केरल का पारंपरिक नाट्य चविट्टुनाटकम्- ओम प्रकाश भारती
चविट्टुनाटकम् केरल के ईसाइयों द्वारा अभिनीत किया जाने वाला संगीतात्मक
लोकनाट्य है। भारतीय लोकनाट्यों की परंपरा में यह एक मात्र ईसाई लोकनाट्य है। इस
नाट्यरूप में यूरोपीय विषयों को भारतीय लोकनाट्य शिल्प विधि में प्रस्तुत किया
जाता है। केरल के स्थानीय संगीत और नृत्य कला की इस पर विशिष्ट छाप पड़ी है।
केरल दुनिया की कई
संस्कृतियों का संगम स्थल रहा है। अति प्राचीनकाल से यूनानी, रोमन, यहुदी, सीरियाई, अरब, चीनी,
पुर्तगाली, डच, फ़्रांसीसी, अंग्रेज
और कई अन्य देशों के लोग व्यापारियों, यात्रियों, साहसी नाविकों, इतिहासकारों अथवा धर्मप्रचारकों के रूप में यहाँ आते रहे
हैं। इनमें से सबसे अधिक संख्या में ईसाई लोग यहाँ बस गए। इन लोगों ने युद्धाभ्यास
के लिए कलरियाँ (युद्ध प्रशिक्षण केन्द्र)स्थापित किए। इन्हीं ‘कलरियों’ में केरल के कुडियाट्टम् जैसी लोकविधा को आदर्श बनाया गया।
यह परंपरा कई वर्षों तक चलती रही। बाद के दिनों में रोम केन्द्रित ईसाइयों ने, पुर्तगाल से आए पादरियों के धर्म-दर्शन (जिसमें हिन्दू और
ईसाई संस्कृति के समन्वय की बात की गई थी) का विरोध किया। परिणामस्वरूप पूर्व
प्रचलित ‘कलरि’ में होने वाले प्रदर्शन को बंद करना पड़ा। अब उनकी जगह नयी
विद्या की खोज आंरम्भ हुई जिनसे पिछले नाट्यरूपों के अभाव की पूर्ति हो सके।
इन्हीं बदलती धर्मिक परिस्थियों में चविट्टुनाटकम् का उद्भव हुआ। इनके नये
प्रयोक्ताओं ने भी स्थानीय कलारूपों की उपेक्षा नहीं की। उन्होंने बहुतेरे भारतीय
लोककला तत्त्वों का समीचीन समावेश किया। जबकि कथानक बाईबिल, यूरोपीय इतिहास शार्लमेन की जीवन की घटनाओं पर आधरित थे।
अतः चविट्टुनाटकम् को केरल का लोकनाट्य कहना समीचीन नहीं होगा। इसे मात्र केरल में
विकसित एक नाट्यरूप माना जा सकता है।
चविट्टु का अर्थ
होता है पांव या कदम, नाटकम् यानि नाटक अर्थात किसी भी और विषय को पदचाप द्वारा तालबद्ध अभिव्यक्त
करना ही चविट्टुनाटकम् है। इसलिए इस नाटक में कदम विभिन्न प्रकार की तालों में निबद्ध
होते है। राजा, सेनापति, देवदूत पुरोहित और वैद्य आदि श्रेष्ठ पात्रों के लिए पद
संचालन विशिष्ठ प्रकार का होता हैं, जबकि चोर, जल्लाद ठग जैसे निकृष्ट पात्रों का पदताल भिन्न प्रकार का
होता है। स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुषों द्वारा अभिनीत किए जाते है। पुरुष और स्त्री
दोनों के लिए पृथक पदताल होते हैं। पुरुषों का पदताल तांडव से प्रभावित होता हैं
जबकि स्त्रियों के पदताल में लास्य की लटक होती है। कदम मूलतः बारह प्रकार के होते
हैं। जिसमें कवितम्, कलशम्, एड़क्कलाशम्
आदि बुनियादी पदताल माने जाते हैं। चविट्टुनाटकम् का अंग विक्षेप कथकलि और
मोहिनिट्टृम् से विशेष साम्य रखता है। संगीत चविट्टुनाटकम् का अनिवार्य अंग है।
सारे संवाद पद्य में तथा गेय होते हैं। गद्य संवाद नहीं के बराबर प्रयुक्त होते
हैं। गीतों के माध्यम से ही कथावस्तु को आगे बढ़ाया जाता है। मंच पर गीत की
पंक्तियां गाने वाले तीन व्यक्ति होते हैं। पात्र, गुरु और सहायक। पहले पात्र खुद गीत गाता है, उसके बाद गुरु और अन्य सहायक गाने लगते हैं। वाद्ययंत्रों
में बेला,
बाँसुरी, बुलबुल, हारमोनियम के अलावे तेज आवाज वाली इलतालम और चेण्डा का भी
प्रयोग किया जाता हैं।
चविट्टुनाटकम् का
मंचन वर्ष में कम से कम दो बार खासकर क्रिसमस व ईस्टर के अवसरों पर गाँव के खुले
मैदान में किया जाता है। लड़की के पटरों से तीन फीट ऊँचा तथा 40 फीट लम्बा, 12 फीट चौड़ा मंच तैयार किया जाता है। मंच के दोनों तरफ
द्वारमंडप बनाये जाते हैं। अलंकृत द्वारमंडप राजभवन का प्रतिनिधत्त्व करता है।
प्रकाश व्यवस्था मशालों द्वारा की जाती है। मंच के एक कोने में मसीही क्रॉस के
सामने कांस्यदी जलाई जाती है। चेण्डा (नगाड़े) की पहली चोट पर अभिनेता रूपसज्जा में
जुट जाते हैं। तीसरी बार चेण्डा पर चोट करते ही गुरु नाटक प्रारंभ होने की सूचना
देता है। उसके बाद गुरु सहित सभी सहभागी प्रार्थना में भाग लेता है। तत्पश्चात
गुरू और लेखक के प्रति आभार ज्ञापन किया जाता है। मुख्य खेल आरंभ होने से पहले
नाटक के कुछ दृश्यों के बारे में संक्षेप में बताया जाता है, फिर दर्शक के अभिवादन हेतु थूंतियोगर (सैन्य वेशधारी अल्प
वयस दो लड़के) मंच पर उपस्थित होते हैं। दर्शकों के अभिवादन के बाद गुरु को प्रणम
करते हैं तथा गुरु दक्षिणा के रूप में कुछ वस्त्र एवं रूपये भेंट करते है। लड़को को
मंच पर से जाते ही, स्त्री भेषधरी लगभग सात आठ पुरुष नर्तक लास्य कदमों के साथ प्रार्थना करते हुए
मंच पर प्रस्तुत होते हैं। नर्तकों को मंच पर से जाने के बाद मुख्य खेल आरंभ होता
है,
जिसका प्रदर्शन सुबह तक चलता है सुबह मंगलम गायन से नाट्य
प्रदर्शन समाप्त होता है।
चविट्टुनाटकम् में गुरु जिसे अशान कहा जाता है, पूर्वाभ्यास से लेकर प्रस्तुति के अन्त तक उनकी विशिष्ट
भूमिका होती है। विदूषक, जिसे कटियककारन कहा जाता है। नाटक की घटनाओं और पात्रों क्रिया-व्यापारों पर
हास्य-व्यंगपूर्ण टिप्पणी करते हुए दर्शकों का मनोरंजन करता है। वह नाट्य संचालन में
सहयोग करता है। किसी भी दृश्य में मंच पर आने और बोलने की पूरी स्वाधीनता उसे
प्राप्त होती है।
चविट्टुनाटकम् की
रूप-सज्जा और वेशभूषा याथार्थवादी होती है। अधिकांश चरित्र राजा और सैनिक होने से
वेशभूषा मँहगी होती है। सैनिक पात्र अक्सर यूनानी-रोमन वेश धरण करते हैं।
नाट्यालेख छपे हुये
रूप में उपलब्ध् नहीं होता है। प्राचीनतम और लोकप्रिय नाटक कार्ल्समैन है। मलयालम
भाषा में शार्लेमैन का उच्चारण ही कार्ल्समैन है। इसमें सन् 768 ई. से 814 ई. तक पश्चिमी यूरोप और रोम पर शासन करने वाले चार्ल्स
बादशाह और उसके बारह सेनापतियों के वीरतापूर्ण युद्धों की उद्वेगपूर्ण घटनाओं को
दर्शाया गया है। कथा की घटना-योजना, पात्र-सृष्टि आदि तत्त्वों पर यूनानी पुराणों का स्पष्ट
प्रभाव लक्षित होता है भारतीय रंगदर्शन के अनुकूल नायक परिकल्पना, संकलनत्रय, कथागीत आदि का निर्वाह किया गया है जो इस नाट्यशैली को
भव्यरूप प्रदानकरते हैं। कुछ नाटक सामाजिक समस्याओं को लेकर भी रचे गयें हैं जैसे
धर्मिष्ठ सत्यपाल, ज्ञानसुन्दरी, कोमलचरित, जानकी
आदि। आंरभ में (16वीं सदी) ये सारे नाटक तमिल भाषा में थे जो अब अप्राप्य हैं। इन दिनों तमिल
मिश्रित मलयालम इन नाटकों की भाषा है।
अपने प्राचीन युद्ध
कौशल की समृद्ध धरोहर के रूप में यह लोकनाट्य आज भी सुरक्षित है। कई अर्थों में
यूरोपीय ऑपेरा से प्रभावित होते हुए भी भारतीय लोकनाट्य शिल्पों का इसमे सरस
समन्वय हुआ है। चविट्टुनाटकम् भारतीय लोकरंगशाला का अमूल्य धरोहर है।

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