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Saturday, September 21, 2024

सौंदर्यशास्त्र एवं सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन की अवधारणाएँ- ओम प्रकाश भारती

 

सौंदर्यशास्त्र एवं सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन की अवधारणाएँ- ओम प्रकाश भारती

सौंदर्यशास्त्र मूलत: कलाओं के सिद्धांतों का अध्ययन करता है। सौंदर्यशास्त्र  कलाओं का उद्भव, वर्गीकरण, विशेषताएँ, कला भावना, सृजन की अभिवृति, सृजन प्रक्रिया  तथा कला और मानव के अंत: संबंधों आदि का अध्ययन करता है। यह दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान तथा विज्ञान – से संवद्ध रहते हुये भी स्वतंत्र अध्ययन की शाखा के रूप में स्थापित है। इसे अंग्रेजी में एस्थेटिक्स तथा हिन्दी में सौंदर्यशास्त्र , नंदतिकशास्त्र तथा कलाशास्त्र के नाम से भी जाना जाता है।

एस्थेटिक शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है, जिसका मूल रूप है- atoQnTikos । यही ग्रीक शब्द बाद में ‘Aesthesis’ बनकर उपस्थित हुआ, जिसका अर्थ होता है- ऐंद्रिय सुख की चेतना। तदनंतर इस ‘Aesthesis’ से एस्थेटिक शब्द बना। पाश्चात्य साहित्य में पहले एस्थेटिक शब्द ही प्रचलित

था,‘एस्थेटिक्स नहीं। बाउमगार्तेन ने भी एस्थेटिक शब्द का प्रयोग किया है। बहुत बाद में इस शब्द का बहुबचन रूप एस्थेटिक्स प्रचलित हुआ।[1]




 सौंदर्यशास्त्र के अधिकांश विचारक दर्शनशास्त्र, समाज विज्ञान, मनोविज्ञान, काव्यशास्त्र, साहित्य तथा विज्ञान के अध्येयता रहे हैं। पाश्चात्य देशों में यूनान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस तथा इटली आदि देशों के चिंतकों ने सौंदर्यशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पूर्व के देशों में चीन तथा भारत में कला और सौंदर्य के क्षेत्र में प्राचीन काल से ही विमर्श होते रहे हैं। यूनान के दार्शनिक सुकरात(409 - 399 ई. पू.) प्लेटो (427- 347 ई. पू.) अरस्तु(384 - 322 ई. पू.) प्लॉटिनस(205 - 270 ई. पू.), सिसरो /- सेंट आगस्टीन, सेंट थामस एक्विनास, सेवोनरोला, अल्बर्ट ड्यूरर इटली के दार्शनिक रोशमनी सवार्ती और ममियानी फ्रांस के कला विचारक क्राउसेज, ज्योफ्राय, पिक्टे, एमिएल, थोर, यूजिन विरोन, वैले, गुयान, बेनार्ड रूस के टालस्टाय, जेलिन्स्की, मैजकोफ  जर्मनी के बामगार्टन, काण्ट(1724- 1804 ई.) , हेगेल (1770- 1831 ई.), शापेनहावर(1788- 1862 ई.), शेलिंग  (1775- 1854 ई.) , विंकिलमन (1717- 1768 ई.), लेसिंग (1729- 1781 ई.), नित्से (1844- 1900 ई.), शिलर (1759- 1805 ई.) ब्रिटेन के थामस रीड ,ह्यूम (1711- 76 ई.), रस्किन (1819- 1900 ई.) आदि चिंतकों ने सौंदर्य और कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत में कला तथा सौंदर्य चिंतन की समृद्ध तथा प्राचीन  परंपरा रही है । इस लिहाज़ से भरत मुनि विरचित नाट्यशास्त्र महत्वपूर्ण ग्रंथ है। वहाँ भले ही सौंदर्य शास्त्र जैसे शब्द गौण है,

लेकिन सौंदर्य शास्त्र की परिधि में आने वाले विभिन्न तत्वों का विवेचन किया गया है।  भारत में लम्बे समय तक काव्यशास्त्र  तथा दर्शनशास्त्र के अंतरगर्त सौंदर्य शास्त्रीय विमर्श होता रहा। आधुनिक काल में  के. सी. पाण्डेय, आनंद कुमार स्वामी, हरद्वारी लाल शर्मा, कुमार विमलतथा  रमेश कुंतल मेघ  आदि विद्वानों ने सौंदर्य शास्त्र को स्वतंत्र विषय के रूप स्थापित करने के महत्वपूर्ण प्रयास किए। 

हिन्दी में सौंदर्यशास्त्र शब्द कब प्रचालित हुआ यह ठीक - ठीक ज्ञात नहीं है। पाश्चात्य सौंदर्य शास्त्र की नींव डालने का वास्तविक श्रेय यूनानी दार्शनिक अरस्तू (384 - 322 ई. पू.) को है। यूरोप में एस्थेटिक्स शब्द के प्रचलन का श्रेय जर्मन दार्शनिक एलेक्जेंडर बाउमगार्टेन(1714-1762) को है । उसे एस्थेटिक्स आधुनिक का जनक  माना जाता है। भारत में सौंदर्य शास्त्र के  अध्ययन  आरंभ एस्थेटिक्स के परिपेक्ष्य में ही हुआ।

सौंदर्य (ब्युटि) की अनुभूति तथा विशेषताओं के संबंध में दिये गए अभिमतों को सौंदर्यशास्त्र (एस्थेटिक्स) अध्ययन की परिधि तथा क्षेत्र से जोड़ देने से, भ्रांतियाँ होती रही है।

सौंदर्य कला की अवस्था, गुण तथा तत्व है, जबकि सौंदर्यशास्त्र (एस्थेटिक्स) ज्ञान और अध्ययन की एक शाखा अथवा विषय है। पाश्चात्य तथा भारतीय विद्वानों ने एस्थेटिक्स अथवा सौंदयशास्त्र के अध्ययन की परिधि का निर्धारण करते हुए अर्थगत एवं विषयगत परिभाषाएं प्रस्तुत की हैं। यहाँ हम केवल सौंदर्यशास्त्र (एस्थेटिक्स) के अध्ययन की परिधि तथा क्षेत्र के संबंधों में व्यक्त विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं:

 

 पाश्चात्य विचारक

एस्थेटिक्स (सौंदर्यशास्त्र) संवेग तथा ऐंद्रिय अनुभूतियों का विज्ञान है।[2] - बाउमगाटर्न

एस्थेटिक्स (सौंदर्यशास्त्र) ललित कलाओं का दर्शन है।[3] - हीगेल

एस्थेटिक्स (सौंदर्यशास्त्र) अभिव्यक्ति परक /अभिव्यंजनात्म्क क्रियाओं का विज्ञान है ।[4] -क्रोचे

एस्थेटिक्स (सौंदर्यशास्त्र) ललित कलाओं के दार्शनिक विकल्पों और समस्याओं का सैद्धांतिक निरूपण है।[5] - लैंगर

सौंदर्यशास्त्र सुंदर का दर्शन है।[6] - बोसांके

 

भारतीय विचारक

 

सौंदर्यशास्त्र कला में अभिव्यक्त सौंदर्य का विज्ञान है।[7] - के. एस. रमा शास्त्री

सौंदर्यशास्त्र ललित कलाओं का विज्ञान और दर्शन है। [8] - के. सी. पाण्डेय

इसका संबंध सैद्धांतिक विवेचन से है अर्थात कला में  निहित सौंदर्य की प्रकृति, मूल तत्व, आस्वाद, प्रयोजन और उपादान आदि का सैद्धांतिक अवधारणा मूलक विवेचन ही इसकी विषय परिधि में आता है, यह कला समीक्षा नहीं है, बल्कि कला के मौलिक सिद्धांतों की ही संहिता है।[9]- डॉ. नगेंद्र

सौंदर्यशास्त्र का संबंध ललित कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त सौंदर्य के साथ है, अन्य माध्यम से अभिव्यक्त सौंदर्य के साथ नहीं । इस तरह सौंदर्यशास्त्र ललित कलाओं के दार्शनिक विकल्पों और समस्याओं का सैद्धांतिक निरूपण है, क्योंकि कला जगत की दार्शनिक समस्याएँ प्राय: सौंदर्य, आस्वाद ,संवेग ,पुन प्रत्यक्ष इत्यादि से ही संबद्ध रहती है।[10]

उपरोक्त परिभाषाओं में भारतीय विद्वानों की व्याख्या में कोई नवीनता नहीं है। इन परिभाषाओं के आलावा भी सौंदर्यशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र को व्याख्यायित की गई है। लम्बे समय तक यह दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान तथा काव्यशास्त्र  की अध्ययन शाखा रही है। कुमार विमल ने यहाँ तक कहा है कि  दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान ने सौंदर्यशास्त्र के स्वतंत्र व्यक्तित्व को अपहृत करने कि कोशिश की है।[11] मुझे लगता है कि इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि सौंदर्यशास्त्र का अध्ययन दर्शनशास्त्र अथवा मनोविज्ञान संकाय के अध्येयता करें। संवेग, अभिव्यक्ति तथा उद्देश्य(तत्व) सृजन, कला अथवा सौंदर्य का विशिष्ट गुण या तत्व है। इन विषयों पर दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान का दखल रहा है। अत: कलाओं के सौंदर्य शास्त्रीय विश्लेषण में  दर्शनशास्त्रीय  और मनोवैज्ञानिक दृष्टि को अलग रखना समीचीन नहीं होगा।

सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन की  परिधि तथा  रूपरेखा तय करने से पहले हम सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन के विकास क्रम तथा संवद्ध विषय से इसके अंत:संबंधों पर प्रकाश डालेंगे।

प्राचीन यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक थैलीज, पाइथागोरस, अरस्तु, प्लेटो तथा  सुकरात आदि दार्शनिकों ने कला और सौंदर्य विषय पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए।  मूल रूप से यह सभी दार्शनिक थे, अतः इनका चिंतन भी दर्शन से प्रभावित था। इन्होंने सौंदर्य के केंद्र में तत्व चिंतन तथा ऐन्द्रीय बोध को रखा । यूनान में दार्शनिकों के अलावा कवियों का एक वर्ग था, जिन्होंने कला और सौंदर्य पर चिंतन किया।  कवि और दार्शनिक दोनों ही स्वयं को प्रज्ञा अर्थात ज्ञान का स्रोत मानते थे।  कवियों का मानना था कि काव्य का प्रभाव मानव हृदय पर अत्यधिक पड़ता है, अतः वह काव्यों  के माध्यम से मानव को तथा उसकी चेतना को अधिक प्रभावित कर सकता है। दार्शनिक वस्तुगत यथार्थ और ऐन्द्रीय संवेदनाओं पर अधिक बल देते थे। उनका दावा था वस्तुगत यथार्थ के अनुभव से मानव में चेतना का विकास होता है। अत: दार्शनिक और कवि एक दूसरे से अपने को श्रेष्ठ मानते थे। यूनान में पदार्थों को सुसंगत देखने की प्रवृत्ति विद्यमान थी। यूनानी समाज कला और सौंदर्य के प्रति विशेष सजग थे। यूनानी कलाओं में कल्पना एवं प्रज्ञा का सुंदर समन्वय हुआ है। यूनानी लोग बौद्धिक चिंतन में भी आनंदित होते थे। सौंदर्य के  प्रति सजगता से यूनानियों का धार्मिक जीवन भी प्रभावित था। वहां के कलाकारों ने देवता तथा देवियों का अंकन-चित्रण सामाजिक अभिरुचि तथा  कल्पनाओं के अनुरूप किया। प्राचीन यूनान में सौंदर्य प्रतियोगिताएं होती थीं, जिसमें स्त्री और पुरुष उत्साह के साथ भाग लेते थे। यूनानी कला और सौंदर्य में ऐश्वर्य तथा शौर्य की प्रतिछाया देखी जा सकती है।

13वीं सदी के प्रख्यात चिंतक दांते ने कहा कि वास्तविक सौंदर्य की अनुभूति आध्यात्मिक स्तर से ही की जा सकती है । प्लेटो ने पहले ही कह दिया था कि ललित उत्तेजनाओं को सींचती है तथा कविता एवं चित्रकला अपनी असत्य कल्पनाशीलता के कारण सत्य और ईश्वर से कोसो दूर होता है।  मध्यकालीन यूरोप सौंदर्य चिंतन के प्रति उदासीन रहा। इसका सबसे प्रमुख कारण था चर्च का नैतिक प्रतिबंध। चर्च ने ललित कलाओं को निकृष्ठ कहा। उनके लिए ईश्वर से बढ़कर कोई सत्य और पवित्र नहीं है। आगस्टाइन जैसे संत ने रंगमंच की निंदा की । कई विद्वानों ने सौंदर्य शास्त्र का इतिहास लिखते समय मध्य युग को छोड़ सीधे आधुनिक काल में आ जाते हैं। 

अठारहवीं सदी के मध्य कला तथा  सौंदर्य चिंतन के क्षेत्र में  बाउमगार्टेन का  पदार्पण क्रांतिकारी सिद्ध हुआ। उन्होंने कला विवेचन के लिये स्वतंत्र विषय एस्थेटिक का सुझाव दिया, जो आगे चलकर एस्थेटिक्स और भारतीय भाषाओं में सौंदर्यशास्त्र के नाम से रूढ़ हुआ। बाउमगार्टेन दार्शनिक था । उसने एस्थेटिक को ऐन्द्रिय  ज्ञान का विज्ञान कहा। वैचारिक स्तर पर बाउमगार्टेन पूर्ववर्ती परंपराओं का ऋणी था। जहां उसके  पूर्व के दार्शनिकों ने कला और सौंदर्य के लिए ऐन्द्रीय संवेदनाओं को महत्वपूर्ण बताया था। बाउमगार्टेन का योगदान यह था कि अब तक जो कला विमर्श दर्शनशास्त्र के अंतर्गत हो रहा था उसके लिये उन्होंने एक स्वतंत्र विषय एस्थेटिक को स्थापित किया। कलाओं का क्रमबद्ध विवेचन किया। एस्थेटिक्स अथवा सौंदर्यशास्त्र की अर्थवान परिभाषा दी। इसीलिए बाउमगार्टेन को आधुनिक सौंदर्यशास्त्र का जनक कहा जाता है। बाउमगार्टेन के बाद कांट ने संवेदनाओं के दार्शनिक विवेचन को सौंदर्यशास्त्र  कहा। सौंदर्यशास्त्र के क्षेत्र निर्धारण में हीगेल की भूमिका क्रांतिकारी है। हीगेल ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ द फिलॉसफी ऑफ फाइन आर्ट की

 

भूमिका में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा कि सौंदर्यशास्त्र ललित कलाओं का दर्शन है। सौंदर्यशास्त्र का संबंध ललित कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त सौंदर्य के साथ है ना कि अन्य माध्यमों से अभिव्यक्त सौंदर्य के साथ। हीगेल से पूर्व सौंदर्यशास्त्र को संवेग या ऐंद्रिय अनुभूतियों का विज्ञान माना जाता था। इस प्रकार हीगेल ने कलाओं में निहित सामान्य आधारभूत तत्वों के दर्शन के रूप में सौंदर्यशास्त्र का अर्थ निर्धारण का समर्थ प्रयास किया। हीगेल का यह सिद्धांत दीर्घजीवी रहा। हीगेल के पश्चात क्रोचे ने सौंदर्यशास्त्र को स्वतंत्र संपूर्ण विचार प्रणाली के रूप में प्रतिष्ठित किया।

क्रोचे के अनुसार ऐस्थेटिक्स कल्पनात्मक क्रियाओं अथवा अभिव्यक्तियों  का विज्ञान है, उन्होंने यह भी कहा कि सौंदर्य शास्त्र का संबंध मानवीय कल्पना आधारित प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति से  है । ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में हीगल के परवर्ती विद्वान लैंगर ने पूर्व की सभी परिभाषाओं को भ्रामक बताते हुए कहां कि सौंदर्यशास्त्र ललित कलाओं के दार्शनिक विकल्पों और समस्याओं का सैद्धांतिक निरूपण है। उसके अनुसार आस्वाद, सौंदर्य या अभिव्यक्ति की दार्शनिक खोजबीन को हम विज्ञान नहीं कह सकते ।

फ्रांस और इंग्लैंड में अनुभवजन्य और प्रकृतिवादी दृष्टि का प्रभाव रहा।  किंतु कांट के आदर्शवाद ने अनुभाविक दृष्टि को दबा दिया और कला तथा सौंदर्य की दृष्टि बहुत कुछ अध्यात्मिक और अतींद्रिय हो गई । टेन  ने विकास वादी विचारधारा को कला शैलियों के अध्ययन के लिए प्रस्तावित किया, किंतु उनका मत भी दीर्घायु नहीं हो सका। फैचनर ने सौंदर्यशास्त्र का संबंध मनोविज्ञान या प्रयोगात्मक अनुभवों से जोड़कर सौंदर्य शास्त्र की नई व्याख्या प्रस्तुत की। सौंदर्यात्मक अनुभूति के रूप में भी सौंदर्यशास्त्र के लक्षण और प्रणालियां विकसित हुई, इसमें कला

 

का स्थान गौण रहा और अनुभूति प्रदान हो गया।  कालांतर में यह केवल सौंदर्य का दर्शन ही नहीं हुआ अपितु अनुभाविक मनोविज्ञान और कलात्मक सर्जना का समाजशास्त्र भी हो गया। इस नए सिद्धान्त को  प्रायोगिक सौंदर्यशास्त्र कहा गया । इसके सूत्रपात का श्रेय फेचनर को है।  बाद में वैलेंटाइन एडवर्ड ब्लू जैसे मनोवैज्ञानिकों ने प्रयोगात्मक सौंदर्यशास्त्र को विकसित किया। फ्राइड और कार्ल जुंग के मनोविश्लेषण के आधार पर सौंदर्यशास्त्र को कई लोगों ने व्याख्यायित  किया। सौंदर्यशास्त्र के अध्ययन के क्षेत्र में  सामानुभूति का सिद्धांत बीसवीं शताब्दी का नया प्रयोग था।  इस सिद्धांत के पुरोधा विश्चर थे। बाद में लिप्स ने इसे और अधिक विकसित किया। इनके सिद्धांतों के आधार पर गेस्टाल्ट ने मनोविज्ञान सौंदर्यशास्त्र के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

          जर्मन विद्वान मैक्स डेजायर ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में सौंदर्यशास्त्र सौंदर्य का दर्शन है तथा कला की सामान्य विज्ञान का सिद्धांत प्रस्तुत किया। लेकिन यह सिद्धांत भी जर्मनी के बाहर लोकप्रिय नहीं हो सका। मार्क्सवादी विचारधारा में सौंदर्यशास्त्र के अंतर्गत सामाजिक आर्थिक विकास के ऐतिहासिक संदर्भ में सौंदर्य बोध का अध्ययन किया जाता है।

भारत सहित पूर्वी देशों में सौंदर्य चिंतन की परंपरा सौंदर्य तथा कला चिंतन की परंपरा प्राचीन काल से ही रही। लेकिन जिस आधुनिक सौंदर्यशास्त्र का प्रवर्तन और व्याख्या 18 वीं शताब्दी में बाउमगार्ट्न और बाद में हीगेल तथा क्रोचे ने किया था उसी दृष्टिकोण से पूर्वी देशों में सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आरंभ हुआ। भारत में आधुनिक सौंदर्यशास्त्र के अध्येयता मूलत: दर्शन और काव्यशास्त्र के विद्वान थे। कला प्रयोक्ता और चिंतक इस क्षेत्र में या इस अध्ययन के प्रति उदासीन रहे।  भारतीय परंपरा में भरतमुनि ने  नाट्यशास्त्र के माध्यम से

कला और सौंदर्य की जो व्याख्या प्रस्तुत की है, वह आज भी भारतीय कला और सौंदर्य के  चिंतन के  केंद्र में है और प्रासांगिक भी।

भारतीय परंपरा में भरत के परवर्ती मम्मट ने सौंदर्य और कला में आनंद तथा रस की अवधारणा प्रस्तुत की।  भारत से पूर्व ऋग्वेद, उपनिषद, पुराण, शैवागमों, बौद्ध तथा जैन ग्रंथों में कला और सौंदर्य से संबंधित विमर्श प्राप्त होते हैं। भरत के परवर्ती विद्वानों में मम्मट, अभिनव गुप्त तथा क्षेमेंद्र ने कला और काव्य को लेकर जो विमर्श किए, उसे भारतीय सौंदर्यशास्त्र का बीज रूप कहा जा सकता है।  भारतीय काव्य अथवा कला आलोचना में तीन प्रमुख सिद्धांतों यथा; रस सिद्धांत, ध्वनि सिद्धांत और औचित्य सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया है। इनमे औचित्य सिद्धांत ही कला विचार तथा सौंदर्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। शेष दो काव्य आलोचना के लिए उपयुक्त है। यहाँ याद रहे कि नाटक को भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने काव्य के अंतर्गत रखा है। औचित्य सिद्धांत के प्रवर्तक क्षेमेन्द्र तथा परवर्ती व्याख्याकार भोज थे।

भोज ने औचित्य के निम्नलिखित प्रकारों का निरूपण किया है[12]-

-        विषयौचित्य 

-        वाच्यौचित्य 

-        देशौचित्य 

-        समयौचित्य 

-        वक्तृ –विषयौचित

-        अथौचित्य 

भारतीय विद्वानों ने रस सिद्धांत से भी बढ़कर औचित्य विचार को महत्व दिया। इसे भारतीय सौंदर्यशास्त्र का वह आधार सूत्र कहा गया जो सभी ललित कलाओं पर सामान्य रूप से समान रूप से लागू हो सकता है। क्षेमेंद्र ने औचित्य की महत्ता को निरूपित करते हुए बार-बार कहना चाहा कि  औचित्य ही रस का प्राण है।  

भारत में विचारकों का एक वर्ग सौंदर्यशास्त्र को काव्यशास्त्र, अलंकारशास्त्र। साहित्यशास्त्र या साहित्य विद्या का पर्याय मानता है। किंतु ऐसा मानना दूसरे खेमों के विचारकों की दृष्टि में अनुचित है, क्योंकि काव्यशास्त्र केवल काव्यों का अध्ययन करता है और उसके अध्ययन की सीमा केवल रस, छंद, अलंकार  तक सीमित है, जबकि सौंदर्यशास्त्र सभी ललित कलाओं का शास्त्र है, उसकी सीमा काव्य के साथ  स्थापत्य, मूर्ति, चित्र और संगीत तक फैली हुई है।[13] काव्यशास्त्र को सौंदर्यशास्त्र की शाखा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। काव्यशास्त्र रस विवेचन शब्द शक्ति जैसे अलंकार आदि विषयों पर गहन चिंतन करता है जबकि सौंदर्यशास्त्र में ललित कलाओं के सूक्ष्म तात्विक सिद्धांत तथा परिकल्पना पर विशेष बल दिया जाता है। डॉ विमल कुमार विमल के अनुसार सौंदर्यशास्त्र काव्यशास्त्र का ही विकसित और कला-चैतन्य से समन्वित रूप है।[14] एस. के. दे.  के अनुसार सौंदर्य शास्त्र में जिस दार्शनिक निरूपण की प्रधानता रहती है वह काव्यशास्त्र में नहीं।[15] डॉक्टर के. सी पांडे का मत है भारतीय काव्यशास्त्र में पाश्चात्य सौंदर्य शास्त्र की तरह विवेचन की प्रवृत्ति नहीं है।

 

इस प्रकार आधुनिक भारतीय कला विचारकों ने काव्यशास्त्र और सौंदर्य शास्त्र को पृथक माना है।  

पाश्चात्य आलोचकों ने भी निधि काव्यशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र को पृथक माना है।  वेबस्टर न्यू वर्ल्ड डिक्शनरी के अनुसार पोईटिक्स आलोचना शास्त्र की वह शाखा है, जो काव्य की प्रकृति और  विधानाओं को विवेचित करती है। सैंटसबरी  की दृष्टि में सौंदर्यशास्त्र और काव्यशास्त्र में अंतर है, दोनों को एक कर देने से आलोचनाशास्त्र का निर्णय पक्ष धूमिल पड़ जाएगा।  जॉर्ज संतायना के अनुसार सौंदर्य शास्त्र और काव्यशास्त्र में यह अंतर है काव्यशास्त्रीय आलोचना में निर्णय की प्रधानता रहती है , जबकि सौंदर्य शास्त्रीय अध्ययन में प्रत्यक्षीकरण को प्राथमिकता दी जाती है।

इसप्रकार भारतीय तथा पाश्चात्य ने सौंदर्यशास्त्र को काव्यशास्त्र से पृथक तथा स्वतंत्र विषय माना है।

निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि  काव्यशास्त्र में रस विवेचन, शब्द शक्ति विश्लेषण इत्यादि के कुछ ही प्रसंगों में सूक्ष्म तात्विक सिद्धांत परिकल्पना की आवश्यकता पड़ती है, जबकि सौंदर्य शास्त्र ललित कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त सौंदर्य तथा दार्शनिक विकल्पों और समस्याओं का सैद्धांतिक निरूपण और विश्लेषण करता है। काव्यशास्त्र कब देने काव्य मैं अभिव्यक्त सौंदर्य का अध्ययन करता है । काव्य सृजन प्रक्रिया रचना में प्रयुक्त भाव कल्पना शैली प्रभाव आदि का अध्ययन करता है जबकि सौंदर्यशास्त्र ललित कलाओं का सैद्धांतिक निरूपण करते हुए कला का अर्थ परिभाषा वर्गीकरण स्वरूप सौंदर्य सौंदर्य की अनुभूति आस्वाद प्रक्रिया उसका स्वरूप कलाकृति का वस्तु रूप सौंदर्य के तत्व सृजन प्रेरणा प्रतिभा सृजन प्रक्रिया आदि का विशद अध्ययन प्रस्तुत करता  है।

 

बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक सौंदर्य शास्त्र के अध्ययन का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत हो चुका था। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका(Encyclopedia Britannica)[16]  में सौंदर्यशास्त्र की परिधि तथा अध्ययन क्षेत्र को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया गया -

1.    कलाओं का विधिवत वर्गीकरण और उनके अंतःसंबंधों का अध्ययन।

2.    सौंदर्य-रूप-विज्ञान अर्थात विभिन्न कलाओं की रचना व शैली का विस्तृत अध्ययन।

3.    कला के ऐतिहासिक सिद्धांत (कला का विकास) दिशा, विचार, मुख्य प्रवृत्तियां, रूप, कला के विविध शैलियों पर सामयिक प्रभाव व कारण, कला का अन्य सांस्कृतिक तत्वों से संबंध आदि।

डॉ. कुमार विमल ने सौंदर्य शास्त्र के तत्वों का निर्धारण करते हुए सौंदर्यशास्त्र का अध्ययन 'सौंदर्य', 'कल्पना', 'बिंबऔर 'प्रतीक' इन चार अभिधानों के अंतर्गत किया है। डॉ. एस .एन. घोषाल ने एलिमेंट्स आफ एसथेटिक्स (Elements of Aesthetics)  के अंतर्गत सौंदर्य तत्वों का विभाजन चार भागों में इस प्रकार किया है- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक, कलात्मक, दार्शनिक तथा काव्यात्मक।[17]

इस प्रकार अलग –अलग समय /काल में विद्वानों ने सौंदर्य शास्त्र की  युगानुकूल परिभाषाएं और व्यख्याएँ प्रस्तुत की। जिस युग में जिस विचार या विषय की प्रधानता रही, सौंदर्य शास्त्र को उस विषय से जोड़कर उसकी व्याख्या की गयी । एक प्रकार से इस विश्लेषण में हमें विचारों का

 

कालक्रमिक रूपरेखा मिलती है। प्राचीन यूनान में कवि और दार्शनिकों का बोलबाला था, अत: सौंदर्य की व्याख्या में काव्य तथा दर्शन शास्त्रीय विचारों की प्रधानता रही। मध्यकालीन योरोप की ईसाई धर्मांधता का प्रभाव उस युग के सौंदर्यशास्त्रीय विश्लेषण में परिलक्षित होता है। आधुनिक काल में विज्ञान, दर्शन, इतिहास तथा मनोविज्ञान तथा ज्ञान के कई विषयों की पुनरव्याख्या की गयी। इन सभी का प्रभाव तत्कालीन सौंदर्यशास्त्रीय विश्लेषण पर पड़ा। भारतीय संदर्भ में कला और सौंदर्य के चिंतन के लिए भरत का  लोकिक और समन्वयवादी विचार तथा क्षेमेन्द्र और भोज का औचित्य सिद्धांत उन तमाम उलझनों को सुलझाने का सूत्र जो आज तक बना हुआ है-  कि सौंदर्य शास्त्र को कहाँ जाना है- दर्शनशास्त्र, काव्यशास्त्र, अलंकार शास्त्र, साहित्यशास्त्र या कलाशास्त्र के साथ। लेकिन जो हो आज स्वतंत्र विषय के रूप में सौंदर्यशास्त्र को मान्यता मिल चुकी है। और इसकी अवश्यकता भी है, खासकर लोक और  जनजातीय कलाओं  के संदर्भ में जहाँ सृजन की अभिवृति तथा प्रक्रिया का वह सूत्र मौजूद हैं,  जिसकी  सहायता से कला और मानव जीवन के अंत:संबंध को उद्घघाटित किया जा सकेगा। निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि सौंदर्यशास्त्र मूलत: कलाओं के सिद्धांतों का अध्ययन करता है। इसके अंतर्गत कलाओं का उद्भव, वर्गीकरण, विशेषताएँ, कला भावना, सृजन की अभिवृति, कलाकृतियाँ  तथा कला और मानव के अंत: संबंधों का आदि का अध्ययन किया जाता है।

प्रस्तुत शोध में जनजातीय तथा लोक कलाओं का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन सौंदर्यशास्त्र  के  प्रमुख तत्वों यथा; 'सौंदर्य', 'कल्पना', 'बिंबऔर 'प्रतीक' इन चार अभिधानों के अंतर्गत किया जाएगा।  

 

 

 



[1]डॉ. कुमार विमल(2015), सौंदर्यशास्त्र के तत्व, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 27

[2] चतुर्वेदी ,ममता , सौंदर्यशास्त्र , पृ. 93

[3] G.W.F. Hegel: The Philosophy of Fine Arts, vol 1, Translated by F. P.B. Osmaston, G. Bell and Sons, London,1920,p.2

[4] Bendetto Croce, Aesthetic: translated by Douglas Ainslie, Vision Press, Petter Owen , London,1953, p.155

[5] Susanne K. Langer, Feeling And Form: Routledge and Kegan Paul, London,1953 p. 12

[6] BOSANKE , History of Aesthetics, p. 2 

[7] K.S. Rama Sastri, Indian Aesthetic, Srirangam, sri Vani Vilas Press ,1928 , p. 1

[8]  Pandey, K.C. , Comprarative Aesthetics , Volume1 , The Chowkhambha Sanskrit Series , Banaras, 1950, p . XV

[9]भारतीय सौंदर्य शास्त्र की भूमिका, पृष्ठ संख्या - 3

[10] सौंदर्यशास्त्र के तत्व- डॉ. कुमार विमल , पृ सं - 42-43

[11] वही , पृ. सं. 28

[12] भोज शृंगार प्रकाश (खंड एग्यारह )

[13] V. Raghavan, Some Concept of  the Alankar Sastra, p. 263

[14] कुमार विमल सौंदर्य शास्त्र के तत्व, पृ . 39 

[15] S. K. De, History of Sanskrit Poetics , Calcutta,1960, p.2

[16]Encyclopaedia Britannica,Vol. I, Page 222

[17] Elements of  Indian Aesthetics, Chapter II, Page - 14

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