हिमाचल का लोकनाट्य करियाला- ओम प्रकाश भारती
करियाला हिमाचल प्रदेश का प्रतिनिधि लोकनाट्य है। सिमौर, सोलन तथा शिमला आदि जिले इसके प्रदर्शन के मुख्य क्षेत्र
हैं,
परन्तु किसी न किसी रूप में इसका प्रचलन समूचे पश्चिमी
हिमालय के पहाड़ी अंचलों में है।
सर्दियों में पहाड़
शीत शापित हो जाता है। वर्षभर खेतों में कमरतोड़ मेहनत करने के बाद सर्दियों में
पहाड़ के दिन आराम के होते हैं। इन्हीं दिनों में पहाड़ गीत एवं नृत्यों की ताल पर
थिरक उठते हैं। वैसाखी और दीवाली सर्दी के दिनों के प्रमुख त्योहार है। इसी अवसर
पर करियाला का प्रर्दशन किया जाता है।
करियाला शब्द की कई
व्याख्या मिलती हैं । इनमें से दो की चर्चा की जा सकती है। पहला मत है कि ग्रामीण
लोग देवताओं के सामने दुःख निवारण के लिए
मनौती रखते हैं। मनौती को पहाड़ी भाषा में करेल भी कहा जाता है। इच्छा पूरी होने पर
लोग अपने देवताओं के सामने नाट्य-नृत्य करवाते हैं। चूँकि यह नाट्य देवी, देवताओं की करेल अर्थात मनौती के लिए किया जाता है, इसलिये इस अवसर पर प्रदर्शित नाट्य को करियाला कहा जाता है।
दूसरे मतों में, विद्वानो
ने करियाला या कराला का सम्बन्ध अनेकार्थक संस्कृत शब्द कराल भयानक/डरावना/हरिण
जाति के पशुओं/असुरों-देवों-गंर्ध्वों -किरातों से जोड़ते हुए, इसे आदिम जनजातियों द्वारा प्रदर्शित भयानक (मुखौटाधारी)
नाट्य बताया है। दोनों ही अवधारणाएं करियाला लोकनाट्य से मेल खाती है। लेकिन
प्रदर्शन के रूप तथा विषय अवलोकन करने से पहला मत अधिक समीचीन प्रतीत होता है।
करियाला का उद्भव 11वीं शताब्दी के आस-पास धर्मिक अनुष्ठानों से माना जाता है।
वैष्णव धर्म का इस पर गहरा प्रभाव पड़ा। कालांतर में समसामयिक सामाजिक प्रसंग भी
करियाला मंच के विषय बने। आनुष्ठानिक स्वरुप से परिवर्तित होकर यह सामाजिक
प्रतिरोध का नाट्य बनकर उभरा। इसका वर्तमान स्वरूप लगभग 17वीं शताब्दी के आसपास अस्तित्त्व में आया। करियाला प्रदर्शन
के लिए किसी मंच विशेष की आवश्यकता नहीं होती है। कलाकार प्रकृति के खुले प्रांगण
में प्राय सायंकाल से सुबह तक इसका प्रदर्शन करते हैं। प्रदर्शन स्थल के लिये किसी
जगह (लगभग 10-12 फीट) को
चार खंभे के सहारे रस्सी से चौकोर (वर्गाकार) घेर लिया जाता है। इस चौकोर स्थान को
अखड़ा कहते हैं। प्रकाश के लिये डंडों से तेल के दीये, मशाल या गैसबत्ती आदि लटका दिये जाते हैं। खाड़ा के पास ही
चँदोवा टांग कर कमरानुमा घर या तम्बू तैयार किया जाता है, जिसमें ‘करियालची’ प्रदर्शन
के लिये तैयार होते हैं। इसे ग्रीनरूम कहा जा सकता है। मंच दर्शक तीन ओर से अखाड़ा
को घेरते हुये बैठते हैं। मंच के एक किनारे ‘बजन्तरी’ बैठते हैं। करनाल, रणसिंहा, चिमटा, नगाड़ा, दमामटू, शहनाई, बांसुरी, ढोलक तथा खंजरी आदि करियाला के वाद्ययंत्र हैं। नाट्यारंभ पहले बधाई ताल के साथ पाग
चन्द्रवली या चन्द्रौली, चन्द्ररौली नृत्य करते हुये मंच पर प्रस्तुत होती है। चन्द्रावली नटी है। वह ‘बधाई ताल’ के बाद जंगताल और करियाला ताल पर नृत्य करती है। नृत्य धीरे
धीरे शुरू होकर द्रुतगति में समाप्त होता
है। कभी-कभी तो चन्द्ररौली के साथ मंच पर डांगर कान्हा (कुल्हारीधारी कृष्ण) नाम
का पात्र भी प्रस्तुत होता है। मुख्यखेल आंरभ होने से पहले प्रायः यही मशालों या
दीपों को जलाता है। इस सारी प्रक्रिया को अखाड़ा बाँधना कहा जाता है। इस प्रक्रिया
को पूर्वरंग समझना चाहिए। पूर्वरंग की समाप्ति मंत्रोचारण वंदना या परिक्रमा
द्वारा की जाती है। चन्द्रावली नृत्य करने के पश्चात् ग्रीनरूम में चली जाती है।
अखाड़ा में खामोशी छा जाती है। दर्शक उत्सुकता पूर्वक मंच की ओर एकटक देखने लगते
हैं। इसी क्षण, अचानकदर्शकों
के बीच से या कहीं बाहर से भीड़ को चीरता अलख जगाता हुआ साधू वेशधारी एक व्यक्ति
मंच की ओर लपकता है। उसके साथ ही तीन-चार साधु विभिन्न दिशाओं से मंच पर कूद पड़ते
हैं। साधुओ के हाथों मे तूम्बा, चिमटा और घंटियाँ रहते हैं। अलख निरंजन के उद्घोष के साथ, कहरवा ताल पर मस्ती में थिरकते साधु, वाद्य मंडली से प्रश्नोत्तर करते हुये विविध प्रकार का
स्वांग प्रस्तुत करते हैं। इनमें ज्ञान-ध्यानी, साधु-स्वादु, मुनि-तपस्वी, संत-त्यागी, भले-बुरे सभी प्रकार के साधु होते हैं। बुद्धिमान और मूर्ख
साधुओं के स्वांग में हास्य और व्यंग के साथ-साथ दार्शनिकता व आध्यात्मिकता के गूढ़
दृष्टांत भी उभरते हैं। साधु स्वांग के बाद कई अन्य छोटे-छोटे प्रसंगों का अभिनय
होता है। संवाद लिखित नहीं होता है
कलाकारों को अपनी बात ज़बानी कहनी होती है। कलाकार अपने संवादो को पद्यात्मक रूप
में प्रस्तुत करते हुए प्रायः लोक-धुनों को प्रयोग करते हैं। कुन्जू-चंचलो, गंगी-सुन्दर, मोहणा, लामण और झूरी आदि पहाड़ी गीत और लोक भजन की करियाले में धूम
मची रहती है। गिद्ध, लुड्डी, गीह, साका, रासा और रथबेला आदि मनोंरजक नृत्य भी करियाले में छाये रहते
हैं। करियाला के कलाकार जिसे करियालची कहा जाता है वे सभी के सभी समाज के पिछड़े और
शोषित वर्ग से आते हैं। एशियाई लोकरंगशाला की भाँति करियाली में भी स्त्री पात्रों
की भूमिका पुरूषों द्वारा अभिनीत की जाती है। करियाला का सूत्रधार करियालटू और
विदूषक बौरा, मसखरा
या डण्ड कहलाता है। करियालची स्वयं अपना वेशभूषा और मुखौटा तैयार करते हैं। मुखौटे
भयानक होते हैं, जिन्हें
काष्ठ,
मिट्टी अथवा तूँबों से तैयार किया जाता है। साधु बैरागियों
के जटाजूट एवं दाढ़ी-मूँछ घास के रेशों, मकई के मिजरों तथा भेड़-बकरियों के बालों से तैयार किये जाते
हैं। मुख एवं बदन सज्जा के लिये आटा, चूल्हे की भस्मी, कोयला-चूना, गेरू प्रयुक्त किया जाता है।
करियाले में
लोकरूचि के विभिन्न कथानकों को छोटे-छोटे झलकियों में प्रहसनात्मक शैली में
प्रस्तुत किया जाता है। साधुओं की अनेतिकताएं, छुआछूत की विभीषिका, दहेज प्रथा की निर्ममता, परिवार नियोजन की सार्थकता, शिक्षा की उपादेयता जैसे सभी विषयों से सम्बंधित स्वांग
अभिनय करियाला में प्रस्तुत होता है। मनोविनोद करियाला का प्राण होता है।
प्रहसनात्मक एकांकियों में लाड़ा-लाड़ी, नट-नट्ट्णी, साहब और मेम, पिलपिली साहब, चना जोर गरम, भागी हुई लड़की, बीकानेरी मालणियां आदि लोकप्रिय स्वांग है। साहब और मेम में
भारतीय समाज की अंग्रेजियता पर तीखा प्रहार है तो पिलपिली साहब में नौकरशाही पर
कटाक्ष और पति-पत्नी में पारिवारिक जीवन की विसंगतियों पर व्यंगपूर्ण प्रकाश डाला
गया है।
करियाला लोकनाट्य
एकांकी,
प्रहसन, नृत्य तथा संगीत का सामूहिक रूप है। इन्होंने हिमालयांचल के
लोकजीवन को नई दिशा दी है। यह पहाड़ी जनमानस के गले का हार और जन-जीवन की अतीत का
वातायन और वर्तमान का दर्पण है।
No comments:
Post a Comment