अभिनय प्राय: शैलीबद्ध रहते हुए भी किसी
सीमा या बंधनों से मुक्त होता है । अभिनेता कहीं भी किसी परिस्थिति में अभिनय या
प्रदर्शन कर सकेगा। अभिनय प्राय: अंचल विशेष के लोकाचार, मानवीय अभिव्यक्ति तथा हाव भाव से प्रेरित होता है ।
- लोकनाट्यों की भाषा सहज, जीवंत तथा समकालीन होती है। अधिकांश लोकनाट्यों
- अंचल विशेष के लोकधुनों और नृत्यों का
समुचित प्रयोग।
-पारम्परिकता
का निर्वाह।
पारंपरिक
नाट्य
पारम्परिकता
का निर्वाह लोक का प्रथम और आवश्यक गुण है। परम्परा से तात्पर्य है वह जो वर्षों
से प्रचलित हो तथा परिवर्तनशील होते हुए भी चिरंजीवी हो। ‘मानव हिन्दी कोश’ में परम्परा के सम्बन्ध में
निम्नलिखित बातें कही गई हैं :
-वह व्यवहार जिसमें पुत्रा, पिता की, वंशज, पूर्वजां की और
नई पीढ़ी वाले पुराने पीढ़ी वालों की देखा-देखी उनके रीति-रिवाज़ों का अनुकरण करते
हैं।
-वह रीति-रिवाज़ जो बड़ों, पूर्वजों या पुरानी पीढ़ी
उनके रीति रिवाज़ों का अनुकरण करते हैं।
-नियम या विधान से भिन्न अथवा अनुलिखित वह
कार्य जो बहुत दिनों से एक ही रूप में होता चला आ रहा है और इसलिए जो सर्वमान्य
हो।(मानव हिन्दी कोश, खण्ड, 3, पृ. 396)
भारतीय
लोक की विशेषता है चिरनवीनता और यह परम्पराधर्मी होने के करण ही संभव है। परम्परा
की चेतन सत्ता के आधार पर नित नए प्रयोग, नए मूल्य
तथा धारणाएँ कायम की जा सकती है। इस प्रकार परम्परा की छाप प्रत्येक युग में
अभिव्यक्ति के पीछे रहती है। प्रत्येक युग में परम्परा को अपनाकर नए प्रयोग किए
जाते रहे हैं। कहने का अर्थ है कि हम अतीत से बंधे तो अवश्य हैं, परन्तु परम्परा का यह अर्थ नहीं है कि हम उसे ढोते चलें। परम्परा तभी
जीवन्त होगी जब हम वर्तमान के साथ उसका समन्वय करें, उसमें
नए प्रयोग करें। और यही प्रयोग प्रत्येक युग से अपना समन्वय स्थापित कर उस युग के
अनुकूल एवं लोक बन जाता है और अनंत काल के लिए जीवित भी। जो परम्परा परिवर्तन का
आकांक्षी नहीं होगी या परम्परा में परिवर्तन की लचक नहीं होगी, तो वह अवरूद्ध होगी और मर जाएगी। इस तरह परम्पराशीलता लोक का प्रथम और आवश्यक
गुण है। जो लोक है,पारम्परिक भी है। अतःलोकनाट्यों को
पारम्परिक नाट्य कहना अधिक समीचीन है ।
भारतीय नाट्यरूपों में कुछ
ऐसे नाट्यरूप हैं, जिनकी परम्परा तो है लेकिन वह
तो लोकनाट्य के दायरे से बाहर है। ऐसे नाट्यरूपों में कुट्टियाट्टम, किरतनिया, यक्षगान तथा अंकिया नाट आदि हैं। इन
नाट्यरूपों को पारम्परिक नाट्य ही कहा जाता है। लोक और पारम्परिक नाट्यरूपों की
धारा को अलग-अलग समझने के लिए अलग से विमर्श की आवश्यकता है।
लोकनाट्यों
का वर्गीकरण
विषय
वस्तु के आधार पर के आधार पर लोकनाट्यों का वर्गीकरण समीचीन नहीं होगा । क्योंकि
प्राय: अधिकांश लोकनाट्यों में सामाजिक, धार्मिक या राजनीतिक विषय शामिल होते हैं। कुछ ऐसे लोकनाट्य है, जिसमें केवल धार्मिक और पौराणिक
विषयवस्तु पर आधारित नाटक प्रस्तुत होते है। लेकिन लोक मंच के प्रयोक्ताओं
ने धार्मिक और पौराणिक विषय के साथ समसामयिक
घटनाओं को जोड़ते से समकालीन बनाया
है।
प्रस्तुति
या प्रदर्शन शैली/शिल्प के आधार पर लोक नाट्यों के दो प्रकार माना जा सकता है-
गीत नाट्य
नृत्य नाट्य
गीत नाट्य
- इस श्रेणी के नाट्य रूपों में गायन की
प्रधानता होती है । अभिनय या भावाभिव्यक्ति संवाद गीतों के माध्यम से प्रस्तुत
होता है ।गीतों के माध्यम से नाटकीय घटना क्रम का वर्णन किया जाता है। नौटंकी , माच ,बिदेसिया ,तमाशा , नाचा , ख्याल आदि इस श्रेणी के नाट्य हैं। माच का
पारंपरिक मंच 12-15 फीट ऊँचा होता था । स्त्री पात्र चेहरे पर किसी प्रकार के
मेकअप नहीं करते । स्त्री की भूमिका कर
रहे पुरुष मूंछे नहीं मुंडवाते । वे चेहरों को होठों तक घूँघट से ढके रहते हैं । इनकी
गायकी राग – रागिनीबद्ध तथा उच्च कोटि की होती है । दर्शक गीतों में
अभिव्यक्त भावों के माध्यम से रस का आनंद लेते हैं। इस श्रेणी के नाट्य रूपों में
नृत्य कथानक या घटना क्रम की माँग के अनुरूप प्रस्तुत होता है।
नृत्य
नाट्य – इस श्रेणी के नाट्य रूपों में भाव, मुद्रा तथाआंगिक चरियों की प्रधानता रहती है । दूसरे शब्दों में अभिनय या
भावाभिव्यक्ति नृत्य तथा आंगिक चरियों के माध्यम से प्रस्तुत होता है ।यक्षगान, छऊ,
तेरूकुथु आदि इस श्रेणी के नाट्य
हैं।इस श्रेणी के नाट्य रूपों के अधिकांश गीत नृत्य का सहयोगी है।
कला
प्रस्तुति का कोई ना कोई प्रयोजन या उद्देश्य होता है । भारतीय लोक नाट्यों के प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन और
अनुष्ठानिक रहा है । लोक नाट्यों की प्रस्तुति किसी सामाजिक समारोह के दौरान या
धार्मिक अनुष्ठानों के अवसर पर होता रहा है।
प्रदर्शन
के उद्देश्य के आधार पर लोकनाट्यों का दो प्रकार माना जा सकता है-
1.
प्रदर्शन मूलक
2.
आनुष्ठानमूलक
प्रदर्शनमूलक
(Per
formative)
प्राचीन भारत के कई ग्रंथों में कलाजीवी समुदाय
का उल्लेख हुआ है । इन कालजीवियों को राजकीय अथवा सामाजिक संरक्षण प्राप्त था। ये कलाजीवी
मनोरंजन के साथ संरक्षक या आश्रयदाता की भावनाओं की तुष्टि भी करता था। बड़े राजकीय
या सामाजिक समारोह में बड़ी संख्या में उपस्थित दर्शकों के बीच ये प्रदर्शन करते थे।
अत:इन कलारूपों में प्रदर्शन के तत्व (मंच, दर्शक, प्रेषणीयता )सुनियोजित रूप से प्राप्त होते हैं ।
आनुष्ठमूलक
(Ritualistic)
भारतीय
तथा यूरोपीय विद्वानों की मान्यता है कि धार्मिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों से
कई नाट्य रूपों का विकास हुआ । सदियों
तक ये नाट्य अनुष्ठान के रूप में प्रस्तुत
होते रहे । ऐसे नाट्य रूपों में प्रदर्शन तत्व का आभाव देखा गया है। आनुष्ठानिक
नाट्यों में मूलत: दर्शक कोई नहीं होता, समारोह स्थल
पर उपस्थित सभी के सभी लोग अनुष्ठान का सहभागी होता है। बिहार का जट – जटिन, महाराष्ट्र का भारूर तथा गोंधल,केरल का तेय्यम आदि
इस श्रेणी के नाट्य हैं । इन नाट्य रूपों ने धीरे –धीरे अपने आनुष्ठानिक स्वरूपों
का त्याग किया है । इनका प्रदर्शनात्मक स्वरूप निखरा है।
नाटकीप्राय
विधा
नाटकीप्राय
अर्थात , नाटक नहीं नाटक जैसा । वह विधा जिसमें नाटक के सभी नहीं बल्कि कुछ तत्व
की उपस्थिति रहती है । वर्तमान परिपेक्ष्य में अभिनय, संवाद, कथोपकथन, दृश्यात्मकता,अभिव्यक्ति
परक तथा प्रदर्शनमूलक नाटक के तत्व अथवा
विशेषताएँ कही जायगी। इनमें से कोई भी एक विशेषता या तत्व की उपस्थिति होने पर वह
कला रूप अथवा विधा नाटकीप्राय कही जाएगी।

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