बिहार का आनुष्ठानिक लोकनाट्य - जट-जटिन
जट-जटिन उत्तर बिहार का आनुष्ठानिक लोकनाट्य है। आषाढ़, सावन और भादो महीने की दुग्ध-धवल चाँदनी रात में वर्षा के
आवाहन के निमित्त इसका प्रदर्शन किया जाता है। कभी-कभी आश्विन, कार्तिक, चैत तथा वैशाख महीने में भी इसका प्रदर्शन होता है।
प्रस्तोता और प्रेक्षक सिर्फ़ स्त्रियाँ ही होती हैं। नृत्य और सहगान सहित
प्रस्तावना, संक्षिप्त
कथानक,
संतुलित पात्रयोजना, प्रश्नोत्तर शैली के गीतात्मक संवाद, सरल-सहज-प्रवाह्यमान भाषा, मुक्ताकाश रंगस्थली तथा आनुष्ठानिक उद्दीपन जट-जटिन को
विशिष्ट लोकनाट्य सिद्ध करता है।
जट-जटिन मूलतः आनुष्ठानिक लोकनाट्य है, जिसका आयोजन वर्षा के आवाहन के लिए किया जाता है। गीत, नृत्य, प्रहसन लोकनाट्यों के अंग हैं, वह यहाँ भी है। नृत्य और गीत नाट्य की जो प्रचलित धारणाएँ हैं, उसके अनुसार जट-जटिन को गीतिनाट्य की श्रेणी में रखा जा सकता है।जट पुरुष और जटिन स्त्री पात्र, इन्हीं दो पात्रों के नाम पर इस नाट्य रूप का नाम जट-जटिन प्रचलित है। ‘जट-जटिन’ आनुष्ठानिक नाट्य है। अनुष्ठान का आयोजन वर्षा के आहवान के लिए किया जाता है। इस अनुष्ठान का आरंभ उस समय हुआ होगा, जिस समय कृषि आधरित अर्थव्यवस्था अस्तित्व में आई होगी। भोजन संग्राहक मानव उत्पादन के कार्य में जुड़ गए होंगे। उत्पादन के लिए पानी का होना आवश्यक होता है। अनावृष्टि होने पर, कृषि कर्म से जुड़े लोगों के द्वारा यह अनुष्ठान आरंभ किया गया होगा। जट-जटिन से जुड़े आनुष्ठानिक क्रिया में दो ऐसी क्रियाएँ हैं, जो लगभग विश्वभर में प्रचलित हैं तथा प्राचीन सभ्यताओं में उसका उल्लेख मिलता है :
- राजा, सभ्रांत वर्ग, पुरोहित या ब्राह्मण द्वारा कृषि कर्म की अवहेलना।
- मेढकों से जुड़ी धारणाएँ।।
सभ्यताओं के उदय के साथ ही मानव समाज कई स्तरों में बँट गया। पहले पायदान पर या
सबसे ऊपर वे लोग थे, जो सारी सुविधओं को भोगने के बाद भी उत्पादन के पचरे से पल्ला झाड़ लिए थे। ऐसे
ही लोग राजा, सामंत, पुरोहित आदि थे। धीरे-धीरे लोकमानस ने इस दासता को स्वीकार
कर लिया। रामायण काल में अनावृष्टि के कारण अकाल पड़ने पर वर्षा के आगमन के लिए
मिथिला नरेश सिरध्वज जनक द्वारा हल जोता गया था। राजा और सामंत के बाद पुरोहित थे, जो सीधे उत्पादन या श्रम से नहीं जुड़े थे। लोकमानस में इन
वर्गों का आदर था। इनके लिए हल जोतना, भोजन और पानी नहीं मिलना अनहोनी घटना थी। इस क्रम में
जट-जटिन के पूर्वरंग का यह गीत द्रष्टव्य है :
इन्द्र भगवान इनरलोक गमोलिन
पानी बिनु पड़ले अकाल हो राम
चमराक, खत्ता-खुत्ती
छापर-छुपर पनियां
ओहि मे नहाय छै ... बभना,
धेतियो ने खीचै छै जनऊओ ने माँजै छै,
दयो ने लागै छ हो इनरलोक भगवान
दैवा पानी रे बिनु ना
पानी रे बिनु पड़लै अकाल
दैवा पानी रे बिनु ना
चर सुखलै चाँचर सुखलै
सुखि गेलै, गाँव
बहियार
दैवा पानी रे बिनु ना
पानी रे बिनु पड़लै अकाल
दैवा पानी रे बिनु ना
बभना के ध्यिपुता खुद्दी लै कानै छै
दयो ने लागै छ हो इनरलोक भगवान
दैवा पानी बिनु पड़लै अकाल
दैवा पानी, रे
बिनु ना
राँड़ी बभिनियाँ हल जोतै छै बीया बुनै छै
दयो ने लागै छऽ हो इनरलोक दैबा।
अर्थात्, इन्द्र
भगवान इन्द्र्रलोक में नहीं है, तभी तो पानी के बिना अकाल पड़ा है। चअर-चाँचर सूख गया है, सिर्फ़ ‘चमार’
के खेतों में थोड़ा बहुत पानी बचा है, उसमें ब्राह्मण को स्नान करना पड़ रहा है। धोती और जनेऊ को धोने
के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है। फलाने ब्राह्मण का ‘धियापुता’ (बेटी-बेटा) ‘खुद्दी’ (चावल के टूटे दाने) के लिए रो रहा है। विध्वा ब्राह्मणी हल
जोत रही है। हे इन्द्र्रलोक के देवता तुम्हें दया नहीं आती।
यहाँ गौरतलब है कि ब्राह्मणी द्वारा हल चलाना, ब्राह्मण को भोजन नहीं मिलना तथा धेती और जनेऊ के लिए पानी
का नहीं मिलना जन आस्था है। लोकमानस को यह विश्वास है ऐसा कहने पर इन्द्र भगवान
रीझ जाएँगे और वर्षा होगी।
वर्षा के आवाहन के लिए स्त्रियों द्वारा हल जोतने की प्रथा भारत के अलावा
दुनियाँ के दूसरे भागों में भी प्रचलित है। इस विषय पर डॉ. जार्ज जेम्स फ्रेजर का
महत्त्वपूर्ण शोध है। डॉ. फ्रेजर ने गोल्डन बाउ में ‘द मेजिकल कन्ट्रोल ऑफ़ द वेदर’ नाम के अध्याय में वर्षा के आगवान के लिए स्त्रियों द्वारा
हल जोते जाने की कई रोचक प्रथाओं का उल्लेख किया। दरअसल इस प्रकार के अनुष्ठान में
स्त्रियाँ हल नहीं जोततीं, बल्कि हल जोतने का अभिनय/स्वांग करती हैं। आर्मेनिया के आदिम समाज में
अनावृष्टि होने पर बूढ़ी औरत या पुजारी की पत्नी द्वारा पुजारी का कपड़ा पहनकर बहते
पानी की धरा के विपरीत हल जोतने का स्वांग किया जाता है। काउसक समाज में वर्षा के
लिए हल जोतने का एक विशिष्ट रिवाज है। दो लडकियाँ बैल की तरह हल में जुड़ने का
स्वांग करती हैं तथा नदी में कमर भर पानी तक हल जोतने का स्वांग करती हैं। डॉ
फ्रेजर ने जुलाई 1891 में बंगाल के चुनार अंचल (अब उत्तर प्रदेश) में प्रचलित एक रोचक अनुष्ठान का
वर्णन किया है- रात्रि
के नौ-दस बजे के बीच ‘नाईन’ (नाई की पत्नी) घर-घर जाकर औरतों को हल जोतने का निमंत्राण
देती है। सभी औरतें रात्रि को किसी खेत में एकत्र होती हैं। वहाँ कोई पुरुष नहीं
होता है। तीन महिलाएँ नग्नावस्था में, दो बैलों की तरह तथा एक हलवाहा के तरह लागन (हल की मूंठ)
पकड़कर हल जोतने का स्वांग करती हैं। जो महिला लागन पकड़ने का स्वांग करती है वह
मुँह से चिल्लाती है- ‘‘हे धरती माता, अनाज,
पानी और भूसी दो, मेरा पेट भूख से फटा जा रहा है।’’ गाँव के ज़मीदार द्वारा कुछ अनाज, पानी और भूसी खेत में भिजवाया जाता है। अनुष्ठान समाप्त
होते ही महिलाएँ वस्त्र पहनकर घर वापस होती हैं। इस प्रकार वर्षा के आवाहन के लिए
स्त्रियों द्वारा हल जोतने के स्वांग करने की प्रथा प्राचीन काल से ही विश्व
समुदाय में प्रचलित है।
लगभग विश्वभर में लोकविश्वास है कि मेढक, बादल का अन्यतम प्रेमी है। यदि वह कष्ट में होगा तो उसके
प्रेमी बादल अवश्य क्षितिज पर आएँगे और पिफर वर्षा होगी। ओरनिको द्वीपवासी
अनावृष्टि होने पर मेढक को एक बर्तन में रख डंडा से पीटते हैं। ब्रिटिश कोलम्बिया
के थाम्पसन नदी के द्वीपवासी सूखा पड़ने पर वर्षा के लिए मेढक की हत्या करते हैं।
दक्षिण पूर्व आस्ट्रेलिया के निवासी अनावृष्टि होने पर मेढक को पीटते हैं। वहाँ
मेढक को ‘मि. रेन’ कहा जाता है। वहाँ के लोगों में इससे जुड़ी एक कथा प्रचलित
है- बहुत
पहले एक समय एक मेढक झील और नदियों के सभी जल को पीकर, नदियों के सूखे तल में छुप गया। अन्य सभी प्रजातियों में
पानी को लेकर हाहाकार मच गया। सभी पानी की एक बूँद के लिए इधर-उधर भागने लगे। कहीं
पानी नहीं मिला। सभी ने सोचा कि यदि किसी तरह मेंढक को हँसाया जाए तो सारा पानी
बाहर निकल आएगा। उन्होंने मेंढक को हँसाने के कई उपाय किए, लेकिन सब के सब विफल रहे। ग़ुस्साए प्राणियों ने मेढक की
पूँछ समुद्री घास से बाँध्कर अग्नि के चारों ओर द्रुतगति से घुमाने लगे। यह पीड़ा
मेढक के लिए असहनीय थी। उसने मुँह खोला और तब तक हँसता रहा जब तक सारा पानी बाहर न
आ गया।
भारत में भी प्राचीन काल से ही इस प्रकार के कई लोकविश्वास प्रचलित हैं।
पूर्वोत्तर भारत के असम के निवासी अनावृष्टि होने पर मेढक की शादी करवाते हैं। यह
शादी बिलकुल आनुष्ठानिक होती है। उत्तरांचल राज्य के कुमाँऊ अंचल में वर्षा नहीं
होने पर वहाँ के निवासी मेढक को मुँह के बल घास से बाँधकर किसी पेड़ से लटका देते
हैं।
लोक विश्वास है कि वर्षा के देवता अपने प्रिय जीव को कष्ट में देख वर्षा को
भेजेंगे। फ्रेजर ने ‘गोल्डन
बाउ’
में बिहार के मुज़पफरपुर जिले के लोगों के बीच वर्षा के
आवाहन के लिए एक रोचक प्रसंग का उल्लेख किया है- भारत के मुज़फ्फ़रपुर जिले के लोगों के बीच लोक विश्वास है कि
मेढक का चिल्लाना/ टर्राना वर्षा के देवताओं द्वारा सुन लिया जाता है। इसलिए यहाँ
सूखा पड़ने पर निम्न जाति की महिलाएँ शाम के समय एकत्र होती हैं। पाँच अलग-अलग घरों
से पानी माँगकर मिट्टी के एक बर्तन में एकत्र किया जाता है। मेढक को पकड़कर पानी से
भरे मिट्टी के बर्तन में रखा जाता है। फिर मिट्टी के बर्तन को ऊखल में रखकर समाठ (मूसल)
से कूटा जाता है। इस अवसर पर महिलाएँ पानी की कमी के गीत गाती हैं। डॉ. शरतचन्द्र
ने भी बिहार के मुजफरपुर जिले में वर्षा से जुड़े एक अनुष्ठान का वर्णन किया है-भारत
के मुज़फरपुर जिले के लोगों के बीच लोक विश्वास है कि मेढक का क्रंदन वर्षा के
देवताओं द्वारा सुना जाता है। यहाँ सूखा पड़ने पर निम्नजाति की महिलाएँ शाम में
किसी के आँगन में एकत्र होती है। मिट्टी के छोटे बर्तन में मेढक पकड़कर रखा जाता
है। पाँच अलग-अलग घरों से पानी मांगकर उस बर्तन में डाला जाता है। फिर इसे धान
कूटने वाली ‘ढेकी’ में रखकर मार डाला जाता है। मेढक के मरने के बाद महिलाएँ
ऊँचे स्वर में पानी की कमी के गीत गाती हैं।
तमिलनाडु में वर्षा के आवाहन के लिए महिलाएँ मेढक को बाँस के बने पंखे में
बाँध लेती हैं तथा घर-घर जाकर कहती हैं- ‘मेढकी को स्नान कराना है, हे वर्षा के देवता पानी दो।’ घर की महिलाएँ पँखे से बाँध कर मेढक पर पानी फेंकती हैं, तथा गाने वाली महिला को उपहार देती हैं। नेपाल के निवासियों
के बीच लोक विश्वास है कि मेढक वर्षा के देवता इंद्र का दूत है। वहाँ कार्तिक
सप्तमी को पोखर के किनारे मेंढक की पूजा की जाती है। इस प्रकार वर्षा के आवाहन के
लिए मेढक से जुडे़ लोक विश्वास विश्वभर में प्रचलित हैं। ऋग्वेद की कुछ रिचाएँ
मेढक और वर्षा से सम्बंधित हैं।
जट-जटिन के आयोजन की पृष्ठभूमि में महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान है मेढक की हत्या।
नाट्यांत में महिलाएँ ‘बेंग’ (मेढक) पकड़ती हैं और ऊखल में रखकर मूसल से प्रहार कर मार
डालती है। मरे हुए ‘बेंग’ को किसी झगड़ालू महिला के घर फेंकती है। सुबह होने पर आँगन
में मरे हुए मेढक को देखकर महिलाएँ मेढक फेंकने वाली को गालियाँ देती है। लोक
विश्वास है कि जितनी गालियाँ दी जाएगीं, उतनी ही वर्षा की तेज़ बौछारें पड़ेंगी। इस प्रकार जट-जटिन का
प्रदर्शन आरम्भ में वर्षा के आवाहन के लिए अनुष्ठान के रूप में किया जाता होगा, धीरे-धीरे अनुष्ठान उत्सव में बदल गया और जीवन के
हर्षोल्लास, संघर्ष
आदि के तत्व जुड़ जाने से जट-जटिन जैसे नाट्यरूप अस्तित्व में आये। आज ग्राम्यजीवन
में जट-जटिन का प्रदर्शन आनुष्ठानिक (वर्षा के आवाहन के लिए)कम, जनरंजनात्मक अधिक होता है। धीरे-धीरे यह आयोजन अपने
आनुष्ठानिक स्वरूप को छोड़ता गया और नाटकीयरूप को प्राप्त करता गया।
जट-जटिन का प्रदर्शन मुक्ताकाश आँगन
में किया जाता है। प्रदर्शन से एक दिन पहले ही गाँव की महिलाओं को जट-जटिन खेलने
का आमंत्रण मिलता है। रात्रि के समय भोजन के बाद महिलाएं पहले से सुनिश्चित किसी
आँगन में एकत्र होती हैं। सबसे पहले प्रदर्शन के उद्यीपन के लिए या कहें कि नाटकीय
भावभूमि निर्माण के लिए नृत्य-गीत का आयोजन होता है। गीतों के स्वर सुनते ही अन्य
महिलाएँ प्रदर्शन स्थल की ओर कूच करती
हैं। एक तरह से जट-जटिन के मुख्य प्रसंग के साथ, प्रदर्शन से पूर्व यह क्रिया पूर्वरंग कही जाएगी, जो बहुत सुनियोजित तो नहीं है लेकिन प्रदर्शन की पृष्ठभूमि में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती
है।
पूर्वरंग के पहले चरण में सहभागियों द्वारा प्रस्तावना गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में इन्द्र की स्तुति तथा स्थानीय नदियाँ कोसी, कमला तथा बलान आदि की स्तुति का आनुष्ठानिक विधान भी किया जाता है।
पूर्वरंग के दूसरे चरण में झूमर और लारंग जैसे नृत्य गीत प्रस्तुत किए जाते
हैं। इन नृत्य गीतों में हास्य-परिहास के साथ पति-पत्नी, ननद-भौजाई, सास-पतोहू के बीच दिन-प्रतिदिन के कलह, हठ तथा द्वेष आदि का चित्रण होता है।
इस गीत में नव ब्याहता अपने पति से झूमर खेलने (जट-जटिन) की अनुमति मांगती है।
इसी क्रम में एक और गीत प्रचलित है, जिसमें कहा गया है शादी से पहले ही नायिका गर्भवती हो जाती
है।
गीतों के बीच-बीच में छेड़-छाड़ और मनोरंजनात्मक छोटे-छोटे चुटीले संवाद भी बोले
जाते हैं। पूर्वरंग के तीसरे और अंतिम चरण में संवाद गीतों के माध्यम से जट-जटिन
खेलने हेतु उलाहनापूर्ण आमंत्रण दिया जाता है। उपस्थित सहभागी, दो दलों में बँट जाते हैं। एक दल नायक जट का होता है, दूसरा जटिन नायिका का । दोनों दल प्रदर्शन स्थल पर दो
विपरीत दिशाओं में जाकर खड़े हो जाते हैं। आँगन (मंच) के बीचों-बीच एक काल्पनिक
सीमा रेखा तय कर दी जाती है। दल के किसी भी सदस्य द्वारा प्रायः सीमा रेखा का
उल्लंघन नहीं किया जाता है। यानी अब से लेकर नाट्यांत तक दोनों दल अलग-अलग गाँव के
निवासी समझे जाते हैं। दोनों दल अपने-अपने ‘मूलगैन’ (दलनायक) का चयन करते हैं। आगे की प्रक्रिया मूलगैन द्वारा
तय की जाती है। जट-जटिन के ‘मूलगैन’ को
नाट्य निर्देशक कहा जा सकता है।
मूलगैन अपने-अपने दल को लम्बी कतार में खड़े होने का निर्देश देते हुए, स्वयं कतार में लग जाते हैं। और अब गलबहियाँ डाले जटिन का
दल संवाद गीत गाते हुए सीमा की ओर कूच करते हैं, जहाँ उसी स्थिति में जट का दल पहले से गीतों के प्रत्युत्तर
के लिए प्रतीक्षा कर रहा होता है-
जट का दल - चल हे सिरमनि बेटी हो-हो रे, झूमरि खेलबै ना
जटिन का दल - कथि रे पात चढ़ि हो-हो रे, झूमरि खेलबै ना
जट का दल - पुरैनीक पात चढ़ि हो-हो रे झूमर खेलबै ना
जटिन का दल - ओहि पुरैनीक के चूरि तोड़बै ना
जट का दल - मारब तँ मारब हो-हो रे, ई गारि किए पढ़ब ना
जटिन का दल - पढ़बौ तँ पढ़बौ हो-हो रे, हमही सम्हारबौ ना।
इस तरह गीतमय संवादों के द्वारा नाट्य प्रदर्शन का वातावरण बन जाता है। गायन
और अंग संचालन की गति संयमित और लयबद्ध होती है। नव यौवना ग्राम्य बालाओं के पैरों
के नुपूर और नैहर के उन्मुक्त वातावरण से आई नव ब्याहता चंचल वधू के पायल और
कमरबंध की खनक से अनायास ही संगीतमय समा बंध जाता है। सावन-भादों की दुधिया चाँदनी
रात,
झिंगुर और मेढक का टर्राना, पूरबा हल्की बयार माहौल को मदमस्त बनाता है। कुछ क्षण के
लिए ये ग्राम बालाएँ जीवन की पीड़ा और निराशा को बिसुरकर प्रदर्शन में भावप्रमण हो
जाती हैं, दिनभर की थकान मिट जाती है। यही तो कला का महानतम् उद्देश्य है।
अनुष्ठान, हास-परिहास, छेड़छाड़ आदि के बाद मुख्य कथानक आरंभ होता है। पूर्वरंग में
सहगान एवं नृत्य सहित संवाद गीतों द्वारा नाट्य प्रदर्शन के लिए उल्लास और उद्दीपन
जुटाया जाता है। इसके साथ ही प्रदर्शन में भाग लेने हेतु आग्रह, उपालम्भपूर्ण आमंत्रण एवं पात्रपरिचय आदि पूर्वरंग में ही
संपन्न होता है।
चरित्र की दृष्टि से जट और जटिन नायक-नायिका के रूप में चित्रित होते हैं।
अन्य पात्रों में क्रमिक रूप से जट की माँ, जटिन की माँ, बंका-भकुली, सोनार, मल्लाह, ग्रामीण, ग्वालिन, सिपाही, गोदिन, चूड़ीहार तथा रोहीदास आदि की भी अवतारणा की जाती है।
गीत,
नृत्य युक्त पद्यात्मक संवाद ही जट-जटिन के प्रस्तुतिकरण की
आत्मा है। जट जटिन का गीत संगीत मिथिलांचल के लोक संगीत पर आधारित है। झूमर, गारी, जँतसार, सोहर, समदौन, समदौन लोकधुनों का प्रयोग विशेष रूप से होता है।
हाथों की ताली और संयमित पदचाप वाद्य संगीत की कमियों को पूरा करता है।
गीतों में संवाद एक कठिन साधना है, छोटे नुकीले, धरदार संवादों के बीच जट-जटिन का अभिनय जीवंत हो उठता है।
प्रश्नोत्तर की नाटकीय शैली में कथोपकथन, लोक-भाषा का प्रखर वेग एवं विविधवर्णी छटा इन संवादों की
भाषा शैली को अत्यंत प्राणवंत बना देती है।
अभिनय की कसौटी पर जट-जटिन में सात्विक अभिनय ढूँढ़ना दुष्कर है। आहार्य अभिनय
की दृष्टि से भी इसमें तामझाम का अभाव है। घरों में सहज उपलब्ध वस्त्राभूषणों से
ही स्त्रियाँ काम चला लेती हैं। जहाँ तक नाट्यशिल्प और मंचसज्जा का सवाल है, इसमें भी सुलभता और सहजता का ही सहारा लिया जाता है। आवश्यक
नाट्यशिल्प नहीं होने पर भी इसका मंचन पाँच-छः घंटों तक किया जाता है। चाँदनी रात
में मुक्ताकाश में यह प्रदर्शित होते हैं। कोई पूर्वाभ्यास और साज-सज्जा नहीं। जट
हेतु लाठी, मूरेठा, माला, सामान्य घरेलू जीवन के वस्त्राभूषण के सहारे ही अभिनय
सम्पन्न हो जाता है। प्रस्तोता और प्रेक्षक सिर्फ़ स्त्रियाँ होती हैं। पुरुष पात्र
जट,
सिपाही, चूड़ीहारा, नाविक आदि का अभिनय महिलाओं द्वारा किया जाता है। तोंदू सेठ
के भेष धरने में अंगवस्त्र के नीचे कपड़ा रखने में किसी प्रकार का संकोच नहीं होता
है। जट का भेष धरण करने वाली महिला कभी-कभी अपने ही लम्बे बालों को चिपकाकर मूँछ
बनाना नहीं भूलती है। आंगिक और वाचिक अभिनय पर मिथिला के लोक जीवन की अमिट छाप
होती है।
जट-जटिन का कथानक पूर्ण विकसित एवं व्यवस्थित न होकर छोटे-छोटे प्रसंगों की शृंखला है। इनमें पारिवारिक तथा दाम्पत्य जीवन के विभिन्न पहलुओं को उद्घाटित किया गया है। विवाह पूर्व मँगनी प्रसंग, प्रेमी-प्रेमिका, हास-परिहास, विवाह संस्कार की उपयोगिता, वैवाहिक जीवन की जटिलता, स्त्रियों की नैहर प्रियता, चंचल रोमांस द्वारा गृहस्थी के भार-संचालन की अनिवार्यता, सुख-दुःख की व्यापकता का सफल और हृदयस्पर्शी वर्णन ही जट-जटिन के कथानक का सार है। इसके अलावा जट-जटिन में बंका भकुली-विवाह, रोहीदास का इलाज, लुखबा की मौत जैसे छोटे-छोटे प्रहसन भी प्रदर्शित होते हैं। जट-जटिन के कथा प्रसंगों का मंचन निम्नलिखित क्रमों में होता है।
छेका प्रसंग
मिथिलाचंल में सगाई की रस्म को ‘छेका’ कहा जाता है। कथानक मंचन के क्रम में सबसे पहले जट-जटिन का ‘छेका’ प्रसंग का मंचन किया जाता है। जट की माँ छेका का साजो-सामान
यथा-साया,
साड़ी, सिनूर, टिकुली, हँसुली, सिकरी तथा संदेश आदि के साथ जटिन के घर पहुँचती है। जटिन की
माँ सभी समानों को घटिया बताकर ‘दूष’
देती है। जट और जटिन की माँ के बीच बहुत देर तक हिल-हुज्जत
चलता रहता है। वाद-विवाद का यह विषय व्यक्तिगत न होकर सामाजिक होता है। मिथिला में
सामाजिक रूप से नववधू से गृहकार्य करवाना अच्छा नहीं माना जाता है। अतः जट की माँ
कहती है-मैंने तुम्हारे लड़की को घास काटते देखा है, घर लीपते देखा है। प्रतित्युत्तर में जटिन की माँ कहती है
कि-मेरी बेटी कुँवारी ही रहेगी तुम बारात लेकर वापस जाओ, क्योंकि तुम भी घर ले जाकर मेरी बेटी से घास कटवाओगी, घर लिपवाओगी। और अंत में समझौता। दोनों पक्ष गले मिलते हैं।
जट-जटिन की सगाई होती है। पंडित का स्वांग करने वाली महिला लग्न पत्र देखकर शादी
का शुभ दिन बताती है।
जट पक्ष बारात लेकर जटिन के घर पहुँचते हैं। जट और जटिन के विवाह के प्रतिरूप बंका-भकुली के विवाह का स्वांग प्रस्तुत किया जाता है। इस अवसर पर छोटे-छोटे लघु प्रहसन भी प्रस्तुत होते हैं। ‘रोहिदास का इलाज’ और ‘लुखवा की मौत’ जैसे प्रहसन कथानक की शिथिलता को तोड़ते हुए नाटकीय गति प्रदान करता है। विवाह प्रसंग में परिछन से लेकर बेटी बिदाई तक की सभी रस्मों को दिखाया जाता है। कुछ देर के लिए प्रदर्शन मंच विवाह मंडप में तब्दील हो जाता है।
द्विरागमन प्रसंग- मिथिला में विवाह के उपरांत लड़कियाँ नाबालिग होने के कारण
ससुराल नहीं जाती हैं। बालिग होने पर ससुराल से द्विरागमन या गौना का बुलावा आता
है। जट-जटिन का यह प्रसंग इसी घटनाक्रम पर आधरित है। ससुराल से गौना का बुलावा आता
है,
सखी सहेली गाती है-
काँचेही बाँसके बँसुलिया गे मैना,
मैना,
जूमि रे गेलै बभना लियौनमा गे मैना।
अर्थात् जटिन अभी कच्चे बाँस की बाँसुरी है यानी नाबालिग है, ब्राह्मण गौने का बुलावा लेकर आ पहुँचे हैं। लेकिन इसका
प्रतिवाद कौन करेगा? कारण कुछ और ही बताया जाता है। जटिन ब्राह्मण के साथ जाना अस्वीकार कर देती है, क्योंकि रास्ते में ब्राह्मण उसे पोथी पढ़ाते जाएँगे।
ब्राह्मण के बाद नाई आता है, उसके साथ जाना इसलिए स्वीकार्य नहीं है कि वह राह-बाट में
हजामत बनाता रहेगा। फिर ससुर गौने के लिए आते हैं, उसके साथ इसलिए जाना नहीं चाहती कि रास्ते भर घूँघट तानना
पड़ेगा। जेठ के साथ इसलिए नहीं जाएगी कि रास्ते भर झगड़ता जाएगा, देवर के साथ इसलिए नहीं कि वह छड़ी ही चमकाता रहेगा। ससुराल
से उड़न खटोला भेजने के लिए कहा जाता है। ससुराल वाले मना कर देते हैं। माँ-बाप की
दुलारी जटिन कहती है- बीतते उमेरिया हम ते नहिरे गमेबैय ना (सारी उम्र हम नैहर में ही बिताएँगे)।
माननी जटिन का मान भी रह जाता है। इस बार पति गौना के लिए आया है। जटिन सहर्ष कहती
है-
सामी के संग हमहूँ जयबै गे मैना जयबै गे मैना
मैना राहे रे बाटे पनमा (पान) खिलैते गे मैना
मैना राहे रे बाटे बेनिया (पंखा) डुलेते गे मैना।
जटिन अपने पति के संग ससुराल पहुँचती है।
ससुराल प्रसंग- नैहर
के उन्मुक्त वातावरण से जटिन ससुराल आती है। यहाँ सामाजिक मर्यादा के अनुरूप
व्यवहार करने का दवाब उन पर डाला जाता है। नैहर में वह घर की बेटी थी, लेकिन ससुराल में नववधू है। यहाँ जेठ हैं, ससुर हैं, समाज के लोग हैं, जिनसे उनको पर्दा करना है। सास और जेठानी का धौंस है। ननद
चुगलखोर है। सब कुछ प्रतिकूल है। ननद द्वारा चुगली करने पर सुहागरात में ही जट
उससे पूछता है- तुम्हारा
झुमका कहाँ खो गया यानी तुम्हारे सम्बन्ध किसी पर पुरुष से तो नहीं है? सास छोटी-छोटी बातों पर ताना मारती है। जटिन अपनी सास से
खेत की निकोंनी के लिए खुरपी और हँसिया माँगती है, तो सास ताना देती है कि नैहर से मंगा लो। लेकिन जटिन सब कुछ
सहती है।
संयोग-वियोग प्रसंग - जटिन आभूषण प्रेमी है, जट से आभूषण की माँग करती है। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी
नहीं है,
जट कहाँ से आभूषण ख़रीद सकेगा। जट कमाई के लिए पूरब यानी
कलकत्ता जाना चाहता है। जटिन, जट को पूरब जाने से रोकती है। पूरब की हवा खराब है। लाख
समझाने बुझाने पर भी जट नहीं मानता है। आख़िरकार बिदेस चला ही जाता है। जटिन जट के
वियोग में तड़पती है। निःसहाय जटिन, जट के खोज में निकलती है। गाँव, नगर, बाट,
घाट में जट को ढूँढ़ती है। राह में सोनार उसे आभूषण देकर
लुभाना चाहता है, तो झिंगनापुर घाट का मल्लाह ‘खेबा’
के एवज में यौवन की माँग करता है। जटिन सभी को दुत्कार देती
है। कुछ दिनों के बाद जट लौट आता है। जटिन आभूषण पाकर खुश होती है। लेकिन कुछ ही
दिनों के बाद फिर दोनों में झगड़ा हो जाता है। जट समाठ (मूसल) से जटिन को मारता है।
जटिन रूठकर घर छोड़ देती है और अब जट विरह दग्ध है। जट, जटिन को ढूँढ़ने निकलता है। रास्ते में तरह-तरह का वेष धरण
करता। कभी ग्वालिन (दही बेचने वाली) गोढ़िन (मछली बेचने वाली) तो कभी चूड़ीहारिन का रूप धरण करता
है। गाँव-गाँव, नगर-नगर, गली-गली भटकता है और जटिन की ‘पूछारि’ करता है। घर के आँगन में ‘दूब’ उग आया है, बिछावन
पर मकड़ी ने जाले लगा लिए हैं, रसोई घर के बर्तन ठंडे पड़े हैं-सब कुछ जटिन के बिना।
जट-जटिन की भेंट होती है। जट उसे मनाता है। जट का विरह, जटिन से देखा नहीं जाता है। जटिन घर वापस आती है। दोनों
हँसी खुशी रहने लगते हैं। मंगलगायन के साथ नाटक यहीं समाप्त होता है।
प्रदर्शन के स्तर पर जट-जटिन को आज भी आनुष्ठानिक नाट्य ही कहा जाएगा, भले आज मेंढक की हत्या न की जाती हो, स्त्रियों, राजा या ब्राह्मण द्वारा हल जोतने का स्वांग पूर्वरंग में
प्रस्तुत नहीं होता हो। बदलते सामाजिक परिस्थितियों के कारण इस प्रकार के मिथकीय विश्वास
के प्रति जन अरूचि स्वाभाविक और सहज सामाजिक प्रक्रिया है। इसलिए जट-जटिन के
पूर्वरंग का आनुष्ठानिक रंग फीका हुआ है। तथापि जट-जटिन के पूर्वरंग के गीतमय
संवादों में आनुष्ठानिक अवशेषों का स्वर सुना जा सकता है। ग्राम्यजीवन में आज भी
जट-जटिन का प्रदर्शन हर्षोल्लास के साथ किया जाता है।

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