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Saturday, November 22, 2025

लोक गाथा वीर लोरिक- ओम प्रकाश भारती

 भारतीय जनक्रांति के प्रथम महानायक महानायक –वीर लोरिक - ओम प्रकाश भारती 

लोरिक भारतीय जनक्रांति के प्रथम महानायक थे । विभिन्न सृजनात्मक माध्यमों तथा आख्यानों में लोरिक के जीवन गाथा को उकेरा गया।लोरिकायन भारतीय परंपरा का महाकाव्य है । विषय की व्यापकता, विस्तार तथा वस्तु की दृष्टिकोण से इसे लोकमहाव्य की संज्ञा दी जा सकती है।



 हिन्दी प्रदेश की मैथिली, मगही, भोजपुरी मिर्जापुरी, छतीसगढ़ी तथा बुन्देली आदि बोलियों के अतिरिक्त बंगला और तेलगू भाषा में इस लोकगाथा के कई रूप मिलते हैं। भारत के लगभग 40 करोड़ लोगों की स्मृति में परम्परित और संरक्षित है। इस लिहाज से यह दूसरी लोकगाथा है। पहली लोकगाथा राजा भरथरी है, जिसका विस्तार हमें आर्यभाषा की लगभग सभी बोलियों प्राप्त होती है। तीसरी गाथा आल्हा-उदल हो सकती है। इन गाथाओं को महागाथा की संज्ञा दी जा सकती है। भारतीय लोक आख्यानों में लोरिकायन की एक अन्य विशिष्टता यह भी है कि इसने सहित्य के सृजकों को आकर्षित किया और सृजन के लिये उपजीव्य समग्री प्रदान की। संत कवि मुल्लादाउद ने लोरिक और चन्दा के प्रेम प्रसंगो का पुनर्सृजन कर चंदायन लिखा जो प्रेमख्यानक परम्परा की महत्पवूर्ण और कालजयी कृति है। बंगला रूपों को आधार बनाकर शाह सुलेमान ने सती मैनाबती और लोरचन्द्रा लिखा। हिन्दी के महान लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास पुनर्नवा की आधार सामग्री लोरिकयन को माना जाता है। उनके ही उपन्यास वाणभट्टठ्ठ की आत्मकथा के कई प्रसगों में लोरिकायन और उससे जुड़े स्थलों की चर्चा होती है। मगध से प्रयाग यात्रा के क्रम में वाणभट्टठ्ठ को लोरिक आश्रम आकर्षित करता है। मैथिली के प्रसि( उपन्यासकर तथा साहित्य आकादेमी पुरस्कार से सम्मानित डा॰ ब्रज किशोर वर्मा मणिपद्म ने 1970 में लोरिक विजय नाम से उपन्यास लिखा। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक तथा नाटककार सुमन कुमार ने लोरिकायन को आधार बनाकर हिन्दी नाटक-एक तारा टूटा की रचना की। इसके अलावे भी लोरिकायन ने हिन्दी और मौथिली के सृजकों को आधार सामग्रियां प्रदान की, जिनकी सूचना एकत्रा किया जाना शेष है।

मौखिक परम्परा में होने तथा कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं रहने के कारण लोरिकायन की ऐतिहासिकता तथा देशकाल को लेकर विद्वानां में मतभेद है। लोरिक का सबसे पहला लिखित साक्ष्य ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा तेरहवी शताब्दी में लिखित विश्वकोशीष ग्रंथ वर्णरत्नाकर में मिलता है। वर्णरत्नाकर में लोरिक नाच का उल्लेख हुआ है। मिथला में आज भी लोरिक नाच का मंचन होता है। इसकी कथावस्तु और लोरिक गाथा की कथावस्तु एक जैसी है। किसी भी घटना को आख्यान में परिवर्तित होने या लोकस्मृति में रचने-बसने में सौ वर्ष का समय लग सकता है। वर्णरत्नाकर का समय तेरहवीं शताब्दी है, तो सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि लोरिक उससे सौ पूर्व यानि 12वीं सदी या उससे भी पहलो हुये होगें। अन्य सभी विद्वानों ने भी लोरिक का समय आठवीं से तेरहवीं सदी के बीच माना है। हरदीगढ़ जो लोरिक का कर्मक्षेत्रा रहा है वहां की पुरातात्विक खुदाई में जो भवन के अवशेष और मूर्तिया मिली हैं, पुरातत्वविदों ने उसका काल 8वीं सदी तय किया है।

लोक आख्यानों की भाषा आज की भाषा होती है। इस तरह भारतीय लोकआख्यानों को चिर नवीन कह सकते हैं। घटनाएं चिर होती हैं। और भाषा तथा संवेदना नवीन। मौखिकता के कारण गायक द्वारा कुछ स्थानों के नाम बदल दिये जाते हैं। अतः भाषा और स्थान को लेकर लोकगाथाओं का कालक्रम तय करना भ्रामक होगा। लोकगाथाओं का देशकाल करने में सबसे अधिक सहायक तत्व है, गाथा में वर्णित समाज। लोरिकायन में वर्णित समाज, सामंती समाज है। सामाजिक इतिहासकार 8-12वीं सदी को सामंती काल मानते हैं। गौ और स्त्रियों का अपहरण सामंती काल में पराकाष्ठा पर था। लोरिकायन की मुख्य घटनाएं गौ और स्त्रियों के अपहरण के इर्द-गिर्द है। नायक लोरिक गौ और स्त्रियों के उद्धार के लिए संघर्ष करते हैं। 

मौलागत गौरा के राजा हैं, सहदेव अगौरी के राजा है तथा हरदीगढ़ के राजा महबर है। ये सभी लिखित नाम इतिहास में गौण है। दरअसल हर्षव(र् के बाद यानि 7वीं से-13वीं सदी तक जब तक कि दिल्ली सल्तनत स्थापित नहीं हो जाती, उत्तर और मध्य भारत में कोई शक्तिशाली संगठित राज्य नहीं था। छोटे-मोटे सामंतों ने अपने को राजा घोषित कर दिया। ये निरंकुश और स्वेच्छाचारी थे। लोरिकायन में वर्णित राज्य प्रणाली और इसी सामंती परम्परा और काल के हैं। थे। एक और तथ्य यह है कि लोरिक शाक्त थे। दुर्गा उनकी आराध्य देवी थी। 7 वीं से 14 वीं सदी के बीच शाक्त का पराभव काल माना जाता है। निष्कर्ष में लोरिक का समय 8 वीं से 13 वीं सदी के बीच कुछ भी तय किया जा सकता है। मेरी दृष्टि में  लोरिक दसवीं सदी में अवश्य थे। 

लोरिकायन पर अब तक कई विद्वानों ने महत्वपूर्ण शोध किया है। इसके कई प्रतिरूप संकलित किये गये हैं। यहां कुछ विद्वानों की चर्चा करना समीचीन होगा। पुरातत्वविद् बेगलर ने 1850 में भोजपुरी रूप का संक्षिप्त कथानक लिखा, 1885 में भाषाविद् जार्ज अब्राहम ग्रिर्यसन ने मगही रूपों का संकलन किया। डब्ल्यू क्रुक ने मिर्जापुरी रूप पर शोध आलेख लिखा। वैरियन एल्विन ने ‘पफोक सांग्स आपफ छतीसगढ’़ में छतीसगढ़ी रूप को प्रस्तुत किया। डा॰ शरतचन्द ने1890 में भोजपुरी और बांगला रूपों का तुलनात्मक शोध अध्ययन प्रस्तुत किया। अभी हाल में प्रो नरेश जैन ने छत्तीसगढ़ी रूप का अंग्रेजी अनुवाद किया है, जो प्रकाशन की प्रतीक्षा में है। मैथिली में डा॰ मणिपद्म, डा॰ एल॰ पी॰ श्रीवास्तव और मायानंद मिश्र का शोध कार्य महत्वपूर्ण है। मगही में डा॰ सम्पत्ति आर्याणी ने संकलन प्रस्तुत किया है। मिजोपुरी रूप को लेकर डा॰ अर्जुनदास केसरी ने समग्र रूपों का संकलन और शोध अध्ययन प्रस्तुत किया है, जो अति महत्वपूर्ण और प्रमाणिक है। भोजपुरी में डा॰ सत्येन्द्र और डा॰ कृष्णदेव उपाध्याय का शोध महत्वपूर्ण है। डा॰ सत्येन्द्र ने 1952 में भोजपुरी लोकगाथा विषयपर डी॰ लिट की उपाधि के लिये अपना शोध प्रबंध इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया। इस शोध प्रबंध में लोरिकायन के भोजपुरी रूपों तथा अन्यरूपों से उसका तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। भोजपुरी रूप का एक महत्वपूर्ण संकलन डा॰ मन्नू यादव ने किया है जो प्रकाशन की प्रतीक्षा में है। छतीसगढ़ रूप को लेकर डा॰ सोमनाथ यादव और डा॰ पी॰ सी॰ लाल यादव का शोध महत्वपूर्ण है। लोरिकायन पर अन्य कई महत्वपूर्ण शोध कार्य भी हुये है, जिसका उल्लेख यहां संभव नहीं है। अब तक की गई शोध चर्चा के सभी विद्वान भाषा, साहित्य तथा लोक संस्कृति के अन्वेषक हैं। एक केवल बेगलर हैं, जो पुरातावविद हैं। एक और इतिहासकर प्रो॰ हसन असकरी (पटना विशविद्यालय) ने 1952 ई में लोरिकायन पर शोध आलेख लिखा था, जो अप्राप्त है। आवश्यकता इस बात है कि मानविकी के अलावे समाज विज्ञान के अध्येताओं को भी इसक्षेत्रा में आना चाहिये, जिससे कि इस महागाथा के सामाजिक और ऐतिहासिक महता को समझा जा सके।

लोरिकायन अहीरों का जातीय काव्य है और लोरिक जातीय नायक। इसलिये न केवल मगध और मिथिला में अपितु अन्य अंचलों में भी मांगलिक और शुभ अवसरों पर मुख्यरूप से अहीर जाति इस गाथा का शौर्यपरक गायन करते हैं। कालांतर में अन्य समुदायों के कलाकारों और लोकगायकों ने भी मनोरंजनार्थ तथा जीविकोपार्जन के निमित इस गाथा को गाना आरंभ किया। मैथिली, मगही, भोजपुरी तथा मिर्जापुरी रूपों में लोरिक के जीवन से जुड़े वीरकथात्मक प्रसंगों प्रमुखता से गाया जाता है। इन रूपों में लोरिक वीरनायक है, जबकि छतीसगढ़ी रूपों में लोरिक और चन्दा के प्रेम प्रसंगों को प्रमुखता से उद्घाटित किया गया है। मिथिला और मगध में लोरिकायन प्रायः ढोलक पर उच्च लय में गायी जाती है। एक दल में एक मूलगायन और तीन-चार सहायक टेकिये होते हैं। मूलगायन उच्च लय में स्वर अलापते हुये एक सीमा पर जाकर छोड़ देते हैं। टेकिये वहां से स्वर को उठाकर आगे बढ़ता है। वीरता का आख्यान प्रस्तुत करते समय गायकों का ताली देते हुये आठ से दस की पफीट उफँचा कूदना आम बात है। गीत लयव( गद्य जैसे होते हैं। तुकबंदी और छंदो का प्रयोग यदा- कदा होता है।

लोरिकी कंठ से नहीं नाद गायी जाती है। गाने वाले चरवाहे और श्रमिक होते हैं। नाद से जब स्वर आलापा जाता तो गायक के शरीर में असंख्य स्वर तरंगों का निमार्ण होता है, जो शरीर में सुषुता अवस्था में पड़े उत्तकों और इन्द्रिया को सक्रिय कर देता है। शरीर में नये उर्जा का संचर होता है और दिनभर की थकान मिट जाती है। लोरिकायन के अधिकांश प्रसंग वीर, शृंगार और करण रस के हैं। इन रसों के साथ गायक और श्रोता कुछ क्षण के लिये कैथारसिस (भावप्रमणता) में चले जाते हैं। गाथा की घटनाएं कुछ देर के उनके जीवन घटनाएं लक्षित होती है। हर्ष और विषाद की इस सुखद अनुभूति से जीवन की उलझनों  सामना करने की उर्जा मिलती है ।

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