कला – अर्थ, परिभाषा, वर्गीकरण, विशेषताएँ
– भारतीय एवं पाश्चात्य
कला
का शाब्दिक अर्थ सुंदर, कोमल, मधुर और सुखद माना जाता है । बृहत अर्थों में कला को
अनुकरण,
अभिवव्यंजना, कौशल, संयोजन, सौंदर्य आदि
कहा गया है ।
भारतीय
चिंतन परंपरा में कला का प्रयोग ललित कला के व्यापक अर्थों में किया जाता है, जिसमें संगीतकला, मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला
तथा काव्यकला को शामिल किया जाता रहा है। नृत्य को संगीत के अंतर्गत परिगणित किया
गया है । पाश्चात्य विचारकों ने पाँच
कलाएँ स्वीकार की है- स्थापत्य, मूर्ति ,चित्र, संगीत तथा
काव्य। भारतीय तथा पाश्चात्य विचारकों ने नाट्यकला को काव्य के अंतर्गत ही
रखा है।
भारतीय
परंपरा में पहली बार ऋग्वेद (1500 ई. पू.) में कला शब्द का उल्लेख हुआ है।[1]
उपनिषदों में भी ‘कला’ शब्द का प्रयोग हुआ है,
यथा; प्राचीविक कला, दक्षिणाविक कला, उदीची टिककला। इसके अतिरिक्त ललित विस्तर में 86,
वात्स्यायन के कामसूत्र में 64, शुक्रनीति में 64, प्रबंधकोष में 72, क्षेमेन्द्र के कला विलास में
जनोपयोगी 64, सुनार की 64 , वेश्या की
64 तथा कायस्थ की 16 कलाओं का उल्लेख हुआ है। कला विवेचन के दृष्टिकोण कालिकापुराण तथा विष्णुधर्मेतर पुराण भी उल्लेखनीय है।
मार्कण्डेय
मुनि द्वारा रचित विष्णुधर्मेतर पुराण में कला को धर्म, अर्थ और मोक्ष का दाता कहा गया है।[2] पाश्चात्य में यूनानी दर्शनशास्त्र के पिता
थेलीज़ (640 ई. पू. - 547ई. पू .) को कला
का पहला चिंतक कहा जा सकता है। उनके विचारों में कला और सौंदर्य पर विमर्श किया
गया है । कला विवेचन के संदर्भ में निम्नलिखित तीन शब्दों के बीच के अंतरों को
स्पष्ट रूप से समझ लेना अवश्यक है- कला, शिल्प तथा विद्या
कला
एवं शिल्प
कला
की व्याख्या के संदर्भ में ‘कला’ शब्द
के अर्थ विकास को जानना आवश्यक होगा। 'कला' शब्द की उत्पत्ति कल् धातु में अच् तथा टापू प्रत्यय लगाने से हुई है
(कल्+अच्+टापू), जिसके कई अर्थ हैं—शोभा, अलंकरण, किसी वस्तु का
छोटा अंश या चन्द्रमा का सोलहवां अंश आदि। कुछ
विद्वानों ने कला शब्द की व्याख्या क + ल = कला । और फिर ‘क’ से अभिप्रेत है – कामदेव, आनंद, सौंदर्य, हर्ष, तथा ‘ला’ से अभिप्रेत है , देना।
अर्थात सौंदर्य, आनंद तथा हर्ष प्रदान करने वाली विधा कला
है। प्राचीन भारतीय लक्षण ग्रंथों के अनुसार किसी कार्य को कौशल या निपुणता से
करना कला है। संस्कृत शब्दकोश में कला शब्द का अर्थ है- प्रेरित करना,आगे बढ़ाना,उत्साहित करना ,
कार्य में
लगना
, निर्मित करना,रचना,बनाना ,स्थापित करना ,गिनना ठीक करना तथा महत्व देना आदि ।[3]
अंग्रेजी
भाषा में कला शब्द का पर्याय आर्ट (Art) है, जिसका प्रचलन तेरहवीं में हुआ । आर्ट शब्द प्राचीन लैटिन के ‘आर्स’ शब्द से विकसित है,
जिसका अर्थ है- कौशल अथवा शिल्प है या किसी किसी भी कार्य को ठीक से करना, बनाना, पैदा करना आदि। प्राचीन यूनान और रोम
में ‘आर्ट’ शब्द शिल्प के अर्थ में ही प्रचलित था । ग्रीक में कला का पर्याय ‘TEXVN’, शब्द का प्रचालन था। डॉ. कुमार विमल के अनुसार,
“संभवत: इसे ही प्लेटो ने ‘तेख्ने ’(Techne) कहा है।
तेख्ने का प्रचलित अर्थ शिल्प अथवा कौशल से
था, जिसमे स्वर्णकारी, बढ़ईगिरी,
स्थापत्य तथा सर्जरी आदि शामिल थे। इस तरह शिल्प के लिए कला अथवा ललितकला जैसे
अर्थगरिमापूर्ण शब्द कलांतर में प्रचलित हुआ।[4]
प्राचीन
यूनानी साहित्य की तरह पहले भारत वर्ष में में भी कला ‘शब्द’ का प्रयोग कारीगर, कौशल, या शिल्प के लिए होता था। शिल्प का शाब्दिक अर्थ है, ‘कारीगरी और हुनर।[5]
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार कला से अभिप्रेत कार्यकुशलता और क्षमता है।[6] प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के कई मंडलों में
शिल्पियों का उल्लेख प्राप्त होता है। पाणिनि रचित अष्टाध्यायी (400 ई. पू.) में
शिल्प को दो भागों में विभाजित किया गया है- चारु तथा कारु । अन्य ग्रंथों में भी
कलाकार के अर्थों में शिल्पियों का उल्लेख हुआ है। प्राचीन भारत में शिल्पियों के
चार प्रकार मान्य थे – स्थपति, सूत्रग्राही, वर्धकी तथा तक्षक (मानसार)। तक्षक शिल्पी काष्ठकला , वास्तुकला , मूर्तिकला तथा लौहकला में कुशल होता था
। अन्य सभी शिल्पी वेद शास्त्रों के ज्ञान
में निपुण होते थे। कौषीतकी ब्राह्मण में नृत्य, गीत और
वाद्य को शिल्प कहा गया है– ‘त्रिवृ शिल्पं, नृत्यं, गीतं वादितमिती’।[7] बौद्ध
साहित्य में शिल्प को ही ‘सिप्प’ कहा
गया है। रामायण में राम को वैहारिक शिल्पों(संगीतकला तथा चित्रकला) का ज्ञाता कहा
गया है।[8]
महाभारत के कई प्रसंगों में शिल्पियों की चर्चा की गयी है।[9] एक
अन्य प्रसंग में युधिष्ठिर की दसियों को चौंसठ कला में निपुण कहा गया है।[10]
अष्टाध्यायी के अनुसार नर्तक, गायक ,वादक
जिस नृत्य– संगीत की साधना करते हैं उस ललित कला को भी शिल्प कहा जाता था।[11]
अष्टाध्यायी में शिल्पियों के दो श्रेणियों का उल्लेख हुआ है- ग्राम शिल्पी और राज
शिल्पी। राजशिल्पी को राजकीय संरक्षण प्राप्त था । ग्राम शिल्पी स्वजीवी थे।'पाली ग्रंथ ‘लोकनीति’ में 18
प्रकार के शिल्प गिनाये गये हैं- श्रुति, स्मृति, सांख्य, योग, नीति, वैशेषिक, गंधर्व (संगीत), गणित,
धनुर्वेद, पुराण, चिकित्सा,
इतिहास, ज्योतिष, माया
(जादू), छन्द, हेतुविद्या, मन्त्र (राजनय), और शब्द (व्याकरण)।[12]
इस
प्रकार वैदिक ग्रंथों, रामायण, महाभारत, बौद्ध
ग्रंथों, उपनिषदों तथा अन्य लक्षण ग्रंथों यथा; अर्थशास्त्र , अष्टाध्यायी आदि में उल्लेखित कला और
शिल्पियों की जीविका एवं कार्यक्षेत्रों के अवलोकन के पश्चात कहा जा सकता है कि
ईस्वी पूर्व दूसरी सदी तक शिल्प एवं कला का अन्तर स्पष्ट नहीं हो पाया था।
कालजीवियों को शिल्पी अथवा कलाकार दोनों ही नामों से संज्ञापित किया जाता था। इस
संदर्भ में विद्या एक और शब्द है, जिसको लेकर प्राचीनों के
बीच भ्रम बना रहा।
विद्या
‘विद्यते ज्ञायते अनया’ अथार्त जिसके द्वारा जाना जाय
वह विद्या है। ‘विद्या’ शब्द ‘विद ज्ञाने’ धातु से व्युत्पन्न है। संस्कृत में
जानने के लिए ‘ज्ञा’ धातु का प्रयोग
होता है, जिससे ज्ञान शब्द निष्पन्न हुआ है। अंग्रेजी में ‘नालेज’ (Knowledge), ‘विजडम’ (Wisdom), ‘लोर’
(Lore) शब्द ज्ञान अथवा विद्या का पर्याय है। भारतीय संदर्भ में
विद्या से अभिप्रेत केवल ज्ञान ही नहीं अपितु सत्य, यथार्थ
अथवा तात्विक ज्ञान है। ‘रुद्रहृदयोपनिषद’ के अनुसार विद्या के दो रूप हैं- परा और अपरा ।चारों वेद तथा वेदांग (शिक्षा ,कल्प, व्याकरण ,छंद ,निरुक्त, ज्योतिष)को अपरा विद्या के अंतर्गत रखा गया है। परा विद्या वह है, जिससे आत्म ज्ञान हो, मोक्षदायक हो। महाभारत में
इसे सभी विद्याओं का राजा कहा गया है।
भारतीय
परंपरा में चौदह विद्या स्वीकृत है – चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद ,सामवेद
तथा अथर्व वेद), छ:
वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण , आन्वीक्षिकी, मीमांसा और स्मृति )। राजशेखर ने
काव्य को सकल विद्या में श्रेष्ठ मानते हुए पंद्रहवें
विद्या(सकलविद्यास्थानैकायतनं पञ्चदशं काव्यं विद्यास्थानम) के रूप स्थापित किया
है। कौटिल्य, भार्गव, वृहस्पति और
गोभिल ने तर्क, त्रयी, वार्ता और
अर्थशास्त्र को जोड़ते हुए विद्या की
संख्या 18 माना है। विष्णु पुराण में भी 18 प्रकार के विद्याओं का उल्लेख हुआ है ।
इस
प्रकार वेद (1500 ई.पू.- 500 ई.पू.),उपनिषद(800 ई.पू.-
600 ई.पू.), रामायण (600 ई.पू.),
महाभारत (400 ई.पू.), अष्टाध्यायी(400 ई.पू.), अर्थशास्त्र (300 ई.पू.), कामसूत्र (400 ई.पू.- 200
ई.पू.), मानसार(200 ई.पू.), ललितविस्तर
(300 ई.पू.), शिवसूत्र विमर्शनी
,जयमंगला आदि ग्रंथों के कलासूची में शिल्प और कलाओं को एक रूप में /साथ
प्रस्तुत किया है। शुक्रसारनीति कला और विष्णु पुराण में शिल्प तथा विद्या की अवधारणा बहुत स्पष्ट नहीं
है। इसमें गांधर्व (संगीत) को विद्या के अंतर्गत रखा गया है। राजशेखर ने काव्य को
विद्या के अंतर्गत रखा है।
कला
की परिभाषा
‘भरत के परवर्ती लक्षणकार अभिनवगुप्त ने कला की व्याख्या करते हुए कहा –
कला गीतवाद्यादिकौ, यथा; कला में गीत, वाद्य आदि शामिल है। क्षेमेन्द्र ने ‘शिवसूत्रविमर्शनी
‘में कला को व्यापक अर्थ देते हुए कहा है कि – कलयति स्वरूप
आवेशयति वस्तुनि वा, आथर्त किसी वस्तु के स्वरूप को सुशोभित
या अलंकृत करे वह कला है।
कवि
रवींद्रनाथ टैगोर ने कला की परिभाषा इस प्रकार की है- जो सत है, जो सुन्दर है, वही कला है, कला में मानव स्वयं अपनी अभिव्यक्ति करता है और वस्तु
की नहीं । जैनेंद्र कुमार के अनुसार अनुभूति
की अभिव्यक्ति कला है । आचार्य
रामचंद्र शुक्ल के अनुसार एक ही अनुभूति को दूसरे तक पहुंचा देना ही कला का रहस्य
है । मैथिलीशरण
गुप्त के अनुसार अभिव्यक्ति की शक्ति ही
कला है।
कला
की परिभाषा को हंस कुमार तिवारी ने पाँच श्रेणियों में विभक्त किया है[13]-
-
कला अनुकरण
है ।
-
कला आत्माभिव्यक्ति
है।
-
कला
भावनाओं को दूसरों पर प्रतिष्ठित करने का साधन है।
-
कला
सौंदर्य साधना है।
-
विविध।
हमें
कला की विशेषताओं को परिभाषा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, यहाँ कुछ
विद्वानों के मन्तव्य है जो मूलत: कला की
विशेषताओं को उद्घाटित करता है।
इस प्रकार भारतीय विद्वानों ने प्राचीन काल से ही कला को
परिभाषित करने कि कौशिश कि है । भारतीय विद्वानों के मतों का समन्वय करते हुये
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि कला मानव के उदात्त तथा अनुभूत भावनाओं की
सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है । दूसरे शब्दों में अनुभवजन्य उदात्त मानवीय अभिव्यक्ति
ही कला है।
पाश्चात्य अवधारणा
पाश्चात्य विद्वानों के
अनुसार यूनानी दार्शनिक प्लेटो के अनुसार कला सत्य की अनुकृति है। प्लेटो के शिष्य अरस्तु ने कला की परिभाषा एक
नवीन रूप में प्रस्तुत की है- कला अनुकरणीय है।
सोफियन हावर ने कला को दिव्य
मानकर कला को पवित्रता की अभिव्यक्ति बताया है।
प्रसिद्ध इटालियन मूर्तिकार
एवं चित्रकार माइकल एंजेलो ने कला के महान
कृतियों को दिव्य झलक की छाया कहा है। इटालियन
दार्शनिक विनीत ओकरोन जी ने कहा है कि कला वही है जैसा हर एक उसे जानता है । दूसरे
शब्दों में कहें तो कला ही प्रभाव की अभिव्यक्ति है।
वर्मन ब्लैक के अनुसार
सुंदरता को व्यक्त करना कला है।
टॉलस्टॉय के अनुसार यदि अपने
भावों को क्रिया वर्ण रेखा ध्वनि अथवा शब्द द्वारा इस प्रकार से अभिव्यक्त किया
जाए कि उसके दर्शन से अथवा श्रवण के द्वारा कलाकार के मन में भाव जागृत हो जाए तो
उसको कला से संबोधित किया जाएगा।
सिंगल के अनसार – कला भौतिक
सत्ता को व्यक्त करने का माध्यम है ।
शायद के अनुसार कला दमित वासनाओं का उभरा हुआ
रूप है।
गोते के अनुसार कला की सबसे
बड़ी समस्या यह रहती है कि किस प्रकार महान सत्य की प्रतिकृति प्रस्तुत कर सकें।
वरमोन ब्लेक के अनुसार –
सुंदरता को व्यक्त करना ही कला है।
हीगेल के अनुसार मनुष्यों की
क्रिया की सृष्टि ही कला है ।
टालस्टाय ने कला की व्याख्या करते हुए कहा कि कला मानवीय चेष्टा है, एक मनुष्य
अपनी उन भावनाओं को जिनका कि उसने अपने जीवन में साक्षात्कार किया है ,
ज्ञानपूर्वक कुछ संकेतों द्वारा दूसरों पर प्रकट करता है। उन भावनाओं का दूसरों पर
असर पड़ता है और वे भी उनकी अनुभूति करते हैं।
इस
प्रकार भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने कला को परिभाषित करने की चेष्टा की है ।
उपरोक्त परिभाषाओं के
विश्लेषण के बाद कहा जा सकता है कि कला मानव के उदात्त तथा अनुभूत भावनाओं की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है । अनुकरण, रहस्य, नंदातिक आदि कला कि विशेषताएँ हैं ।
आज जो भारतीय
कला के प्रचलित रूप हैं और जिस तरह से रूढ़
है या समझा जाता है इस दृष्टि से कला का वर्गीकरण निन्म्लिखित प्रकार से किया जा
सकता है-
प्रस्तुति शिल्प एवं उदेश्य/प्रयोजन के आधार पर ,कला दो रूप-
1.
अनुष्ठान मूलक
2.
प्रदर्शन मूलक
कला के
स्वरूपगत विश्लेषण के आधार पर दो प्रकार
हैं-
1. ललित कला – संगीत, नृत्य , नाट्य , चित्र, मूर्ति ।
2. शिल्प कला – वास्तु कला , हस्त शिल्प आदि ।
कला वर्गीकरण की पाश्चात्य
अवधारनाएं
अरस्तु का कहना था कि
जब अनुकरण केवल वस्तु का होता है और साथ ही जीवन में उपयोगी भी होता है वह शिल्प
कला होती है। शिल्प कला में बढ़ईगिरी, वास्तुकला आदि आ जाते हैं। इनमें
मनोभावों अथवा आंतरिक अनुभूतियों का अनुकरण नहीं हो पाता है दूसरा ललित कलाओं में
आंतरिक भावों का अनुकरण होता है जैसे चित्रकला काव्य कला संगीत कला । अरस्तू ने नाट्य कला में भी त्रासदी को सर्वश्रेष्ठ माना है। प्लेटो ने
संगीत कला को।
हीगेल ने कला कि तीन अवस्थाओं को बताया है- प्रतीकात्मक ,शास्त्रीय तथा रोमांटिक ।
हीगेल ने वस्तुकला को प्रतीकात्मक, मूर्ति कला और आंशिक रूप से चित्रकला तथा संगीत ,काव्यकला
तथा चित्रकला को रोमांटिक कला के अंतर्गत रखा । उनके अनुसार प्रतीकात्मक कला में
सौंदर्य अथवा प्रत्यय की अपूर्ण व कलात्मक
अभिव्यक्ति होती है। शास्त्रीय कला में अंतर्वस्तु एवं रूप में समन्वय पाया जाता है, जबकि रोमांसवादी कलाओं में
अभिव्यक्त सौंदर्य के साथ आत्मा के सूक्ष्म तथा सघन अंशों की अभिव्यक्ति होती है ।
अंतत: हीगेल ने कलाओं के दो प्रकार बताए –
उपयोगी तथा ललित कला।
[1] कलां यथा शफं ऋण संनयामसि ।
[2]
कलानां प्रबरं चित्र धर्म कामार्थमोक्षम।
[3]
मोनियर विलियम्स,
पृ 260
[4]
कुमार विमल,
कला विवेचन ,
पृ.
[5]
संस्कृत शब्दार्थ – कौस्तुभ , पृ. 1156
[6]
Art- in its most basic meaning signifies a skill or ability. Voll-2 Page. 484
[7]
कौषीतकी ब्राह्मण ,
29. 5 ।
[8] वैहारिकानां शिल्पनां- रामायण 2. 1.
28।
[9]
शिल्पं यश्वोपजीवित।अनु। 90. 9
[10]
चतुष्षष्ठिविशारदा:। सभा 61. 9 ।
[11]
पाणिनि – अष्टाध्यायी (3।1।146,3। 2। 56,4। 4। 56)।
[12] सुति सम्मुति संख्या च, योगा
नीति विसेसिका । गंधब्बा गणिका चेव, धनुबेदा च पुरणा ॥
तिकिच्छा इतिहासा च,
जोति माया च छन्दति । हेतु मन्ता च सद्दा च, सिप्पाट्ठारसका
इमे ॥
[13]
कला – हंस कुमार तिवारी ,
मानसरोवर प्रकाशन ,
बोध गया,
पृ. 28

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