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Monday, September 23, 2024

हिमाचल का लोकनाट्य करियाला- ओम प्रकाश भारती

 

                                      हिमाचल का लोकनाट्य करियाला- ओम प्रकाश भारती


करियाला हिमाचल प्रदेश का प्रतिनिधि लोकनाट्य है। सिमौर, सोलन तथा शिमला आदि जिले इसके प्रदर्शन के मुख्य क्षेत्र हैं, परन्तु किसी न किसी रूप में इसका प्रचलन समूचे पश्चिमी हिमालय के पहाड़ी अंचलों में है।

            सर्दियों में पहाड़ शीत शापित हो जाता है। वर्षभर खेतों में कमरतोड़ मेहनत करने के बाद सर्दियों में पहाड़ के दिन आराम के होते हैं। इन्हीं दिनों में पहाड़ गीत एवं नृत्यों की ताल पर थिरक उठते हैं। वैसाखी और दीवाली सर्दी के दिनों के प्रमुख त्योहार है। इसी अवसर पर करियाला का प्रर्दशन किया जाता है।

            करियाला शब्द की कई व्याख्या मिलती हैं । इनमें से दो की चर्चा की जा सकती है। पहला मत है कि ग्रामीण लोग देवताओं के सामने दुःख  निवारण के लिए मनौती रखते हैं। मनौती को पहाड़ी भाषा में करेल भी कहा जाता है। इच्छा पूरी होने पर लोग अपने देवताओं के सामने नाट्य-नृत्य करवाते हैं। चूँकि यह नाट्य देवी, देवताओं की करेल अर्थात मनौती के लिए किया जाता है, इसलिये इस अवसर पर प्रदर्शित नाट्य को करियाला कहा जाता है। दूसरे मतों में, विद्वानो ने करियाला या कराला का सम्बन्ध अनेकार्थक संस्कृत शब्द कराल भयानक/डरावना/हरिण जाति के पशुओं/असुरों-देवों-गंर्ध्वों -किरातों से जोड़ते हुए, इसे आदिम जनजातियों द्वारा प्रदर्शित भयानक (मुखौटाधारी) नाट्य बताया है। दोनों ही अवधारणाएं करियाला लोकनाट्य से मेल खाती है। लेकिन प्रदर्शन के रूप तथा विषय अवलोकन करने से पहला मत अधिक समीचीन प्रतीत होता है।

            करियाला का उद्भव 11वीं शताब्दी के आस-पास धर्मिक अनुष्ठानों से माना जाता है। वैष्णव धर्म का इस पर गहरा प्रभाव पड़ा। कालांतर में समसामयिक सामाजिक प्रसंग भी करियाला मंच के विषय बने। आनुष्ठानिक स्वरुप से परिवर्तित होकर यह सामाजिक प्रतिरोध का नाट्य बनकर उभरा। इसका वर्तमान स्वरूप लगभग 17वीं शताब्दी के आसपास अस्तित्त्व में आया। करियाला प्रदर्शन के लिए किसी मंच विशेष की आवश्यकता नहीं होती है। कलाकार प्रकृति के खुले प्रांगण में प्राय सायंकाल से सुबह तक इसका प्रदर्शन करते हैं। प्रदर्शन स्थल के लिये किसी जगह (लगभग 10-12 फीट) को चार खंभे के सहारे रस्सी से चौकोर (वर्गाकार) घेर लिया जाता है। इस चौकोर स्थान को अखड़ा कहते हैं। प्रकाश के लिये डंडों से तेल के दीये, मशाल या गैसबत्ती आदि लटका दिये जाते हैं। खाड़ा के पास ही चँदोवा टांग कर कमरानुमा घर या तम्बू तैयार किया जाता है, जिसमें करियालचीप्रदर्शन के लिये तैयार होते हैं। इसे ग्रीनरूम कहा जा सकता है। मंच दर्शक तीन ओर से अखाड़ा को घेरते हुये बैठते हैं। मंच के एक किनारे ‘बजन्तरी’ बैठते हैं। करनाल, रणसिंहा, चिमटा, नगाड़ा, दमामटू, शहनाई, बांसुरी, ढोलक तथा खंजरी आदि करियाला के वाद्ययंत्र  हैं। नाट्यारंभ पहले बधाई ताल के साथ पाग चन्द्रवली या चन्द्रौली, चन्द्ररौली नृत्य करते हुये मंच पर प्रस्तुत होती है। चन्द्रावली नटी है। वह बधाई तालके बाद जंगताल और करियाला ताल पर नृत्य करती है। नृत्य धीरे धीरे  शुरू होकर द्रुतगति में समाप्त होता है। कभी-कभी तो चन्द्ररौली के साथ मंच पर डांगर कान्हा (कुल्हारीधारी कृष्ण) नाम का पात्र भी प्रस्तुत होता है। मुख्यखेल आंरभ होने से पहले प्रायः यही मशालों या दीपों को जलाता है। इस सारी प्रक्रिया को अखाड़ा बाँधना कहा जाता है। इस प्रक्रिया को पूर्वरंग समझना चाहिए। पूर्वरंग की समाप्ति मंत्रोचारण वंदना या परिक्रमा द्वारा की जाती है। चन्द्रावली नृत्य करने के पश्चात् ग्रीनरूम में चली जाती है। अखाड़ा में खामोशी छा जाती है। दर्शक उत्सुकता पूर्वक मंच की ओर एकटक देखने लगते हैं। इसी क्षण, अचानकदर्शकों के बीच से या कहीं बाहर से भीड़ को चीरता अलख जगाता हुआ साधू वेशधारी एक व्यक्ति मंच की ओर लपकता है। उसके साथ ही तीन-चार साधु विभिन्न दिशाओं से मंच पर कूद पड़ते हैं। साधुओ के हाथों मे तूम्बा, चिमटा और घंटियाँ रहते हैं। अलख निरंजन के उद्घोष के साथ, कहरवा ताल पर मस्ती में थिरकते साधु, वाद्य मंडली से प्रश्नोत्तर करते हुये विविध प्रकार का स्वांग प्रस्तुत करते हैं। इनमें ज्ञान-ध्यानी, साधु-स्वादु, मुनि-तपस्वी, संत-त्यागी, भले-बुरे सभी प्रकार के साधु होते हैं। बुद्धिमान और मूर्ख साधुओं के स्वांग में हास्य और व्यंग के साथ-साथ दार्शनिकता व आध्यात्मिकता के गूढ़ दृष्टांत भी उभरते हैं। साधु स्वांग के बाद कई अन्य छोटे-छोटे प्रसंगों का अभिनय होता है।  संवाद लिखित नहीं होता है कलाकारों को अपनी बात ज़बानी कहनी होती है। कलाकार अपने संवादो को पद्यात्मक रूप में प्रस्तुत करते हुए प्रायः लोक-धुनों को प्रयोग करते हैं। कुन्जू-चंचलो, गंगी-सुन्दर, मोहणा, लामण और झूरी आदि पहाड़ी गीत और लोक भजन की करियाले में धूम मची रहती है। गिद्ध, लुड्डी, गीह, साका, रासा और रथबेला आदि मनोंरजक नृत्य भी करियाले में छाये रहते हैं। करियाला के कलाकार जिसे करियालची कहा जाता है वे सभी के सभी समाज के पिछड़े और शोषित वर्ग से आते हैं। एशियाई लोकरंगशाला की भाँति करियाली में भी स्त्री पात्रों की भूमिका पुरूषों द्वारा अभिनीत की जाती है। करियाला का सूत्रधार करियालटू और विदूषक बौरा, मसखरा या डण्ड कहलाता है। करियालची स्वयं अपना वेशभूषा और मुखौटा तैयार करते हैं। मुखौटे भयानक होते हैं, जिन्हें काष्ठ, मिट्टी अथवा तूँबों से तैयार किया जाता है। साधु बैरागियों के जटाजूट एवं दाढ़ी-मूँछ घास के रेशों, मकई के मिजरों तथा भेड़-बकरियों के बालों से तैयार किये जाते हैं। मुख एवं बदन सज्जा के लिये आटा, चूल्हे की भस्मी, कोयला-चूना, गेरू प्रयुक्त किया जाता है।

            करियाले में लोकरूचि के विभिन्न कथानकों को छोटे-छोटे झलकियों में प्रहसनात्मक शैली में प्रस्तुत किया जाता है। साधुओं की अनेतिकताएं, छुआछूत की विभीषिका, दहेज प्रथा की निर्ममता, परिवार नियोजन की सार्थकता, शिक्षा की उपादेयता जैसे सभी विषयों से सम्बंधित स्वांग अभिनय करियाला में प्रस्तुत होता है। मनोविनोद करियाला का प्राण होता है। प्रहसनात्मक एकांकियों में लाड़ा-लाड़ी, नट-नट्ट्णी, साहब और मेम, पिलपिली साहब, चना जोर गरम, भागी हुई लड़की, बीकानेरी मालणियां आदि लोकप्रिय स्वांग है। साहब और मेम में भारतीय समाज की अंग्रेजियता पर तीखा प्रहार है तो पिलपिली साहब में नौकरशाही पर कटाक्ष और पति-पत्नी में पारिवारिक जीवन की विसंगतियों पर व्यंगपूर्ण प्रकाश डाला गया है।

            करियाला लोकनाट्य एकांकी, प्रहसन, नृत्य तथा संगीत का सामूहिक रूप है। इन्होंने हिमालयांचल के लोकजीवन को नई दिशा दी है। यह पहाड़ी जनमानस के गले का हार और जन-जीवन की अतीत का वातायन और वर्तमान का दर्पण है।

 

केरल का पारंपरिक नाट्य चविट्टुनाटकम्- ओम प्रकाश भारती

 

                                        केरल का पारंपरिक नाट्य चविट्टुनाटकम्- ओम प्रकाश भारती  

चविट्टुनाटकम् केरल के ईसाइयों द्वारा अभिनीत किया जाने वाला संगीतात्मक लोकनाट्य है। भारतीय लोकनाट्यों की परंपरा में यह एक मात्र ईसाई लोकनाट्य है। इस नाट्यरूप में यूरोपीय विषयों को भारतीय लोकनाट्य शिल्प विधि में प्रस्तुत किया जाता है। केरल के स्थानीय संगीत और नृत्य कला की इस पर विशिष्ट छाप पड़ी है।

            केरल दुनिया की कई संस्कृतियों का संगम स्थल रहा है। अति प्राचीनकाल से यूनानी, रोमन, यहुदी, सीरियाई, अरब, चीनी, पुर्तगाली, डच, फ़्रांसीसी, अंग्रेज और कई अन्य देशों के लोग व्यापारियों, यात्रियों, साहसी नाविकों, इतिहासकारों अथवा धर्मप्रचारकों के रूप में यहाँ आते रहे हैं। इनमें से सबसे अधिक संख्या में ईसाई लोग यहाँ बस गए। इन लोगों ने युद्धाभ्यास के लिए कलरियाँ (युद्ध प्रशिक्षण केन्द्र)स्थापित किए। इन्हीं कलरियोंमें केरल के कुडियाट्टम् जैसी लोकविधा को आदर्श बनाया गया। यह परंपरा कई वर्षों तक चलती रही। बाद के दिनों में रोम केन्द्रित ईसाइयों ने, पुर्तगाल से आए पादरियों के धर्म-दर्शन (जिसमें हिन्दू और ईसाई संस्कृति के समन्वय की बात की गई थी) का विरोध किया। परिणामस्वरूप पूर्व प्रचलित कलरिमें होने वाले प्रदर्शन को बंद करना पड़ा। अब उनकी जगह नयी विद्या की खोज आंरम्भ हुई जिनसे पिछले नाट्यरूपों के अभाव की पूर्ति हो सके। इन्हीं बदलती धर्मिक परिस्थियों में चविट्टुनाटकम् का उद्भव हुआ। इनके नये प्रयोक्ताओं ने भी स्थानीय कलारूपों की उपेक्षा नहीं की। उन्होंने बहुतेरे भारतीय लोककला तत्त्वों का समीचीन समावेश किया। जबकि कथानक बाईबिल, यूरोपीय इतिहास शार्लमेन की जीवन की घटनाओं पर आधरित थे। अतः चविट्टुनाटकम् को केरल का लोकनाट्य कहना समीचीन नहीं होगा। इसे मात्र केरल में विकसित एक नाट्यरूप माना जा सकता है।

            चविट्टु का अर्थ होता है पांव या कदम, नाटकम् यानि नाटक अर्थात किसी भी और विषय को पदचाप द्वारा तालबद्ध अभिव्यक्त करना ही चविट्टुनाटकम् है। इसलिए इस नाटक में कदम विभिन्न प्रकार की तालों में निबद्ध होते है। राजा, सेनापति, देवदूत पुरोहित और वैद्य आदि श्रेष्ठ पात्रों के लिए पद संचालन विशिष्ठ प्रकार का होता हैं, जबकि चोर, जल्लाद ठग जैसे निकृष्ट पात्रों का पदताल भिन्न प्रकार का होता है। स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुषों द्वारा अभिनीत किए जाते है। पुरुष और स्त्री दोनों के लिए पृथक पदताल होते हैं। पुरुषों का पदताल तांडव से प्रभावित होता हैं जबकि स्त्रियों के पदताल में लास्य की लटक होती है। कदम मूलतः बारह प्रकार के होते हैं। जिसमें कवितम्, कलशम्, एड़क्कलाशम् आदि बुनियादी पदताल माने जाते हैं। चविट्टुनाटकम् का अंग विक्षेप कथकलि और मोहिनिट्टृम् से विशेष साम्य रखता है। संगीत चविट्टुनाटकम् का अनिवार्य अंग है। सारे संवाद पद्य में तथा गेय होते हैं। गद्य संवाद नहीं के बराबर प्रयुक्त होते हैं। गीतों के माध्यम से ही कथावस्तु को आगे बढ़ाया जाता है। मंच पर गीत की पंक्तियां गाने वाले तीन व्यक्ति होते हैं। पात्र, गुरु और सहायक। पहले पात्र खुद गीत गाता है, उसके बाद गुरु और अन्य सहायक गाने लगते हैं। वाद्ययंत्रों में बेला, बाँसुरी, बुलबुल, हारमोनियम के अलावे तेज आवाज वाली इलतालम और चेण्डा का भी प्रयोग किया जाता हैं।

            चविट्टुनाटकम् का मंचन वर्ष में कम से कम दो बार खासकर क्रिसमस व ईस्टर के अवसरों पर गाँव के खुले मैदान में किया जाता है। लड़की के पटरों से तीन फीट ऊँचा तथा 40 फीट लम्बा, 12 फीट चौड़ा मंच तैयार किया जाता है। मंच के दोनों तरफ द्वारमंडप बनाये जाते हैं। अलंकृत द्वारमंडप राजभवन का प्रतिनिधत्त्व करता है। प्रकाश व्यवस्था मशालों द्वारा की जाती है। मंच के एक कोने में मसीही क्रॉस के सामने कांस्यदी जलाई जाती है। चेण्डा (नगाड़े) की पहली चोट पर अभिनेता रूपसज्जा में जुट जाते हैं। तीसरी बार चेण्डा पर चोट करते ही गुरु नाटक प्रारंभ होने की सूचना देता है। उसके बाद गुरु सहित सभी सहभागी प्रार्थना में भाग लेता है। तत्पश्चात गुरू और लेखक के प्रति आभार ज्ञापन किया जाता है। मुख्य खेल आरंभ होने से पहले नाटक के कुछ दृश्यों के बारे में संक्षेप में बताया जाता है, फिर दर्शक के अभिवादन हेतु थूंतियोगर (सैन्य वेशधारी अल्प वयस दो लड़के) मंच पर उपस्थित होते हैं। दर्शकों के अभिवादन के बाद गुरु को प्रणम करते हैं तथा गुरु दक्षिणा के रूप में कुछ वस्त्र एवं रूपये भेंट करते है। लड़को को मंच पर से जाते ही, स्त्री भेषधरी लगभग सात आठ पुरुष नर्तक लास्य कदमों के साथ प्रार्थना करते हुए मंच पर प्रस्तुत होते हैं। नर्तकों को मंच पर से जाने के बाद मुख्य खेल आरंभ होता है, जिसका प्रदर्शन सुबह तक चलता है सुबह मंगलम गायन से नाट्य प्रदर्शन समाप्त होता है।

चविट्टुनाटकम् में गुरु जिसे अशान कहा जाता है, पूर्वाभ्यास से लेकर प्रस्तुति के अन्त तक उनकी विशिष्ट भूमिका होती है। विदूषक, जिसे कटियककारन कहा जाता है। नाटक की घटनाओं और पात्रों क्रिया-व्यापारों पर हास्य-व्यंगपूर्ण टिप्पणी करते हुए दर्शकों का मनोरंजन करता है। वह नाट्य संचालन में सहयोग करता है। किसी भी दृश्य में मंच पर आने और बोलने की पूरी स्वाधीनता उसे प्राप्त होती है।

            चविट्टुनाटकम् की रूप-सज्जा और वेशभूषा याथार्थवादी होती है। अधिकांश चरित्र राजा और सैनिक होने से वेशभूषा मँहगी होती है। सैनिक पात्र अक्सर यूनानी-रोमन वेश धरण करते हैं।

            नाट्यालेख छपे हुये रूप में उपलब्ध् नहीं होता है। प्राचीनतम और लोकप्रिय नाटक कार्ल्समैन है। मलयालम भाषा में शार्लेमैन का उच्चारण ही कार्ल्समैन है। इसमें सन् 768 ई. से 814 ई. तक पश्चिमी यूरोप और रोम पर शासन करने वाले चार्ल्स बादशाह और उसके बारह सेनापतियों के वीरतापूर्ण युद्धों की उद्वेगपूर्ण घटनाओं को दर्शाया गया है। कथा की घटना-योजना, पात्र-सृष्टि आदि तत्त्वों पर यूनानी पुराणों का स्पष्ट प्रभाव लक्षित होता है भारतीय रंगदर्शन के अनुकूल नायक परिकल्पना, संकलनत्रय, कथागीत आदि का निर्वाह किया गया है जो इस नाट्यशैली को भव्यरूप प्रदानकरते हैं। कुछ नाटक सामाजिक समस्याओं को लेकर भी रचे गयें हैं जैसे धर्मिष्ठ सत्यपाल, ज्ञानसुन्दरी, कोमलचरित, जानकी आदि। आंरभ में (16वीं सदी) ये सारे नाटक तमिल भाषा में थे जो अब अप्राप्य हैं। इन दिनों तमिल मिश्रित मलयालम इन नाटकों की भाषा है।

            अपने प्राचीन युद्ध कौशल की समृद्ध धरोहर के रूप में यह लोकनाट्य आज भी सुरक्षित है। कई अर्थों में यूरोपीय ऑपेरा से प्रभावित होते हुए भी भारतीय लोकनाट्य शिल्पों का इसमे सरस समन्वय हुआ है। चविट्टुनाटकम् भारतीय लोकरंगशाला का अमूल्य धरोहर है।

 

Sunday, September 22, 2024

मिथिला में भगैत गायन परंपरा - प्रो. (डॉ.) ओम प्रकाश भारती

 

मिथिला में भगैत गायन परंपरा 

प्रो. (डॉ.) ओम प्रकाश भारती

मिथिला  में गाथाओं को प्राय: गीत, भगैत तथा महराय कहने का प्रचलन है। गाथा गायक को भगतिया, महरइया तथा गुदररिया कहा जाता है । भगतिया मूल रूप से भक्तिपरक गाथाओं को गाते हैं । भगैत परंपरा में धर्मराज के पंजियार – उदय साहू, जोति, बेनी, अंदु ,हरिया डोम तथा मीरा साहेब /सुल्तान की गाथाएँ गायी जाती है। लोक देव कारू खिरहरी, बिसु राऊत, कारीख तथा बखतौर-बसाबन आदि  की गाथाएँ  भगैत की श्रेणी में आती है।

उत्तर बिहार विशेषकर कोसी अंचल तथा नेपाल के मधेश अंचल के यदुवंशियों/यादवों के बीच लोक देवता धर्मराज की पूजा की जाती है। इस अंचल के यादव समुदाय के लोग अंधक और वृष्णि वंश की शाखा से जुड़े हैं। ये शाखाएँ पश्चिम भारत के गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के ब्रज और मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में निवास करते थे। श्रीकृष्ण का जन्म यादवों के वृष्णि वंश में हुआ था । महाभारत के अनुसार श्रीकृष्ण अंधक और वृष्णि गण के मुखिया थे। इतिहासकार के. पी. जयसवाल, अल्तेकर और रोमिला थापर ने अंधक और वृष्णि के बीच गणतांत्रिक शासन व्यवस्था प्रचलित होने का उल्लेख किया है। कालांतर में ब्रज क्षेत्र के यादवों का गंगा के उत्तरी भाग स्थित वैशाली जनपद में आगमन हुआ, जो बृज्जी /ब्रज्जी (ब्रज के बासी) कहलाए । बृज्जियों ने ही वैशाली जनपद में विश्व के प्राचीनतम गणतन्त्र की स्थापना की। फ़्रांसीस बुकानन ने 1808 ई . भक्तिया का उल्लेख किया है(एकाउंट  ऑफ दी  डिस्ट्रिक्ट ऑफ पूर्णिया, पृ . 516 )।  मिथिला में भगैत गायन की परंपरा लगभग सोलहवीं सदी से प्रचलित है।  

            धर्मराज की पूजा पश्चिम भारत के गुजरात, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र  में यादव तथा गुजरों के बीच भी प्रचलित है। धर्मराज मूलत: सत्य एवं नैतिक मूल्यों के संरक्षक देवता हैं। धर्मराज को एक देवता नहीं बल्कि पंथ मानना चाहिए । धर्मराज की उपासना में कोई कर्मकांड या अंध विश्वास को स्थान नहीं दिया गया है। केवल सत्य और मानवीय मूल्यों का अनुसरण किया जाता है । धर्मराज एक पथ प्रदर्शक देवता हैं, उसके पाँच  पंजियार हैं- उदय साहू , ज्योति, हरिया, बेनी, अंदु । पंजियार को पैगंबर समझा जा सकता है । इन पाँच पजियारों की अलग जातियाँ हैं, यथा ; ज्योति दुसाध ,हरिया डोम, बेनी यादव, उदय तेली  तथा अंदु माली जाति से हैं । इन सभी पंजियारों ने अपने जीवन चरित्र से उच्च मानवीय मूल्यों तथा लोक आदर्शों की स्थापना की । इनके जीवन गाथा को भगतिया गाते -सुनाते हैं, जिसे भगैत  कहा जाता है। इन चार पंजियारों के साथ बाबू कालीदास तथा मीरा साहेब/पीर /दातार की गाथा भी गाई जाती है ।  बाबू कालिदास की गाथा संस्कृत के कवि कालिदास  तथा श्रीकृष्ण के जीवन कथा से लिया गया लगता  है। यह गाथा काल्पनिक तथा चमत्कारिक है। मीरा साहेब तुर्क मुसलमान है ।  पश्चिम तथा उत्तर भारत के पाँच पीरों में मीरा साहेब का नाम भी आता है। गुजरात के उंझा (मेहसाना) में  मीरा पीर का दरगाह है। गुजराती परंपरा के अनुसार उन्होंने  काला जादू करने वाले तंत्रिकों को दंडित किया तथा शहीद हो गए। लेकिन भगतिया इसकी गाथा कुछ अलग गाते हैं। गाथा में उल्लिखित भौगोलिक परिवेश उत्तर तथा पश्चिम भारत की है। हो सकता यह गाथा यादवों के साथ प्रवजन के दौरान साथ आयी हो।

 

            भगैत  दल में लगभग सात-आठ व्यक्ति होते है। झाल और टुभकी  (तन्तु वाद्य) के साथ कथागायन प्रस्तुत किया जाता है। वर्ष में एक बार चैत्र शुक्ल पक्ष के  एकादशी के दिन भगतियों की एक सभा होती है. जिसे 'सहमिलन' कहा जाता है। इस 'सहमिलन' में लगभग चार सौ दल भाग लेते है। 72 घंटे तक अनवरत गायन चलता है अलग-अलग दल आते है और गायन प्रस्तुत कर चले जाते हैं । धर्मराज के पूजा घर को गहबर अथवा गौसाएँ घर कहा जाता है। गहबर बास डीह के पश्चिमी भाग में पूरब रुख का होता है। गहबर में बहुत नेम –टेम का अनुपालन किया जाता है। गहबर में  देवता पिंडी/पीरी बनी होती है , जो चिकनी मिट्टी से अर्द्ध वृताकर /गोलाकार  मिट्टी के ही छोटे चबूतरे  पर  बना होता है ।  पिंडी की मिट्टी गंगा नदी से लाये जाने की परंपरा है। यह धर्ममराज का पिंडी माना जाता है । इसकी स्थापना अनुष्ठानिक विधि से भगत द्वारा किया जाता है। इस अनुष्ठान में कोई पुरोहित नहीं बुलाया जाता है। पिंडी के दाहिने ओर चबूतरा के नीचे प्रतिकात्मक रूप से गईयाँ स्थापित होता है तथा उसकी पुजा की जाती है।  गईयाँ कुल देवी अथवा कुल देवता होता है।

             भगतिया मूल रूप से जोति, हरिया , बेनी ,अंदु तथा मीरा साहेब के जीवन चरित्र को गाते हैं।  जोति पंजियार पुहपी पुर गाँव (संभवत: नेपाल में स्थित) के रहने वाले थे। धर्मराज कोढ़ी के भेष में जोति के घर उनकी  परीक्षा लेने जाते  हैं। जोति कोढ़ी का अपमान करते हैं। जोति धरम के पंजियार हैं, उनसे चूक होती है। धरमराज उनकी कंचन काया हरकर उसे कोढ़ दे देता है। अब कोढ़िया काया लेकर जोति नगर में कैसे रहेगा , वह केदुली वन चला जाता है। बारह वर्ष कौल काटने के बाद पुन: पोहपी पुर लौटकर धर्मराज की सेवा करता है। अछमित पुर के  हरिया डोम के घर  धर्मराज परीक्षा लेने अतिथि के रूप में पहुंचते हैं और मानव मांस खाने की इच्छा व्यक्त करते। हरिया आतिथ्य के जाना जाता था। अतिथि के लिए अपने पुत्र की बलि दे देता है। धरमराज हरिया से प्रसन्न होता और उसके पुत्र को पुनः जीवित कर देता है। बेनी मुगलों से तंग आकर फरकिया (भागलपुर ) से सवा लाख गाय लेकर पररी (सहरसा)आ जाता है । वनगाँव के राजा जुगल खां के मृत पुत्र को जीवित कर देता है। जुगल खां प्रसन्न होकर बेनी को बावन एकड़ का चरागाह दान में देता है। बेनी मुगल से टक्कड़ लेता है। स्त्री तथा पशुओं की रक्षा के लिए हुरियाहा प्रथा का आरभ्म करता है । सुकराती  के दूसरे दिन सूअर के बच्चे को बांस में लटकाकर हुरियाहा दिया जाता है। जिस क्षेत्र में हुरियाहा होती थी वहाँ के पशुओं को मुगल जबरन हांक कर नहीं ले जाते थे। धरमराज पंथ के अलावा कारू खिरहरी और बाबा बखतौर का  भगैत प्रचलित है। सहरसा जिले के मैना महपुरा गाँव में कारू बाबा का थान है। कारू बाबा पशु रक्षक देवता माने जाते हैं। बाबा बखतौर का जन्म सहरसा जिले के गढ़िया –रसलपुर गाँव में हुआ। नौहट्टा के आततायी राजा दलेल सिंह  के शोषण खिलाफ युद्ध किया । वैशाली जिला स्थित पाना पुर लंगा में बाबा बखतौर और बसवन थान हैं। बाबा बखतौर का भगैत मिथिला के अलावा बज्जिका तथा मगध क्षेत्र में प्रचलित है।

इस तरह भगैत  गायन  मिथिलांचल का सांस्कृतिक धरोहर है। भगैत के आदर्श नायकों के जीवन चरित्रों ने  मानव मूल्यों के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । अवश्यकता है इसे संरक्षित करते हुए नए अर्थों  इसकी व्यख्या करने की।

            धर्मराज  पंथ में किसी मूर्ति की पुजा नहीं की जाती है। और ना ही यहाँ कोई अवतारवाद की अवधारणा है। देवता धर्मराज के सभी पंजियार मानव है तथा उनका जन्म माँ की कोख से हुआ है। कुछ हद तक वे ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। लोक परम्पराओं के अनुसार सभी पंजियारों का जन्म भारतीय इतिहास के उत्तर मध्यकाल तथा उपनिवेश काल में हुआ। सभी पंजियार पशु रक्षक हैं, मानवता तथा मानव मूल्यों के रक्षक हैं। उनके जीवन के त्याग, समाज के लिए दिये गए बलिदान को भगतिया बार –बार गाते हैं । समाज भी उसे बार –बार सुनना चाहता है।  सही अर्थों में धर्मराज पंथ लोक परंपरा के मानवतावाद की उस शृंखला में है, जहां मानव को श्रेष्ठ बताया गया। यहाँ धार्मिक आडंबर और कर्मकांड धराशायी है। वर्ण व्यवस्था , जाति भेद , छुआ- छूत, धर्म विभेद कुछ भी मान्य /स्वीकार्य नहीं है। धर्मराज पंथ के अनुयायी प्राय: यादव हैं और पंजीयारों की जाति में ज्योति दुसाध, हरिया डोम, बेनी यादव, उदय तेली  तथा अंदु माली है। हिन्दू  वर्ण व्यवस्था में  दुसाध और डोम को अछूत माना जाता रहा है। लेकिन यहाँ पूजित है। मीरा साहिब मुसलमान है ।  भगैत की कथा के अनुसार जब वह नूजागढ़ लड़ने के लिए दल फौज साजता है, तो उसका घोड़ा हंसराज उसे गंगा स्नान कर पवित्र होने कहता है। गंगा पच्चीस कोस दूर है। वह अल्लाह को स्मरण करता है और गंगा वहीं बहने लगती है। यह गाथा साझी संस्कृति और विरासत का नायाब अवदान है।   

 

कश्मीर का लोकनाट्य भांड़ पाथेर – ओम प्रकाश भारती

 

                                        कश्मीर का लोकनाट्य भांड़ पाथेर ओम प्रकाश भारती

भांडजश्न या भांडपाथेर  कश्मीर का लोकनाट्य है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है भांडऔर जश्न। भांड कश्मीर के वाथोरा,कुलग्राम, वायोर, एकीग्राम, बुमूज और एटामुकाम क्षेत्र में बसने वाली कलाजीवी समुदाय है।   जश्न फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है सामूहिक रूप से मनाया जाने वाला उत्सव। इस प्रकार  भांडजाति द्वारा मनाया जाने वाले नाट्योत्सव को भांड जश्न कहा जाता है।  भांड पाथेर की एक अन्य व्याख्या भी है-भांड शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के भण्डधातु से हुई है, जिसका अर्थ होता है मसख़रा और पाथर शब्द संस्कृत शब्द पात्र का कश्मीर रूप है। अतः भांड पाथर का अर्थ हुआ भांडो द्वारा पात्रों का अभिनय या नकल करना । भांडों की परम्परा बहुत पुरानी है। लगता है नाट्यशास्त्र के रचियता भरत-मुनि भांडों से परिचित थे। पुष्कर आदि घन वाद्यों का वर्णन करते समय उन्होंने माना है कि इस वाद्य-विशेष की रचना भांड-वाद्य के  आधार पर हुयी।

            15वीं शताब्दी के आस-पास कश्मीर के ग्राम्यांचल में भांडजश्नका उद्भव और विकास हुआ। कश्मीर सहित सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र पर शैव मत का व्यापक प्रभाव रहा है। कश्मीर के अनेक राजा शैवमतावलम्बी थे। नटराज शिव नृत्य और संगीत के आदि देव हैं। शिव की अराधना के लिए मंदिरों में नृत्य गीत प्रस्तुत होते थे । कहा जाता है कि 10वीं शताब्दी के प्रसिद्ध  महाराजा चक्रवर्मन ने सम्मानपूर्वक एक नर्त्तकी से शादी की थी। कश्मीर के अकबर के नाम से प्रसिद्ध  जैनुल अबेदिन के दरबार में हाफीज़ाओंद्वारा प्रस्तुत हाफिज़नामेंके आयोजनों से गज़ब का समां बंध जाता था। कालांतर में 15वीं शताब्दी के आस-पास राजनैतिक परिवर्तनों के कारण कलाओं को राजाश्रय मिलना बंद हो गया। परिणमस्वरूप शास्त्राय नृत्य, संगीतों की परम्परा अवरूद्ध  हो गयी। इनके सभी कलाकार गाँव चले गए। और पूर्व प्रचलित नृत्य, गीत और संगीत की परम्परा में नाटकीय और लोकतत्त्वों का समावेश कर जश्नका आरंभ किया। भांड पाथेर का उल्लेख कश्मीरी सूफी संत शेख नूरुद्दीन नूरानी ने अपनी कविताओं और अंग्रेजी लेखक सर वाल्टर लारेंस ने अपनी यात्रा वृतांत में किया है।

            यों तो वर्षभर जश्न का आयोजन किया जाता है। लेकिन कश्मीर घाटी में वसंत और ग्रीष्म  ऋतु में लगने वाले मेले तथा उर्स आदि के अवसर पर इसका प्रर्दशन अनिवार्य रूप में होता है। शाम ढलते ही नगाड़े की आवाज सुनकर दर्शक जुट जाते हैं। प्रर्दशन सुबह तक चलता है। कभी-कभी दिन में भी इसका प्रर्दशन किया जाता है। ईद के मौके पर कलाकार गांव-गांव और शहरों में जाकर खुशी और उल्लास से भरे नाटक पेश करते थे। लोग भांडों के इतने मुरीद थे कि वे उनके प्रदर्शन का बेसब्री से इंतजार करते थे। पहले, भांड  पाथेर भी शादी की रस्मों का अहम हिस्सा हुआ करता था। भांडों के बिना कोई भी दूल्हा-दुल्हन अपनी शादी की तैयारी नहीं कर पाता था। लगभग हर दिन भांड कोई न कोई नाटक करते थे। लोग उनके इर्द-गिर्द इकट्ठा होकर भांड पाथेर देखते थे, जो उन दिनों मनोरंजन का एक लोकप्रिय साधन था।

            भांड कलाकार सिपर्फ मुसलमान होते हैं। कहा जाता है की स्वतंत्रता से पूर्व कुछ हिन्दू भी भण्डाई करते थे। लेकिन अब वे इसे पूर्णतया छोड़ चुके हैं। भांडों के मुखिया/गुरु  को मागुन कहते हैं। मागुन संस्कृत भाषा के मार्गनः या महागुणी शब्द का कश्मीरी रूप लगता है। आमतौर पर मागुन ही राजा का अभिनय करता है। राजा सिर पर पगड़ी तथा लम्बा चोगा पहनता है। स्त्रा पात्रों की भूमिका युवकों द्वारा अभिनीत की जाती है। वे पेशवाज पहनते हैं और सिर पर दुपटे रखते है। अन्य पात्रों की वेशभूषा रोज़मर्रा का पहनावा रहता है। मसख़रा हस्यापद टोपियाँ तथा चादर पहनता है। वह चुटीले संवादों के साथ मंच पर आता है और आद्यान्त हास्य-व्यंग की बौछारों से दर्शकों का दिल जीत लेते  हैं।

भांड जश्न में पांरपरिक कश्मीरी संगीत सूपफ़याना कलाम का प्रयोग किया जाता है यह भारतीय, ईरानी और कश्मीरी संगीत सूपिफ़याना कलाम का प्रयोग किया जाता है। यह भारतीय, ईरानी और कश्मीरी संगीत प(तियों के सम्मिश्रण से बना है। इसके कुछ रागों के नाम इस प्रकार हैं जंजोटी, दुगाह, रास्त, तबरोज़, सुबह कल्याण, तोड़ी बहार, बड़ रंग, स्वारी, गतका तथा हदिंपोश इत्यादि।

            वाद्ययंत्रों में ढोल, नगाड़ा और सुरन (नीचे घंटी के आकार की आउटलेट वाली लकड़ी की बांसुरी) आदि प्रमुख होते हैं। प्रत्येक नाटकों में पात्रों के प्रवेश, नृत्य तथा अनरूप  कार्यकलापों के लिये भिन्न-भिन्न मुकाम (रागनियां) और घुने बजाई जाती हैं। हंज पाथेर, बकरवाल पाथेर, शिकारगाह पाथेर, वटल पाथेर, गोसाईं पाथेर और अंग्रेज पाथेर के प्रदर्शन  की पहचान सांगीतिक धुनों हो जाती है।

            ‘भांड जश्नके मंचन का विषय समसामयिक तथा सामाजिक होता हैं। इनमें उन राजाओं का उपहास किया जाता है, जिन्होंने जनसामान्य का शोषण किया है। भांड अपनी मजबूरियों, कमजोरियों और पूरी न होनेवाली आकांक्षाओं पर व्यंग ही नहीं करते, बल्कि उपहास करते हुए उनपर प्रकाश भी डालते हैं। भांड शैली में खेले जानेवाले नाटक के नाम हैं- दरद पाथर, आरमान्य पाथर, वातल पाथर, बटअ पाथर, राजा पाथर, अंग्रेज पाथर और बकरवाल पाथर आदि। ये नाटक मौखिक होते हैं । पात्रों को घटना क्रम का पता होता है । पात्र घटनाओं के अनुरूप संवादों की आशु रचना करते हैं।

            गोसाईं पाथेर, शिकारगाह पाथेर और बादशाह पाथेर में राज्य में व्याप्त सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक दुविधाओं को दर्शाया गया है। साथ ही, इन प्रदर्शनों में नकल, व्यंग्य और हास्य के माध्यम से समाज में व्याप्त  मौजूदा तनाव और पाखंड को दर्शाया गया है।

लुक पाथेर : इसमें एक कलाकार एक सैन्य अधिकारी की भूमिका निभाता है जो बंदूक की मांग करता है, जिसे दूसरा कलाकार, जो एक अपढ़ कश्मीरी की भूमिका निभा रहा है, गलत अर्थ में 'गाने' को  समझ लेता है, जो कश्मीर में एक आम गांव का नाम है। इस प्रतिक्रिया के कारण सैन्यकर्मी उससे बंदूक दिखाने का अनुरोध करता है, और बाद में उसे पता चलता है कि उसकी बात को अनपढ़ कश्मीरी ने गलत समझ लिया था।

वुंट वाली पाथेर : यह पहाड़ियों द्वारा कश्मीरियों की अधीनता को दर्शाता है। बुहिर पाथेर और बाटा पाथेर एक ही विषय के दो अलग-अलग रूप हैं। बुहिर एक पंडित व्यापारी का प्रतिनिधित्व करता है, और बाटा एक सामंती शासक का प्रतिनिधित्व करता है। इस  नाटक में  कश्मीरी पंडित के सामाजिक वर्चस्व को दिखाया गया है। यह दर्शाता है कि पंडित, अपनी कम संख्या के बावजूद, उस समय समृद्ध थे, प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर थे और व्यापारियों और सामंती प्रभुओं के रूप में व्यापार के अधिकांश हिस्से को नियंत्रित करते थे। कथानक दो पंडित परिवारों के बीच झगड़े के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसके शिकार मुख्य रूप से गरीब अशिक्षित मुस्लिम किसान हैं। नाटक का मूल स्वर है शोषण का प्रति चित्रण । यह उत्पीड़ित प्रशासनिक व्यवस्था में अराजकता को भी दर्शाता है, जिसमें एक आम आदमी को बिना किसी अपराध के दंडित किया जाता है जबकि बदमाशों को पुरस्कृत किया जाता है और उन्हें दंडित नहीं किया जाता है।

शिकारगाह पाथेर : शिकारगाह पाथेर एक नृत्य -नाटिका है, जिसका नाम शिकारगाह के नाम पर रखा गया है, जो मुगलों द्वारा कश्मीर पर शासन करने के दौरान बनाया गया एक बड़ा अभयारण्य है, जो श्रीनगर से लगभग 40 किलोमीटर दूर एक गाँव में स्थित है। यह प्रदर्शन जंगलों और वन्यजीवों की बुनियादी ज़रूरतों और लाभों को दर्शाता है, साथ ही यह भी दर्शाता है कि कैसे लोगों को आपसी लाभ के लिए जंगल और उसकी प्रजातियों के साथ शांति से रहना चाहिए। कथानक एक शिकारी के शिकार अभियान के इर्द-गिर्द घूमता है, कैसे वह जानवर को मारता है, और कैसे उसे वन अधिकारियों, या तथाकथित वन रक्षकों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। 'शिकारगाह पाथेर' का उद्देश्य पर्यावरण, वन्यजीव और पारिस्थितिकी की रक्षा करना था। नाटक आज के समाज में भ्रष्टाचार के व्यापकता को उद्घाटित करता है।

बकरवाल पाथेर : यह नाटक  पहाड़ी क्षेत्रों के एक चरवाहे कबीले बकरवाल के रूप में जाने जाने वाले पिछड़े वर्ग के जीवन को दर्शाता है। व्यापारियों द्वारा बकरवालों के शोषण को यहाँ दर्शाया गया है। बकरवालों को लूटने के लिए, व्यापारी जानबूझकर उनकी भाषा के बारे में अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं। यह दूसरी भाषा में संवाद करते समय सावधानी बरतने के महत्व को भी रेखांकित करता है, क्योंकि एक ही शब्द के अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं ।

दरद  पाथेर : यह अफगानिस्तान के शासक वर्ग के प्रतीक दरद  के अधीन कश्मीर को दर्शाता है। यह नाटक दरद  शासकों की हिंसा और दमन का एक स्पष्ट उदाहरण है। चूँकि नाटक में दर्द शासक को एक ड्रग तानाशाह के रूप में दर्शाया गया है, इसलिए यह शराब और अन्य नशीले पदार्थों के व्यक्तियों और पूरे समाज पर पड़ने वाले नकारात्मक परिणामों को उजागर करता है। नाटक कश्मीरियों के अपने वतन और भाषा के प्रति लगाव को भी दर्शाता है

राजे पाथेर : राजे  पाथेर में सुख चाहने वाले शासकों के कार्यों की आलोचना की गई है। यह कश्मीर में अफ़गानों के शासन को दर्शाता है। नाटक के विषय राजाओं की भव्य जीवनशैली, जनता की उत्पीड़ित स्थिति, व्यापक भ्रष्टाचार और अधिकारियों की चालाकी है


गोंसाई  पाथेर
 : यह नाटक एक कश्मीरी लोक कथा पर आधारित है, जिसमें एक गोंसाई  (साधु) और एक दूधवाली, गोपाली के बारे में बताया गया है, जो गोंसाई से मोहित हो जाती है और धार्मिक चर्चाओं में भाग लेना शुरू कर देती है। आध्यात्मिक ज्ञान की उसकी चाहत उसके साथ उसके संपर्क से जुड़ी हुई प्रतीत होती है।

आर्मेन पाथेर : यह समाज में आर्मेन (सब्जी उगाने वाले) लोगों की जीवन शैली को दर्शाता है। नाटक भिखारी (जबरन मजदूरी) के खतरे की निंदा करता है और उन लोगों का मज़ाक उड़ाता है जो तानाशाहों से खुद को मुक्त करने के लिए व्यवस्था के खिलाफ़ विद्रोह करते हैं। बाल विवाह की प्रथा को भी दर्शाया गया है और उसकी आलोचना की गई है।

अंग्रेज पाथेर : यह अंग्रेजों द्वारा कश्मीरियों पर किए गए अत्याचार को दर्शाता है। यह कश्मीरी भाषा के प्रति प्रेम और अंग्रेजों के सवालों का अंग्रेजी में जवाब देने में अनिच्छा को भी दर्शाता है।

वाटल पाथेर : यह बारह सबसे पुराने पाथेरों में से एक है जो अभी भी प्रदर्शित किए जा रहे हैं। वाटल जनजाति के अस्तित्व के पर चर्चा की गई है। संदेश मुख्य रूप से सामाजिक-सांस्कृतिक है। यह नाटक बाल विवाह, बहुविवाह, वृद्ध पुरुषों द्वारा छोटी उम्र की महिलाओं से विवाह और विश्वासघात जैसी सामाजिक बुराइयों को उजागर करता है।

चकदार पाथेर : यह नाटक ज्मींदारों के अत्याचार तथा निरंकुशता को दर्शाता है। उस समय एक गरीब किसान एक गुलाम चकदार बन गया था क्योंकि उसे सारा काम खुद करना पड़ता था। वह अपने जमींदारों की दया पर जीता था। वह बिना किसी पारिश्रमिक के पूरे दिन खेत में काम करता था। एक किसान को फसल रखने या खुद के लिए उपज सुरक्षित रखने की अनुमति नहीं थी। अगर वह ऐसा करता, तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था। जब इन प्रथाओं के खिलाफ़ एक लोकप्रिय आंदोलन पीड़ित किसानों द्वारा शुरू किया गया था, तो चकदार पाथेर ने लोगों को संगठित करने और उनकी भावनाओं को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इस तरह भांड पाथेर सामाजिक प्रतिरोध का रंगमंच है। हास्य –व्यंग और मसखरी करते हुए अभिनेता जीवन और समय की सच्चाइयों उद्घाटित करता है।