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Monday, November 24, 2025

महाराष्ट्र की लोक चित्रकला : चित्रकथी- ओम प्रकाश भारती

 

 

महाराष्ट्र की लोक चित्रकला : चित्रकथी

 

भारतीय लोक परंपरा में चित्रकला का विशेष स्थान रहा है । लोक चित्रकला न केवल सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति है, बल्कि यह समाज की आस्था, संस्कृति और लोककथाओं का जीवंत दस्तावेज भी है। महाराष्ट्र की लोक चित्रकलाओं में चित्रकथी परंपरा अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट है। यह कला न केवल चित्रों की प्रस्तुति है, बल्कि कथा, संगीत और नाट्य का संगम भी है, जो लोकजीवन से गहराई से जुड़ी रही है।

चित्रकथी (Chitrakathi) महाराष्ट्र की एक प्राचीन और लुप्तप्राय लोक कला है, जो चित्रकला और कथावाचन का अनोखा संगम है। चित्रकथी यह शब्द 'चित्र' (चित्र) और 'कथा' (कहानी) शब्दों से मिलकर बना है, जो ठाकर आदिवासी समुदाय द्वारा मुख्य रूप से सिंधुदुर्ग जिले के पिंगुली गांव में प्रचलित है।चित्रों कीसहायता से कथा/ कहानी कहने की कला को चित्रकथी कहा जाता है। इसकास्थानिक भाषा में पारंपरिक नाम पोथीहै। यह कला केवल चित्र बनाना नहीं, बल्कि जीवंत कथानक प्रस्तुत करने का माध्यम है, जो रामायण, महाभारत और स्थानीय लोककथाओं को चित्रों के माध्यम से जीवंत करती है। ठाकरसमुदाय के ये कलाकार परंपरागत रूप से घुमंतू गायक, प्रदर्शक संगीतकार और कथावाचक हुआ करते हैं, जो गांव-गांव जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे।

चित्रकथी की जड़ें लगभग एक सहस्राब्दी पुरानी हैं। 13वीं शताब्दी के ग्रंथ 'ज्ञानेश्वरी' में इसका उल्लेख मिलता है।सोमेश्वर के ‘मानसोल्लास’ इस ग्रंथ में भी चित्रकथी का उल्लेख पाया जाता हैl मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में यह कला विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गई। ठाकरकलाकार गुप्तचर विभाग का हिस्सा थे, जो भेष बदलकर (कलाकार बनकर) गुप्त संदेश राजा तक पहुंचाते थे। शिवाजी  महाराज ने इन्हें जंगलों से गांवों में बसने और हस्तनिर्मित कागज पर चित्र बनाकर कहानियां फैलाने के लिए प्रोत्साहित किया। प्रदर्शन के बाद ये कलाकार द्वार-द्वार भिक्षा मांगते थे।

 

पारंपरिक पद्धति से चित्रकथी का प्रदर्शन मंदिरों में होता है। मंदिरों में पोथी (चित्रकथी) प्रदर्शन को जागर करणे ऐसा कहा जाता है।एक संपूर्ण आख्यान में 40 से 70  हस्तलिखित चित्र होते हैं। इन्हीं चित्रों का संच अर्थात पोथी।यह  चित्र 15 इंच लंबे x 12इंच के चौड़े  होते  हैlजो हस्तनिर्मित कागज पर बनाए जाते हैं।रंग प्राकृतिक होते हैंलाल, हल्दी से पीला, हरी (पत्तियों से), नीला (मिट्टी से) और अन्य बीजों व मिट्टी से प्राप्त। आधुनिक समय में आधुनिक रंगों का उपयोग भी होने लगा है। चित्रण में पारंपरिक और पौराणिक दृश्य तथा हाथी, घोड़े आदि प्राणी प्रमुख हैं। ठाकर आदिवासीयों की चित्रकथी केवल चित्रकला के रूप में मर्यादित ना होकर एक प्रयोगशील दृश्य-श्रव्य प्रदर्शन है। प्रदर्शन की भाषा मराठी तथा मालवणी होती हैl

चित्रकथी में जिन पौराणिक कथाओं का वर्णन होता है वह गीतबद्ध होता है। गीतों के माध्यम से विस्तार से कथा-कथन करते हुए चित्रों को दिखाया जाता है। प्रदर्शन करते समय कलाकार दर्शकों के समाने आसान लगाकर बैठता है। मुख्य कलाकार आख्यान बताता है और उसके साथी उसे साथ देते है। यह एक मौखिक परंपरा है। 

प्रदर्शन के दौरान कलाकार चित्रों को एक-एक करके खोलते हैं, जबकि तानपूरा, ढोलक, हुडुक, मंजीरा वाद्यों के साथ गायन, नाटकीय संवाद और लयबद्ध कथा सुनाते हैं। यह प्रदर्शन मंदिरों या गांव के आंगनों में नवरात्रि या दीवाली जैसे त्योहारों पर होता था। यह कला शिक्षा, मनोरंजन और गुप्त सूचना प्रसार का माध्यम रही।

 

चित्रकथी मुख्य रूप से पौराणिक कथाओं पर आधारित है, जैसे लंका दहन, राम विजय और रुक्मिणी स्वयंवर। ये चित्र सामूहिक स्मृति और मौखिक परंपराओं को संरक्षित करते हैं, जो समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखते हैं। यह कला आदिवासी समुदाय की मौखिक विरासत का जीवंत अभिलेखागार है। यह न केवल मनोरंजन देती है, बल्कि नैतिक शिक्षा और ऐतिहासिक घटनाओं को संप्रेषित करती है। ठाकरसमुदाय की यह कला महाराष्ट्र की 11 पारंपरिक कलाओं (जैसे कठपुतली, छाया नाटक) में से एक है, जो उनकी बहुआयामी कलात्मकता को दर्शाती है।

बढ़ते आधुनिकीकरण के कारण यह कला लुप्तप्राय हो गई है। सिंधुदुर्ग के पिंगुली गांव में सौ से अधिक ठाकरपरिवारों में से केवल कुछ ही कलाकार बचे हैं। पहले घुमंतू जीवनशैली के कारण यह जीवित रही, लेकिन अब युवा पीढ़ी इसमें रुचि नहीं ले रही।

गंगावने परिवार इस कला के संरक्षण में अग्रणी है। परशुराम गंगावाने (पद्मश्री प्राप्त) ने अपने पिता विश्राम गंगावाने से सीखा और पुत्र चेतन व एकनाथ को सिखाया। उन्होंने अपनी गौशाला को 'टाका’ (ठाकरआदिवासी कला आंगन) संग्रहालय एवं कला दीर्घामें बदल दिया, जहां 1,000 से अधिक मूल चित्र, वाद्ययंत्र और कठपुतलियां संरक्षित हैं। परिवार वर्कशॉप, प्रदर्शनियां, गुरुकुल कार्यक्रम और होमस्टे (टाका सुंदर होमस्टे) के माध्यम से इसे जीवित रख रहा है। पर्यटक यहां चित्रकथी सीख सकते हैं, मालवणी भोजन का आनंद ले सकते हैं और ग्रामीण जीवन अनुभव कर सकते हैं। अन्य प्रयासों में दस्तकारी हाट समिति जैसे संगठन भी शामिल हैं। गंगावाने परिवार के आलावा ठाकर समुदाय में  मसगे परिवार भी एक संग्रहालय चला रहे हैl

 

चित्रकथी कला की विशेषताएँ

1.    कथात्मक चित्रण – चित्रकथी में प्रत्येक चित्र एक कथा का अंश प्रस्तुत करता है। इन चित्रों को कपड़े, कागज़ या चमड़े पर बनाया जाता था।

2.    चलित प्रस्तुति – कलाकार इन चित्रों को एक क्रम में दिखाते हुए कथा सुनाते थे, जिसे चित्रकथन कहा जाता था।

3.    संगीत और संवाद – प्रस्तुति में लोकसंगीत, ताल, वाद्य और संवादों का प्रयोग होता था, जिससे यह कला लोकनाट्य का रूप ले लेती थी।

4.    लोक विषयवस्तु – इसमें रामायण, महाभारत, दशावतार, देवी-देवताओं की कथाएँ, संतकथाएँ और स्थानीय लोककथाएँ चित्रित की जाती थीं।

5.    रंग और शैली – प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक शैली का प्रयोग होता था। चित्रों में रेखाओं की सादगी और भावों की स्पष्टता प्रमुख होती थी।

चित्रकथी कला का प्रमुख केंद्र महाराष्ट्र के पिंगुली (जिला सिंधुदुर्ग) को माना जाता है। यहाँ की ठाकरसमुदाय के लोग पीढ़ियों से इस कला परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
प्रसिद्ध चित्रकथी कलाकारों में परशुराम गंगावनेगणपत मसगे, पालवे , रणशिंग, गरुड़ , पांगूल आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पिंगुली में लोककलासंग्रहालय भी स्थापित किया गया है, जहाँ चित्रकथी सहित अन्य पारंपरिक कलाएँ संरक्षित हैं।

संदर्भ

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3.    (सुमती लांडे) शब्दालय प्रकाशन

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5.    Telling of the Ramayana through chitrakathi, kalsutri and Dayati

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6.    खांडगे, (डॉ.) प्रकाश. 2017. ‘महाराष्ट्राच्या प्रयोगात्मक लोककला:परंपरा आणि

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