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Monday, November 24, 2025

महाराष्ट्र का लोकनाट्य - तमाशा, डॉ ओम प्रकाश भारती

 

महाराष्ट्र का लोकनाट्य - तमाशा

तमाशा महाराष्ट्र का सामाजिक लोकनाट्य है। भारतीय लोकनाट्यों की परंपरा में  तमाशा अपने ओजपूर्ण प्रसंगों, तीव्र वाद्य संगीत और उत्तेजक  शृंगारिक नृत्यों के कारण अत्यन्त लोकप्रिय है। इसका उद्भव अट्ठारहवीं शताब्दी में हुआ। पेशवाओं के काल में यह पूर्ण उत्कर्ष पर पहुँच चुका था। इनके प्रदर्शन के विषय पौराणिक आख्यान, ऐतिहासिक, शृंगारपरक, प्रेमाख्यानक तथा सामाजिक जीवन से जुड़े प्रसंग होते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के समय लोकमंच तमाशा ने ग्रामीण जीवन में नई चेतना लाने के लिए महत्वपूर्ण योगदन दिया ।


उद्भव की पृष्ठभूमि

तमाशा मूलतः फारसी भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है, खेल, मजा तथा रंजन। अनुमान है कि यह शब्द महाराष्ट्र में उर्दू भाषा के माध्यम से मुगल काल में प्रचलित हुआ होगा । संत एकनाथ ने अपनी रचना में तमाशा शब्द का उल्लेख मात्र किया है। लेकिन अठारहवीं शताब्दी तक महाराष्ट्र में तमाशा गीत, नृत्य तथा अभिनयपरक विधा के लिये रूढ़ हो चुका था। तमाशा की प्रस्तुति में परम्पराओं की लम्बी छाप दृष्टिगोचर होती है । तमाशा के उन्नायकों ने नाट्यगान की पूर्ववर्त्ती परम्पराओं का समायोजन कर, लोकनाट्य तमाशा के वर्तमान स्वरूप का निर्धारण किया। 13वीं से 16वीं सदी के संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम तथा रामदास प्रभृति संतों ने अपनी रचनाओं में भारूड़, दशावतार, पवाड़े, बहुरूपी, ललित आदि नाट्याभिव्यक्तियों का वर्णन किया है। वीररसात्मक पवाड़ों की परम्परा तो शिवाजी महाराज के काल से थी।

            महाराष्ट्र में गोंधळ की पुरानी परम्परा रही है । गोंधळ के दो रूप प्रचलित थे- एक भक्तिपरक सामूहिक गायन और दूसरा पौराणिक आख्यानों की नाटकीय प्रस्तुति की जाती थी । नायक मुख्य गायक होता था। एक सहयोगी गायक । एक तुनतुने वादक और एक सम्बल बजाता था। भारूड़ भी एक अभिनय परक प्रस्तुति थी, जिसमें गीत-नृत्य के साथ चटपटे प्रहसनों के संवाद होते थे । ललित भारूड़ का ही विकसित रूप है। पवाड़ा गायन में नाटकीय अभिव्यक्ति के सारे तत्व मूल रूप में उपस्थित थे यथा, गीत, अभिनय और संवाद। इन नाट्य रूपों ने तमाशा के उन्नायकों को नव नाट्य सृजन की पृष्ठभूमि प्रदान की।

            तमाशा में गण और गोळण की प्रस्तुति होती है। गण परम्परा जो विशेष रूप से गणपति के स्तवन या वंदना से जुड़ा हुआ है, मुख्यतया मध्यकाल में प्रचलित तुर्राकलंगी के प्रतिस्पर्धात्मक प्रदर्शन से लिया गया है। तुर्रा वाले शिव और कलगी वाले शक्ति के उपासक थे। इन दो दलों का अखाड़ा जमता था और प्रश्नोत्तर शैली में गायन प्रस्तुत होता था। आरम्भ में दोनों दल गणपति और उसके बाद अपने-अपने देवताओं की वंदना करते थे। इसी तरह गोळण एक अन्य अभिनय परक मध्यकालीन नृत्यगान परम्परा है। गोप कन्याओं द्वारा कृष्ण को सम्बोधित कर गाया जाने वाला गीत गोळण कहलाता था। संत नामदेव से लेकर निबोला राय तक की रचनाओं में गोळण गीत उपस्थित हैं। कालान्तर में शाहिरों ने कथानक और संवाद का समावेश किया और गोळण में छोटे-छोटे नाट्य प्रसंग अभिनीत होने लगे।

            तमाशा के विकास में लावणी जैसी नृत्यगान पद्धति ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। पर पेशवाई के उत्तर काल में लावणी का विशेष उदय एवं प्रचलन हुआ। आरम्भ में लावणी काव्य रचना शैली का एक छंद था। लावणी छंद का प्रयोग महाराष्ट्र के अलावा गुजरात, राजस्थान और हिन्दी प्रदेश के प्रायः सभी कवियों ने किया। लेकिन मराठी लावणी गायन और नृत्य विधा थी, कालान्तर में जिसमें कथा और अभिनय के तत्व जुड़ गए। लावणी के तीन प्रकार प्रचलित हैं -शाहिरी लावणी, बैठकीची लावणी तथा महार की लावणी। शाहिरी लावणी में डफ-तुनतुनिया के ताल पर कलगी तुर्रा गाया जाता है । बैठकीची लावणी में कोल्हाटिनें ठुमरी या रागदारी के ढंग से तबला हार्मोनियम के ताल पर गाती हैं। घुंघरू की लय में डफ, तुनतनिया के ताल पर गाई और नाची जाती हैं, वह महार की लावणीकहलाती है। तमाशा में प्रायः महार की लावणी का ही प्रचलन है। तमाशा की लावणी और शाहिरी लावणी में तर्ज की समानता रीSSSSहोती है। पेशवा शासकों ने लावणी के शाहिरों को विशेष संरक्षण दिया। अनंतफंदी, रामजोशी, प्रभाकर, गंगू हैबती, होनाजी बाला, सगनभाउफ 18वीं शताब्दी के प्रसिद्ध लावणीकार हुए। विषय के स्तर पर लावणी में भक्तिपरक, पौराणिक अख्यानों के अलावा  शृंगारिक विषयों का विशेष समावेश था। वाद्य तीव्र और आकर्षक था। गायकी और नर्तन में विशेष प्रकार की उत्तेजना थी, जो आमजनों को आकर्षित करता था। तमाशा के उन्नायकों ने इस तरह की लोकविधाओं को प्रदर्शन में शामिल करना अपरिहार्य समझा। इसी तरह बहुरूपी, नाच्या तथा सोंगाडया जैसे पात्रा मराठी लोकजीवन से ही तमाशा में शामिल किये गए। इस प्रकार तमाशा के प्रयोक्ताओं ने महाराष्ट्र के लोकजीवन में प्रचलित पूर्ववर्ती परम्पराओं का समयोजन कर नये नाट्यरूप तमाशा का प्रतिस्थापन किया।

नाट्यदल का संगठन, पात्रा और उसकी सामाजिक स्थिति

तमाशा दल को फडया बारीकहा जाता है। तमाशा की बारियां दो प्रकार ही होती हैं। एक संगीत बारीजिसमें संगीत और नृत्य की प्रधानता होती है और दूसरी ढोलकी बारीजिसमें ढोलकी के साथ नाट्यमय संवाद, वग, नृत्य संगीत आदि की प्रधनता होती है। एक फडमें कम से कम दस-बारह कलाकार होते हैं। बड़े सम्पन्न और व्यावसायिक दल में इसकी संख्या पच्चीस-तीस या इससे अधिक भी हो सकती है। दल का नायक और संचालक सरदार कहलाता है। एक फडमें एक सरदार, एक सोंगाडया (विदूषक), दो नाच्या (नर्तकी, स्त्री  या पुरुष), एक सुरतिया (तुनतुनियां बजाते हुए अलाप लेता है), एक ढोलकिया तथा एक कड़ा वादक होते हैं। इसके अलावा वग(नाटक) में पात्रों की संख्या के अनुसार कलाकार रखे जाते हैं। नर्तकियों की भी संख्या किसी-किसी दल में आठ-दस होती है। सरदार तमाशा का निर्देशक, प्रशिक्षक तथा संचालक होता है। वह प्रायः लावणीकार शाहीर तथा उच्चकोटि का गायक भी होता है।

            आरम्भ में तमाशा दल को अच्छी पारिश्रमिक नहीं मिलती थी। आजादी के बाद महाराष्ट्र सरकार ने तमाशा प्रदर्शन के लिये सेंसर बोर्ड का गठन कर दिया। बहाना था कि तमाशा मंच से अश्लीलता प्रस्तुत की जाती है। प्रदर्शन से पूर्व की दस प्रतियां सेंसर बोर्ड को जमा करनी होती थी। प्रदर्शन के लिये अनुमति प्राप्त करना कठिन हो गया था। 1955 ई. में महाराष्ट्र तमाशा परिषद् का गठन किया गया। परिषद् के हस्तक्षेप से प्रदर्शन की अनुमति प्राप्त करना तो आसान हो गया, लेकिन इसके बाद एक नई व्यवस्था आ गई। मुम्बई और पुणे में तमाशा थियेटर बने। थियेटर के संचालक आमतौर से तमाशा दलों के साथ कान्ट्रेक्ट कर लेता था। कान्ट्रेक्ट के दौरान कोई भी अभिनेता कहीं और प्रदर्शन में भाग नहीं ले सकता था। प्रदर्शन के बाद ए श्रेणी दल को पचास रुपये और निचले श्रेणी के दल को पन्द्रह रुपये पारिश्रमिक मिलता था। इनमें से पुरुषों को जितनी राशि मिलती थी उससे दोगुनी महिला पात्रों को। प्रदर्शन 8 बजे शुरू होता था और आधी रात के बाद तक चलता था। तमाशा देखने के लिये टिकट एक रुपये से तीन रुपये तक का होता था। तमाशा में स्त्री नाच्याके प्रवेश से प्रदर्शन का महत्व बढ़ गया। तमाशा की नर्तकी महार, मांग, कसविन और कोल्हाटी जैसी शोषित और दलित जाति की युवतियां थी। ये लोग सामाजिक रूप से अछूत माने जाते थे। इनकी कई पीढ़ियां नृत्यगान के पेशे से जुड़ी थी। इनके नृत्यों में ओज, उर्जा, मादकता और इतनी सफाई होती थी कि ये तमाशा के मंच के लिये अपरिहार्य हो गई। इसका दूसरा पक्ष था इनके सामाजिक जीवन की अनिश्चितता। इस पेशे में लगी लड़कियाँ येलम्मा देवी को समर्पित होती थी। ये शादी नहीं कर सकती थी परन्तु उनके बच्चे हो सकते थे। ये बच्चे सामाजिक अधिकारों से वंचित थे। ये परम्परा अब भी है लेकिन बदली हुई परिस्थिति में। अब लड़कियाँ प्रायः दल के किसी न किसी सदस्य से शादी कर लेती है।

प्रदर्शन स्थल

तमाशा का प्रदर्शन गाँव के चौक-चौराहे, मुक्ताकाश मैदान या प्रोसीनियम थियेटर आदि जगहों में कही पर हो सकता है। मुम्बई, पुणे तथा अन्य शहरों में तमाशा के कई स्थायी मंच बने हुए हैं। कुछ व्यवसायिक दल जो घुमन्तू हैं उनके पास मंच निर्माण की प्रायः सभी सामग्री उपलब्ध होती है। यहां तक कि वे मैदान में अस्थायी प्रेक्षागृह तक का निर्माण कर लेते हैं। कांताबाई सातारकर के दल में तीस कलाकारों के अलावा सत्तर अन्य सहयोगी हैं, जो दल के भोजन से लेकर प्रेक्षागृह और मंच का निर्माण करते हैं। यह तो सम्पन्न और व्यवसायिक तमाशा दल है। सामान्य दल के प्रदर्शन के लिये 20-30 फीट लम्बाई चौड़ाई का 3 से 4 फीट का उफँचा चबूतरा पर्याप्त समझा जाता है। तीन ओर दर्शकों का समूह बैठता है। पीछे एक पर्दा लटका दिया जाता है, जिसके पीछे नेपथ्य होता है। मंच पर प्रकाश के लिए पैट्रोमेक्स, गैसबत्ती और उपलब्धता हो तो बिजली का उपयोग होता है।

प्रस्तुति और अभिनय

तमाशा रात्रि के प्रथम प्रहर से प्रारंभ होता है और रात-भर मंचित होता है। दिवाली के समय, पोला पर्व (बैलों का त्योहार) और शादी-ब्याह के अवसरों पर फड़ (तमाशा दल) को नाट्य मंचन के लिए सुपारी (आमंत्राण) भेजा जाता है। खेल के आरम्भ में सबसे पहले ढोलक और हलगी (डफ) वादक मंच पर आते हैं। इनके गायन प्रारम्भ करने की घोषणा की जाती है। उसके बाद मंजीरा और तुनतुने (एकतारा) वादक आ जाते हैं। मंजिरा और तुनतुने वादक गायक भी होते हैं। इनके साथ सुरतिया सहयोगी गायक होता है। ढोलक तथा हलगी वादन की समाप्ति के बाद गणपति वंदना और फिर शिव, पार्वती, नाट्यदेवता की वंदना की जाती है। इस समय गायन-वाद्यदल दर्शकों की ओर पीठकर आगे बढ़ती है और पीछे हटते हैं। गायन के दौरान सोंगाडया का प्रवेश होता है। सोंगाडया भी गायन में शामिल हो जाता है।

            वंदना के बाद गोळण की प्रस्तुति होती है। गोळण यानि ग्वालन घुंघट को दोनों हाथों से पकड़े, लयबद्ध और मटकती चाल में मंच पर आती है। वह तालबद्ध चाल से रंगमंच का चक्कर लगाती हुई दर्शकों की ओर पीठकर खड़ी हो जाती है। दर्शक घुंघट उठने का बेसब्री से इंतजार करता है। सोंगाडया कोई चूक नहीं होने देता। वह कृष्ण का स्वांग करते हुये ग्वालिन को छेड़ता है। कृष्ण और उसके सखाओं द्वारा गोपियों की छेड़खानी, हास्य-परिहास एवं कामोन्मादक संवादों की झड़ी लग जाती है। कुछ देर के लिये पूरा मंच ही कृष्णलीला का स्थल हो जाता है। यहां दानलीला का प्रसंग प्रस्तुत होता है, जिसमें कृष्ण गोपियों से अपना हिस्सा मांगते हैं। दो और तीन लड़कियां दही का मटका लिये मटकती हुई मथुरा के बाजार से जा रही होती हैं। सोंगाडया उनको छेड़ते हुये उनसे राह करमांगता है। इस हास्य-परिहास के प्रसंग में मंच पर उपस्थित सभी कलाकार भाग लेते हैं। यहां तक कि वाद्य दल भी चूहलबाजी और चुटकी लेने से नहीं चूकते।

            गोळण की प्रस्तुति के बाद लावणी की धमाकेदार प्रस्तुति होती है। तमाशा की लावणी को प्रभावी बनाने वाला पात्र है नाच्यानाच्यावस्तुतः नर्तकी का मराठ रूप है। यह नाच्यालड़का होता है, कभी-कभी कोई स्त्री नाचीभी। अपनी साड़ी का पल्लू सिर के ऊपर पाल-सा पकड़कर दर्शकों की ओर पीठ करके नाचते हुए ठुमकते हुए से आती है। ढोलकी की लय और अधिक बढ़ती जाती है, साथ पदन्यास की लय भी। ढोलक की धीमी गति में पीछे से छुन्नूक-छुन्नूक आवाज दर्शकों का हृदय को बांधती है। नाच्या का आप में स्वतंत्र नृत्य होता है गतिमान तत्कार लेकर, पांवों को जोरदार झटका देकर एड़ी पर आघात करके, शरीर को हिलाते नाच्याचलता है। नाची शरीर की लचक से पल्लू को झटकारती, हिलाती उसके साथ खेलती-मटकती हुई अपने नयन-बाणों से बीच में ही अंगड़ाइयां लेती है, वृत्ताकार घूमती कमर पर हाथ रखकर कूदती-नाचती है, आकर्षक और शृंगारिक इशारे, हाव-भाव, नेत्रा पल्लवी और अंगविक्षेपों से प्रेक्षकों को आहत करती गाती है। लावणी की प्रस्तुति रस और तर्ज के अनुसार तथा शब्द रचना की विशेषता के आधार पर पहचानी जा सकती है। उसकी प्रस्तुति में सवाल-जवाब होते हैं।

            लावणी के नृत्य गीत के प्रसंग के मध्य दौलतजादा का प्रसंग होता। पेशवाई के पश्चात् तमाशा का राजाश्रय नष्ट होने पर जनाश्रय के आधार पर ही तमासगीरों को पैसे दिए जाने लगे। पैसे मिलने पर तमासगीर उन्हें दुआ देकर कहते, ‘‘दौलतजादा। ख्याने आपका अनका, उनका भला हो।’’ इसी से लावणी  में दौलतजादासंकेत ही बन गया और दिन-ब-दिन उसका स्वरूप बदलता गया और बदतर होता गया। कोई श्रोता या प्रेक्षक सिक्का अथवा नोट हाथ में लेकर नाचने वाले को देने लगा। पैसे  लेकर नाचीऔर अधिक  शृंगारिक चेष्टाएं करके दिखाने लगी। पैसे देकर लावणी की फरमाइश करने की प्रथा भी इसी से निकली।

            लावणी की करणीया प्रस्तुति करण को तमासगीर झगड़ाकहते हैं। विरोधपरक, जोरदार, तालबद्ध प्रतिकारात्मक लय में खटका और चटचटापन होता हैं। तुनतुनिया की सहज ध्वनि के द्वारा झगड़े का ठेका दिखाया जाता है। गाते-गाते उसी तर्ज में लावणी गाई जाती है। लावणी गाने का यह ढंग म्हणणीया टाकणीकहलाता है। तमाशा की करणी या झगड़े में उर्दू उत्तर-प्रत्युत्तर के शेर या सवाल-जवाब के गीत गाए जाते हैं । दोनों का झगड़ा दिखाते समय ठोस जोरदार शब्दों की परस्पर मार-ताल के माध्यम से रोचकता लाई जाती है। डफ और तुनतुनिये की आवाज भी खास खटकेबाज निकाली जाती है। कभी-कभी इस झगड़े में इतनी रंगत भर जाती है कि उस फडके दोनों पक्षों में जैसे झगड़ा शुरू हुआ हो। इसीलिए लावणी की रचना के साथ ही उसकी प्रस्तुति का विशेष महत्त्व है।

            लावणी के दूसरे चरण में रंगबाजी का प्रसंग होता है। रंगबाजी यानि रूमानी और हास्यपूर्ण मध्यान्तर। रंगबाजी में खटकेबाज लावणी, उत्कट  शृंगारपरक गीत, ठुमरी, कव्वाली, साकी, टप्पा आदि गीतों को नृत्य के साथ गाये जाते हैं। रंगबाजी के संवाद विशेषतः सूत्रधार, सोंगाडया और नाची के बीच चलते रहते हैं। इनमें  शृंगारिक प्रसंगों, गांव के किसी लड़की का किसी बनियें से प्रेम, अकेली स्त्री के घर में डाकुओं का घुस आना आदि प्रसंगों का स्वांग प्रस्तुत होता है। इसी क्रम में तमाशा में छक्कड़ भी गाया जाने लगा। आशु और माशुक का प्रत्यक्ष पद्यबद्ध संवाद छक्कड़ कहलाता है। सुरीली आवाज में साभिनय प्रस्तुत होनेवाले छक्कड़ का प्रसंग बड़ा मनमोहक होता है।

            इस प्रकार लावणीकारों ने संतों के पौराणिक और आध्यात्मिक विषयों का पूर्णतः त्याग न करते हुए उनमें तत्कालीन नए ढंग से नाट्यपूर्ण पद्धति से रंग भरकर प्रस्तुत किया जाने लगा। विवाह, पत्नी, मिलन, विरह, युद्ध के लिए पति को विदाई सात्विक प्रेम, परकीया प्रेम व्यभिचार, स्त्री का दुःख भोजन, अकाल जैसे कई लौकिक विषयों में शाहीरों ने संचार किया। उन्होंने शृंगार का खुला और अत्यंत निर्भयतापूर्वक वर्णन किया। इसीलिए तो शाहीरों का लावणी-साहित्य केवल उच्च वर्ग का काव्य नहीं था बल्कि ग्रामीण जनता के लिए समाज के सभी वर्णों के काव्य बना। लावणी में अनुस्यूत चित्रामयता, जीवंतता, भावों की खुलावट, संवादात्मकता अभिनय के लिए अनुकूल है साथ ही गानेवाले की नजाकत, नखरे, गर्दन के सूचक हावभाव, नेत्रचापल्य आदि उसमें नाटृयमयता लाता है।

            अब तक का यह प्रसंग तमाशा का पूर्वरंग माना जायेगा। तमाशा के पूर्वरंग में अध्यात्मिक वंदना से लेकर ऐहिक विषयों को प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद मुख्य खेल यानि वगप्रस्तुति की घोषणा दल के सरदार करते हैं। मुख्य गायक प्रथम लावणी के द्वारा पात्रों का परिचय देता है। कथासार कहता है । अभिनेता भूमिका अनुसार गद्य संवाद बोलते हैं और अगली लावणी कथासूत्र को जोड़ते हुये आगे बढ़ाती है । संवाद और लावणी के बीच नाच्या का मोहक नृत्य प्रस्तुत होते रहता है । दृश्य और स्थान परिवर्तन का बोध संवादों से कराया जाता है। संवाद और गीतों के बीच सुरतिये का जी जी जीका स्वर अभिनय को विशेष प्रभावी तथा बातों पर बल देने के लिये है है हैका स्वर नाटकीय सघनता को तीव्र बनाता है। कुल मिलाकर तमाशा का अभिनय, गायन, अंग संचालन तथा नृत्य शास्त्रीय न होकर शैलीबद्ध है।

            तमाशा के वगके अंत में सुबह होते फार्स दिखाया जाता है। फार्स का अंतर्भाव भी रंगबाजी और छक्कड़ के समान बाद के काल में होने लगा । कथावस्तु को बढ़ाने तथा हास्य उत्पन्न करने के कारण फार्स लोकप्रिय हुआ। फार्स में किसी विषय पर हल्के ढंग से उपहास और व्यंग्य किया जाता है । कभी-कभी छक्कड़ के बाद फार्स प्रस्तुत कया जाता है । पेशवाकालीन तमाशा में गण, गौळण, लावणी, भेदिक, कवन और मुजरा इतनी ही बातें थी । पर उत्तरकाल में उसमें गण गौळण के बाद संगीत लावणी और उसके साथ दौलतजादा, रंगबाजी, छक्कड़ और बाद में वग आ गया। 

            नाटक के भरतवाक्यके समान तमाशा के अंत में मुजरा गाने की पद्धति प्रचलित हुई । मुजरे में विभिन्न शाहिरों तथा साधुओं की वंदना की जाती है और उनसे आशीर्वचन मांगा जाता है । हालांकि आज मुजरे की परंपरा लगभग बंद हो गई है फिर भी मराठवाड़ा में आज भी कहीं-कहीं यह प्रथा जारी है।

 

वेशभूषा और रूप सज्जा

 

महाराष्ट्र के विभिन्न सामाजिक वर्गों की पोशाकें तमाशा के कलाकारों की वेशभूषा होती है। पौराणिक और ऐतिहासिक नाटकों के पात्र युगानुकूल भेष धारण करते हैं। मसलन वग यदि पेशवा कालीन घटनाओं पर आधारित है तो पात्र पेशवाई वस्त्र पहनेंगे। प्रायः सभी पुरुष पात्र धोती, लम्बा कुर्ता और कुर्ते के उपर फतुही पहनते हैं। कमरबन्द बांधना प्रायः आवश्यक समझा जाता है। कमरबन्द को शेला कहा जाता है। मराठी पगड़ी या फेंटा प्रायः सभी पुरुष पात्र धारण करते हैं। फेंटा कई प्रकार से बांधा जाता है। पगड़ी और फेंटा बांधने के तरीके से पात्रों का सामाजिक स्थिति का पता चलता है। स्त्री पात्र प्रायः लम्बी साड़ी (लगभग 8-9 गज) मराठी तरीके से पहनती है। नर्तकियों के पांव में घूंघरू, नाक में नथ, गले में कोल्हापुरी साज, हाथों में पाटली, कानों में मोतियों की कुण्डली और बालों में मोगरा और शेवंती फूलों का जुड़ा पहनती हैं। रूपसज्जा सामान्य होती है। रूपसज्जा के लिये आधुनिक सामग्रियों का उपयोग होता है।

 

नाट्य निर्देशक और कलाकार

साठ-सत्तर के दशक तक महाराष्ट्र में लगभग पाँच सौ तमाशा दल था। पाँच सौ दलों में लगभग पचास हजार कलाकार नाट्य प्रदर्शन के पेशे से जुड़े थे। इनमें से कुछ दल बहुत ही सुसंगठित और साधन सम्पन्न थे। इनके पास अपना टेन्ट, गतिमान मंच, मोटर गाड़ियां, प्रकाश व्यवस्था हेतु जेनरेटर आदि उपलब्ध था। विठा भाउ नारायणगांवर, दत्ता महाडिक, दत्तोबा ताम्बे, तुकाराम खेडकर, लीला गांधी, रोशन सतारकर, गुलाब संग मनेकर, कौशल्या कोपरगांवकर, शिवा साम्मा कवलापुरकर, सरला लता, लंका नांदुरकर और अनसूया पुष्पा जेजुरीकर आदि कलाकारों का दल सम्पन्न माना जाता था। दादा कोंडके तमाशा के प्रसिद्ध कलाकार हैं। दादा कोंडके द्वारा अभिनीत तमाशा विछा मांझी पुरी कराके आठ सौ से ज्यादा प्रदर्शन हो चुके हैं । तमाशा के नर्त्तकी (नाची) के रूप में पवळी महारिन, चंद्री, सवाई, नानी, भिल्लिन, सुन्दरी, कांताबाई सतारकर को बड़ी ख्याति मिली है।

 

 

 

वग

तमाशा का नाटक वगकहलाता है। वगके संवाद संपादणीकहलाते हैं। संवाद (सवाल-जवाब) गद्य-पद्य दोनों में होते हैं। पद्य संवादों को गाकर नर्तकी या अन्य पात्रा वगप्रस्तुत करते हैं। सहयोगी पात्रा जी-जी-जी की तर्ज दुहराते हैं। भाषा उर्दू मिश्रित मराठी होती है।

            वगमें पौराणिक या काल्पनिक आख्यान अथवा लोकजीवन से जुड़ी कथावस्तु, राजा-महाराजा, साहुकार, रखैल आदि के संबंध में कथासूत्र होता है। कभी-कभी भाई-भाई का संघर्ष, शराबखोरी या अद्भुतरम्य विषय भी संपादणी में आते हैं। संपादणी आरंभ होते ही सूक्ष्म निरीक्षणपूर्वक, चातुर्ययुक्त शब्दरचना तथा शब्दों के उच्चारणादि के द्वारा प्रेक्षकों में कौतूहल जगाकर प्रसंग या घटना को जीवंत किया जाता है। सुख-दुखपूर्ण उद्गारों के साथ वाद्य-संगीत ऊंचे स्वरयुक्त गीत, खटकेबाज संवाद, हास्य-विनोद, बीच में ही नाची का नृत्य आदि सब बातें वगमें आती हैं। रात-भर चलनेवाले वग की समाप्ति होते-होते हास्यमय सवेरे-सवेरे फार्स दिखाया जाता है।

            पेशवाकालीन तमाशा में वगनहीं होता था। तमाशा के उत्तरकालीन परिवर्तित रूप में सन् 1860 के आसपास में उसमें वगका समावेश होने लगा। यह समय मराठी रंगमंच का उत्कर्ष काल माना जाता है। तमाशा वालों ने नाटक से प्रेरणा ग्रहण कर वग में गद्य संवाद का समावेश किया। पठ्ठे बापूराव और दगडू साळी वग नाट्यके प्रवर्तक माने जाते हैं। वगके विषय पौराणिक आख्यान, प्रेमकथात्मक और सामाजिक तथा ऐतिहासिक प्रसंगों पर आधारित होते हैं। हरिश्चंद्र-तारामति, नल-दमयंति, सीता-सावित्रा, राजा श्रीयाळ  राजा विक्रम, भोजराजा, विक्रम राजा के प्रधन, झांसी की रानी, संत तुकाराम, संत दामाजी आदि तमाशा के लोकप्रिय वग हैं । कुछ काल्पनिक कथाओं के आधार पर भी वग रचे गए । मोहना बटावपहला काल्पनिक वग माना जाता है। कालान्तर में भूदान, समाजवादी समाज रचना, संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन, चुनाव, विभिन्न दलों के प्रचार आदि समकालीन विषयों पर आधारित वगों की रचना हुई। तमाश के आधुनिक लेखकोंमें शाहीर साबळे, अण्णाभाऊ साठे, पठ्ठे बापूराव, वसंत सबनीस, द. मा. मिरासदार, शंकर पाटिल जैसे नाम बताए जा सकते हैं।

 

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