मिथिला में भगैत गायन परंपरा
प्रो. (डॉ.) ओम प्रकाश भारती
मिथिला में गाथाओं को प्राय: गीत, भगैत तथा महराय
कहने का प्रचलन है। गाथा गायक को भगतिया, महरइया तथा गुदररिया कहा जाता है ।
भगतिया मूल रूप से भक्तिपरक गाथाओं को गाते हैं । भगैत परंपरा में धर्मराज के
पंजियार – उदय साहू, जोति, बेनी, अंदु ,हरिया डोम तथा मीरा साहेब /सुल्तान की गाथाएँ गायी जाती है।
लोक देव कारू खिरहरी, बिसु राऊत, कारीख तथा बखतौर-बसाबन आदि की गाथाएँ
भगैत की श्रेणी में आती है।
उत्तर बिहार विशेषकर कोसी अंचल तथा नेपाल के मधेश अंचल के यदुवंशियों/यादवों
के बीच लोक देवता धर्मराज की पूजा की जाती है। इस अंचल के यादव समुदाय के लोग अंधक
और वृष्णि वंश की शाखा से जुड़े हैं। ये शाखाएँ पश्चिम भारत के गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के
ब्रज और मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में निवास करते थे। श्रीकृष्ण का जन्म यादवों
के वृष्णि वंश में हुआ था । महाभारत के अनुसार श्रीकृष्ण अंधक और वृष्णि गण के
मुखिया थे। इतिहासकार के. पी. जयसवाल, अल्तेकर और रोमिला थापर ने अंधक और
वृष्णि के बीच गणतांत्रिक शासन व्यवस्था प्रचलित होने का उल्लेख किया है। कालांतर
में ब्रज क्षेत्र के यादवों का गंगा के उत्तरी भाग स्थित वैशाली जनपद में आगमन हुआ, जो बृज्जी
/ब्रज्जी (ब्रज के बासी) कहलाए । बृज्जियों ने ही वैशाली जनपद में विश्व के
प्राचीनतम गणतन्त्र की स्थापना की। फ़्रांसीस बुकानन ने 1808 ई . भक्तिया का उल्लेख
किया है(एकाउंट ऑफ दी डिस्ट्रिक्ट ऑफ पूर्णिया, पृ . 516
)। मिथिला में भगैत गायन की परंपरा लगभग सोलहवीं
सदी से प्रचलित है।
धर्मराज की पूजा पश्चिम
भारत के गुजरात, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में यादव तथा गुजरों के बीच भी प्रचलित है। धर्मराज
मूलत: सत्य एवं नैतिक मूल्यों के संरक्षक देवता हैं। धर्मराज को एक देवता नहीं
बल्कि पंथ मानना चाहिए । धर्मराज की उपासना में कोई कर्मकांड या अंध विश्वास को
स्थान नहीं दिया गया है। केवल सत्य और मानवीय मूल्यों का अनुसरण किया जाता है । धर्मराज
एक पथ प्रदर्शक देवता हैं, उसके पाँच पंजियार
हैं- उदय साहू , ज्योति, हरिया, बेनी, अंदु । पंजियार को पैगंबर समझा जा सकता है । इन पाँच
पजियारों की अलग जातियाँ हैं, यथा ; ज्योति दुसाध ,हरिया डोम, बेनी यादव, उदय तेली तथा अंदु माली जाति से हैं । इन सभी पंजियारों ने
अपने जीवन चरित्र से उच्च मानवीय मूल्यों तथा लोक आदर्शों की स्थापना की । इनके
जीवन गाथा को भगतिया गाते -सुनाते हैं, जिसे भगैत कहा जाता है। इन चार पंजियारों के साथ बाबू
कालीदास तथा मीरा साहेब/पीर /दातार की गाथा भी गाई जाती है । बाबू कालिदास की गाथा संस्कृत के कवि
कालिदास तथा श्रीकृष्ण के जीवन कथा से
लिया गया लगता है। यह गाथा काल्पनिक तथा
चमत्कारिक है। मीरा साहेब तुर्क मुसलमान है । पश्चिम तथा उत्तर भारत के पाँच पीरों में मीरा
साहेब का नाम भी आता है। गुजरात के उंझा (मेहसाना) में मीरा पीर का दरगाह है। गुजराती परंपरा के अनुसार
उन्होंने काला जादू करने वाले तंत्रिकों
को दंडित किया तथा शहीद हो गए। लेकिन भगतिया इसकी गाथा कुछ अलग गाते हैं। गाथा में
उल्लिखित भौगोलिक परिवेश उत्तर तथा पश्चिम भारत की है। हो सकता यह गाथा यादवों के
साथ प्रवजन के दौरान साथ आयी हो।
भगैत दल में लगभग सात-आठ व्यक्ति होते है। झाल और टुभकी
(तन्तु वाद्य) के साथ कथागायन प्रस्तुत
किया जाता है। वर्ष में एक बार चैत्र शुक्ल पक्ष के एकादशी के दिन भगतियों की एक सभा होती है. जिसे 'सहमिलन' कहा जाता है। इस 'सहमिलन' में लगभग चार सौ दल भाग लेते है। 72 घंटे तक अनवरत गायन
चलता है अलग-अलग दल आते है और गायन प्रस्तुत कर चले जाते हैं । धर्मराज के पूजा घर
को गहबर अथवा गौसाएँ घर कहा जाता है। गहबर बास डीह के पश्चिमी भाग में पूरब रुख का
होता है। गहबर में बहुत नेम –टेम का अनुपालन किया जाता है। गहबर में देवता पिंडी/पीरी बनी होती है , जो चिकनी मिट्टी
से अर्द्ध वृताकर /गोलाकार मिट्टी के ही
छोटे चबूतरे पर बना होता है । पिंडी की मिट्टी गंगा नदी से लाये जाने की
परंपरा है। यह धर्ममराज का पिंडी माना जाता है । इसकी स्थापना अनुष्ठानिक विधि से ‘भगत’ द्वारा किया जाता है।
इस अनुष्ठान में कोई पुरोहित नहीं बुलाया जाता है। पिंडी के दाहिने ओर चबूतरा के नीचे
प्रतिकात्मक रूप से ‘गईयाँ’ स्थापित होता है तथा उसकी पुजा की जाती है। ‘गईयाँ’ कुल देवी अथवा कुल
देवता होता है।
भगतिया मूल रूप से जोति, हरिया , बेनी ,अंदु तथा मीरा साहेब
के जीवन चरित्र को गाते हैं। जोति पंजियार
पुहपी पुर गाँव (संभवत: नेपाल में स्थित) के रहने वाले थे। धर्मराज कोढ़ी के भेष में
जोति के घर उनकी परीक्षा लेने जाते हैं। जोति कोढ़ी का अपमान करते हैं। जोति धरम के पंजियार
हैं, उनसे चूक होती है। धरमराज उनकी कंचन काया हरकर उसे कोढ़ दे देता
है। अब कोढ़िया काया लेकर जोति नगर में कैसे रहेगा , वह केदुली
वन चला जाता है। बारह वर्ष कौल काटने के बाद पुन: पोहपी पुर लौटकर धर्मराज की सेवा
करता है। अछमित पुर के हरिया डोम के घर धर्मराज परीक्षा लेने अतिथि के रूप में पहुंचते हैं
और मानव मांस खाने की इच्छा व्यक्त करते। हरिया आतिथ्य के जाना जाता था। अतिथि के लिए
अपने पुत्र की बलि दे देता है। धरमराज हरिया से प्रसन्न होता और उसके पुत्र को पुनः
जीवित कर देता है। बेनी मुगलों से तंग आकर फरकिया (भागलपुर ) से सवा लाख गाय लेकर पररी
(सहरसा)आ जाता है । वनगाँव के राजा जुगल खां के मृत पुत्र को जीवित कर देता है। जुगल
खां प्रसन्न होकर बेनी को बावन एकड़ का चरागाह दान में देता है। बेनी मुगल से टक्कड़
लेता है। स्त्री तथा पशुओं की रक्षा के लिए हुरियाहा प्रथा का आरभ्म करता है । सुकराती
के दूसरे दिन सूअर के बच्चे को बांस में लटकाकर
हुरियाहा दिया जाता है। जिस क्षेत्र में हुरियाहा होती थी वहाँ के पशुओं को मुगल जबरन
हांक कर नहीं ले जाते थे। धरमराज पंथ के अलावा कारू खिरहरी और बाबा बखतौर का भगैत प्रचलित है। सहरसा जिले के मैना महपुरा गाँव
में कारू बाबा का थान है। कारू बाबा पशु रक्षक देवता माने जाते हैं। बाबा बखतौर का
जन्म सहरसा जिले के गढ़िया –रसलपुर गाँव में हुआ। नौहट्टा के आततायी राजा दलेल सिंह
के शोषण खिलाफ युद्ध किया । वैशाली जिला स्थित
पाना पुर लंगा में बाबा बखतौर और बसवन थान हैं। बाबा बखतौर का भगैत मिथिला के अलावा
बज्जिका तथा मगध क्षेत्र में प्रचलित है।
इस तरह भगैत गायन मिथिलांचल का सांस्कृतिक धरोहर है। भगैत के आदर्श
नायकों के जीवन चरित्रों ने मानव मूल्यों के
निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । अवश्यकता है इसे संरक्षित करते हुए नए अर्थों
इसकी व्यख्या करने की।
धर्मराज पंथ में किसी मूर्ति की पुजा नहीं की जाती है।
और ना ही यहाँ कोई अवतारवाद की अवधारणा है। देवता धर्मराज के सभी पंजियार मानव है
तथा उनका जन्म माँ की कोख से हुआ है। कुछ हद तक वे ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। लोक
परम्पराओं के अनुसार सभी पंजियारों का जन्म भारतीय इतिहास के उत्तर मध्यकाल तथा
उपनिवेश काल में हुआ। सभी पंजियार पशु रक्षक हैं, मानवता तथा मानव
मूल्यों के रक्षक हैं। उनके जीवन के त्याग, समाज के लिए दिये
गए बलिदान को ‘भगतिया’ बार –बार गाते हैं । समाज भी उसे बार –बार सुनना चाहता
है। सही अर्थों में धर्मराज पंथ लोक
परंपरा के मानवतावाद की उस शृंखला में है, जहां मानव को
श्रेष्ठ बताया गया। यहाँ धार्मिक आडंबर और कर्मकांड धराशायी है। वर्ण व्यवस्था , जाति
भेद , छुआ- छूत, धर्म विभेद कुछ भी मान्य /स्वीकार्य नहीं है। धर्मराज पंथ
के अनुयायी प्राय: यादव हैं और पंजीयारों की जाति में ज्योति दुसाध, हरिया
डोम, बेनी यादव, उदय तेली तथा अंदु
माली है। हिन्दू वर्ण व्यवस्था में दुसाध और डोम को अछूत माना जाता रहा है। लेकिन
यहाँ पूजित है। मीरा साहिब मुसलमान है ।
भगैत की कथा के अनुसार जब वह नूजागढ़ लड़ने के लिए दल फौज साजता है, तो उसका घोड़ा
हंसराज उसे गंगा स्नान कर पवित्र होने कहता है। गंगा पच्चीस कोस दूर है। वह अल्लाह
को स्मरण करता है और गंगा वहीं बहने लगती है। यह गाथा साझी संस्कृति और विरासत का
नायाब अवदान है।
No comments:
Post a Comment