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Saturday, November 22, 2025

बिहार की लोक चित्रकलाएं - मधुबनी, मंजूषा तथा जादोपटिया, डॉ ओम प्रकाश भारती


बिहार की लोक चित्रकलाएं - मधुबनी, मंजूषा तथा जादोपटिया 


 मंजूषा चित्रकला 

 चित्रकला मानवीय अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। हिमयुग से अंतरिक्ष युग तक की यात्राएं मानव ने दस हजार वर्षों में तय की है। ये लम्बी यात्राएँ मानव की संघर्ष यात्रा रही है। मानव नित नये आलोक और आनन्द की खोज में साधनारत रहा है। इस प्रक्रिया में उसने आत्मान्वेषण, चिंतन तथा कल्पनाओं का सहारा लिया है। ये कल्पनाएं कभी ध्वनि संकेत, तो कभी चित्र संकेत के रूप में अभिव्यक्त होती रही हैं। यही चित्र संकेत हमें लोकचित्रकलाओं के विविध रूपों में प्राप्त हैं।

ज्ञानार्जन के लिए आदि मानवों ने दो माध्यमों को अपनाया श्रुति और दृश्य। श्रुति से संगीत का विकास हुआ, जबकि दृश्य से लिपि और चित्र का। वैदिक काल में ही मानवों ने दृश्यों (चित्रों) को सीखने का माध्यम बना लिया था। लिपि का आविष्करण मानव के चित्रात्मक प्रवृत्ति, कल्पना और अभिव्यक्ति का प्रतिफल है। कालांतर में संस्कृति के विकास के साथ-साथ चित्रकला उपयोगितावादी बनी, जिसे हमने सांस्कृतिक वृत्ति कहा। घड़े, सिक्के, दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, धार्मिक आनुष्ठानिक अभिव्यक्ति, प्राकृतिक घटनाओं का चित्रण आदि चित्रकला के अंग बनते गये।

बिहार में मिले पुरापाषाणकालीन अवशेषों में कई चित्रात्मक अभिव्यक्तियां मिलती हैं। बौद्ध काल में ये अभिव्यक्तियां और निखरीं। सामाजिक, धार्मिक अनुष्ठानों और चिंतनों ने कई कलारूपों को जन्म दिया। इन कलारूपों ने मध्य युग तक पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित किया। मध्य युग में चीन, तिब्बत, मंगोलिया, कोरिया, श्रीलंका आदि देशों में इसका प्रसार हुआ।

बिहार की लोकचित्रकलाओं में मिथिला चित्रकला, जादोपटिया तथा झाँप आदि महत्त्वपूर्ण हैं। इन चित्रकलाओं की सबसे बड़ी विशेषता है कि इनका विकास राग और रंगों के साथ हुआ। इन चित्रों को गढ़ते समय कलाकार गीत अवश्य गाते हैं। इसलिए इन कलारूपों की रेखाओं में एक अलग तरह की लयबद्धता का आभास होता है।

मिथिला कला के नाम से प्रसिद्ध चित्रकला मुख्यतया तीन प्रकार की होती हैं-भू-चित्रण (अरिपण), भित्ति चित्रण (कोहबर) तथा पट-चित्रण।

मिथिला में भू-चित्रण की परंपरा वैदिक काल से ही है। ब्राह्मण युग केकर्मकांडीय ग्रन्थों में कई स्थलों पर भूमि-चित्रण के लिए 'अर्पण' शब्द का प्रयोग हुआ है। भारत के अन्य अंचलों में भी भू-चित्रण की लोक परम्परा है। सोलहवीं शताब्दी ने विद्यापति ने अरिपन के संबंध में लिखा है-

ललातरूअर मण्डप जीति, निरमल ससधर घबलए भीति हरि जब आओब गोकुलपुर, घारे-घारे नगारे बजाए जयतर अरिपन देओब मोतिमहारे मंगल कसल करब कुचहार।।

राजस्थाना में माँडणा, महाराष्ट्र में रंगाली, बंगाल और असम तथा त्रिपुरा में अल्पना, उत्तर प्रदेश में साँझी, आंध्रप्रदेश में मुग्गु तथा केरल में कोलम् के नाम से भू-चित्रण की परम्परा है।

मिथिला में पर्व-त्यौहार के अवसरों पर महिलाएँ घर के आंगन को गोबर और चिकनी मिट्टी से लिपती हैं, जिसे चौका कहा जाता है। चौका के ऊपर पिठार (अरवा चावल का सफेद घोल), सिंदूर, गेहूँ का आटा तथा गेरू से फूल-पत्तियां बेल-बूटे, पशु-पक्षी, पेड़-पौधों, पद-चिन्ह, देवी-देवताओं की आकृतियां चित्रांकित की जाती हैं। इन चित्रणों में कभी-कभी तांत्रिक प्रतीकों और कथाओं को भी रेखांकित किया जाता है। मिथिला में चौथ-चन्द के अवसर पर बनाये जाने वाले अरिपन बड़े मनमोहक होते हैं। चतुः शंख, तुसारी पूजा, कोजगरा, मधुश्रावनी, षष्टी पूजा, दशपात, उबटन, सांझ, कल्याणदेई पूजा, गवाहा संक्रान्ति, तुलसी पूजा, सत्यनारायण पूजा आदि के अवसरों पर बनाये जाने वाले अरिपण मंगलदायक और मोहक होते हैं। इन रेखाचित्रों में कई तांत्रिक और धार्मिक अभिव्यक्तियां छुपी होती हैं।


                  राजा सलहेस, मधुबनी चित्रकला 
                     राजा सलहेस, मधुबनी चित्रकला 


मिथिला चित्रकला का दूसरा और महत्वपूर्ण प्रकार है-भित्ति-चित्रण। विभिन्न धार्मिक और आनुष्ठानिक अवसरों परं भित्ति चित्र बनाये जाते हैं। मिथिला में अधिकांश घर मिट्टी की भीत से बने होते हैं। इन भीतों को गोबर चिकनी मिट्टी से लीपा जाता है और उसके ऊपर पिठार के संग अन्य प्राकृतिक रंगों (तोड़ी फूल, हरा, लाल) से विभिन्न सांकेतिक आकृतियां बनायी जाती हैं। लेकिन इसमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है-कोहबर लेखन। मिथिला में विवाह के बाद दूल्हा-दुल्हन के लिए किसी कक्ष को विशेष रूप से सजाया जाता है, उसे कोहबर कहा जाता है। कोहबर घर में कुलदेवता की स्थापना की  तांत्रिक प्रतीकों का अंकन करती कोहबर लेखन मिथिला की एक ज्यामितिक एवं तांत्रिक पद्धति की चित्रकला है। इसमें विघ्न बाधा हरण तथा मंगल सूचक कई आकृतियां बनाई जाती हैं। कोहबर घर वर-वधू के किसी तरह की अनिष्ट से रक्षा करती है। बांसपरैन, कमल का फल और के मुख्य द्वार तथा घर के चारों कोणे में नैनायोगिन का चित्रांकन किया जाता है। नैनायोगिन पत्ता, कछुआ, मछली, मोर, तीतर, सुग्गा (तोता), मैना, सूर्य, चन्द्र, कमल, कल्पवृक्ष, हंस, अनार का पेड, आम का पेड तथा फले हुए केले का पेड आदि का प्रतीकात्मक चित्रण कोहबर घर में किया जाता है। कुछ कामोत्तेजक चित्रण यथा, लिंग-योनि के चित्र कोहबर घर में बनाये जाते हैं। बाँस वंश वृद्धि, केले मांसलता, सुग्गा ज्ञान के विकास, सिंह अजस्र शक्ति, हाथी-घोड़े ऐश्वर्य, सूर्य-चन्द्र कछुआ दीर्घ जीवन, हंस-मयूर सुख-शांति तथा कमल का पत्ता स्त्री प्रजननेन्द्रि के प्रतीक के रूप में चित्रित किए जाते हैं।

                            कोहबर चित्रकला 

कोहबर घर एक अद्भुत सामाजिक सांस्कृतिक उपादान है, जहाँ दो अनभिज्ञ युगल के मिलन के लिए आनुष्ठानिक विधान सामाजिक जिम्मेवारी है। कोहबर घर को सजाने या आनुष्ठानिक प्रक्रिया को पूरी करने में पूरे गाँव या समाज की सहभागिता होती है। यहाँ युगल जोड़ी के मिलन और जीवन की चुनौतियों से सामना करने का उद्दीपन जुटाया जाता है। समाज अब तक के उपार्जित ज्ञान, अनुभव और संस्कारों को कोहबर घर के रूप में सजाते हैं। 'गीतहरि' गीत गाती हैं और 'लिखनी' गीतों की लय पर भावप्रमण आकृतियां गढ़ती हैं-

नवी रे कोहबरबा के रंगो ने मलिन भेलै

अहाँ परभू जाइछी बिदेस हे

केकरा पर सोभते परभू लाली रे पलंगिया

केकरा पर सोभतै परभू हीरा-मोती सोनमा

केकरा पर करबै सिंगार हे

कोइली सबद जिया साले हे

नहिरा मे छको धनी माई-बाप भइया

ससुरा मे छोटका दियर हे

की करतै भाई-बाप, की करतै भैया

की करतै छोटका दीयर हे

अहीं पर सोभतै परभू हीरा-मोती सोनमा

अहीं बिनु पलंगा उदास हे। 

अभी तो कोहबर का रंग मलिन भी नहीं हुआ है और आप मुझे छोडकर प्रदेश जा रहे हैं। किसके लिए सेज लगाऊँगी, किसके लिए श्रृंगार करूंगी ? (आपके नहीं रहने से) कोयल की बोली हृदय को सालती है। पति समझाते हुए कहता है नैहर में माँ-बाप और भाई हैं, ससुराल में छोटा देवर है। विरहनी कहती है-मां-बाप भाई और देवर कुछ नहीं कर सकते, आपके रहते ही श्रृंगार और सेज की शोभा रहेगी।

इस तरह राग और रंगों के संग रेखाओं से चित्रांकन किया जाता है।

मिथिला चित्रकला का तीसरा प्रकार है-पटचित्रण। पटचित्रों के माध्यम से लोकमहाकाव्यों के आख्यान प्रस्तुत किये जाते हैं। मिथिला के प्रसिद्ध शासक शिवसिंह के समय पटचित्रण की समृद्ध परम्परा का उल्लेख मिलता है। विद्यापति वर्णित राधा-कृष्ण की लीलाएँ, गीत-गोविन्द, राजा सलहेस, रायरणपाल, लवहरि-कुशहरि, नायनैकानजरा जैसे लोकगाथाओं से जुड़े विविध प्रसंगों को पट पर चित्रित किया जाता है। पट चित्र मुख्यतया घर के भीतों तथा कागजों को जोड़कर बनाये गये वितान पर बनाये जाते हैं। इन दिनों सिल्क की साड़ी और खादी वस्त्रों पर पट चित्र बनाये जा रहे हैं।

मिथिला चित्रकला की तूलिका लकड़ी, बाँस की कमाची या दियासलाई की तिलियों से बनायी जाती है। रंग भरने की तूलिका के सिरे पर रुई अथवा सूत लपेटा होता है। ये तूलिकाएं कलाकार स्वयं बनाते हैं। मिथिला चित्रकला के कलाकार रंग स्वयं तैयार करते हैं। सफेद रंग पीठार या उड़द की दाल, सेम के पत्तों से हरा रंग, हरसिंगार के फूलों और डंटल से नारंगी रंग, हल्दी से पीला रंग, नील के पौधों से नीला रंग, केसर और पलास के फूलों से केसरिया रंग, लाख से महावर या लाल रंग तथा घोंघे से बैगनी रंग तैयार किये जाते हैं। काई, गेंदा के फूल, जामुन की छाल, सिक्कटा की घास तथा उड़हूल के फूल आदि से भी प्राकृतिक रंग प्राप्त किये जाते हैं।

मिथिला चित्रकला, रेखाओं की बारीक संयोजन के कारण आकर्षक लगती है। स्त्री और पुरुष के चित्रांकन में कलाकार आँख और नाक को विशेष रूप से उकेरते हैं। आँखें गहरी लम्बी तथा नाक तीखी लम्बी बनायी जाती है।

इस तरह मिथिला चित्रकला, मिथिला की संस्कृति और जनजीवन की जीवंत झाँकी प्रस्तुत करती है। इन चित्रों के प्रतीकों के निहितार्थ मिथिला की गौरवमयी सांस्कृतिक परंपरा है। मिथिला कई बौद्धिक और दार्शनिक आंदोलन का उन्नायक केन्द्र रहा है। शैव, शाक्त और फिर वैष्णव चिंतन के उत्थान और समन्वयीकरण इन चित्रकलाओं में देखा जा सकता है। नागफण, त्रिशूल, डमरू, बसहा बैल, शैव चिंतन का प्रतीक; मत्स्य, घट, नारियल, खंडा, मुंड, स्त्री के गहने, बाहर निकली हुई जिह्वा, तीसरा नेत्र, आग की ज्वाला आदि शाक्त चिंतन के प्रतीक तथा कमल, शंख, चक्र, गदा,पद्म, रामविवाह, धनुषभंग, पुष्पवाटिका, सीताहरण, केवट प्रसंग, सीता का ससुराल जाना तथा कालियदमन आदि वैष्णव चिंतनधारा के प्रतीक के रूप में मिथिला चित्रकला में चित्रित होते हैं।

जनजातीय अभिव्यक्ति- जादोपटिया चित्रकला 

जादोपटिया बिहार और बंगाल की सीमांचल में प्रचलित चित्रकला की प्राचीन शैली है। यह चित्र संताल जनजाति की एक उपजाति 'जादो' लोगों के द्वारा कई पीढ़ियों से बनाया जाता रहा है। जादो मुख्यतः संतालों के पुरोहित होते हैं. जो गाँव-गाँव घुमकर पट के ऊपर चित्र बनाते हैं और उन चित्रों से सम्बन्धित कथाएँ लोगों में वांचते और गाते हैं। गाँव के लोग उसे दक्षिणा देते हैं; जिससे उसका जीवन यापन होता है।




जादो समुदाय द्वारा चित्रित किए जाने के कारण ही इस कलारूप को जादोपटिया कहा जाता है। कहीं-कहीं इसे 'जामपट' भी कहा जाता है। जादोपटिया दक्षिण-पूर्व एशिया की प्राचीन पट चित्र शैली परम्परा की महत्वपूर्ण कड़ी है। भारत के अलावा नेपाल, तिब्बत, मंगोलिया, जावा, सुमात्रा, भूटान तथा श्रीलंका आदि देशों में बौद्ध युग में पट चित्र की परम्परा थी। भारत में रामायण और महाभारत काल में यमपटक (पट चित्र) की परम्परा रही है। विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस, वाणभट्ट के कादम्बरी और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पटचित्र के उल्लेख मिलते हैं। सोलहवीं शताब्दी में शंकरदेव ने अकिया भावना (असम का पारम्परिक नाट्य) के प्रदर्शन के लिए पटचित्र बनवाया था। पटचित्र परम्परा की अवशेष के रूप में आज हमें सिर्फ जादोपटिया और राजस्थान में प्रचलित 'पड़चित्र' उपलब्ध है।

जादोपटिया शैली के चित्र कपड़े या कागज के टुकड़ों को जोड़कर बनाए गये पट वितान पर बनाया जाता है। यह पट 15 से 20 फीट लम्बाई-चौड़ाई का होता है। प्रत्येक पट पर चार से सोलह चित्र बने होते हैं। चित्रों को बनाने में मुख्यतः भूरा, हरा, पीला और काला रंग प्रयोग में लाया जाता है। ये रंग प्राकृतिक स्रोतों से तैयार किये जाते हैं यथा--हल्दी से पीला रंग, एक विशेष प्रकार के पत्थरों को घिसकर भूरा रंग, हरे पत्ते से हरा रंग आदि। बबूल के गोंद में मिलाकर रंगों का लेप तैयार किया जाता है। इस तरह रंग टिकाऊ और असरदार बना रहता है।


जादोपटिया चित्रों में सहज जनजातीय भावनाओं की रेखीय अभिव्यक्ति है। चित्रों में रहस्य या गुंफन नहीं के बराबर होता है। रैखिक गतिशीलता और अवचेतन की प्रधानता जादोपटिया शैली की मुख्य विशेषता है। मिथ, कल्पना और वर्तमानका अद्भुत समन्वय जादोपटिया चित्रों में देखा जा सकता है। चित्र के विषय मुख्यतया पौराणिक तथा नैतिक आदर्शों से जुड़े होते हैं। 'का राम विनती' (संतालों की उत्पत्ति की कथा) को मुख्य रूप से चित्रित किया जाता है। इस कथा में मरांङ-बुरू (शिव) और जाहेर ऐरा (भगवती) ने किस तरह हांस-हासिनी (हंस-हंसनी) को रचा और फिर किस तरह हंस हासिनी' के अंडे से 'पिलच् हडाम' और 'पिलच बूढा' (संतालों के आदि दम्पत्ति) का जन्म हुआ तथा किस तरह उनके सात बेटों और बेटियों ने संताल समाज की स्थापना की आदि चित्रित होते हैं।

संतालों में पुनर्जन्म, मर्त्यलोक, तथा यमलोक, आदि की धारणाएँ प्रचलित हैं। मर्त्यलोक में किये गये बरे कार्यों का फल यमलोक में भुगतना होता है। ऐसे चित्रों के माध्यम से सामाजिक नियंत्रण और नैतिक शिक्षा का संदेश दिया जाता है। इसके अलावे राम और कृष्ण के चरित्रों को केन्द्र में रखकर भी कुछ चित्र बनाये जाते हैं। कुछ चित्र जनजातीय योद्धाओं और सैनिकों के भी होते हैं। 

अंग जनपद की लोककला - मंजूषा चित्रकला 





गीतों और रागों के संग चित्रकारी की एक अन्य अल्प परिचित परम्परा है-झाँप।

कुछ लोगों ने इसे मंजूषा चित्र कला कहा है। झाँप और मंजूषा समानार्थी शब्द है। यह चित्रकला विशेषकर बिहार के अंग और कोसी अंचलों में प्रचलित है।

झाँप देवी-देवताओं के पिरी (पिंडी) के ऊपर लगाया जाता है। यह कोरिला (एक प्रकार का स्थानीय पौधा, जो सिर्फ पानी में उगता है) के तने में बाँस की कमाची से बेध कर तैयार किया जाता है। ढाँचे के ऊपर कागज (अकसर अखबार) को चिपका दिया जाता है। कागज के ऊपर प्राकृतिक रंगों से चित्र बनाये जाते हैं। चित्र सांकेतिक और रेखाएँ समकोणिक होती हैं। बाँस की करची से बनी कूची से पहले रेखाएँ खींची जाती हैं और फिर उन रेखाओं के बीच रंग भरा जाता है। लाल, तोड़ी फूल (पीला), नीला तथा हरा आदि रंगों का प्रयोग बहुतायत में होता है। घोड़ा, हाथी, बाघ, वनतीतर, साँप, पालकी, मयूर (सभी देवी-देवताओं के वाहन) आदि चित्र बनाये जाते हैं। झाँप मुख्यतः माली जाति के लोग बनाते हैं। अतः इसे माली चित्रकला भी कहा जाता है। किसी विशेष अवसर पर यथा, ब्याह, मुंडन, दीपावली, दुर्गापूजा तथा अन्य त्यौहारों पर 'गहवर' (देवी-देवताओं के लिए बना घर) में नया झाँप चढ़ाया जाता है। पुराने झाँप को कुंवारी कन्याएँ गीत गाती हुई नदी या पोखर में विसर्जित कर देती हैं।

इस तरह बिहार में लोक चित्रकलाओं की समृद्ध परम्परा है। रंग और रेखाओं के साथ राग (गायन), भारतीय लोक चित्रकलाओं में इसकी अलग पहचान कायम करता है।

(ओम प्रकाश भारती,आत्मकथा, 22 अक्टूबर 1988, पटना)

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