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Saturday, November 22, 2025

लोकगाथा नटुवा दयाल - ओम प्रकाश भारती

 लोकगाथा नटुवा दयाल - ओम प्रकाश भारती 

                  AI Pic. Natua Dyal Singh

नटुवा दयाल सिंह या दुलरा दयाल सिंह महाकाव्यात्मक लोकगाथा है, जो विशेषकर बेगूसराय और खगड़िया जिलो में गाई जाती है। इस गाथा को दयालसिंघी भी कही जाता है। गाथागायक पखवज़ के साथ दयालसिंघी गाता है। पीछे से एक या दो टेकिये, टेक भरते हैं।

नटुवा दयाल बिहार की पिछड़ी जाति गोढ़ी (मल्लाह) समुदाय से थे। मल्लाह लोग दयाल सिंह की दुहाई देते हैं, तथा उसकी पूजा करते हैं। नटुवा-नाच (बिहार का पारम्परिक नाट्य) के कलाकारों द्वारा दयाल सिंह का नाच भी किया जाता है। दयाल अपने लोककल्याणकारी कार्य के लिए लोक में पूजित है। उन्होंने कालाजादू, डायन योगिन से समाज को मुक्ति दिलाने के लिये कामाख्या शक्तिपीठ (असम) की यात्रा की, वहाँ से तंत्र विद्या सीखकर वापिस आया और तंत्र साधको को दंडित किया। कहा जाता है कि एक बार कमला नदी सूख गयी। कमला की धारा को उन्होंने अथक प्रयास से पुनर्जीवित किया। गाथा की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है -

मिथिलांचल के दरभंगा जिले में भरौड़ा नाम का कोई राज्य था। भरौड़ा के राजा विश्वम्भर मल्ल थे। उनकी रानी गजमोती अति सुन्दर थी। राजा-रानी के एक मात्र पुत्री थी। बहुत मान मनुहार, मनौती के बाद अधवेसू राजा रानी को पुत्र हुआ। जिसका नाम दुलरा दयाल रखा गया। दयाल जन्म से ही, प्रतिभावान था। तंत्रविद्या और नृत्य में पारंगत होने पर लोग उसे नटुआ दयाल कहने लगे।

भरौड़ा के सेनापति भीमल नामी पहलमान था। अपने समकालिक कई अजोध और पिच्छड़ पहलवान का वध वह कर चुका था। बाँसुरी बजाना और कौओं को प्रशिक्षित करना उनका शौक था। उनके द्वारा प्रशिक्षित कौओं की शोहरत दूर-दूर तक फैली थी। प्रशिक्षित कौओं की बिक्री से बड़ी आमदनी होती थी। जग्गा कौआ उनका प्रिय काक था। उसे उन्होंने कभी नहीं बेचा। कहा जाता है, जग्गा सर्वज्ञ था।

दयाल के गुरु मंगल थे। मंगल के सानिध्य में दुलरा श्रेष्ठ सार्थवाह, नर्त्तक वादक (पखावज और बाँसुरी) के साथ-साथ तंत्रविद्या में पारंगत हुआ।

जग्गा काग ने भविष्यवाणी की "इस वर्ष भरौडा के वार्षिक मेले में बखरी की राजकुमारी अमरौती (अमरावती) आ रही हैं।" दरअसल, दुर्गा दशमी के महाअष्ठमी के दिन भरौड़ा में पाँच काले छागड़ की बलि दी जाती थी। उसके बाद तांत्रिक नृत्य का आयोजन होता था, जिसमें देश-देशान्तर के लोग भाग लेने आते थे। अमरौती भी इसी अनुष्ठान में भाग लेने आ रही थी।

कमला नदी के तट पर इस अनुष्ठानिक युगल नृत्य को देखने के लिए देश-देशान्तर के लोग इकट्ठे थे। कमला पूजन के बाद तांत्रिक नृत्य का घमासान हुआ। दयाल और अमरौती एक दूसरे पर मोहित हुए। दयाल और अमरौती के विवाह का प्रस्ताव बखरी गया।

अमरौती बखरी की ठकुराइन बहुरा गोढ़िन की बेटी थी। वह बखरी स्थित कमला-बलान तट के घाट की मालकिन थी। तंत्र साधना और नृत्य में उनका कोई जोड़ नहीं था। उन्होंने दयाल और अमरौती के परिणय को स्वीकृति दी। भीमल के नेतृत्व में भरौड़ा की बरात बखरी पहुँची। बहुरा अपने तंत्र साधना में लीन थी। भीमल भी बखरी पहुँचकर तंत्र पूजन आरंभ किया। दोनों को अपनी साधना में लीन देखकर बारात में आए लोग इधर-उधर टहलने चले गए। उन्हीं दिनों बखरी शहर में जयसिंह सौदागर ठहरा हुआ था। वह अमरौती के अप्रतिम सौन्दर्य पर मोहित था। किसी भी तरह वह अमरौती से विवाह करना चाहता था। दयाल और अमरौती के परिणय से क्षुब्ध जयसिंह दोनों पक्षों को एक दूसरे के खिलाफ भड़काने में सफल हुआ। बारात और गाँव के लोग लड़ पड़े। तंत्र साधना में विघ्न देख बहुरा आग बबूला होकर तंत्र प्रहार करने लगी। तंत्र प्रहार से बरात में आए कई लोग भेड़, बकरी, कौआ, तीतर बन गए। सेनापति भीमल ने अपनी एक आँख गँवा दी। बचे खुचे बराती तंत्र प्रहार से भाग खड़े हुए। नटुआ दयाल सिंह अमरौती के सहयोग से भरौड़ा लौटने में सफल हुआ। वह बहुरा को परास्त कर अमरौती को पाना चाहता था, साथ ही कौआ, तीतर, भेड़-बकरी बने बारात को भी उन्हें मुक्त कराना था। दयाल के गुरु मंगल ने, उन्हें 'कामर कमरच्छा' जाकर 'षष्टचक' तंत्रसाधना के लिए प्रेरित किया। गुरु के निर्देशानुसार दयाल प्रिय मल्लाह विजयमल्ल और झिमल खबास के साथ 'कामर कामरच्छा' के लिए प्रस्थान किया। दुलरा के नेतृत्व में जलपोत कमला बलान गंगा आदि नदियों से होते हुए ब्रह्मपुत्र के तट पर स्थित 'कामर कमरच्छा' पीठ पहुँचा। वहाँ से विजयमल्ल और झिमला जल बेड़ों के साथ भड़ौरा वापस आ गए।

दुलरा दयाल ने कामाख्या शक्ति पीठ के पंडा को कुछ स्वर्ण मुद्राएँ भेंट करते गए, वहाँ कुछ दिनों के लिए ठहरने का प्रबंध करने का निवेदन किया। पंडा अच्छा व्यक्ति था। भरौड़ा के सभी लोग उसी के यजमान थे। उनकी मदद से दयाल को ठहरने की अच्छी जगह मिल गई।

कामाख्या पीठ प्रवास के दौरान दयाल को पता चला कि षष्टचक तंत्र की शिक्षा उन्हें सिर्फ कामा योगिनी साधिका से मिल सकती है, जो कार्तिक अमावस्या की अद्धरात्रि को मंदिर के प्रांगण में तंत्र नृत्य का अभ्यास करती है। नटुआ दयाल सिंह उस दिन की प्रतिक्षा करने लगा। एक दिन मंदिर के प्रांगण में दुलरा से एक कोढ़ पीड़ित बुढ़िया ने ब्रह्मपुत्र में स्नान करा देने का आग्रह किया। दयाल ने उनकी इच्छापूरी की। बुढ़िया ने सदैव विजयी रहने का वरदान दिया। वह कार्तिक अमावस्या का दिन था। दयाल जल्दी - जल्दी स्नान कर, कामाख्या मंदिर परिसर में साधनारत हो गया। ठीक मध्य रात्रि में मृदंग की अलौकिक थाप सुनकर उनकी आँखे खुली। उसने देखा कि हजारों तांत्रिकों , योगनियों के बीच कामा योगिनी उन्मत भाव में षष्टचक नृत्य कर रही है। कुछ ही क्षण के बाद मृदंग बादक थककर बेहोश हो गया। चारों ओर शोरगुल होने लगा। तंत्र साधना में बाधा देख, कामा की भोहें तन गयी। दयाल मृदंग वादन में प्रवीण था। यही अवसर था, कामा को प्रसन्न करने का। उसने तत्काल ही मोर्चा थामते लिया और, मृदंग पर थाप देने लगा। मृदंग की थाप पर कामा बेसुध थिरकने लगी। रात्रि के अंतिम पहर तक वह नाचती रही। तंत्र साधना पूरी होने पर उसने दयाल से मनचाही वस्तु मांगने को कहा। दुलरा ने तंत्र नृत्य सिखाने की याचना की। कामा को अप्रत्याशित आश्चर्य हुआ।

उनका अनुमान था कि एक युवक रतिदान के अलावे और क्या माँग सकता है? कामा, दयाल के इस आचरण से प्रसन्न होकर, तंत्र सिखाने की सहर्ष सहमति दी।

कामा योगिनी द्वारा दयाल सिंह का तंत्र नृत्य शिक्षण आरंभ हुआ। कुछ ही महीने में धरती चक्र, स्वाधि स्थान चक्र तथा मणिपुर चक्र और तंत्र नृत्य में दयाल पारंगत हो गया। प्रशिक्षण के दौरान कामा योगिनी कई बार रति प्रणय की असफल कोशिश कर चुकी थी। लेकिन दुलरा अपने पथ से नही डिगा। कहा जाता है कि जब कभी उनका मन विचलित हुआ, तब-तब मंगेतर अमरौती उनके सहायतार्थ उपस्थित हुई। कामा योगिनी ने दुलरा दयाल से कहा- हमारे पास जो कुछ था, तुम्हें दिया। इससे आगे की विद्या तुम शंखाग्राम की भुवन मोहिनी से सीख सकते हो। नटुआ दयाल सिंह शंखाग्राम के लिए प्रस्थान कर गया।

शंखाग्राम गंगा नदी और बंगसागर के संगम तट पर स्थित बड़ानगर था। यहाँ के राजा जोधी सामन्त के निधन के बाद उनकी बेटी भुवन मोहिनी, रानी माँ के सहयोग से राज्य का देखभाल करती थी। लेकिन राजमाता और प्रजा टंका कपालिक सेबडे दुःखी थे। टंका प्रत्येक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात में एक युवक की बलि देता था। बलि के लिए युवक राज परिवार की ओर से उपलब्ध कराना होता था। ऐसा नहीं करने पर वह अपने तंत्र-मंत्र से नगर को भस्म करने को उद्यत हो जाता था। शंखाग्राम की प्रजा और राजा, टंका के आतंक के समक्ष विवश थे। धीरे-धीरे यह परम्परा बनी कि जो कैदी या अपराधी मृत्युदंड का भागी होता था, उसे ही टंका को दे दिया जाए। इसके अलावे टंका वस्त्र, मद्य, रशद आदि भी धमकाकर ले जाता था। शंखाग्राम में तंत्र नृत्य का वार्षिक अयोजन होता था। इस समारोह में विभिन्न राज्यों के तांत्रिक भाग लेते थे। कहा जाता है कि राजकुमारी भुवन मोहिनी का नृत्य इस समारोह का विशेष आकर्षण था। नटुआ दयाल सिंह इसी वार्षिक आयोजन के दिन चंदन सेठ के नौका पर शंखा ग्राम पहुँचा। यहाँ भरौड़ा के बहुत सारे सौदागर, आढ़तिया और सार्थवाह रहते थे। उन्हीं में से एक आढ़तिया था माधव तिरहुतिया। शंखा ग्राम में उनकी बड़ी धाक थी। उनकी पत्नी अमला बंगालिन व्यापार कार्य में बड़ा सहायोग करती थी। दयाल, माधव के घर ही ठहरा। माधव और उनकी पत्नी ने उनका भव्य आतिथ्य सत्कार किया तथा शंखा ग्राम की समस्याओं से अवगत कराया।

आज बंगेश्वरी पूजन का दिन है। देश-विदेश के प्रसिद्ध तांत्रिक, नर्त्तक राज दरबार में पधारे हुए हैं। उड़िया देश के राजकुमार चन्द्रचूड़, जो जंजीर में जकड़ा है को कपालिक टंका को सौंपने के लिए सभा में लाया गया। चन्द्रचूड़ को एक राजनायिक की हत्या के आरोप में प्राणदंड दिया जाना था। लेकिन नटुआ सिंह चन्द्रचूड़ की जगह स्वयं को नरबलि हेतु प्रस्तुत कर देते हैं। इस अप्रत्याशित घटना से सबके चेहरे फक्क हो गए। कपालिक टंका का भय सबको सताने लगा। दयाल आत्मविश्वास के साथ मुसकराते हुए सभा के मध्य पहुँचकर चन्द्रचूड़ को मुक्त कराया। बौखलाए टंका ने दयाल से पाँच प्रश्न किया। दयाल ने स्थिर चित से पाँचों प्रश्नों के उत्तर दिया। परास्त टंका ने मानवबलि प्रथा की समाप्ति की घोषणा की। चारों ओर दुलरा की जयकार होने लगी। फिर दयाल ने टंका से पाँच प्रश्न किए, सही उत्तर देने में असफल कपालिक ने दुलरा की दासता स्वीकार कर ली। लेकिन दयाल ने लोक कल्याणकारी कार्य करने का वचन लेकर टंका को मुक्त कर दिया। हर्ष उल्लास के साथ बंगेश्वरी पूजन आरंभ हुआ। राजकुमारी भुवनमोहिनी ने देवी को प्रसन्न करने के लिए नर्त्तन आरंभ किया। दयाल ने उनके साथ तीन आरंभिक नृत्य कर, राजकुमारी का दिल जीत लिया। राजकुमारी दुलरा पर मोहित होकर विवाह का प्रस्ताव रखा। लेकिन दुलरा ने अमरौती के बारे में बताकर अपनी असमर्थता जाहिर की। उसने राजकुमार चन्द्रचूड़ और भुवन मोहिनी की शादी करवा दी। राजकुमार चन्द्रचूड़ का राज्य उनके सामन्तों ने हड़प लिया था। उसे वापस दिलाने में दयाल ने मदद की। शंखाग्राम के सार्थवाह के रूप में दयाल ने स्वर्णद्वीप सिन्धली वन, माणिकदह, जावाद्वीव तथा बाली द्वीप आदि की यात्राएँ की। नटुवा दद्याल सिंह राजकुमारी भुवन मोहिनी से अनाहत चक्र, आज्ञाचक्र तथा सहस्त्र दलचक्र तंत्र नृत्य की शिक्षा लेकर शंखाग्राम से बिदा लिया।

वापसी मार्ग में आनेवाले राज्यों के राजाओं, सामन्तों, सार्थवाहों, तांत्रिकों तथा जलपोतों के अधिपति‌यों द्वारा दुलरा का भव्य अभिनन्दन किया गया। दुलरा की वापसी की खबर भरौड़ा और बखरी नगर में फैल गई। जयसिंह दुलरा की सफल वापसी से जल उठा। वह रौसड़ा के राजा कन्दर्पदेव को दयाल सिंह के विरुद्ध भड़काया कि दयाल सिंह रौसड़ा पर आक्रमण करने वाला है। जयसिंह और कन्दर्पदेव ने साजिश रची। कमला पूजा के बहाने दुलरा को रौसड़ा बुलाकर छल से बंदी बना लिया। उधर बहुरा ने काले जादू की शक्ति से रौसड़ा घाट का पानी सुखा दिया। दुलरा के सारे जलयान सूखे में पहुँच गए। जंजीर में जकड़े दुलरा को कोड़ा से पीटने के लिए कन्दर्पदेव ने ज्योंही हाथ उठाया कहा जाता है कि उनका हाथ उठा ही रह गया तथा छाती में जलन होने लगी। कन्दर्पदेव छटपटाने लगे। दयाल के हाथ पैर की बेडियाँ झंकारने लगी। दयाल कमलामाय को स्मरण कर थिरकने लगा। देखते ही देखते हाथ पैर की बेड़ियाँ टूट गई। नदी के जलपोत तैरने लगे। जयसिंह का जलपोत दह-भैंस गया। विवश कन्दर्पदेव दुलरा के पाँव पर गिर पड़े। दुलरा उसका प्राण बक्स भरौड़ा के लिए प्रस्थान किया। भरोंड़ा में दुलरा का भव्य अभिनन्दन किया गया।

लेकिन कमला की धार तो सूख गई थी। वह भरौड़ा से दस मील दूर बह रही थी। दयाल सबसे पहले कमला की खोज में निकल पड़ा। कहा जाता है कि कोयला वीर और सुवानन्द लामा की मदद से कमला को भरौड़ा वापस लाने में सफल रहा। भरौड़ा हर्षोल्लास में डूब गया। उधर बखरी में अमरौती पिय मिलन के लिए उद्यत हो रही थी। उसने अपनी अंतरंग सखी मातंगी के संग तीन पान के बीड़े के माध्यम से संकेतात्मक संवाद भिजवाया। पहला पान कमला धार की वापसी हेतु, दूसरा अमरौति के गौना करवाने हेतु तथा तीसरा पान बखरी में विजयी होने के बाद माँ बहुरा को क्षमादान देने हेतु। दयाल ने तीनों ही पान मुसकराते हुए खा लिया तथा प्रतित्युत्तर में गले का हार देकर मातंगी को विदा किया। दयाल सिंह ने बखरी नगर पर आक्रमण कर वहाँ फँसे बरातियों को वापिस लाया। बहुरा को पश्चाताप हुई, उसने अमरौती को दुलरा के साथ सहर्ष विदा किया। (लोकायायन, लेखक ओम प्रकाश भारती से साभार)

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